pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

खून, कितना जानते हैं हम इसके बारे में ?

रक्त, खून, लहू, रुधिर कितने नाम हैं इस जीवनदायी तरल के, जो जन्म से लेकर मृत्यु प्रयंत हमारे शरीर में अनवरत दौड़ता रहकर हमें जिन्दगी प्रदान करता रहता है। फिर भी हम इसके बारे में ज्यादा नहीं जानते {डाक्टरों के अलावा}। मेरे पास कुछ जानकारियां हैं जिन्हें बांटना चाहता हूं। इनके अलावा यदि आपके पास हों तो सबको जरूर बतायें---

हमारे शरीर में करीब पाँच लीटर रक्त विद्यमान रहता है। इसकी आयु कुछ दिनों से लेकर 120 दिनों तक की होती है। इसके बाद इसकी कोशिकाएं तील्ली में टूटती रहती हैं। परन्तु इसके साथ-साथ अस्थी-मज्जा {बोन मैरो} में इसका उत्पादन भी होता रहता है। यह बनने और टूटने की क्रिया एक निश्चित अनुपात में होती रहती है, जिससे शरीर में खून की कमी नहीं हो पाती। रक्त वाहिनियों में प्रवाहित होने वाला यह गाढ़ा, कुछ चिपचिपा, लाल रंग का द्रव्य, एक जीवित उत्तक है। यह प्लाज़मा और रक्त कणों से मिल कर बनता है। प्लाज़मा वह निर्जीव तरल माध्यम है जिसमें रक्त कण तैरते रहते हैं। प्लाज़मा के सहारे ही ये कण सारे शरीर में पहुंच पाते हैं और वह प्लाज़मा ही है जो आंतों से शोषित पोषक तत्वों को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुंचाता है और पाचन क्रिया के बाद बने हानीकारक पदार्थों को गुर्दे तक ले जा कर उन्हें फिर साफ़ होने का मौका देता है।

रक्तकण तीन प्रकार के होते हैं, लाल, सफ़ेद और प्लैटलैट्स। लाल कण फ़ेफ़ड़ों से आक्सीजन ले सारे शरीर में पहुंचाने का और कार्बनडाईआक्साईड को शरीर से फ़ेफ़ड़ों तक ले जाने का काम करते हैं। इनकी कमी से अनिमिया का रोग हो जाता है। सफ़ेद कण हानीकारक तत्वों तथा बिमारी पैदा करने वाले जिवाणुओं से शरीर की रक्षा करते हैं। प्लेटलेट्स रक्त वाहिनियों की सुरक्षा तथा खून बनाने में सहायक होते हैं।

मनुष्यों में रक्त ही सबसे आसानी से प्रत्यारोपित किया जा सकता है। पर भिन्न-भिन्न रक्त कण तरह-तरह एटीजंस वाले होते हैं। इन्हीं एटीजंस से रक्त को विभिन्न वर्गों में बांटा गया है और रक्त दान करते समय इसी का ध्यान रखा जाता है। महत्वपूर्ण एटीजंस को दो भागों में बांटा गया है। पहला ए बी ओ तथा दुसरा आर-एच व एच-आर। जिन लोगों का रक्त जिस एटीजंस वाला होता है उसे उसी एटीजंस वाला रक्त देते हैं। जिन पर कोई एटीजंस नही होता उनका ग्रुप "ओ" कहलाता है। जिनके रक्त कण पर आर-एच एटीजंस पाया जाता है वे आर-एच पाजिटिव और जिनपर नहीं पाया जाता वे आर-एच नेगेटिव कहलाते हैं। ओ वर्ग वाले व्यक्ति को सर्वदाता और ए बी वाले को सर्वग्राही कहा जाता है। परन्तु ए बी रक्त वाले को ए बी रक्त ही दिया जाता है।

जहां स्वस्थ व्यक्ति का रक्त किसी की जान बचा सकता है, वहीं रोगी, अस्वस्थ व्यक्ति का खून किसी के लिये जानलेवा भी साबित हो सकता है। इसीलिए खून लेने-देने में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। वैसे अब वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में भी कृत्रिम रक्त का निर्माण कर लिया है और आशा है कि निकट भविष्य में रक्त की अनुपलब्धता से किसी की जान नहीं जाएगी।

