pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 31 अगस्त 2011

न वैसे सिंहासन रहे न वैसे आरूढ़ होने वाले

ऐसा तो नहीं कि गलत इंसान के गलत तरीके से सत्ता हथिया कर किए जाने वाले गलत कार्यों को उस आसन का श्राप मिलता हो कि जा निकट भविष्य में तेरा नाश अवश्यंभावी है?

किसी समय राजाओं के सिंहासन, न्यायाधीश की कुर्सी या पंचायतों के आसन की बहुत गरिमा होती थी। उस पर बैठने वाले का व्यवहार पानी में तेल की बूंद के समान रहा करता था। उसके लिए न्याय सर्वोपरी होता था। उस स्थान को पाने के लिए उसके योग्य बनना पड़ता था। समय बदला, उसके साथ ही हर चीज में बदलाव आया। पुराने किस्से-कहानियों में वर्णित घटनाएं कपोलकल्पित सी लगने लगीं। प्राचीन ग्रंथों को छोड़ दें तो 60-70 साल पहले की कथाओं को भी पढने से लोग आश्चर्यचकित होते हैं कि कहीं ऐसा भी हो सकता था।

राजा विक्रमादित्य का जितना बखान उनकी वीरता, न्याय प्रियता, उनके ज्ञान, चारित्रिक विशेषता, गुण ग्राहकता के लिए हुआ है वह शायद ही किसी सम्राट के लिए हुआ हो। कहते हैं उनके इन्हीं गुणों से प्रसन्न हो राजा इंद्र ने उनको एक विराट सिंहासन भेंट स्वरूप दिया था, जिस पर बैठ कर वे न्याय किया करते थे। उस आसन के उपर तक पहुंचने के लिए बत्तीस सीढियां चढनी पड़ती थीं। हर सीढी की रखवाली एक-एक पुतली करती थी जिससे कोई अयोग्य आसनारूढ ना हो जाए।
विक्रम ने राज-पाट छोड़ते वक्त उस सिंहासन को भूमि में गड़वा दिया था। कालांतर में जब राजा भोज ने शासन संभाला और उन्हें इस बात का पता चला तो उन्होंने उसे जमीन से निकलवा, उस पर बैठ कर राज करने का निश्चय किया। शुभ मुहुर्त में जब उन्होंने उस पर पहला कदम रखा तब उस पायदान की रक्षक पुतली ने उन्हें राजा विक्रम से जुड़ी एक कथा सुनाई और पूछा कि राजन क्या आप अपने को इस सिंहासन के योग्य पाते हैं? राजा भोज ने विचार कर कहा, नहीं। फिर उन्होंने उस लायक बनने के लिए साधना की, अपने को उस योग्य बनाया। इस तरह उन्होंने बत्तीस पुतलियों को संतुष्ट कर अपने आप को उस सिंहासन के लायक बना उस को ग्रहण किया।

यह तो पुरानी बात हो गयी। अभी भी प्रेमचंदजी की कहानियों के पंचपरमेश्वर या और भी धर्माधिकारियों के किस्से मशहूर हैं, जो इन गरिमामयी आसनों पर बैठ अपने पराये को भूल सिर्फ न्याय करते थे। पर अब इन आसनों को अपनी योग्यता या काबिलियत से हासिल नहीं किया जाता। उसे पाने के लिए साम-दाम-दंड़-भेद हर तरह की नीति अपनाई जाती है। शायद इसी लिए उस पर बैठते ही बैठने वाले पर कोई आसुरी शक्ति हावी हो जाती है, जिससे आसनारूढ को सब अपना ही अपना दिखने लगता है। वह अच्छे को छोड़ सिर्फ बुरा ही बुरा करने पर उतारू हो जाता है। अपनी गलत बातों का विरोध करने वाला उसे अपना कट्टर दुश्मन लगने लगता है। उस आसन पर बैठ सत्ता हासिल होते ही वह अपने आप को खुदा समझने लगता है।

ऐसा तो नहीं कि गलत इंसान के गलत तरीके से सत्ता हथिया कर किए जाने वाले गलत कार्यों को उस आसन का श्राप मिलता हो कि जा निकट भविष्य में तेरा नाश अवश्यंभावी है?





रविवार, 28 अगस्त 2011

अब तो यही प्रार्थना है कि यह लहर सतत बहने वाली धारा बन जाए.

