pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले कुछ शब्द

कल रात अपने एक राजस्थानी मित्र के चिरंजीव की शादी में जाना हुआ था। बातों ही बातों में पता चला कि राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए अलग-अलग करीब २५० शब्दों का प्रयोग होता है। मित्र के पिताजी ने कुछ पर्याय बताए, वही पेश कर रहा हूँ :-

पति : अलबलियो, आलीजो, उमराव, कामणगारो, केसरियो बालम, गायड़मल, ईसर, गढपतियो, चतर, जलाल, ढोला, गुमानीड़ो, छैलभंवर, पिव, भरतार, मूंछालो, राईवर, रावतियो, पांवड़ां, ललबलिया, नवलबनो, भंवर, मारूजी, रसियो, राजकवंर, रायजादो, लसकरियो, सास सपूती रा पूत, साहिबां, सुगणो, नणद रो वीर, सायबो, सरदार, इत्यादि।

पत्नी : - अरधंगी, कामणगारी, गौरी, चितहरणी, चुड़ाहाली, अलबेली, कांमणी, नखराली, चंदाबदनी, फूलवंती, मरवण, मिरगानैणी, रमणी, लाडी, सुगणीनार, पद्मणी, नार, मारू, सुवागण, स्याणी, जोड़ायत, इत्यादि।

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

ब्लॉग जगत अब एक परिवार न हो ऐसा मोहल्ला बन गया है जहां अधिकाँश दूसरे को फूटी आँख देख नहीं सुहाते

चाहे हम लाख कहें पर सच्चाई यही है कि ब्लाग जगत एक परिवार ना हो कर एक मध्यम वर्गीय मोहल्ला है। जो तरह-तरह के स्वयंभू उस्तादों, गुरुओं, आलोचकों, छिद्रान्वेषियों का जमावड़ा होता जा रहा है। जहां एक दूसरे की टांग खीचने या नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहता। मुस्कान की नकाब तो सबके चेहरे पर है पर बहुतों का अधिकांश समय अपने नाखूनों को तीक्ष्ण करने में जाया जाता है।

एक मोहल्ले में रहने वाले, जैसे एक दूसरे की तरक्की, खुशहाली, उन्नति पर अपने दिल को कबाब बनाते रहते हैं वैसे ही इस ब्लागी मोहल्ले में होना शुरु हो गया है। शुरु तो खैर शुरु से ही था पर जरा संकोच, आंखों की शर्म जैसा कुछ बचा हुआ था जो 'बेनामी' जैसा बुर्का ओढवा देता था। अब तो खुले आम 'खुला खेल फर्रुखाबादी' की शुरुआत हो चुकी है। जिसमें दूसरे का दूध भी छाछ और अपना पानी भी शर्बत नजर आने लगा है। अपनी कैसी भी रचना से उतना ही लगाव है जितना एक काले भुजंग, आड़ी-टेड़ी, नालायक संतान से उसकी माँ को होता है। ठीक है आपका 'उत्पादन' अच्छा है आपकी नजर में पर दूसरे के को तो कमतर ना आंकें।

ज्यादातर कुढन यहां दी जाने वाली टिप्पणियों के कारण हैं। किसी के खाते में रोजाना 25-50 दर्ज हो जाती हैं तो किसी के यहां 2-3 आकर नमक छिड़क जाती हैं। यह नहीं समझ आता कि इससे पहले के चारों ओर कौन से चार चांद घूमने लग जाते हैं या उसके यहां 1000-1000 के लाट्टू 'चसने' लगते हैं और दूसरे के यहां मोमबत्ती जलती रह जाती है। अरे भाई आई, आई नहीं तो ना सही। पर उस मुए अहम का कोई क्या करे जो सीधा दिमाग में घुस उसे उस टिप्पणिधिराज को अपना दुश्मन मानने को मजबूर करने लगता है? उसकी हर अच्छी बुरी पोस्ट या बात सीधे कलेजे पर वार करने लगती है।

एक "बोन आफ कंटेंशन" और है। चिट्ठाजगत का सक्रियता क्रमांक। जिसमें उपस्थित चालिस नाम हजारों 'होनहारों' के दिल पर सांप लोटवाते रहते हैं। वे अपना काम धाम छोड़ उसी क्रमांक पर नजर गड़ा अपना रक्त-चाप बढवाते रहते हैं। उस चालिसे में नाम आ जाने से पता नहीं कौन सा साहित्य अकादमी या बुकर का ईनाम मिल जाता है जो कुछ लोगों की हवा बंद कर देता है।

