pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 19 मई 2011

गर्मी का जलवा और पर उपदेश कुशल बहुतेरे :-) :-(

जैसे कभी 'काजी जी परेशान रहते थे शहर के अंदेशे को लेकर'। उसी तरह हर किसी में होड़ लगी हुई है हमें तंदुरुस्त बनाए रखने की। कोई तरह-तरह के सुझाव देता है, भिन्न-भिन्न तरह की नसीहतें पेश करता है तो दूसरा भांति-भांति की हिदायतें ले हाजिर हो जाता है। भले ही खुद उस पर कभी भी अमल न किया हो..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग   
गर्मी का जलवा अपने पूरे शवाब पर है। इसके साथ ही हर अखबार और पत्रिका हमारे स्वास्थ्य को लेकर वैसे ही चिंतित हैं जैसे कभी 'काजी जी परेशान रहते थे शहर के अंदेशे को लेकर'। हर किसी में होड़ लगी है हमें तंदुरुस्त बनाए रखने की। एक तरह-तरह के सुझाव देता है, भिन्न-भिन्न तरह की नसीहतें पेश करता है तो दूसरा भांति-भांति की हिदायतें ले हाजिर हो जाता है। भले ही खुद उस पर कभी भी अमल न किया हो.
बानगी देखिए :-

:-) सुबह सबेरे उठना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। जागिंग नहीं तो वागिंग जरूर करें। गहरी साँसे लें।

:-( आजकल पूरा वायुमंडल प्रदुषित है। सुबह-सुबह थोड़ा कम रहता है जिसकी कसर सड़क साफ करने वाला दस्ता कर देता है। भूल कर भी गहरी सांस लेने से बचें।


:-) पानी अमृत जैसा है इसका भरपूर उपयोग करें। कम से कम १०-१५ गिलास पानी पीने से शरीर के दूषित पदार्थ बाहर निकल जाते हैं।

:-( ज्यादा पानी पीना ठीक नहीं होता, इससे शरीर के लिए आवश्यक लवणों के बाहर निकलने से नुक्सान होता है ।
:-) सुबह का नाश्ता भारी हो, दोपहर का भोजन हल्का तथा रात को अल्पाहार लेना चाहिए। एक साथ न खा कर दिन भर थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुछ न कुछ खाते रहना चाहिए।

:-( बार-बार खाना ठीक नहीं होता। इससे मुंह की पाचन में सहायक लार में कमी आ जाती है और पेट पर भी अनावश्यक दवाब बना रहता है। हफ्ते में एक या दो दिन का उपवास जरूर करें।

:-) दूध जरूर पीएं। इससे शरीर को कैल्शियम मिलता है जिससे हड्डियां मजबूत बनी रहती हैं।

:-( दूध हमारे शरीर के लिए उपयोगी नहीं होता। बल्कि यह कई बीमारियों को निमंत्रण देता है।

:-) कच्ची सब्जियों और फलों का भरपूर सेवन करें। इनके रेशों से पाचन शक्ति को बढ़ावा मिलता है.

:-( आजकल इतने कीटनाशक और दवाईयां पौधों में डाली जाती हैं कि वे फलों इत्यादि की ऊपरी सतह पर ही नहीं उनके अन्दर तक जगह बना लेती हैं। सो इनका प्रयोग सोच-समझ कर ही करना चाहिए।


:-) गर्मियों में तरबूज प्रकृति का दिया वरदान है। इसको वैसे ही या इसका रस निकाल कर दिन में दो बार पीने से गर्मी कोसों दूर रहती है।

:-( आजकल तरबूज खाना मौत को दावत देना है। इसके लाल रंग और मिठास को बनाए रखने के लिए इसमें खतरनाक केमिकल्स के इंजेक्शन लगा अपने थोड़े से फायदे के लिए इसे जहरीला बना आपकी सेहत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसे खाने से बचें। इत्यादि-इत्यादि !

तो सारा लब्बो-लुआब यह है कि जैसे यात्रा के दौरान कहीं-कहीं लिखा होता है कि यात्री आपने सामान की हिफाजत खुद करें। ठीक वैसे ही आपने शरीर रूपी सामान की रक्षा भी हमें अपनी सोच-समझ से ही करनी है नाकि इन मुफ्त की समझाईशों से।
तो लब्बो-लुआब यह है कि जैसे यात्रा के दौरान कहीं - कहीं लिखा रहता है कि यात्री अपने सामान की हिफाजत खुद करें। ठीक वैसे ही अपने शरीर रूपी सामान की हिफाजत भी हमें अपनी सोच-समझ से ही करनी है नाकि इन मुफ्त की समझाईशों स