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

सपूत

दफ्तर जाने के पहले रवि रोज की तरह अपने बिमार पिता के कमरे में गया। पिता रोज की तरह आंखें बंद किए पड़े थे। दरवाजे से ही मुड़ कर वह अपने काम पर चल दिया।

अभी दफ्तर पहुंचा ही था कि पत्नि जया का फोन आ गया, पिताजी नहीं रहे। रवि जड़ सा रह गया। क्षण भर में ही सारे दफ्तर में खबर फैल गयी। लोग सांत्वना देने लगे। वह उठा कार निकाली और घर की ओर चल पड़ा। शरीर गाड़ी में बैठा था पर दिमाग भविष्य की सोच कर उलझन मेँ पड़ा हुआ था।

क्या सचमुच पिताजी चल बसे। साल दो साल और रह जाते तो........

उनकी बिमारी के बहाने ही तो इस बड़े शहर में तबादला करवा पाया था। आते ही उन्हीं के कारण फोन, गैस इत्यादि का कनेक्शन भी तुरंत मिल गया था। गाहे-बगाहे घर के या और किसी निजि काम के लिए उनकी बिमारी के बहाने छुट्टी मिल जाया करती थी। दफ्तर में जाने में देर सबेर हो जाने पर भी पिताजी ही काम आते थे और तो और इतने बड़े शहर में इस मंहगाई के जमाने में अपनी और बच्चों की अनाप-शनाप मांगों को पूरा करने के लिए उनकी पेंशन का जो सहारा था वह भी गया।

हे भगवान अब क्या होगा ?

रवि पिता के सिरहाने खड़ा फूट-फूट कर रो रहा था।

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

इस फोन काल से सचेत रहें

यदि आपके मोबाइल फोन पर किसी व्यक्ति द्वारा यह काल आती है कि आपकी लाईन चेक करने के लिए या आपको किसी इनाम का भागीदार बनाने के लिए आपको #90, #09 या ऐसा ही कोई नंबर दबाना है तो बिना देर किए आप अपना फोन बंद कर दें।

CNN web site पर यह बताया गया है कि पाकिस्तान में एक ऐसा ग्रुप सक्रिय है जो उसके द्वारा दिए गये नंबर को दबाते ही उस फोन की सिम को हैक कर उसका दुरुपयोग करना शुरु कर देता है वह भी आपके खर्चे पर।

इस बात की 'मोटोरोला' तथा 'नोकिया' ने भी पुष्टि कर दी है। करीब तीस लाख फोन इस गलत हरकत का शिकार हो चुके हैं।
इसलिए आप खुद सचेत रहें और अपने दोस्तों तथा प्रियजनों को भी आगाह कर दें।

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

ये भी तो प्रशंसा के हकदार हैं

सही समय पर इलाज ना हो पाने के कारण कमला अमरनानी के पति तथा पुत्र की असमय मौत हो गयी थी। उस भीषण दुख से उबरते हुए उन्होंने ऐसे लोगों की मदद करने का संकल्प लिया जो किसी भी कारणवश अपनों की जिंदगी बचा पाने में असमर्थ होते हैं। उल्हास नगर में गरीबों के बीच माता के नाम से लोकप्रिय कमलाजी से शहर के रिश्वतखोर डाक्टर भी घबड़ाते हैं। यदी उन्हें किसी भी डाक्टर के रिश्वत लेने या अपने काम के प्रति लापरवाह होने का पता चलता है तो फिर उस डाक्टर की खैर नहीं रहती। 44 साल पहले उन्होंने डाक्टरों की हड़ताल के कारण अपने पति और पुत्र को खोया था और अब वे नहीं चाहती कि उनकी तरह किसी और को उस विभीषीका का सामना करना पड़े। आज 96 साल की उम्र में भी वे पूरी तरह सक्रिय हैं।
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अमेरिकी सेना में तैनात सार्जेंन्ट जानी कैंपेंन इराक गया तो था लोगों की मौत का पैगाम लेकर, पर इंसान के मन को कौन जान सका है। अपने इराक अभियान के दौरान जानी की मुलाकात वहां के राहत कैंप में एक आंख की बिमारी से ग्रस्त बच्ची, जाहिरा, से हुई, जिसका इलाज हो सकता था। जानी ने अपने गृह नगर में अपने दोस्तों और नगरवासियों से अपील कर एक बडी राशी एकत्र कर उसे अस्पताल में भर्ती करवाया। आप्रेशन सफ़ल रहा। आज जाहिरा दुनिया देख सकती है। उसकी दादी कहती है कि युद्ध चाहे तबाही लाया हो, पर मेरी पोती के लिये उसी फौज का सिपाही भगवान बन कर आया।
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बैंकाक में तीन पहिया स्कूटर को "टुक-टुक" कहते हैं। इसी पर सवार हो कर जो हवस्टर और एन्टोनियो बोलिंगब्रोक केंट ने बैंकाक से ब्रिटेन तक 12 हजार मील की यात्रा सिर्फ़ इस लिए की जिससे मानसिक तौर पर विकलांगों की सहायता की जा सके। इसमे वे सफ़ल भी रहीं और उन्होंने 50 हजार पौंड जुटा अपना मिशन पूरा किया।

