pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

मेरे शेव करने पर तो आपकी भाभी ही नोटिस नही करतीं, पर वहाँ.....

मेरे मित्र त्यागराजनजी बहुत सीधे, सरल ह्रदय और खुशदिल इंसान हैं। किसी पर भी शक, शुबहा करना उन्होंने तो जैसे सीखा ही नहीं है। अक्सर हम संध्या समय चाय-बिस्कुट के साथ अपने सुख-दुख बांटते हुए दुनिया जहान को समेटते रहते हैं। पर कल जब वह आए तो कुछ अनमने से लग रहे थे, जैसे कुछ बोलना चाहते हों पर झिझक रहे हों। मैंने पूछा कि क्या बात है? कुछ परेशान से लग रहे हैं। वे बोले नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। मैंने कहा कुछ तो है जो आप मूड़ में नहीं हैं। वे धीरे से मुस्कुराए और बोले कोई गंभीर बात नहीं है कुछ शंकाएं हैं, पर आप बोलोगे कि पता नहीं आज कैसी बातें कर रहा हूं। मैंने कहा, अरे हमारे बीच ऐसी औपचारिकता कहां से आ गयी? खुल कर कहिये क्या बात है। वे बोले टी.वी. में इतने सारे विज्ञापन आते हैं तरह-तरह की हरकतों के साथ। उनमें से अधिकांश को समाज के शिखर पर बैठी बड़ी-बड़ी हस्तियां पेश करती हैं। पर अधिकतर विज्ञापनों के दावे गले नहीं उतरते। सच तो प्रस्तुत करने वाले भी जानते ही होंगे फिर उनकी क्या मजबूरी है, ना उन्हें पैसे की कमी है ना ही शोहरत की, फिर क्यूं वे ऐसा करते हैं? अब जैसे मैं रुक्षता के बचाव की खातिर एक क्रीम शाहरूख के समझाने के वर्षों पहले से लगा रहा हूं, पर मेरा रंग वैसे का वैसा ही सांवला है। मुझे लगा कि इतना बड़ा हीरो झूठ थोड़े ही बोलेगा। मेरी स्किन में ही कोई गड़बड़ी ना हो। मैं अपनी हंसी दबा कर बोला, क्या महाराज आप भी किसकी बातों में आ गये? अरे वहां सब पैसों का खेल है, उसकी बातों में सच्चाई होती तो उस क्रीम के निर्माता अपनी फैक्टरी अफ्रिका में लगाए बैठे होते, जहां चौबिसों घंटे बारहों महीने लगातार उत्पादन कर भी वे वहां की जरूरत पूरी नहीं कर पाते पर करोंड़ों कमाते। त्यागराजनजी कुछ उत्साहित हो बोले, वही तो, मैं समझ तो रहा था पर ड़ाउट क्लियर करना चाहता था। अब देखीए एक विज्ञापित ब्लेड़ से मैं दाढी बनाते आ रहा हूं, पर बाहर किसी कन्या ने तो क्या ही कहना आपकी भाभी ने भी कभी नोटिस नहीं लिया कि मैंने शेव बनाई भी है कि नहीं। और उधर शेव बनने की देर है और कन्या हाजिर। वैसे आप तो मुझे जानते ही हैं कि यदि ऐसा कोई हादसा मेरे शेव करने पर होता तो मैं तो शेव बनाना ही बंद कर