चलिए अंत भला सो सब भला। भले ही पूर्णरुपेण न हो फिर भी अन्ना का अनशन टूटा, देश की जान में जान आई। एक राहत की ठंडी बयार तो मिली। ऐसा भी नहीं है कि सोमवार से पूरा देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाएगा, सारे लोग इमानदार हो जाएंगे, सरकारी कर्मचारी 'चाय पानी' से तौबा कर लेंगे, दफ्तरों में चढावा बंद हो जाएगा, पुलिस वाले चौथ लेना बंद कर देंगे, अकस्मात यात्रा के योग पर लोग बर्थ की चिंता से मुक्ति पा लेंगे, स्कूल-कालेजों में डोनेशन लेना पाप समझा जाएगा, किसान सुखी हो जाएंगे। पर फिर भी दिनों-दिन कुव्यवस्था के कसते शिकंजे पर कुछ तो रोक लगेगी। कहीं न कहीं लोगों के मन पर एक डर तो हावी रहेगा। कहीं न कहीं मजबूरों को एक सहारे का आसरा तो रहेगा। यदि कदाचार में पांच प्रतिशत भी कमी हो पाई तो यह एक उपलब्धी ही होगी।

देखते-देखते कुछ ही सालों में कितनी दबंगता आ गयी थी रिश्वतखोरी में। पहले लुके-छिपे, मेज के नीचे से, पान की दुकान या चाय के बहाने बाहर जा या फिर तीसरे के माध्यम से यह काम किया जाता था पर अब तो सीधे-सीधे दसियों लोगों की मौजूदगी मे बिना किसी डर-भय, लाज-संकोच के रकम खीसे में डाल ली जाती है, वह भी इस अंदाज से गोया सामने वाले पर एहसान कर रहे हों।

पर जो भी इन 10-15 दिनों में हुआ वह ऐसे ही नहीं हो गया। दिल्ली में घटित हो रहे सारे घटनाक्रम पर देश भर की करोडों आंखे टकटकी लगाए देख रही थीं एक निहत्थे, भूखे-प्यासे वृद्ध के मनोबल को। एक ऐसे इंसान को जो अपने लिए नहीं देश की जनता के लिए आ ड़टा था मैदान मे। बिना किसी ड़र के ललकार रहा था, धनबल, बाहूबल से सक्षम उन लोगों को जो अपने आप को देश और देशवासियों के भाग्यविधाता होने की गलतफहमी पाल चुके थे। शीशा दिखा रहा था उनको। उसके व्यक्तित्व में आभास होने लगा था, जन-जन को, गहन अंधकार के विरुद्ध कमर कसे एक दीए का। इसीलिए लाखों हाथ उठ गये, ओट बन कर, उसे आने वाले सरकारी अंधड़ से बचाने के लिए।

इस सरकार का अजीब सा ही रवैय्या रहा है समस्याओं से निपटने का। इंतजार करो और करवाओ, मनोबल तोड़ो, फूट ड़ालो, भड़काओ और फिर अशांति का हौव्वा खड़ा कर अंदर भिजवा दो। यह तरीका कारगर हो चुका था बाबा रामदेव के समय। इस बार भी वही हथकंड़ा अपनाया गया, अहम और ऐंठ से भरे गिने-चुने अदूरदर्शी सलाहकारों द्वारा। पर वे बाबा और अन्ना का भेद नहीं समझ पाए, अंदाजा नहीं लगा पाए जनता के अटूट इरादों का जिसने इन नये मुल्लाओं के हाथों के तोते उड़वा दिए। क्या नहीं किया इन लोगों ने, कौन सा हथकंड़ा नहीं अपनाया। साम-दाम-दंड़-भेद सारे कुचक्र रच कर देख लिए। पर इनका हर वार "बूमरैंग" बन इन्हें ही घायल करता रहा। ये अकेले ही नहीं थे चक्रव्यूह रचने में और भी कुछ लोग इनके साथ अपनी दुकान चलाने का मौका समझ रहे थे इस वक्त को। किसी को यह सब धर्म के खिलाफ लग रहा था तो कोई इसे सवर्णों का जमावड़ा सिद्ध करने की मूर्खता कर रहा था। पर इस अनूठे यज्ञ में जुटे हर वर्ग, हर जाति, हर धर्म के लोगों ने उनकी पल भर में बोलती बंद करवा दुकानें बढवा दीं। क्योंकि जिस कुव्यवस्था के विरुद्ध यह जन-जागरण था उसका कोई धर्म, कोई जाति या कोई वर्ग नहीं होता।