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

लो खरगोश फिर हार गया

बहुत हो गया। वर्षों से बदनामी का दंश सहते-सहते पूरी खरगोश जाति ग्लानी से पूरे जंगल में मुंह छुपाए रहती थी। भले ही कोई अब कुछ ना कहता हो पर शर्म के मारे खरगोशों की किसी उत्सव या जश्न मे भाग लेने की इच्छा नहीं होती थी। सो इस स्थिति से उबरने के लिए उन्होंने कोई उपाय खोजने की खातिर एक मीटिंग बुलवाई। उसमें सर्वसम्मति से फैसला हुआ कि फिर एक बार कछुओं को दौड़ के लिए राजी किया जाए और इस बार उन्हें हरा कर वर्षों से माथे पर चिपके हार के दाग को धो ड़ाला जाए। शक था कि कछुए नहीं मानेंगे पर पूरी खरगोश जाति खुशी से उछल पड़ी जब कछुओं ने बिना किसी प्रतिवाद और शर्त के फिर एक बार फिर दौड़ आयोजित करने की सहमति दे दी। खरगोश कछुओं की इस बेवकूफी की बात करते ना थकते थे।

दिन, समय, स्थान, दूरी सब तय हो गया। पूरे जंगल को इस खास दौड़ के लिए आमंत्रित किया गया ताकि सनद रहे, सारे पशु-पक्षी गवाह रहें खरगोशों की जीत के।

खरगोशों ने अपना खिलाड़ी चुन रोज प्रैक्टिस करनी शुरु कर दी। पर कछुआ कैंप में उन्हें कोई हलचल ना दिखाई देती थी। इस पर वे खुश भी थे। दौड़ का दिन आ पहुंचा। खरगोशों ने अपने प्रतियोगी को ढेर सारी नसीहतें दीं, जिनमें सबसे प्रमुख थी कि कुछ भी हो जाए, आसमान भी टूट पड़े पर उसे अपनी दौड़ खत्म किए बिना कहीं भी रुकना नहीं है। फिर ढोल-ढमाके के साथ उसे दौड़ शुरु होने के स्थान पर लाया गया। शेर ने सीटी बजा दौड़ शुरु करवाई। सीटी बजते ही खरगोश तीर की तरह अपने गंतव्य की ओर भाग निकला। इतना तेज तो वह तब भी नहीं भागा था जब एक बार उसके पीछे भेड़िया पड़ गया था। पर इस बार सारे जाति की इज्जत का सवाल था। सारी दूरी उसने बिना रुके पार की। कुछ ही दूरी पर सीमा रेखा भी दिखने लगी थी। कछुए का कहीं अता-पता भी नहीं था। मन ही मन खुशी के लड्डू फोड़ता जैसे ही वह अंतिम रेखा के पास पहुंचा कि उसने देखा कि कछुआ धीरे-धीरे सीमा रेखा पार कर रहा है और इसके वहां पहुंचते-पहुंचते कछुए ने फिर एक बार बाजी मार ली।

सारे जंगल में यह खबर आग की तरह फैल गयी। खरगोश की समझ में कुछ नहीं आया कि गलती कहां हुई। पर जो होना था वह हो चुका था। कछुए ने सभी के सामने खरगोश को एक बार फिर मात दे दी थी।

कुछ दिन बीत गये। एक रात जिस कछुए ने दौड़ मे भाग लिया था उसका पुत्र सोते समय अपने बाप से लिपट कर अपने पूर्वजों की शौर्य गाथाएं सुन रहा था। तभी उसने अचानक पूछा, बाबा एक बात बताओ, खरगोश अंकल तो इतना तेज दौड़ते हैं और आप इतना धीरे चलते हैं तो उस दिन आप जीत कैसे गये?