देता। मैं बोला यह सब बाजार की तिकड़में हैं जिनमें रत्ती भर भी सच्चाई नहीं होने पर भी लोग बेवकूफ बनते रहते हैं। इनका निशाना खासकर युवा वर्ग होता है। आप एक बात बताईये, आप इतना घूमते रहते हैं। हर छोटे-बड़े शहर में आपका जाना होता है। जहां तरह-तरह के लोग किस्म-किस्म के परफ्यूम लगाए मिलते होंगे। पर कभी आपने किसी एंड़-बैंड़-मोटरस्टैंड़ छोकरों के पीछे बदहवास सी कन्याओं को दौड़ते देखा है? अरे महिलाएं अच्छे-बुरे की पहचान मर्दों से ज्यादा रखती हैं। मुझे तो आश्चर्य है कि महिलाओं की प्रगति की बात करने वाले किसी भी संगठन ने ऐसे घटिया विज्ञापनों पर रोक लगाने की कोशिश तक नहीं की है अब तक। अच्छा बताईये भाभीजी के साथ साड़ी वगैरह तो लेने गये होंगे कभी? किसी भी दुकान में लटके-झटकों के साथ साड़ी बिकते देखी है कभी? कभी किसी बीमा एंजेंट को बस या ट्रेन में बिमा पालिसी बेचते देखा है? किसी भी पैथी की दवा खा कर कोई शतायू हो सका है? किसी पेय को पी कर किसी बच्चे को ताड़ बनते देखा है? कुदरत ने हमें जैसा बनाया है वही अपने आप में अजूबा है हमें अपनी कमजोरियां दिखती हैं पर अपनी खूबियों को हम नजरंदाज करते रहते हैं। हमें लगता है कि मैं ऐसा हूं तो लोग क्या कहेंगे, अरे कौन से लोग? दुनिया में कौन है जो पूरी तरह से देवता का रूप ले पैदा हुआ है? यह जो पैसा लेकर उल्टी-सीधी बातें हमें समझाते हैं, वे खुद पच्चीसों बिमारियों से घिरे हुए हैं। दुनिया में गोरों की संख्या से कहीं ज्यादा काले, पीले, गेहुंयें रंग वालों की तादाद है। एक अच्छी खासी तादाद नाटे लोगों की है। करोंड़ों लोगों का वजन जिंदगी भर पचास का आंकड़ा नहीं छू पाता। लाखों लोग मोटापे की वजह से ढंग से हिल-ड़ुल नहीं पाते। पर आप अपनी ओर देखीये आज भी आप पांच-सात कि.मी. चलने के बावजूद थकते नहीं हैं यह भी तो भगवान की अनमोल देन है आपको। आप जो हैं खुद में एक मिसाल हैं इन टंटों में ना पड़ मस्त रहिए बिंदास होकर प्रभू द्वारा दी गयी जिन्दगी का आनन्द लीजिए। मेरे इतने लंबे भाषण से त्यागराजनजी को कुछ कुछ रिलैक्स होता देख मैंने अंदर की ओर आवाज लगाई कि क्या हुआ भाई, आज चाय अभी तक नहीं आई? तभी श्रीमतीजी चाय की ट्रे लिए नमूदार हो गयीं। चाय का पहला घूंट लेते ही त्यागराजनजी बोले, भाभीजी यह वही ताजगी वाली चाय है ना जिसमें पांच जड़ी बूटियां पड़ी होती हैं? बहुत रोकते, रोकते भी मेरा ठहाका निकल ही गया।