अभी कुछ दिनों पहले हम सब एक और शर्मनाक दौर से गुजरे हैं जब कुछ लोगों के मिल बैठने पर ही लोगों की ऊंगलियां उठने लग गयीं थीं। क्या अपराध कर दिया गया था जो अभद्र भाषा के प्रयोग का भी खुल कर प्रदर्शन किया गया। जब अनदेखे अंजाने एक साथ मिल बैठेंगे तभी तो अपनत्व की भावना जोर पकड़ेगी। इसमें बुराई क्या थी? यह कोई राजनीतिक पार्टी का माहौल अपने पक्ष में करने की दावत तो थी नहीं कि उसकी भर्त्सना की गयी। पता नहीं क्यूं सही को भी गलत ठहराने की हमारी आदत खत्म नहीं होती।

मोहल्ले में सभी ऐसे हैं यह बात भी नहीं है। सैंकड़ों ऐसे शख्स हैं जो बिना किसी राग-द्वेष, तेरी-मेरी या अच्छे-बुरे के पचड़े में पड़े बगैर 'स्वांत सुखाय' के लिए अपना काम करे जा रहे हैं और सराहना भी पा रहे हैं। क्यों ना उनसे ही हम कुछ सीखें क्योंकि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और ना ही उससे बड़प्पन कम होता है।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

कौन बेचारा है पति या पत्नी :-)

पत्नी खर्च पूरा ना पड़ने और पति की अल्प कमाई से परेशान थी।एक दिन रहा नहीं गया बोली, "मैं शर्म के मारे अपना सर नहीं उठा पाती हूं। मेरी मां हमारे घर का किराया देती है। मेरी मौसी के यहां से कपड़े आते हैं। मेरी बहन हमारा राशन भरती है। कब हमारी हालत सुधरेगी?
" पति बोला, "शर्म तो आनी ही चाहिए। तुम्हारे दो-दो चाचा हैं जो एक पैसा भी नहीं भेजते।"

संता तथा बंता अपना दर्द बांट रहे थे।संता, "अरे यार पिछले हफ्ते मेरी बीवी की आंख में एक बालू का कण समा गया था। डाक्टर को पूरे पांच सौ देने पड़ गये।
"बंता, "यार तू तो भाग्यशाली रहा। परसों मेरी पत्नी की आंख में एक सोने का हार समा गया था पूरे दस हजार देने पड़े।"

पति गुस्से से, "तुम हर दरवाजे पर आ खड़े हुए भिखारी को खाना देती रहती हो। इससे तुम्हें कुछ मिलने वाला नहीं है।"
"जानती हूं। पर यह देख मुझे बड़ी शांति मिलती है कि कोई तो है जो मेरे हाथ का बना खाना बिना उसकी बुराई किए खा लेता है।"

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

पुलिस वाला, पुलिस वाला ही होता है :-)

आज हंगरी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार 'फर्ज करंथी' की एक रचना पढने को मिली। अच्छी लगी सोचा आप सब को भी शायद पसंद आ जाए :

आज सबेरे दफ्तर जाते समय जरा लेट हो गया था सो दफ्तर के आगे बिना ट्राम के रुके ही कूद पड़ा था। इसके पहले कि मैं मुंह के बल जमीन पर लंबायमान होता एक सिपाही ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे संभाल लिया। उसने मुझे स्नेह से देखा और बोला "घबराइए नहीं आप बिल्कुल सुरक्षित हैं। मैं ना पकड़ता तो आप घायल हो सकते थे।" उसने मधुर स्वर में मुझसे कहा।

उसकी दयालुता देख मेरी आंखों में पानी आ गया।
मैंने कहा "लोग नाहक ही पुलिस वालों को निर्मम, अत्याचारी, उद्दंड और अहंकारी समझते हैं, आप तो दया के साक्षात रूप हैं।"

मैंने गरमजोशी और भावुकता से उसका हाथ देर तक पकड़े रखा। फिर बोला "आपका एक बार फिर बहुत-बहुत धन्यवाद मैं आज की घटना और आपको कभी नहीं भूलूंगा। आपका शुभ नाम ?

