बहुत हो गया। वर्षों से बदनामी का दंश सहते-सहते पूरी खरगोश जाति ग्लानी से पूरे जंगल में मुंह छुपाए रहती थी। भले ही कोई अब कुछ ना कहता हो पर शर्म के मारे खरगोशों की किसी उत्सव या जश्न मे भाग लेने की इच्छा नहीं होती थी। सो इस स्थिति से उबरने के लिए उन्होंने कोई उपाय खोजने की खातिर एक मीटिंग बुलवाई। उसमें सर्वसम्मति से फैसला हुआ कि फिर एक बार कछुओं को दौड़ के लिए राजी किया जाए और इस बार उन्हें हरा कर वर्षों से माथे पर चिपके हार के दाग को धो ड़ाला जाए। शक था कि कछुए नहीं मानेंगे पर पूरी खरगोश जाति खुशी से उछल पड़ी जब कछुओं ने बिना किसी प्रतिवाद और शर्त के फिर एक बार फिर दौड़ आयोजित करने की सहमति दे दी। खरगोश कछुओं की इस बेवकूफी की बात करते ना थकते थे।
दिन, समय, स्थान, दूरी सब तय हो गया। पूरे जंगल को इस खास दौड़ के लिए आमंत्रित किया गया ताकि सनद रहे, सारे पशु-पक्षी गवाह रहें खरगोशों की जीत के।
खरगोशों ने अपना खिलाड़ी चुन रोज प्रैक्टिस करनी शुरु कर दी। पर कछुआ कैंप में उन्हें कोई हलचल ना दिखाई देती थी। इस पर वे खुश भी थे। दौड़ का दिन आ पहुंचा। खरगोशों ने अपने प्रतियोगी को ढेर सारी नसीहतें दीं, जिनमें सबसे प्रमुख थी कि कुछ भी हो जाए, आसमान भी टूट पड़े पर उसे अपनी दौड़ खत्म किए बिना कहीं भी रुकना नहीं है। फिर ढोल-ढमाके के साथ उसे दौड़ शुरु होने के स्थान पर लाया गया। शेर ने सीटी बजा दौड़ शुरु करवाई। सीटी बजते ही खरगोश तीर की तरह अपने गंतव्य की ओर भाग निकला। इतना तेज तो वह तब भी नहीं भागा था जब एक बार उसके पीछे भेड़िया पड़ गया था। पर इस बार सारे जाति की इज्जत का सवाल था। सारी दूरी उसने बिना रुके पार की। कुछ ही दूरी पर सीमा रेखा भी दिखने लगी थी। कछुए का कहीं अता-पता भी नहीं था। मन ही मन खुशी के लड्डू फोड़ता जैसे ही वह अंतिम रेखा के पास पहुंचा कि उसने देखा कि कछुआ धीरे-धीरे सीमा रेखा पार कर रहा है और इसके वहां पहुंचते-पहुंचते कछुए ने फिर एक बार बाजी मार ली।
सारे जंगल में यह खबर आग की तरह फैल गयी। खरगोश की समझ में कुछ नहीं आया कि गलती कहां हुई। पर जो होना था वह हो चुका था। कछुए ने सभी के सामने खरगोश को एक बार फिर मात दे दी थी।
कुछ दिन बीत गये। एक रात जिस कछुए ने दौड़ मे भाग लिया था उसका पुत्र सोते समय अपने बाप से लिपट कर अपने पूर्वजों की शौर्य गाथाएं सुन रहा था। तभी उसने अचानक पूछा, बाबा एक बात बताओ, खरगोश अंकल तो इतना तेज दौड़ते हैं और आप इतना धीरे चलते हैं तो उस दिन आप जीत कैसे गये?
कछुआ मुस्कुराया और बोला, बेटा उस दिन दोनों जातियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई थी। किसी भी तरह हमें अपनी इज्जत बचानी थी। इस बार खरगोश पूरी तैयारी से थे। हमारा जीतना तो नामुमकिन ही था। सो हमने एक योजना बनाई थी। जिस दिन स्थान और दिन का फैसला हुआ था उसी दिन तुम्हारा ननकु चाचा दौड़ खत्म होने वाली सीमा रेखा की ओर चल पड़ा था। दौड़ के दिन जैसे ही सीटी बजी और खरगोश दौड़ा मैं तो चुपचाप घर आ गया था। जो जीता वह तो तेरा काकू था। चल अब सो जा।