अब तो यही प्रार्थना है कि यह जो लहर उठी है वह सतत बहने वाली धारा बन जाए।

रविवार, 21 अगस्त 2011

हम विरोध जरूर करते हैं, पर देखभाल कर, हर तरफ से निश्चिंत हो कर, सामने वाले को तौल-ताल कर।

विरोध करना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है फिर भले ही वह किसी अच्छे काम के लिए ही क्यों ना किया जा रहा हो। हमारी परंपरा रही है कि हम विरोध जरूर करते हैं, पर देखभाल कर, हर तरफ से निश्चिंत हो कर, सामने वाले को तौल-ताल कर। यदि राई-रत्ती भर की भी अपने अनिष्ट की आशंका होती है तो दीदे दिखा कर तुरंत पीछे जा खड़े होते हैं।

हमने राम को नहीं छोड़ा बाली वध पर प्रश्न खड़े कर-कर के अपने को विद्वान साबित करते रहे। कृष्ण की लीलाओं को सवालों से बिंधते रहे। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिन्होंने मंगल पाण्ड़ेय की क्रांति को धर्म से जोड़ उसकी अहमियत कम करनी चाही। मूढमतियों ने झांसी की रानी पर दोषारोपण किया कि जब तक झांसी पर आंच नहीं आई उनका विद्रोह उजागर नहीं हुआ। महात्मा गांधी को तो खलनायक ही बना दिया गया। बहूतेरे ऐसे ही उदाहरण मिल जाएंगे। पर किसी ने सत्ताधीश पर सीधे आकर आंख मिला आरोप लगाने की हिम्मत की? फिर चाहे चीनी तिगुने दामों वाली हो गयी हो, खाद्यानों की कीमत आकाश छू रही हो, पेट्रोल बजट में आग लगा रहा हो, शराब की कीमत से पानी का मूल्य ज्यादा हो गया हो और फिर भी साफ ना मिल पाता हो, 1-2 रुपये का नमक 20 का कर दिया गया हो, ईलाज करवाने से लोग ड़रने लगे हों, बच्चों को पढाना मुश्किल हो गया हो यहां तक कि अपने ही पैसे लेने के लिए पैसे देने पड़ते हों, विधवाओं, निराश्रितों, पेंशन याफ्ता लोगों को भी "गिद्ध' नोचने से बाज नही आते हों।

हां, नुक्ताचीनियां जरूर करते रहे, अपना दुखड़ा आपस में रोते रहे, बदहाली में जीते रहे पर ऐसा करने वाला या ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करने वाला जब बगुला बन कभी "नीले चांद" के दिन सामने आ भी जाता हो तो सड़कों की ऐसी की तैसी कर दसियों द्वार बना, मनों फूल मालाएं लाद, चेहरे पर कृतज्ञता का भाव ला गला फाड़-फाड़ कर उसका स्तुतिगान करते नहीं थके।

इतिहास गवाह है कि जब-जब क्रांतियां हुई हैं उनका विरोध भी हुआ है। फिर उनके पीछे चाहे कार्ल्स रहे हों चाहे लेनिन चाहे सू, चाहे भगत सिंह और चाहे गांधी। उसी तरह आज भी जब एक चौहत्तर साल का इंसान भूखा-प्यासा रह, हर तरह से अघाए, दूध, चीनी, चावल-गेहूं को तो छोड़ दें, लोहा-लक्कड़, सिमेंट, गिट्टी, सड़क, पुल, जमीन, मशीन यहां तक कि देश के गौरव को भी हजम करने वालों के सामने सीना तान खड़ा हुआ है, वह भी अपने लिए नहीं, तो उसी की मंशा पर शक करने, उसकी कार्य पद्दति पर उंगली उठाने वालों की लाईन लग गयी है। गोया कि उसके साथ खड़े सारे देशवासी बेवकूफ हैं और ये जनाब विशेषज्ञ, वह भी छोटे-मोटे नहीं दसियों सालों से शोध करने वाले। ठीक है माना जा सकता है कि 90 प्रतिशत को बिल का मतलब पता नहीं होगा पर वह उसका अर्थ जान कर अपना ज्ञान बढाने नहीं खड़े हुए हैं वह सब आए हैं, तानाशाही, भुखमरी, लूट-खसोट, शांत जीवन की चाह में एकजुट हुए हैं।

