इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
मंगलवार, 4 जनवरी 2011
इस फोन काल से सचेत रहें
CNN web site पर यह बताया गया है कि पाकिस्तान में एक ऐसा ग्रुप सक्रिय है जो उसके द्वारा दिए गये नंबर को दबाते ही उस फोन की सिम को हैक कर उसका दुरुपयोग करना शुरु कर देता है वह भी आपके खर्चे पर।
इस बात की 'मोटोरोला' तथा 'नोकिया' ने भी पुष्टि कर दी है। करीब तीस लाख फोन इस गलत हरकत का शिकार हो चुके हैं।
इसलिए आप खुद सचेत रहें और अपने दोस्तों तथा प्रियजनों को भी आगाह कर दें।
शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010
ये भी तो प्रशंसा के हकदार हैं
सही समय पर इलाज ना हो पाने के कारण कमला अमरनानी के पति तथा पुत्र की असमय मौत हो गयी थी। उस भीषण दुख से उबरते हुए उन्होंने ऐसे लोगों की मदद करने का संकल्प लिया जो किसी भी कारणवश अपनों की जिंदगी बचा पाने में असमर्थ होते हैं। उल्हास नगर में गरीबों के बीच माता के नाम से लोकप्रिय कमलाजी से शहर के रिश्वतखोर डाक्टर भी घबड़ाते हैं। यदी उन्हें किसी भी डाक्टर के रिश्वत लेने या अपने काम के प्रति लापरवाह होने का पता चलता है तो फिर उस डाक्टर की खैर नहीं रहती। 44 साल पहले उन्होंने डाक्टरों की हड़ताल के कारण अपने पति और पुत्र को खोया था और अब वे नहीं चाहती कि उनकी तरह किसी और को उस विभीषीका का सामना करना पड़े। आज 96 साल की उम्र में भी वे पूरी तरह सक्रिय हैं।
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अमेरिकी सेना में तैनात सार्जेंन्ट जानी कैंपेंन इराक गया तो था लोगों की मौत का पैगाम लेकर, पर इंसान के मन को कौन जान सका है। अपने इराक अभियान के दौरान जानी की मुलाकात वहां के राहत कैंप में एक आंख की बिमारी से ग्रस्त बच्ची, जाहिरा, से हुई, जिसका इलाज हो सकता था। जानी ने अपने गृह नगर में अपने दोस्तों और नगरवासियों से अपील कर एक बडी राशी एकत्र कर उसे अस्पताल में भर्ती करवाया। आप्रेशन सफ़ल रहा। आज जाहिरा दुनिया देख सकती है। उसकी दादी कहती है कि युद्ध चाहे तबाही लाया हो, पर मेरी पोती के लिये उसी फौज का सिपाही भगवान बन कर आया।
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बैंकाक में तीन पहिया स्कूटर को "टुक-टुक" कहते हैं। इसी पर सवार हो कर जो हवस्टर और एन्टोनियो बोलिंगब्रोक केंट ने बैंकाक से ब्रिटेन तक 12 हजार मील की यात्रा सिर्फ़ इस लिए की जिससे मानसिक तौर पर विकलांगों की सहायता की जा सके। इसमे वे सफ़ल भी रहीं और उन्होंने 50 हजार पौंड जुटा अपना मिशन पूरा किया।
गुरुवार, 16 दिसंबर 2010
लो खरगोश फिर हार गया
दिन, समय, स्थान, दूरी सब तय हो गया। पूरे जंगल को इस खास दौड़ के लिए आमंत्रित किया गया ताकि सनद रहे, सारे पशु-पक्षी गवाह रहें खरगोशों की जीत के।
खरगोशों ने अपना खिलाड़ी चुन रोज प्रैक्टिस करनी शुरु कर दी। पर कछुआ कैंप में उन्हें कोई हलचल ना दिखाई देती थी। इस पर वे खुश भी थे। दौड़ का दिन आ पहुंचा। खरगोशों ने अपने प्रतियोगी को ढेर सारी नसीहतें दीं, जिनमें सबसे प्रमुख थी कि कुछ भी हो जाए, आसमान भी टूट पड़े पर उसे अपनी दौड़ खत्म किए बिना कहीं भी रुकना नहीं है। फिर ढोल-ढमाके के साथ उसे दौड़ शुरु होने के स्थान पर लाया गया। शेर ने सीटी बजा दौड़ शुरु करवाई। सीटी बजते ही खरगोश तीर की तरह अपने गंतव्य की ओर भाग निकला। इतना तेज तो वह तब भी नहीं भागा था जब एक बार उसके पीछे भेड़िया पड़ गया था। पर इस बार सारे जाति की इज्जत का सवाल था। सारी दूरी उसने बिना रुके पार की। कुछ ही दूरी पर सीमा रेखा भी दिखने लगी थी। कछुए का कहीं अता-पता भी नहीं था। मन ही मन खुशी के लड्डू फोड़ता जैसे ही वह अंतिम रेखा के पास पहुंचा कि उसने देखा कि कछुआ धीरे-धीरे सीमा रेखा पार कर रहा है और इसके वहां पहुंचते-पहुंचते कछुए ने फिर एक बार बाजी मार ली।
सारे जंगल में यह खबर आग की तरह फैल गयी। खरगोश की समझ में कुछ नहीं आया कि गलती कहां हुई। पर जो होना था वह हो चुका था। कछुए ने सभी के सामने खरगोश को एक बार फिर मात दे दी थी।
कुछ दिन बीत गये। एक रात जिस कछुए ने दौड़ मे भाग लिया था उसका पुत्र सोते समय अपने बाप से लिपट कर अपने पूर्वजों की शौर्य गाथाएं सुन रहा था। तभी उसने अचानक पूछा, बाबा एक बात बताओ, खरगोश अंकल तो इतना तेज दौड़ते हैं और आप इतना धीरे चलते हैं तो उस दिन आप जीत कैसे गये?