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

प्रेम की पराकाष्ठा











भगवान से प्रेम बहुत से लोग करते हैं। पहुंचे हुए संतों ने उनकी उपस्थिति भी महसूस की है, कहते हैं। हमने उसे सदा सर्वशक्तिमान ही माना है। उसके थकने की तो कोई कल्पना भी नहीं कर पाया है। पर विदेशी भक्तों का प्रेम सराहनीय है जिनकी सोच ने, प्रेम ने, ममता ने लगातार एक ही स्थिति में खड़े प्रभू को जरा आराम देने की सोची, उनकी बांह के नीचे सहारा देकर।




उसपर छवि कितनी सुन्दर हैं, आखें ही नहीं हटती।

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

लागोस से ई-मेल पर मिली एक मार्मिक घटना का ब्योरा. एक नजर जरूर डाल लें

जिस मित्र ने यह ब्योरा भेजा है उनका कहना है कि यह सच्ची घटना है। इसे मैंने कल पोस्ट किया था पर मुझे लगा कि इसे ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहिए इसीलिए आज फिर आपके सामने रख रहा हूँ।
अन्यथा न लें।

शनिवार का दिन था। मैं कुछ सामान लेने ‘बिग बाजार’ गया हुआ था।वहीं एक खिलौने की दुकान पर दुकानदार और एक 6-7 साल के बच्चे की बातचीत सुन कर ठिठक गया। दुकानदार बच्चे से कह रहा था कि बेटा तुम्हारे पास इस गुड़िया को लेने के लिए प्रयाप्त पैसे नहीं हैं। बच्चा उदास खड़ा था। तभी मुझे वहां देख वह मेरे पास आया और अपने पैसे मुझे दिखा पूछने लगा, अंकल क्या यह पैसे कम हैं? मैंने उसके पैसे गिने और उसके हाथ में पकड़ी गुड़िया की कीमत देख उससे कहा, हां बेटा पैसे तो कम हैं। फिर उससे पूछा तुम यह गुड़िया किस के लिए लेना चाहते हो? उसने जवाब दिया इसे मैं अपनी बहन को उसके जन्म दिन पर देना चाहता हूं। मैं इसे ले जा कर अपनी मम्मी को दूंगा जो मेरी बहन के पास जा रही है। बोलते-बोलते उसकी आंखों में आंसू भर आए। वह कहता जा रहा था, मेरी बहन भगवान के पास चली गयी है और मेरे पापा ने बताया है कि मेरी मम्मी भी जल्दी ही उसके पास जा रही है। तो यह गुड़िया अपनी बहन के पास भेजनी है। मैं पापा से कह कर आया हूं कि जब तक मैं वापस ना आऊं, मम्मी को जाने मत देना।
यह सब सुन मैं धक से रह गया। इतने में उसने अपना एक सुंदर सा फोटो निकाला जिसमें उसके हंसते हुए की तस्वीर थी। मुझे दिखा कर बोला इसे भी मैं गुड़िया के साथ भेजुंगा जिससे मेरी बहन मुझे याद रख सके। मैं अपनी मम्मी से बहुत प्यार करता हूं वह मुझे छोड़ कर जा रही है मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा है पर वहां मेरी बहन भी अकेली है। उसने फिर हाथ में पकड़ी गुड़िया को देखा और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। मैंने उससे छिपा कर अपना पर्स निकाल कर कुछ पैसे अपनी मुट्ठी में ले लिए और उससे कहा कि आओ एक बार फिर पैसे गिन कर देखते हैं। उसने अपने पैसे मेरी ओर बढा दिए। मैने अपने पैसे भी उन पैसों में मिला दिए। इस बार गिनने पर रकम गुड़िया की कीमत से कुछ ज्यादा ही निकली। यह देख बच्चा बोला मैं जानता था कि भगवान जरूर पैसे भेजेंगे। कल रात ही मैंने गुड़िया खरीदने के लिए उनसे पैसे भेजने की प्रार्थना की थी। मेरी मम्मी को सफेद गुलाब बहुत अच्छे लगते हैं पर उसके लिए मैंने भगवान से पैसे नहीं मांगे मुझे ड़र था कि ज्यादा मांगने से वे नाराज हो जाएंगे पर उन्होंने अपने आप ही और पैसे भेज दिए।

उस दिन मैं और कोई काम नहीं कर पाया और घर वापस आ गया। तभी मुझे दो दिन पहले स्थानीय अखबार में छपी एक खबर की याद आयी जिसमें बताया गया था कि एक शराबी ट्रक चालक ने हाई-वे पर एक कार, जिसमें एक युवती और एक बच्ची सवार थी, को रौंद ड़ाला था। बच्ची की वहीं मृत्यु हो गयी थी और युवती कोमा की हालत में अस्पताल में दाखिल थी।
क्या यही वह परिवार तो नहीं?