राजस्थान में एक कहावत है कुछ ऐसी कि "रोतो जावेगो तो मरे की खबर लावेगो", तो मेरा यही मानना है कि पहले से ही अंजाम को शंका की दृष्टि से क्यों देखना। बनने दीजिए इस आंधी को तूफान जिससे सड़े-गले, सुखे-जर्जर, कंटीले पेड़ जमींदोज हो ही जाएं। वैसे असर शुरू हो गया है, कहते हैं चोरों में हिम्मत नहीं होती तो खबरें आ रही हैं कि हमारे देश के सेवकों की सुरक्षा बढाई जा रही है। जनता के प्रतिनिधियों को जनता से ही डर लगने लगा है इसीलिए उनके घरों को और महफूज किया जा रहा है। जनता के पैसों को हड़पने वालों की सुरक्षा जनता के पैसों से ही की जा रही है।

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

पहले स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से तिरंगा फहराए जाते वक्त महात्मा गांधी कहां थे?

स्वतंत्रता दिवस आता है चला जाता है। पर कभी किसी ने सोचा कि आजादी के पैरोकार महात्मा गांधी क्यों नहीं उपस्थित थे उस समय जब पहली बार लाल किले से तिरंगा फहराया गया। कहां थे वे, क्या कर रहे थे उस समय? सत्ता मिलते ही उन्हीं को उन्हीं के अनुगामियों ने कैसे भुला दिया?

15 अगस्त 1947, सारी धरती, सारा आकाश, स्त्री-पुरुष, अबाल-वृद्ध सब जने ड़ूबे हुए थे आनन्दसागर मे, हर देशवासी सैंकडों सालों से प्रतिक्षित आजादी को अपने सामने पा खुशी के मारे बावरा बन गया था। देश का बच्चा-बच्चा जिस दिन खुशी से पागल हो उठा था, उस दिन इस जश्न का पैरोकार, इस उत्सव का सुत्रधार, इस स्वप्न को मूर्तरूप देने वाला शिल्पी, देश के एक कोने मे स्थित कलकत्ता मे, अमन चैन की रक्षा हेतु उपवास और प्रार्थना कर रहा था।

महात्मा गांधी ने आजादी की खुशी मे मनाए जा रहे किसी भी समारोह मे भाग नहीं लिया। उनके लिये यह 15 अगस्त भी आम दिनों की तरह ही रहा। रमजान का महीना था। लोग बापू के प्रति आदर व्यक्त कर अपना रोजा खोलना चाहते थे। सो बापू अन्य दिनों की अपेक्षा और जल्दी सो कर उठ गये थे। सुबह आने वालों मे हिंदू भी थे। गांधीजी सबसे मिले। फिर गीता का पाठ करने लगे। इसके बाद सदा की तरह प्रात: भ्रमण के लिए निकल पडे। सडकों पर उनके दर्शन के लिए भीड एकत्रित थी। करीब आठ बजे बापू लौटे और एकत्रित जनों से कहा कि आज हमें आजादी मिली है परन्तु इसके साथ ही हमारी जिम्मेदारी भी बढ गयी है। जिस चरखे ने हमें आजादी दिलाई है उसे हमे नहीं भूलना है। उपवास से हमारा शरीर शुद्ध होता है। इस प्रकार हमें शुद्ध होकर प्रभू से प्रार्थना करनी है कि वे हमें आजादी के काबिल बनाएं। यह हमारी परीक्षा की घड़ी है।