कछुआ मुस्कुराया और बोला, बेटा उस दिन दोनों जातियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई थी। किसी भी तरह हमें अपनी इज्जत बचानी थी। इस बार खरगोश पूरी तैयारी से थे। हमारा जीतना तो नामुमकिन ही था। सो हमने एक योजना बनाई थी। जिस दिन स्थान और दिन का फैसला हुआ था उसी दिन तुम्हारा ननकु चाचा दौड़ खत्म होने वाली सीमा रेखा की ओर चल पड़ा था। दौड़ के दिन जैसे ही सीटी बजी और खरगोश दौड़ा मैं तो चुपचाप घर आ गया था। जो जीता वह तो तेरा काकू था। चल अब सो जा।

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

भारत में ऐसा भी

गांव - अंजनी, जिला - मैनपुरी, राज्य - उत्तर प्रदेश।
हनुमानजी की माता अंजनी के नाम पर बसे इस गांव में दूध बेचना पाप समझा जाता है। आज जबकी देश में पानी भी खरीद कर पीना पडता है, इस दो हजार भैंसों वाले गांव में यदि कोई चोरी-छिपे दूध बेचता पाया जाता है तो उसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पडती है नहीं तो गांव छोड कर जाना पडता है। हजारों लीटर दूध का उत्पादन करने वाला यह गांव सार्वजनिक उत्सवों या कार्यक्रमों में मुफ़्त दूध दे उस जमाने की याद ताजा करता रहता है, जब कहा जाता था कि इस देश में दूध की नदियां बहा करती थीं। यहां की आबादी मेँ 99 प्रतिशत यदुवंशियों का है जो दूध बेचने को बेटा बेचने जैसा जघन्य काम मानते हैं। यह गांव आर्थिक रूप से काफी संपन्न है।
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नाम - जब्बार हुसैन , उम्र - 66 साल, निवास - फ़तहपुर बिंदकी।
लगन हो तो हुसैन साहब की तरह। 42 बार हाईस्कूल की परीक्षा में फ़ेल हो जाने के बावजूद इन्होंने हिम्मत नहीं हारी है और एक बार फिर ये पूरे जोशोखरोश के साथ परीक्षा की तैयारियों में जुटे हुए हैं। उनकी जिद है कि वह हाईस्कूल की परीक्षा जरूर पास करेंगे वह भी बिना गलत तरीकों को अपनाये। इस जनून के चलते उनकी बीवी ने उनसे तलाक ले लिया है पर हुसैन साहब अपनी धुन पर कायम हैं। इसके चलते उन्होंने जूतों की दुकान की, ट्युशन लगाई, कडी मेहनत की। उनके हौसले बुलंद हैं, वह एक-न-एक दिन अपनी मंजिल जरूर पा लेंगे। आमीन ।

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

फौज में जनरल की भी तो जरूरत होती है :-)

दिनोंदिन बढती मंहगाई से तंग आ एक बुजुर्गवार फौज में भरती होने पहुंच गये।
वहां सार्जेंट ने उनसे कहा, क्या आपको मालुम नहीं कि सैनिक के पद के लिए आपकी उम्र के लोगों को भरती नहीं किया जाता?
तो बुजुर्गवार ने कहा, ठीक है, सैनिक ना सही पर फौज में जनरल की भी तो जरुरत होती है।

एक महिला से भगवान ने प्रसन्न हो उसे दर्शन दिए और वर मांगने को कहा।
महिला बोली, जो देना है फटाफट दे कर नक्की करो, टी.वी.पर सीरियल शुरु होने वाला है।

पत्नी :- अपना चंदू दौड़ में फर्स्ट आया है।
पति :- बेटा किसका है....
पत्नी :- शर्म नहीं आती आपको ऐसी बातें पूछते?

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...