दूसरे दिन की अखबार में उस युवती की मौत का समाचार था। मैं अपने को रोक नहीं पाया और सफेद गुलाबों का एक गुच्छा लेकर अखबार में दिए गये पते पर चला गया। वहां अंतिम यात्रा की तैयारियां हो रही थीं। एक ताबूत में एक युवती का शव अंतिम दर्शनों के लिए रखा हुआ था। युवती के एक हाथ में एक सफेद गुलाब का फूल था, उसकी बगल में एक गुड़िया रखी हुए थी तथा उसके सीने पर उसी बच्चे की हंसती हुई तस्वीर पड़ी थी। मैं अपने आंसू नहीं रोक पा रहा था, पुष्प गुच्छ चढा तुरंत वहां से निकल आया।

सोच रहा था कि कैसे एक लापरवाह शराबी की शराब की लत ने उस मासूम बच्चे, जिसे मौत का अर्थ भी नहीं मालुम, उसका अपनी मां से लगाव अपनी बहन से प्यार और एक हंसते खेलते परिवार को पल भर में बर्बाद कर रख दिया।

कब समझेंगे लोग शराब की बुराईयां?
कम से कम गाड़ी चलाते समय अपने और दूसरों के परिवार का तो ख्याल करें।

सोमवार, 13 सितंबर 2010

लागौस से ई-मेल द्वारा मिली एक मार्मिक घटना का ब्योरा.

शनिवार का दिन था। मैं कुछ सामान लेने ‘बिग बाजार’ गया हुआ था।
वहीं एक खिलौने की दुकान पर दुकानदार और एक 6-7 साल के बच्चे की बातचीत सुन कर ठिठक गया। दुकानदार बच्चे से कह रहा था कि बेटा तुम्हारे पास इस गुड़िया को लेने के लिए प्रयाप्त पैसे नहीं हैं। बच्चा उदास खड़ा था। तभी मुझे वहां देख वह मेरे पास आया और अपने पैसे मुझे दिखा पूछने लगा, अंकल क्या यह पैसे कम हैं? मैंने उसके पैसे गिने और उसके हाथ में पकड़ी गुड़िया की कीमत देख उससे कहा, हां बेटा पैसे तो कम हैं। फिर उससे पूछा तुम यह गुड़िया किस के लिए लेना चाहते हो? उसने जवाब दिया इसे मैं अपनी बहन को उसके जन्म दिन पर देना चाहता हूं। मैं इसे ले जा कर अपनी मम्मी को दूंगा जो मेरी बहन के पास जा रही है। बोलते-बोलते उसकी आंखों में आंसू भर आए। वह कहता जा रहा था, मेरी बहन भगवान के पास चली गयी है और मेरे पापा ने बताया है कि मेरी मम्मी भी जल्दी ही उसके पास जा रही है। तो यह गुड़िया अपनी बहन के पास भेजनी है। मैं पापा से कह कर आया हूं कि जब तक मैं वापस ना आऊं, मम्मी को जाने मत देना।
यह सब सुन मैं धक से रह गया। इतने में उसने अपना एक सुंदर सा फोटो निकाला जिसमें उसके हंसते हुए की तस्वीर थी। मुझे दिखा कर बोला इसे भी मैं गुड़िया के साथ भेजुंगा जिससे मेरी बहन मुझे याद रख सके। मैं अपनी मम्मी से बहुत प्यार करता हूं वह मुझे छोड़ कर जा रही है मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा है पर वहां मेरी बहन भी अकेली है। उसने फिर हाथ में पकड़ी गुड़िया को देखा और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। मैंने उससे छिपा कर अपना पर्स निकाल कर कुछ पैसे अपनी मुट्ठी में ले लिए और उससे कहा कि आओ एक बार फिर पैसे गिन कर देखते हैं। उसने अपने पैसे मेरी ओर बढा दिए। मैने अपने पैसे भी उन पैसों में मिला दिए। इस बार गिनने पर रकम गुड़िया की कीमत से कुछ ज्यादा ही निकली। यह देख बच्चा बोला मैं जानता था कि भगवन जरूर पैसे भेजेंगे। कल रात ही मैंने गुड़िया खरीदने के लिए उनसे पैसे भेजने की प्रार्थना की थी। मेरी मम्मी को सफेद गुलाब बहुत अच्छे लगते हैं पर उसके लिए मैंने भगवान से पैसे नहीं मांगे मुझे ड़र था कि ज्यादा मांगने से वे नाराज हो जाएंगे पर उन्होंने अपने आप ही और पैसे भेज दिए।