बुधवार, 11 मई 2011

लालफीताशाही से तंग आए एक आम आदमी का खतरनाक कदम

अभी कुछ दिनों पहले छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में एक “हादसा” हुआ। हादसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकी ऐसा पहली बार हुआ है कि एक आम आदमी ने लालफीताशाही से तंग आ कर ऐसा खतरनाक रवैया अपनाया हो। एक कमजोर बुजुर्ग इंसान द्वारा उठाया गया ऐसा कदम आने वाले अराजक समय का “ट्रेलर” भी हो सकता है।

हुआ यूं कि सेवानिवृत सब-इंजीनियर लोकेंद्र सिंह, जो 30 सितम्बर 2007 को रिटायर हो चुके थे, उन्हें चार साल से पेंशन के लिए भटकाया जा रहा था। इस दफ्तर से उस दफ्तर, उस टेबल से इस टेबल तक चक्कर काटते-काटते वह वृद्ध पुरुष परेशान हो चुका था। रायपुर से मीलों दूर बालाघाट में रहने वाले लोकेन्द्र सिंह इस उम्र में बार-बार इतनी दूर से आ हर बार नाउम्मीद होने, जीविकोपार्जन का कोई और साधन ना होने के बावजूद चार साल तक हाथ-पैर जोड़ने के बाद एक दिन अपना आपा खोकर चाकू से संबंधित अधिकारी पर हताशा में हमला कर बैठे। सोचने की बात है कि ऐसा आत्मघाती कदम उठाने वाले की मनोदशा कैसी कर दी गयी होगी पैसे के भूखे निर्मम बाबुओं के द्वारा। जबकि आमतौर पर सरकारी कर्मचारी के रिटायर होने के अंतिम साल में ही सारी कार्यवाही पूरी कर सेवा-निवृत होते ही अगले महीने से ही उसे पेंशन मिलनी शुरु हो जाती है।

हमले के बाद लोकेंद्र को तो थाने ले जाया जाना ही था। पर कलेक्टर महोदय ने इस सारे प्रसंग को गम्भीरता से लेते हुए जब पूरी छानबीन करवाई तो सारे संबंधित कार्यालयों की गल्तियां सामने आईं। यह बात भी पता चली कि इस दुधारू जगह में येन-केन-प्रकारेण सालों से पुराने कर्मचारी जमे बैठे हैं और पेंशन जारी करवाने के लिए मुवावजा लेकर अपना भविष्य सुधारते जा रहे हैं। सेवानिवृत होने वाला चाहे उनका पुराना साथी ही क्यों ना हो उन्हें सिर्फ माया से मतलब होता है।

कुछ महीनों पहले मैंने एक पोस्ट ड़ाली थी कि "सुधर जाओ नहीं तो जनता सुधार देगी।" भगवान ना करे कि वैसा समय आए जब हर कोई कानून अपने हाथ में लेने को मजबूर हो जाए। पर सोच कर देखिए कि कौन आपा ना खो बैठेगा जब उसके सामने ये तथाकथित जनता के नौकर घूस ले-ले कर हजारों नोट रोज अपने घर ले जाते दिखें पर एक इमानदार आम आदमी अपने दो समय की रोटी के लिए हताशा-निराशा से गुजरता रहे। मंत्री-संत्री तो अपना वेतन बढवाने के लिए बेशर्मी से एकजुट हो जाएं और मंहगाई की मार को झेलने के लिए बची रहे निरीह जनता। नेता-अभिनेता तो शादी-ब्याह जैसे उत्सवों पर एक रात में करोड़ों फूंक डालें और एक मध्यम वर्गीय अपने बच्चों को एक जोड़ी कपड़े ना दिला पाने के लिए झूठ का सहारा लेता रहे। एक खेल पर तो सरकार अरबों लुटाने को तैयार दिखे पर गरीब जनता की तकदीर सवांरने को उसकी झोली सदा खाली रहे। मालदार लक्ष्मी-पुत्रों के परिवार के हर सदस्य को हवा में अठखेलियां करने का शगल हो और धरती पुत्रों को चलने के लिए जमीन ना मिले तो अंजाम ??????????????