गांधीजी का एक अलग ही सपना था, आजादी को लेकर, वे चाहते थे कि सारे भारतवासी अपने आप को आजादी के काबिल बनाएं। उनका कहना था कि हमें प्रभू को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने हम गरीब भारतवासियों के बलिदान का फ़ल दिया है। आजादी का दिन हमारी परीक्षा का दिन है। इस दिन सब उपवास रखें। चरखा चलाएं। किसी तरह की गडबडी ना हो। आजादी के लिए रोशनी के द्वारा समारोह करना उचित नहीं है। जबकि देश की जनता के पास प्रयाप्त अनाज, तेल और कपडा नहीं है। बापू नहीं चाहते थे कि 1946 की पुनरावृती हो। फिर भी कलकत्ता अशांत हो गया था और उन्हें आजादी का पहला दिन वहीं बिताना पडा था। अमन-चैन की बहाली के वास्ते। बापू प्रार्थना मे मुश्किल से ध्यान लगा पा रहे थे क्योंकि हजारों लोग उनसे मिलने और यह कहने आ रहे थे कि उन्हीं के कारण देश यह दिन देख सका है। इस कारण वे कुछ नाराज से हो गये और उन्होंने भवन का मुख्य द्वार बंद करवा दिया। बाद मे बंगाल सरकार के मंत्रीगण उनसे मिलने आए तो बापू ने स्पष्ट शब्दों मे उनसे कहा कि आज आपने अपने सर पर कांटों का ताज पहना है। सत्ता बेहद बुरी चीज है। आपको गद्दी पर बैठ कर सदा चौकस रहना होगा। आपको सत्यवादी, अहिंसक, विनम्र तथा सहनशील होना होगा। धन-दौलत-सत्ता के लालच मे नहीं फंसना है। आप गरीबों की सेवा के लिए हैं। अंग्रेजों के शासन की परीक्षा तो खत्म हो गयी है अब हमारी परीक्षा का कोई अंत नही ईश्वर आपकी मदद करे। लाख बुलाने पर भी गांधीजी किसी समारोह मे नहीं गये।

शाम को प्रार्थना सभा मे जबरदस्त भीड़ थी। प्रार्थना के बाद उन्होंने फिर जनता को संबोधित कर कहा कि आज आजादी का पहला दिन है। राजाजी गवर्नर हो गए हैं। लोगों ने सोचा कि अब आजादी मिल गयी है, सो उन्होंने राजाजी के घर पर कब्जा जमा लिया। यह अच्छी बात है कि लोग जान गये हैं कि सबको समानता का अधिकार है, पर यह दुख की बात है कि वे सोचने लगे हैं कि उन्हें मनचाहा काम करने, चीजों को तोडने-फ़ोडने और नष्ट करने की भी आजादी मिल गयी है। जनता ऐसा काम ना कर, खिलाफ़त आंदोलन के समय जैसी एकता दर्शाई थी वैसी ही भावनाएं बनाए रखे। उस शाम गांधीजी के साथ सुहरावर्दी भी थे, उन्होने भी बापू के बाद सभा को संबोधित करते हुए हिन्दु-मुसलिम एकता की दुहाई दी, सबने मिल कर जय-हिंद का नारा बुलंद किया। गांधीजी के चेहरे पर उस दिन पहली बार मुस्कान की आभा दिप्त हुई। फिर बहुत अनुरोध करने पर बापू शहर मे की गयी रोशनी देखने निकले। लोगों का सैलाब उनकी ओर उमड पडा। छोटे-छोटे बच्चे बेहद आतुरता से उनके हाथ थामने को लपकते रहे। भीड उन पर गुलाब की पंखुडियों की बौछार करती रही। करीब दस बजे बेहद थक कर गांधीजी लौटे और बिना किसी से बात किए सोने चले गये।

स्वतंत्र भारत की नियती से स्वतंत्रता संग्राम के महानायक की यह पहली मुठभेड थी।

रविवार, 14 अगस्त 2011

भारत के पहले 'इंटरनेट गुरु' शम्मी कपूर नहीं रहे।

अपने समय मे विद्रोही, लीक से हट कर, अपनी विशिष्ट शैली से लाखों लोगों को अपना मुरीद बनाने वाले, अभिनय के दिग्गजों के बीच भी अपनी अलग पहचान बनाए रखने में कामयाब, खिलंदड़े कलाकार के रूप में माने जाने वाले शम्मी कपूर नहीं रहे। उनकी अदाकारी, कलाकारी या अभिनय जैसा भी रहा हो वह अलग बात है पर इंटरनेट को अपनाने वाले वह पहले कलाकार थे। उनका झुकाव नये "गजटों" की तरफ उसी तरह था जैसे एक बच्चे का खिलौनों को लेकर होता है।