उस दिन मैं और कोई काम नहीं कर पाया और घर वापस आ गया। तभी मुझे दो दिन पहले स्थानीय अखबार में छपी एक खबर की याद आयी जिसमें बताया गया था कि एक शराबी ट्रक चालक ने हाई-वे पर एक कार, जिसमें एक युवती और एक बच्ची सवार थी, को रौंद ड़ाला था। बच्ची की वहीं मृत्यु हो गयी थी और युवती कोमा की हालत में अस्पताल में दाखिल थी।
क्या यही वह परिवार तो नहीं?

दूसरे दिन की अखबार में उस युवती की मौत का समाचार था। मैं अपने को रोक नहीं पाया और सफेद गुलाबों का एक गुच्छा लेकर अखबार में दिए गये पते पर चला गया। वहां अंतिम यात्रा की तैयारियां हो रही थीं। एक ताबूत में एक युवती का शव अंतिम दर्शनों के लिए रखा हुआ था। युवती के एक हाथ में एक सफेद गुलाब का फूल था, उसकी बगल में एक गुड़िया रखी हुए थी तथा उसके सीने पर उसी बच्चे की हंसती हुई तस्वीर पड़ी थी। मैं अपने आंसू नहीं रोक पा रहा था, पुष्प गुच्छ चढा तुरंत वहां से निकल आया।

सोच रहा था कि कैसे एक लापरवाह शराबी की शराब की लत ने उस मासूम बच्चे, जिसे मौत का अर्थ भी नहीं मालुम, उसका अपनी मां से लगाव अपनी बहन से प्यार और एक हंसते खेलते परिवार को पल भर में बर्बाद कर रख दिया।

कब समझेंगे लोग शराब की बुराईयां?
कम से कम गाड़ी चलाते समय अपने और दूसरों के परिवार का तो ख्याल करें।

शनिवार, 11 सितंबर 2010

शुक्र है पत्थर तो उछला, आसमां में सुराख हो ना हो

आजादी के पहले देश के वाशिंदों के लक्ष्य, भावनाएं, इच्छाएं करीब-करीब एक जैसे ही थे। एक ही उद्देश्य था अंग्रेजों को निकाल बाहर करना। पर विभाजन के बाद दोनों पड़ोसी फिर कभी एकमत ना हो पाए। कहते हैं कि खेल दिलों को जोड़ने का काम करते हैं। पर यहां तो खेलों से भी तनाव बढता ही दिखा है। चाहे हाकी हो या क्रिकेट, आपस के मैचों के दौरान फिजा में तलखी ही घुली रहती है। लगता है खेल नहीं युद्ध हो रहा हो। इस समय भावनाएं अपने चरम पर होती हैं। जिसमें जीतने वाला ऐसे जश्न मनाता है जैसे विश्वविजय प्राप्त कर ली हो। हारने वाला ऐसे शोकग्रस्त हो जाता है जैसे घर में गमी हो गयी हो। पर लंबे अर्से के बाद तनाव की तपती धूप में हल्के बादलों के छाने का एहसास हो रहा है। ठंड़ी ब्यार के रूप में दो ऐसी बातें सामने आईं हैं जो जले पर फाहे का काम कर रही हैं। उन्होंने वर्षों से सुप्त झील में लहरें भले ही ना उठा दी हों पर एक छोटी सी हलचल तो पैदा कर ही दी है।