कछुआ मुस्कुराया और बोला, बेटा उस दिन दोनों जातियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई थी। किसी भी तरह हमें अपनी इज्जत बचानी थी। इस बार खरगोश पूरी तैयारी से थे। हमारा जीतना तो नामुमकिन ही था। सो हमने एक योजना बनाई थी। जिस दिन स्थान और दिन का फैसला हुआ था उसी दिन तुम्हारा ननकु चाचा दौड़ खत्म होने वाली सीमा रेखा की ओर चल पड़ा था। दौड़ के दिन जैसे ही सीटी बजी और खरगोश दौड़ा मैं तो चुपचाप घर आ गया था। जो जीता वह तो तेरा काकू था। चल अब सो जा।
बुधवार, 15 दिसंबर 2010
भारत में ऐसा भी
हनुमानजी की माता अंजनी के नाम पर बसे इस गांव में दूध बेचना पाप समझा जाता है। आज जबकी देश में पानी भी खरीद कर पीना पडता है, इस दो हजार भैंसों वाले गांव में यदि कोई चोरी-छिपे दूध बेचता पाया जाता है तो उसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पडती है नहीं तो गांव छोड कर जाना पडता है। हजारों लीटर दूध का उत्पादन करने वाला यह गांव सार्वजनिक उत्सवों या कार्यक्रमों में मुफ़्त दूध दे उस जमाने की याद ताजा करता रहता है, जब कहा जाता था कि इस देश में दूध की नदियां बहा करती थीं। यहां की आबादी मेँ 99 प्रतिशत यदुवंशियों का है जो दूध बेचने को बेटा बेचने जैसा जघन्य काम मानते हैं। यह गांव आर्थिक रूप से काफी संपन्न है।
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नाम - जब्बार हुसैन , उम्र - 66 साल, निवास - फ़तहपुर बिंदकी।
लगन हो तो हुसैन साहब की तरह। 42 बार हाईस्कूल की परीक्षा में फ़ेल हो जाने के बावजूद इन्होंने हिम्मत नहीं हारी है और एक बार फिर ये पूरे जोशोखरोश के साथ परीक्षा की तैयारियों में जुटे हुए हैं। उनकी जिद है कि वह हाईस्कूल की परीक्षा जरूर पास करेंगे वह भी बिना गलत तरीकों को अपनाये। इस जनून के चलते उनकी बीवी ने उनसे तलाक ले लिया है पर हुसैन साहब अपनी धुन पर कायम हैं। इसके चलते उन्होंने जूतों की दुकान की, ट्युशन लगाई, कडी मेहनत की। उनके हौसले बुलंद हैं, वह एक-न-एक दिन अपनी मंजिल जरूर पा लेंगे। आमीन ।
मंगलवार, 14 दिसंबर 2010
फौज में जनरल की भी तो जरूरत होती है :-)
वहां सार्जेंट ने उनसे कहा, क्या आपको मालुम नहीं कि सैनिक के पद के लिए आपकी उम्र के लोगों को भरती नहीं किया जाता?
तो बुजुर्गवार ने कहा, ठीक है, सैनिक ना सही पर फौज में जनरल की भी तो जरुरत होती है।
एक महिला से भगवान ने प्रसन्न हो उसे दर्शन दिए और वर मांगने को कहा।
महिला बोली, जो देना है फटाफट दे कर नक्की करो, टी.वी.पर सीरियल शुरु होने वाला है।
पत्नी :- अपना चंदू दौड़ में फर्स्ट आया है।
पति :- बेटा किसका है....
पत्नी :- शर्म नहीं आती आपको ऐसी बातें पूछते?
सोमवार, 13 दिसंबर 2010
पैसे का प्रलोभन ठुकराना भी सबके वश की बात नहीं है.