शनिवार, 7 मई 2011

भगत सिंह की बेबे।

भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव ने हर्ष ध्वनी के साथ अपनी फांसी की सजा सुनी थी।
अंग्रेज भी इनकी दिलेरी पर आश्चर्यचकित थे।

फांसी का दिन आ पहुंचा था। नियमानुसार जेलर ने भगतसिंह से उनकी अंतिम इच्छा जाननी चाही तो भगतसिंह ने कहा कि मैं अपनी बेबे के हाथ की रोटियां खाना चाहता हूं। पहले तो जेलर ने समझा कि भगत अपनी मां के हाथ की रोटी खाना चाहते हैं। पर भगतसिंह ने स्पष्ट किया कि वे जेल में कैदियों की गंदगी उठाने वाली भंगी महिला के हाथ का भोजन करना चाहते हैं । जेलर हैरान , उसने पूछा कि आप उस भंगी महिला को बेबे क्यों कहते हैं? तब भगत ने जवाब दिया कि मेरी जिंदगी में दो ही महिलाओं ने मेरी गंदगी साफ की है। छुटपन में मेरी माँ ने और अब इस महिला ने। इसीलिए मैं इन दोनो को ही अपनी बेबे कहता और मानता हूं।

जब जेल की उस महिला को भगतसिंह की इस बात का पता चला तो उसकी आंखों से अविरल अश्रु-धारा बह चली। इतना बड़ा सम्मान आज तक उसे किसी ने भी तो नहीं दिया था। उसने बड़े प्यार से रोटियां बनाईं और उतने ही प्रेम से भगतसिंह ने उन्हें खाया।

भगतसिंह देश की आजादी के साथ-साथ यहां फैली ऊंच-नीच की दिवार को भी गिरा देना चाहते थे। उनका कहना था कि समाज के ढांचे को बदले बिना मनुष्य-मनुष्य के बीच की असमानता को दूर नहीं किया जा सकता।

आज अपनी कुर्सी को बचा अपना उल्लू सीधा करने वाले तथाकथित नेताओं को इन सब प्रसंगों का पता भी नहीं होगा और होगा भी तो ??????????????????????

बुधवार, 4 मई 2011

विश्वास ही तो है।

भारत में महिलाओं का बिंदी लगाना एक बहुत ही आम बात है। विवाहित महिलाओं के लिए यह सुहाग की निशानी मानी जाती है। वैसे भी इसे लगाने से ललाट की शोभा बढ जाती है। अब तो एशिया के बहुत सारे देशों में इस छोटी सी टिकुली ने महिलाओं को मोह लिया है।

पश्चिमी अफरीका की बात है। वहां बहुत से भारतीय परिवार रहते हैं। वहां की महिलाएं भारतीय महिलाओं से अक्सर बिंदी के बारे में पूछती रहती हैं तो इनका जवाब रहता है कि अपने पति के लिए लगाती हैं।

वहां बहुपत्नीत्व का चलन है। इस कारण वहां की स्त्रियों में असुरक्षा की भावना बनी रहती है। ऐसी ही एक महिला ने अपनी भारतीय सहेली की देखा-देखी बिंदी लगानी शुरु कर दी। कुछ दिनों बाद उसने अपनी भारतीय सहेली को बताया कि जबसे बिंदी लगाई है तब से उसके पति ने अन्य महिलाओं में रुचि लेना छोड़ दिया है। मेरे पास ही रहता है पर मैं उसकी नशा करने की आदत नहीं छुड़वा पाई हूं।

अब इसे क्या कहेंगे, काश ऐसा होता तो यहां भारत में पारिवारिक कलह का ग्राफ भू-लुंठित ना हो गया होता ? खैर अगली खुश रहे।

क्यों क्या कहते हैं आप ?

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

मंदार पर्वत, जिससे समुद्र-मंथन हुआ था. कहाँ है वह ?

मंदार पर्वत, वही जिसे मथानी बना कर समुद्र-मंथन किया गया था।
कहां है वह ? क्या उसका अस्तित्व है ?

यदि उस मूक साधक को देखना चाहते हैं तो आपको बिहार के बांका जिले के बौंसी गांव तक जाना पड़ेगा। यह करीब सात सौ फुट ऊंची पहाड़ी भागलपुर से 30-35 मील दूर स्थित है। जहां रेल या बस किसी से भी सुविधापूर्वक जाया जा सकता है। बौंसी से इसकी दूरी करीब पांच मील की है।

जब समुद्र मंथन किया गया तो मंदार पर्वत को मथनी और उस पर वासुकी नाग को समेट कर रस्सी का काम लिया गया था। पर्वत पर अभी भी धार दार लकीरें दिखती हैं जो एक दूसरे से करीब छह फुट की दूरी पर बनी हुई हैं और ऐसा लगता है कि किसी गाड़ी के टायर के निशान हों। ये लकीरें किसी भी तरह मानव निर्मित नहीं लगतीं। जन विश्वास है कि समुद्र मंथन के दौरान वासुकी के शरीर की रगड़ से यह निशान बने हैं। मंथन के बाद जो हुआ वह अलग कहानी है। पर अभी भी पर्वत के ऊपर शंख-कुंड़ में एक विशाल शंख की आकृति स्थित है कहते हैं शिवजी ने इसी महाशंख से विष पान किया था।