पहले नम्बर पर है भारत के बेंगलुरु में जन्मे रोहन बापन्ना और पाकिस्तान के लाहौर में पैदा हुए एसाम कुरैशी जो 2007 से टेनिस के ड़ब्लस में एक दूसरे के जोड़ीदार बन कर धीरे-धीरे इस खेल में उचाईयों की ओर अग्रसर हैं। अभी-अभी अमेरिकी ओपेन में दोनों ने फायनल में जगह बना एक नया मुकाम बनाया है। दोनों युवक प्रेम और सौहाद्र की भावना से भरपूर हैं। उनकी दिली ख्वाहिश है कि दोनों देशों के बीच प्रेम का दरिया बहे। उनका पसंदिदा वाक्य है "युद्ध रोको, टेनिस खेलो"।
जाहिर है जब दोनों मैदान में होते हैं तो दोनों देशों के रहवासी उनकी जीत की प्रार्थना एक साथ करते हैं।

मैं टी.वी. बहुत ही कम देखता हूं। पर इस जानकारी के बाद कोशिश करूंगा उस "शो" को देखने की जिसके बारे में बताने जा रहा हूं। सुनने में आया है कि छोटे पर्दे पर एक अलग तरह का शो चल रहा है "छोटे उस्ताद-दो देश एक आवाज।" इसमें भारत और पाकिस्तान के बच्चे हिस्सा ले रहे हैं। पर आपस में प्रतिद्वंदिता नहीं कर रहे हैं बल्कि साथ गा रहे हैं। इसमें टीमें ऐसे बनाई गयीं हैं कि हर टीम के दो बच्चों में एक भारत का है तथा दूसरा पाकिस्तान का। दोनों मिल कर अपनी टीम को जिताने की कोशिश करते हैं ।
अब चूंकी टीम में बच्चे दोनों देशों के हैं तो अपनी पसंदिदा जोड़ी को जिताने के लिए दोनों देशों के नागरिल एकजुट हो वोट करेंगे। तो चाहे जैसे भी हो स्नेह की ड़ोर तो बंधेगी ही। यह जिसके भी दिमाग की उपज हो, बधाई का पात्र है।

इतिहास गवाह है कि देशों ने, अवाम ने तभी तरक्की की है जब संसार अमन, चैन, प्यार और भाईचारे की प्राण वायु में सांस लेता रहा है। नफरत और ईर्ष्या की कोख से तो सदा तबाही ने ही जन्म लिया है।

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

३६गढ़ की सही तस्वीर सामने आने लगी है.

खुशी की बात है, देर से ही सही, लोग सच्चाई जानने तो लगे हमारे प्रदेश की।
दिल्ली से मिली एक ई-मेल :-

RAIPUR: In the news more for its chronic insurgeny and tribal poverty, Chhattisgarh will soon boast of one of India's most advanced, eco-friendly modern cities that will be the new capital of the mineral-rich state.

Located about 20 km east of the present capital Raipur, Naya Raipur has been designed on the lines of Malaysia's hi-tech capital complex at Putrajaya, outside Kuala Lumpur, and is expected to cater to the infrastructural needs of industry and trade in the region।

"Some 90-95 percent land acquisition has been completed and we are shifting to a new state secretariat building in Naya Raipur, the 21st century's first high-tech modern city of India, any time late this year, followed by head of department buildings within the next three-four months,
N. Baijendra Kumar,
vice-chairman of the Naya Raipur Development Authority (NRDA),

बुधवार, 8 सितंबर 2010

माने या ना माने पर यह सच ! ! !

विश्वास क्या है और अंधविश्वास क्या है इसके झमेले में नहीं पड़ें तो अच्छा। अरे भाई जिसकी जैसी मर्जी उसे वैसे जीने दो। बड़े-बड़े संत, महात्मा, अवतार आ-आ कर चले गये। समझाते-समझाते सदियां बीत गयीं पर क्या सोच बदली? पर आज भी किसी के विश्वास को अंधविश्वास बता या किसी को दकियानूसी कहने का प्रचलन खत्म नहीं हो पाया है। दोनो पक्ष जुटे हुए हैं एक दूसरे की ऐसी की तैसी करने में। हमें क्या लगे रहो। आज एक ऐसी घटना का जिक्र कर रहा हूं जिसके प्रत्यक्षदर्शियों से तो मुलाकात नहीं हो सकी पर सुने हुए को सुनाने वाले बहुत मिले। अब यह आप पर है कि इस सारी घटना को आप सच माने या फिर तार्किकता के तराजू पर तौलते रहें।