चलिए सचिन की बात नहीं करते पर आप प्रसिद्ध बैडमिन्टन खिलाड़ी , पुलेला गोपीचंद को क्या कहेंगे जिनको "आल इंग्लैण्ड चैंपियनशिप" जीतने के बाद एक विश्वप्रसिद्ध शीतल पेय का भारी भरकम आफर मिला था पर उन्होंने उस यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि जिस चीज का मैं खुद उपयोग नहीं करता उसके बारे में जानते हुए दूसरों को कैसे उपयोग में लाने को कह सकता हूँ। उस समय वह कोई करोडपति तो थे नहीं ।
तो सारी बात यही है कि पैसों का प्रलोभन ठुकराना भी सबके बूते की बात नहीं है।
रविवार, 12 दिसंबर 2010
जब कुली ने मेरे मित्र को रेल के डिब्बे की खिड़की से अन्दर 'पोस्ट' किया
बहुत पुरानी बात है। मेरी उम्र रही होगी कोई 14-15 साल की। तब गाड़ियां भी आज जितनी नहीं चला करती थीं और उनके डिब्बे भी इतने आराम दायक नहीं होते थे। चोरी वगैरह होती थी पर बहुत कम इसीलिए डिब्बों की खिड़कियों में राड वगैरह भी नहीं लगी होती थीं।
दिल्ली घर होने की वजह से छुट्टियों में वहां जाना होता रहता था। उस बार एक मित्र ने भी जाने की इच्छा जाहिर की। अचानक ही सब हुआ था। सो आरक्षण नहीं हो पाया था। देख लेंगें सोच कर हावड़ा स्टेशन पहुंच गये थे। उन दिनों मुझे 'तूफान एक्सप्रेस' बहुत लुभाती थी। हालांकि और गाड़ियों से ज्यादा समय लेती थी। पर एक तो वह ताजमहल को दिखाती हुई जाती थी दूसरे रेल में ज्यादा समय बिताने का मौका देती थी, इसलीए बड़ों के समझाने के बावजूद मुझे उसी में आना-जाना अच्छा लगता था। तो मुद्दा यह कि दोनों मित्र स्टेशन पहुंचे, टिकट लिया और प्लेटफार्म पर जा धमके। गाड़ी अभी लगी नहीं थी। पर वहां की भीड़ देख लगा कि कुछ चूक हो गयी है। बिना जगह मिले इतने दूर का सफर मुश्किल लगने लगा। हमें कुछ हैरान परेशान देख एक कुली हमारे पास आया और गाड़ी और हमारे गंतव्य का पता कर बोला कि सीट दिला दूंगा, दोनों के चालीस रुपये लगेंगे। सौदा पच्चिस में तय हो गया। गाड़ी आनेवाली थी। उसने हम दोनों को आंखों में तौला फिर मेरे मित्र को कहा कि आप मेरे साथ आओ। उसे ले वह स्टेशन के आखिरी छोर तक चला गया। बाद का सारा वृतांत मुझे मित्र की जुबानी पता चला। उसने बताया कि कुली और वह स्टेशन के आखिर में चले गये तो उसने अपना एक कपड़ा दोस्त को थमा दिया और जैसे ही गाड़ी प्लेटफार्म पर आई उसने मेरे दोस्त को उठा कर खिड़की से एक कोच के अंदर पहुंचा दिया और कहा कि एक बर्थ पर कपड़ा बिछा सीट घेर ले और जोर-जोर से गोविंद-गोविंद बोलता रहे। फिर कुली तेजी से दौड़ता हुआ मेरे पास आया और बोला जिस डिब्बे से गोविंद-गोविंद की आवाज आ रही हो उसमें चढ जाना। मैंने ऐसा ही किया। इस तरह बैठने की दो सीटों का इंतजाम हो पाया। तब जा कर उस कुली का हमें घूर कर देखने और मित्र को साथ ले जाने का रहस्य भी खुला। बात यह थी कि मेरे मित्र महोदय कद काठी में मुझसे सोलह थे सो उनके मुझसे हल्के होने के कारण कुली ने उन्हें चुना था, जिससे उन्हें उठा कर खिड़की के अंदर 'पोस्ट' करने में उसे आसानी होती। फिर उसे यानि कुली को मेरा नाम तो मालुम था नहीं सो उसने 'गोविंद-गोविंद की आवाज लगाते रहने को कहा था जिससे मैं सही डिब्बे में चढ सकूं।
अब यह दूसरी बात है कि हम बस बैठ ही पाए थे यही गनीमत थी। नहीं तो उपर-नीचे, दाएं-बाएं मानुष ही मानुष। वह भी इतने की लोग 'प्रकृति की पुकार' को भी अनदेखा अनसुना करने को मजबूर थे। खाने पीने की चीजें बकायदा खिड़कियों से ही लाई ले जाई जाती रही थीं। बहुत पुरानी बात है याद नहीं रात कैसे कटी थी। हां मेरा ज्यादा देर गाड़ी के सफर का मजा लेने और गाड़ी की खिड़की से ताज को देखने का भूत तब से भाग गया।
पर जब भी वह दिन याद आता है बरबस हंसी आ जाती है।
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