पुराणों के अनुसार एक बार विष्णुजी के कान के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो भाईयों का जन्म हुआ। पर धीरे-धीरे इनका उत्पात इतना बढ गया कि सारे देवता इनसे भय खाने लगे। हद से गुजरने के बाद आखिर इन्हें खत्म करने के लिए विष्णुजी को इनसे युद्ध करना पड़ा। इसमें भी मधु का अंत करने में विष्णुजी परेशान हो गये हजारों साल के युद्ध के बाद अंत में उन्होंने उसका सिर काट उसे मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया। पर उसकी वीरता से प्रसन्न हो कर उसके सिर की आकृति पर्वत पर बना दी गयी। जो अब यहां आने वालों के लिए दर्शनीय स्थल बन चुकी है।

वैसे तो यहां अनगिनत सरोवर और मंदिर हैं, सबकी अपनी-अपनी कहानी भी है पर पर्वत के नीचे बने जल-कुंड़ का अपना महत्व है इसके पानी को रोगों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।

यहां से करीब 70-80 कि.मी. की दूरी पर वासुकीनाथ का मंदिर भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। कभी मौका मिले तो समुद्र मंथन की इस मथानी को जरुर देखने जाएं।

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

व्याधि, रोग, ज़रा और मौत भेद-भाव नहीं करते

इस धरा का यह शाश्वत सत्य है कि यहां जो भी जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। बच्चा जब भी जन्म लेता है तो यह अनिश्चित होता है कि वह बड़ा बन कर क्या बनेगा या क्या करेगा पर जन्म के साथ ही यह निश्चित हो जाता है कि वह एक दिन यहां से प्रस्थान जरूर करेगा। प्रकृति के इस अटूट नियम से कोई भी परे नहीं रह पाया है। चाहे वह साधू हो, सन्यासी हो, महापुरुष हो, भगवान का अनन्य भक्त हो या खुद भगवान का ही अंश क्यों ना हो। यहां आए हो तो जाना पहली शर्त है। श्री राम , श्री कृष्ण, ईसा मसीह, पैगम्बर, बुद्ध, महावीर जैसे अवतारों को भी अपना समय पूर्ण होने पर धरा छोड़नी पड़ी थी तो इंसान की क्या औकात है।

मृत्यु तो खैर अटल है ही, आदि-व्याधि से भी कोई बिरला ही बच पाता है। प्रकृति प्रदत्त ये हमारे 'परिक्षक' या 'उपदेशक' किसी में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं करते। ये नहीं देखते कि उनका लक्ष्य स्त्री है या पुरुष, अमीर है या गरीब, ढोंगी है या साधू, जन है या महाजन। बुढापा, व्याधि, बिमारी और मौत ये नाहीं किसी का पक्षपात करते हैं नाही किसी पर दया। यह किस रूप में आएंगे यह भी कोई ना जानता है ना बतला सकता है।

पांडवों को क्या पता था कि उनका अंत किन परिस्थितियों में होगा, सुकरात - मीरा को जहर का सेवन करना पड़ा था, रामकृष्ण परमहंस जैसे सत्य पुरुष को भी भयंकर बिमारी ने अपनी चपेट में ले लिया था। महर्षी रमण, महायोगी अरविंद डायबिटीज से जुझते रहे। जवाहर लाल नेहरु की मृत्यु लकवे के कारण हुई, स्वामी श्रद्धानंद, महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी को गोलियों का शिकार होना पड़ा। हाल ही में सांई बाबा को एकाधिक रोगों से ग्रसित रहने के कारण शरीर त्यागना पड़ा। ये तो कुछ नाम हैं पर असंख्य महापुरुषों ने अपने जीवन में असाध्य रोगों का सामना किया और बहुतों ने अपनी अंतिम सांस अत्यंत कष्ट भोगते हुए ली।

कोई भी नहीं जानता कि किसका अंत किस रूप में आएगा और कब। यही एक बात यदि भगवान ने अपने पास ना रखी होती तो आज लोग उसका अस्तित्व ही नकार देते। खासकर वे जो भोली-भाली जनता की कमजोरियों का फायदा उठा अपने आप को भगवान निरूपित करने में नहीं झिझकते।

विशिष्ट पोस्ट

किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर कर...