पुराने दोस्त कंचन यानि सोने की तरह होते हैं और नये दोस्त हीरे की तरह। पर यदि हीरे जैसे दोस्त मिलें तो भी पुराने दोस्तों को नहीं भूलना चाहिए, क्योंकि हीरा भी सोने में ही जड़ा जा कर शोभा पाता है।
जब हम दूसरों के लिए प्रार्थना करते हैं तो भगवान हमारी पुकार सुन उनकी मदद करते हैं। इसलिए जब हम सुख-शांतिमय समय बिताते हैं तो याद रखना चाहिए कि कोई हमारे लिए प्रार्थना कर रहा है।
चिंता आने वाले कल की मुसीबतें तो दूर नहीं ही करती उल्टे आज की शांति भी छीन लेती है।
कार का आगे का शीशा काफी बड़ा होता है, जबकि पीछे देखने वाला बहुत छोटा, जो बताता है कि भूतकाल में जो हो चुका उसे भूल कर भविष्य सुधारने का प्रयास करो।
"बीती ताही बिसार दे, आगे की सुध ले"
जब भगवान हमारी परेशानियां दूर करते हैं तो हमारा उनकी सक्षमता पर विश्वास और ज्यादा पुख्ता हो जाता है। पर जब वे हमारी परेशानियां दूर नहीं करते तो इसका सीधा अर्थ है कि उन्हें हमारी सक्षमता पर विश्वास है।
दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है यह सभी जानते हैं। इसलिए जब सुख, स्मृद्धी का दौर चल रहा हो तब उसका भरपूर आनंद उठाएं क्योंकि वह स्थायी नहीं है। पर जब सामने मुसीबतें आ खड़ी हों तब भी हौसला बनाए रखें क्योंकि वह भी कहां स्थायी हैं।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
सोमवार, 15 नवंबर 2010
शनिवार, 13 नवंबर 2010
सागर में तैरने वाले को तरण-ताल में वह सुख कहाँ मिल पाता है
नमस्कार,
पंजाबी में एक कहावत है "मुड़, मुड़ खोती बोड़ हेंठा" यानि घूम फिर कर वहीं लौटना। (अब पूरा ट्रांसलेशन ना करवाएं :-) )
तो लब्बोलुआब यह है कि पूरे 26 दिनों बाद लौटना हुआ है। पूरे प्रवास के दौरान अपने अस्त्र-शस्त्र साथ ना होने से कितनी परेशानी होती है यह मैं ही जानता हूं। चाह कर भी आप किसी से बात नहीं हो पा रही थी। ना ढंग से दुआ सलाम हुई ना ठीक से आपके स्नेह का उत्तर दे पाया। इस सारे समय में तीन बार "कैफे" में जा कर कुछ करने की कोशिश की भी थी पर आप समझ सकते हैं कि सागर में तैरने वालों को तरण-ताल में क्या मजा आयेगा।
तो देर तो हुई है जिसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। पर फिर भी मेरी तरफ से हरेक प्रिय जन को बीते पर्वों की तहे दिल से शुभकामनाएं तथा मेरे इस दुनिया में टपकने वाले दिन पर याद करने का बहुत-बहुत धन्यवाद।
पंजाबी में एक कहावत है "मुड़, मुड़ खोती बोड़ हेंठा" यानि घूम फिर कर वहीं लौटना। (अब पूरा ट्रांसलेशन ना करवाएं :-) )
तो लब्बोलुआब यह है कि पूरे 26 दिनों बाद लौटना हुआ है। पूरे प्रवास के दौरान अपने अस्त्र-शस्त्र साथ ना होने से कितनी परेशानी होती है यह मैं ही जानता हूं। चाह कर भी आप किसी से बात नहीं हो पा रही थी। ना ढंग से दुआ सलाम हुई ना ठीक से आपके स्नेह का उत्तर दे पाया। इस सारे समय में तीन बार "कैफे" में जा कर कुछ करने की कोशिश की भी थी पर आप समझ सकते हैं कि सागर में तैरने वालों को तरण-ताल में क्या मजा आयेगा।
तो देर तो हुई है जिसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। पर फिर भी मेरी तरफ से हरेक प्रिय जन को बीते पर्वों की तहे दिल से शुभकामनाएं तथा मेरे इस दुनिया में टपकने वाले दिन पर याद करने का बहुत-बहुत धन्यवाद।
बुधवार, 3 नवंबर 2010
एक मासूम सी जिज्ञासा