"जीनस वार्गा.....श्रीमान।"
पर अजीब बात थी वह मेरा हाथ छोड़ नहीं रहा था। जब मैंने छुड़वाना चाहा तो उसने कहा "ठहरिए श्रीमान... अभी हमारी बात खत्म नहीं हुई है। क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं?"
इसी बीच उसने अपनी नोट बुक निकाल ली और पुछने लगा
"हां श्रीमान...आपका पता?....उम्र?...जन्म तिथि?....शरीर पर कोई शिनाख्ति निशान?

"अरे!!! तो तुम क्या मेरी रिपोर्ट करना चाहते हो?" मैंने विस्मय से पूछा।

"तो आपका क्या ख्याल था कि मैं आपसे मनोविनोद कर रहा था इतनी देर से, क्योंकि आप चलती ट्राम से छलांग मार कर उतरे थे ?"

बुधवार, 24 नवंबर 2010

कहते हैं कि भगवान जो करता है वह अच्छे के लिए करता है, पर यह कैसी अच्छाई है

छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर में एक सवा दो साल के मासूम बच्चे की दरिंदों ने अपनी मन्नत पूरी करने के लिए बलि चढ़ा दी। ऐसी हैवानियत कहाँ से इंसान के अन्दर प्रवेश कर जाती है। किस तरह दिल करता है एक निश्छल, मासूम बच्चे का, जिसका कोई कसूर नहीं, जिसे दुनियादारी की कोई समझ नहीं, जिसकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं , क़त्ल करने को। कैसी बुद्धि हो जाती है, कैसे कोई समझ लेता है कि इस तरह के पाप से ऊपरवाला खुश हो इस घृणित कर्म करने वाले से खुश हो जाएगा। यदि भगवान कहीं है और वह सबका भला चाहते हैं तो फिर वह कौन है जो इस तरह के कुकर्म करने के लिए इंसान को उकसाता है उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर किसी के घर की रौनक को मातम में बदलवा कर रख देता है ? क्या उसके सामने प्रभू भी बेबस हैं ?

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

खबर पर शक बिल्कुल न करें

खबर बिल्कुल सच्ची है। पर विश्वास नही होगा कि ऐसा कैसे हो सकता है। पर अब तो वैज्ञानिकों ने भी इस पर अपनी मोहर लगा दी है। खबर आपके सामने है और फ़ैसला आपके हाथ में।

देव उठनी अमावस्या के समय मेघा नक्षत्र के उदय होने के पूर्व एक मुहूर्त बनता है जिसमे प्रभू का दरबार धरती वासियों के लिए कुछ देर के लिये खोला जाता है। इसका पता अभी-अभी साईंस दानों को लगा है । पहले सिर्फ पहुंचे हुए साधू-महात्मा लोग ऊपर जा अपना जीवन धन्य कर लेते थे. पर अब कोई भी इस अवसर का फ़ायदा उठा सकता है। पर यह बात खुल जाने से भीड़ इतनी बढ़ गयी कि संभालना मुश्किल हो गया । तब लाटरी का सहारा लेना पडा।

इस बार भारत, अमेरीका तथा जापान के तीन नुमांईदों को उपर जाने का वीसा मिला था। वहाँ तीनों को एक जैसा ही सवाल पूछने की इजाजत थी। पहले अमेरीकन ने पूछा कि मेरे देश से भ्रष्टाचार कब खत्म होगा, प्रभू ने जवाब दिया कि सौ साल लगेंगे। अमेरीकन की आंखों मे आंसू आ गये। फिर यही सवाल जापानी ने भी किया उसको उत्तर मिला कि अभी पचास साल लगेंगे। जापानी भी उदास हो गया कि उसके देश को आदर्श बनने मे अभी समय लगेगा। अंत मे भारतवासी ने जब वही सवाल पूछा तो पहले तो प्रभू चुप रहे फिर फ़ूट-फ़ूट कर रो पड़े।

अब आज के जमाने मे कौन ऐसी बात पर विश्वास करता है, पर जब सर्वोच्च न्यायालय की ओर से कहा गया कि इस देश को भगवान भी नही बचा सकते, तो आप क्या कहेंगे ? देख, पढ़ और सुन तो रहे ही हैं न रोज-रोज।

विशिष्ट पोस्ट

व्यक्ति पूजा

मैं अमित जी के ब्लॉग को फॉलो नहीं करता, पर उस दिन  उस दिन उन महाशय के आक्षेप के बाद,  मैं जिज्ञासावश उनके ''बिग-अड्डे'' पर ग...