बहुत से लोगों को यह जान कर हैरत होगी कि शम्मीजी 1988 से कम्प्यूटर और इंटरनेट का लगातार इस्तेमाल करते आ रहे थे। इस तरह भारत में इस टेक्नोलोजी का सबसे पहले उपयोग करने वाले इने-गिने लोगों में उनका स्थान था।
जब पहली बार वे कम्प्यूटर और प्रिंटर घर लाए थे तो दिन भर उस पर अपने प्रयोग करते रहते थे। एक बार उनके दामाद केतन देसाई के साथ अनिल अंबानी उनके घर आए तो सारा ताम-झाम देख कुछ समझ ना पाये और पूछ बैठे कि क्या शम्मी अंकल ने घर पर ही डेस्क-टाप पब्लिशिंग शुरू कर दी है। इतने बडे ओद्योगिक समूह रिलायंस के अनिल अंबानी द्वारा ऐसा सवाल यह दर्शाता है कि उस जमाने में पर्सनल कम्प्यूटर नाम की किसी चीज से लोग कितने अनभिज्ञ थे। इसीसे यह तथ्य भी पुख्ता होता है कि शम्मीजी भारत में कम्प्यूटर और इंटरनेट के घरेलू उपयोग को बढ़ावा देने वाले रहे हैं। इसीलिए उन्हें भारत का पहला इंटरनेट गुरू या साइबरमैन कह कर पुकारा जाता था।

भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को इस दुख को सहने का सामर्थ्य।

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से ही तिरंगा क्यों फहराया जाता है ?

स्वतंत्रता दिवस की पहली सुबह, सारा देश रात भर सो ना पाया था। अंग्रेजों के चंगुल से लहूलुहान स्वतंत्रता को छीन लाने में हजारों-हजार नवजवान मौत का आलिंगन कर चुके थे। उनकी शहादत रंग लाई
थी। सारा देश जैसे सड़कों पर उतर आया था। लोगों की आंखें भरी पड़ी थीं खुशी और गम के आंसूओं से। खुशी आजादी की, गम प्रियजनों के बिछोह का।
दिल्ली तो जैसे पगला गयी थी। होती भी क्यों ना आजाद देश की राजधानी जो थी। हुजूम का हुजूम, ठट्ठ के ठट्ठ बढे जा रहे थे लाल किले की ओर। आज यह एतिहासिक किला भी फूला नहीं समा रहा था अपने भाग्य पर। बहुत उतार-चढाव देख रखे थे इसने अपने जीवन काल में, जबसे शाहजहां, ने उस जमाने में करीब एक करोड़ की लागत से इसे नौ सालों में बना कर पूरा किया था,
तब से आज तक यह अनगिनत घटनाओं का साक्षी रहा था। इसे यह गौरव ऐसे ही नहीं मिल गया था।

1857 की क्रांति में स्वतंत्रता संग्राम के वीरों ने अंग्रेजों को मात दे कर यहीं बहादुर शाह जफर को अपना सम्राट चुना था। किला गवाह है उस इतिहास का कि कैसे बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने मौत का तांडव शुरु कर दिया था। हजारों वीर मारे गये थे, कितनों को फांसी पर लटका दिया गया था, सैंकडों को काला पानी नसीब हुआ था। बुढे शेर को कैद कर रंगून भेज दिया गया था।
जहां यह किला मुगलों की शानो-शौकत का गवाह रहा था वहीं दो सौ साल बाद अंतिम बादशाह की दर्दनाक मौत का अभिसाक्षी भी इसे बनना पड़ा। ऐसा नहीं है कि इसके पहले या बाद में इसने जुल्मों-सितम नहीं देखे थे। सालों बाद एक बार फिर 1945 में ब्रिटिश हुकूमत ने आजाद हिंद फौज के जांबाजों, जी एस ढिल्लन, कैप्टन शाहनवाज तथा कैप्टन सहगल पर यहीं मुकदमा चला उन्हें सजा देने की कोशिश की थी पर उस समय सारा देश उनके पीछे खड़ा हो गया था। प्रचंड विरोध छा गया था पूरे देश में और डर के मारे अंग्रेजों को उन वीरों को मुक्त करना पड़ गया था। देश में विजयोत्सव मनाया गया और लाल किला उस विजय का प्रतीक बन गया। इसीलिए जब हमें आजादी मिली तब देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु ने सर्वसम्मति से इसे पहले स्वतंत्रता दिवस पर झंडोतोलन के लिए सबसे उपयुक्त स्थल मान यहां से सारे राष्ट्र को संबोधित किया। उसके बाद से आज तक देश का हर प्रधान मंत्री यहां से झंडा फहरा कर अपने आप को गौरवांन्वित महसूस करता है।
आप सभी को, असंख्य विडंबनाओं के बावजूद, यह शुभ दिन मुबारक हो।
जय हिंद।

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

सुना है हवाई किराया और कम होगा :-)

इधर रेलवे किराया बढाने का सोच रही है, उधर हवाई कम्पनियां अपने किराए में कमी लाने जा रही हैं। नतीजा -

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नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...