सभी जानते हैं कि पेड़-पौधे सूर्य की रौशनी में आक्सीजन छोड़ते हैं और रात को कार्बन डाई आक्साइड। इसी लिए रात को पेड़ों के नीचे सोने को मना किया जाता है।
पर जंगलों में और उन घने जंगलों में जहां दिन में भी सूर्य की किरणें बमुश्किल पहुँच पाती हैं वहाँ जंगली जानवर और सारे पशु-पक्षी जिन्हें आक्सीजन की जरूरत होती है, रात को कैसे रह पाते हैं? जब कि वहाँ कार्बन डाई आक्साइड अपनी पूरी प्र्चन्ड़ता से उपस्थित होती होगी।
मंगलमय समय आप सब के लिए खुशियाँ, समृद्धि और शान्ति ले कर आए।
मेरे लिए भी :-)
पर जंगलों में और उन घने जंगलों में जहां दिन में भी सूर्य की किरणें बमुश्किल पहुँच पाती हैं वहाँ जंगली जानवर और सारे पशु-पक्षी जिन्हें आक्सीजन की जरूरत होती है, रात को कैसे रह पाते हैं? जब कि वहाँ कार्बन डाई आक्साइड अपनी पूरी प्र्चन्ड़ता से उपस्थित होती होगी।
मंगलमय समय आप सब के लिए खुशियाँ, समृद्धि और शान्ति ले कर आए।
मेरे लिए भी :-)
शनिवार, 30 अक्टूबर 2010
शेरा को काम चाहिए
पिछले दस महीनों से कामनवेल्थ खेलों के "मास्कट" शेरा का रूप धरे सतीश बिदला खेलों के समापन के साथ ही बेरोजगार हो गए हैं।
दुबले पतले, शर्मीले स्वभाव वाले बिदला कहते हैं कि शुरू में उन्हें कम्युनिकेशन प्रभाग में काम मिला था। पर बाद में उनके स्वभाव को देख कर उन्हें "शेरा" बनने का मौका प्रदान कर दिया गया। १२वी पास सतीश बताते हैं कि जैसे-जैसे खेलों का समय नजदीक आता गया और शेरा की ख्याति बढ़ती गयी वैसे-वैसे उनके काम करने का समय भी अधाता गया। उनके अनुसार शेरा का सारा 'गेट-अप', जिसका वजन करीब ८ किलो था उस सबेरे९. बजे से शाम ६ बजे तक पहने रहना पड़ता था। उसी को पहने-पहने उन्हें स्कूल, कालेज, बाजार आदि का भ्रमण करना होता था तथा उसी को पहने-पहने विदेशी मेहमानों से भी मिलना होता था। मेरे जीवन के यादगार क्षण वे ठ जब मैं २६ जनवरी की परेड में शेरा बन कर शामिल हुआ था। राष्ट्राध्यक्ष प्रतिभा पाटिल और राहुल गांधी से मुलाक़ात भी नहीं भुला पाऊँगा। शेरा तो मेरा रूप ही हो गया है इसी ने मुझे प्रसिद्धी दिलवाई है। खेलों में भाग लेनेवाले इतने सारे खिलाड़ियों से मिलना, उनका स्नेह पाना सब शेरा की बदौलत ही हो पाया है। यह समय मेरी जिन्दगी का सबसे अहम् हिस्सा है। अब देखें आगे क्या होता है। फिलहाल तो मुझे काम की तलाश है।
ये तो रही शेरा के जीते जागते स्वरूप की बात। जब इन्हीं का यह हाल है तो उन हजारों "माडलों" का क्या हश्र होगा जिन पर लाखों रूपए लगा कर उन्हें जगह-जगह स्थापित किया गया था, सजावट के लिए। वे सारे के सारे अब बेकार की चीज हो गए हैं। उन्हें कहाँ रखा जाए या उनका क्या किया जाए इसे समझ नहीं पा रहे हैं कुर्सियों पर बैठे समझदार लोग। फिलहाल ये सारे "माडल" बेचारे किसी पार्क के कोने में या ऐसी ही किसी निर्जन जगहों पर पड़े धूल खा रहे हैं।
सही भी है न मतलब निकल गया है तो पहचानने की क्या जरूरत है।
दुबले पतले, शर्मीले स्वभाव वाले बिदला कहते हैं कि शुरू में उन्हें कम्युनिकेशन प्रभाग में काम मिला था। पर बाद में उनके स्वभाव को देख कर उन्हें "शेरा" बनने का मौका प्रदान कर दिया गया। १२वी पास सतीश बताते हैं कि जैसे-जैसे खेलों का समय नजदीक आता गया और शेरा की ख्याति बढ़ती गयी वैसे-वैसे उनके काम करने का समय भी अधाता गया। उनके अनुसार शेरा का सारा 'गेट-अप', जिसका वजन करीब ८ किलो था उस सबेरे९. बजे से शाम ६ बजे तक पहने रहना पड़ता था। उसी को पहने-पहने उन्हें