बात किसी पिछड़े प्रदेश की ना हो कर बंगाल की है। उत्तर 24परगना के कांकीनाड़ा, दक्षिण वाला काकीनाड़ा नहीं, कस्बे में विभूति नाम का एक आदमी रहा करता था। परिवार के नाम पर सिर्फ दो ही प्राणी थे, विभूति और उसकी पत्नी तारा। विभूति सम्पन्न था। भगवान की दया से किसी चीज की कमी नहीं थी, सिवाय औलाद के। बहुतेरे इलाज, टोने-टोटके, झाड़-फूंक के बावजूद घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूंज पाई थी। उम्र के साथ-साथ दोनों की हताशा भी बढती जाती थी। यही दिन थे त्योहारों का समय शुरु होने वाला था कि एक दिन शक्तिपीठ से घूमते-घूमते एक सन्यासी कांकीनाड़ा आ पहुंचे। दैवयोग से उनका ठहरना भी विभूति के यहां ही हुआ। सारी दिनचर्या स्वाभाविक, सरल तरीके से होने के बावजूद साधू महाराज ने दम्पत्ति की उदासी को भांप लिया। कुरेदने पर विभूति के सब्र का बांध टूट गया और उसने अपने दुख को साधू के सामने खोल कर रख दिया। उन्होंने कुछ सोचा फिर ध्यान लगाया और कुछ देर बाद बोले, तुम्हारे दुख का निवारण हो सकता है पर तुम्हें थोड़ा प्रयास करना होगा। विभूति तो कुछ भी करने को तैया था। उसने हां की तो साधू ने बताया कि बंगाल-बिहार की सीमा पर रेल की हावड़ा दिल्ली मेन लाइन पर झाझा नामक एक जगह है। उसके रेल्वे स्टेशन से लगी हुई एक भगवा रंग लिए हुए लाल रंग की पहाड़ी है। उस की चोटी पर मनोकामना देवी का मंदिर है। उस मंदिर में तुम्हें अखंड़ ज्योति जलानी होगी। तुम जाकर दीपक जला किसी को उसका ध्यान रखने का भार सौंप कर आ सकते हो। प्रभू ने चाहा तो तुम्हारी इच्छा जरूर पूरी होगी। इतना कह साधू महाराज अपनी यात्रा पर आगे बढ गये। विभूति को कहां चैन था दूसरे दिन ही वह अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गया और दीपक जला उसकी देखभाल का जिम्मा पुजारी को सौंप कर वापस आ गया। भगवान की अद्भुत माया, सालों से विरान उसके घर में अगले साल ही पुत्र रत्न का जन्म हो गया।

समय बीतता गया। तीन साल कैसे बीत गये पता ही नहीं चला। अचानक एक दिन वही सन्यासी बाबा फिर विभूति के घर आ पहुंचे। तारा ने खुशी-खुशी उनका स्वागत किया। सारा घर बच्चों की किलकारियों से गूंज रहा था। तारा भी बहुत खुश नजर आ रही थी। साधू महाराज ने चारों ओर नजर दौड़ाई पर विभूति कहीं नजर नहीं आ रहा था। उन्होंने तारा से उसके बारे में पूछा तो उसने कुछ झिझकते हुए कहा, महाराज आपके आशिर्वाद से पहले साल हमें एक पुत्र की प्राप्ति हुई। फिर दूसरे साल जुड़वां बच्चों ने जन्म लिया। तीसरे साल जब एक साथ तीन बच्चे हमारी गोद में आये तो हम दोनों को कुछ चिंता और घबड़ाहट हो गयी। इसीलिए विभूति उस जलती ज्योति को ठंड़ा करने गये हैं।

विशिष्ट पोस्ट

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...