स्कूल, कालेज, बाजार आदि का भ्रमण करना होता था तथा उसी को पहने-पहने विदेशी मेहमानों से भी मिलना होता था। मेरे जीवन के यादगार क्षण वे ठ जब मैं २६ जनवरी की परेड में शेरा बन कर शामिल हुआ था। राष्ट्राध्यक्ष प्रतिभा पाटिल और राहुल गांधी से मुलाक़ात भी नहीं भुला पाऊँगा। शेरा तो मेरा रूप ही हो गया है इसी ने मुझे प्रसिद्धी दिलवाई है। खेलों में भाग लेनेवाले इतने सारे खिलाड़ियों से मिलना, उनका स्नेह पाना सब शेरा की बदौलत ही हो पाया है। यह समय मेरी जिन्दगी का सबसे अहम् हिस्सा है। अब देखें आगे क्या होता है। फिलहाल तो मुझे काम की तलाश है।
ये तो रही शेरा के जीते जागते स्वरूप की बात। जब इन्हीं का यह हाल है तो उन हजारों "माडलों" का क्या हश्र होगा जिन पर लाखों रूपए लगा कर उन्हें जगह-जगह स्थापित किया गया था, सजावट के लिए। वे सारे के सारे अब बेकार की चीज हो गए हैं। उन्हें कहाँ रखा जाए या उनका क्या किया जाए इसे समझ नहीं पा रहे हैं कुर्सियों पर बैठे समझदार लोग। फिलहाल ये सारे "माडल" बेचारे किसी पार्क के कोने में या ऐसी ही किसी निर्जन जगहों पर पड़े धूल खा रहे हैं।
सही भी है न मतलब निकल गया है तो पहचानने की क्या जरूरत है।
गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010
prawas par hoon,
kisii ke rahane yaa naa rahane se koi phark kahaan padataa haj. phir bhii sochaa ki bataa hii diyaa jae. prawas par hoon. 20-22 din lag jayenge. ab aap sab to jante hii hain ki blogeria se piidit par kyaa gujaratii hai. aaj kaise bhii jugad bhidaayaa hai. hindi me ho nahii paa raha, par na maamaa se kanaa maamaa hi sahii.
sabko raam raam.
sabko raam raam.
शनिवार, 16 अक्टूबर 2010
"माँ सिद्धिदात्री" जिनकी अनुकंपा से शिवजी अर्धनारीश्वर कहलाए.
नवरात्र-पूजन के नवें दिन "मां सिद्धिदात्री" की पूजा का विधान है।
मार्कण्डेयपुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व , ये आठ प्रकार की सिद्धियां होती हैं। मां इन सभी प्रकार की सिद्धियों को देनेवाली हैं। इनकी उपासना पूर्ण कर लेने पर भक्तों और साधकों की लौकिक-परलौकिक कोई भी कामना अधूरी नहीं रह जाती। परन्तु मां सिद्धिदात्री के कृपापात्रों के मन में किसी तरह की इच्छा बची भी नही रह जाती है। वह विषय-भोग-शून्य हो जाता है। मां का सानिध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। संसार में व्याप्त समस्त दुखों से छुटकारा पाकर इस जीवन में सुख भोग कर मोक्ष को भी प्राप्त करने की क्षमता आराधक को प्राप्त हो जाती है। इस अवस्था को पाने के लिए निरंतर नियमबद्ध रह कर मां की उपासना करनी चाहिए।
मां सिद्धिदात्री कमलासन पर विराजमान हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। ऊपरवाले दाहिने हाथ में गदा तथा नीचेवाले दाहिने हाथ में चक्र है। ऊपरवाले बायें हाथ में कमल पुष्प तथा नीचेवाले हाथ में शंख है। इनका वाहन सिंह है। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव को भी इन्हीं की कृपा से ही सारी सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी। इनकी ही अनुकंपा से शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था और वे "अर्धनारीश्वर" कहलाये थे।
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
"लो हम सब फिर भूल गये.! ! ! सबको याद दिलाना $$$ उसका क्या नाम है ! ! !"
जैसा कि अंदेशा था, खेलों के नशे ने, भव्यता की चकाचौंध ने, पदकों की बौछार ने सिर्फ और सिर्फ 15-20 दिन पहले के आक्रोश को, गुस्से को, तिलमिलाहट को भुलवा कर रख दिया। पहले इस तरह के भूलने को कुछ महीनों का समय लगा करता था पर इस बार यह आश्चर्यजनक रूप से इतनी जल्दि हो गया। प्रभू की मेहर है।
कहावत है कि नेता की पहली खासियत उसका 'चिकना घड़ा होना' जरूरी है, जिस पर कोई 'बाधा' नहीं व्यापति हो।
पता तो सबको है फिर भी एक बार और दुनिया ने देखा एक आम इंसान और "उसके सेवकों" में के फर्क का सच। यदि किसी साधारण आदमी पर कोई झूठा ही आरोप लग जाए तो उसका घर से निकलना दूभर हो जाता है। ग्लानी के मारे वह किसी से आंख नहीं मिला पाता। पर खेलों के उद्घाटन और समापन पर सबने देखा कि दुनिया भर में अपनी "करनी" के कारण नाम "कमाने" के बावजूद अगला कैसे मुर्गे की तरह गर्दन अकड़ा कर बिना किसी शर्मो-हया के हजारों लोगों के हुजूम के सामने आया, लगातार हूटींग के बावजूद आत्म प्रशंसा की और तो और खिलाड़ियों को पदक भी प्रदान किए। बेचारे खिलाड़ियों की मजबूरी थी कि वे ऐसे आदमी के हाथों पदक लेने से इंकार नहीं कर सकते थे पर मन ही मन सोच तो रहे ही होंगे कि यही बचा था हमारा सम्मान करने के लिए।
उधर उसके आकाओं के चेहरे पर व्याप्त संतोष भी इंगित कर रहा था कि तूफान गुजर चुका है। जैसे दुष्ट बच्चे की भूल पर उसके अभिभावक उसके कान मरोड़ कर एक चपत लगा अपने फर्ज की इतिश्री कर लेते हैं वैसा ही शायद कुछ हो गया हो। क्योंकि उद्घाटन और समापन के उद्बोधन में फर्क दिख रहा था। पहले भाषण में जहां चेहरे पर एक 'नर्वसनेस' छाई हुई थी, वहीं समापन दिवस पर उसी चेहरे पर आत्म विश्वास लौटता नजर आ रहा था।
बात वही है, कोई कितना चिल्लाता चीखता रहे, गैंड़े जैसी खालों पर क्या असर होने वाला है।
जय हिंद ।
कहावत है कि नेता की पहली खासियत उसका 'चिकना घड़ा होना' जरूरी है, जिस पर कोई 'बाधा' नहीं व्यापति हो।
पता तो सबको है फिर भी एक बार और दुनिया ने देखा एक आम इंसान और "उसके सेवकों" में के फर्क का सच। यदि किसी साधारण आदमी पर कोई झूठा ही आरोप लग जाए तो उसका घर से निकलना दूभर हो जाता है। ग्लानी के मारे वह किसी से आंख नहीं मिला पाता। पर खेलों के उद्घाटन और समापन पर सबने देखा कि दुनिया भर में अपनी "करनी" के कारण नाम "कमाने" के बावजूद अगला कैसे मुर्गे की तरह गर्दन अकड़ा कर बिना किसी शर्मो-हया के हजारों लोगों के हुजूम के सामने आया, लगातार हूटींग के बावजूद आत्म प्रशंसा की और तो और खिलाड़ियों को पदक भी प्रदान किए। बेचारे खिलाड़ियों की मजबूरी थी कि वे ऐसे आदमी के हाथों पदक लेने से इंकार नहीं कर सकते थे पर मन ही मन सोच तो रहे ही होंगे कि यही बचा था हमारा सम्मान करने के लिए।
उधर उसके आकाओं के चेहरे पर व्याप्त संतोष भी इंगित कर रहा था कि तूफान गुजर चुका है। जैसे दुष्ट बच्चे की भूल पर उसके अभिभावक उसके कान मरोड़ कर एक चपत लगा अपने फर्ज की इतिश्री कर लेते हैं वैसा ही शायद कुछ हो गया हो। क्योंकि उद्घाटन और समापन के उद्बोधन में फर्क दिख रहा था। पहले भाषण में जहां चेहरे पर एक 'नर्वसनेस' छाई हुई थी, वहीं समापन दिवस पर उसी चेहरे पर आत्म विश्वास लौटता नजर आ रहा था।
बात वही है, कोई कितना चिल्लाता चीखता रहे, गैंड़े जैसी खालों पर क्या असर होने वाला है।
जय हिंद ।
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