pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

रविवार, 4 अप्रैल 2010

न कोई सार न ही तत्व, सिर्फ सनसनाहट

बच्ची अपने पूरे प्रवास में "फेंटा" ही पीती रही। तरस आता है ऐसे माँ-बाप की सोच पर !!!

गर्मी दरवाजे पर दस्तक देने लग गयी है। कहीं-कहीं तो दरवाजे खुल भी गये हैं। अब जब सर पर आ पड़ी है तो उससे निपटने के तरह-तरह के इंतजामात भी किये जा रहे हैं। टी।वी. ने तो अपको इस मौसम मे तरोताजा रखने के लिये जैसे कमर ही कस ली है। लगता है यह ना होता तो शायद सब गर्मी की भेंट चढ जाता। तन को, मन को दिमाग को ठंड़ा रखने के उपाय हर पांच मिनट बाद आप को समझाए जा रहे हैं। वहीं साथ ही साथ प्यास बुझाने के लिये तरह-तरह के शीतल पेय आपकी सेवा में हाजिर किए जाते जा रहे हैं। हैं। अब कोई बार-बार इसरार करेगा तो आप मना भी तो नहीं कर सकते। खास कर बच्चे तो इनके आकर्षण में फंस ही जाते हैं। फिर माँ-बाप भी पीछे नहीं रहते अपने लाड़लों की इच्छओं को पूरा करने में। शौक पूरा करना अलग बात है पर उसकी आदत पड़ जाना तो खतरे की घंटी है।

अभी कुछ दिनों पहले देश के बाहर से मेरी एक रिश्तेदार आईं थीं। साथ में उनकी 10-12 साल की बिटिया भी थी। बच्ची जितने दिन भी यहां रही वह "फैंटा" नामक शीतल पेय ही पीती रही। उसकी 'मम्मी' को बहुतेरी बार समझाने की कोशीश की कि यह ठीक नहीं है, पर खुद यहां पली, बढी वर्षों यहां का टनों पानी पीने के बाद भी भली, चंगी तंदरुस्त रहने वाली उस महिला को यहां के पानी पर एतबार नहीं था।

यह बताने का मतलब यही था कि हम ही बच्चों में उल्टी-सीधी आदतें ड़ालने के लिए जिम्मेदार हैं। यहां भी मेरी छोटी भाभी के बच्चों के हाथ में कोई भी नया विज्ञापित खाद्य का पैकेट उसका दूसरी बार विज्ञापन आने के पहले आ जाता है। नतीजा भी सामने है, बच्चों की भूख कम हो गयी है, घर का खाना अच्छा नहीं लगता, आए दिन तबियत ढीली रहती है, पर मां का प्यार पैकटों में भर-भर कर आना जारी है। कहीं भी बाहर आना जाना हो तो बच्चों के लिये शीतल पेय की बड़ी बोतल सफर का एक अभिन्न अंग होती है।

सब पढे-लिखे हैं। अच्छा-बुरा समझने की ताकत भगवान ने दी है तो ऐसे किसी भी पेय को हाथ लगाने से पहले सोच तो सकते हैं कि क्या पानी, प्यास बुझाने का इससे बेहतर विकल्प नहीं है? पानी जिसमें ना कोई कैलोरी होती है ना कोई गैस ना मिलावटी रंग। इसके विपरीत कोला में कार्बन डाई आक्साइड, इथीलीन आक्साइड पालीमर चीनी या सैक्रीन के साथ साथ कैफीन भी होती है। सेहत चिंतकों के लिये चिंता बढाने वाली कैलोरी की मात्रा भी 95-100 के लगभग रहती है। ऐसे पेय पीने से कुछ देर के लिये प्यास बुझती सी लगती है क्योंकि इसमें स्थित गैसें पेट पर दवाब ड़ाल ऐसा एहसास दिला देती हैं। कोला में कैफीन की मात्रा भी काफी होती है जो किसी की सेहत के लिये भी ठीक नहीं होती। ऐसे पेय पदार्थों में कोई “Food Value" नहीं होती, उल्टे बच्चों के द्वारा इनका ज्यादा उपयोग करने से उनका हाजमा तो बिगड़ता ही है उनकी भूख भी मर जाती है।कोला के अलावा जो दूसरे पेय पदार्थ टी वी पर आ-आ कर लुभाने की कोशिश करते हैं वे भी पूरी तरह दोष मुक्त नहीं होते। उनमें भी साईट्रिक एसिड़ के साथ-साथ रंगों, गंधों और जायकों का मिश्रण पीने वाले की सेहत से खिलवाड़ करने का पूरा ताम-झाम समेटे रहता है।


सो इन गर्मियों में अपने घरेलू, हानिरहित, पारंपरिक सचमुच ठंडक प्रदान करने वाले पेय का ही इस्तेमाल करें और बच्चों को भी समझा कर असलियत बता कर उसकी आदत ड़लवाएं।

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

नदी ने कहा जब तक तुझमें मिठास न आ जाए !!!

जिन्दगी जीने के सबके अपने-अपने फलसफे हैं :-

* जीवन में कामयाब होने के लिए तीन कारखाने लगाने की जरूरत है :-

1) दिमाग में बर्फ का कारखाना।

2) जुबान पर चीनी का कारखाना।

3) दिल में प्यार का कारखाना।



* एक दिन सागर ने नदी से पूछा, "कब तक मिलती रहोगी मुझ खारे पानी वाले से?"
नदी ने जवाब दिया, "जब तक तुझ में मिठास न आ जाये तब तक" !!!



* एक पेड़ से एक लाख माचिस की तीलियां बन सकती हैं। पर सिर्फ एक माचिस की तीली एक लाख पेड़ों को जला कर राख कर सकती है। उसी तरह एक नकारात्मक सोच सैकड़ों सपनों का नाश कर देती है।

इसलिये सदा सकारात्मक सोच को दिमाग में जगह दें।


* एक दोस्त ने मुझसे पूछा ,तुम सबको ई-मेल भेजते हो ? तुम्हे क्या मिलता है? मैंने हंस कर कहा, देना लेना तो व्यापार है, जो देकर कुछ न मांगे, वो ही तो प्यार है।

* अपने गम को अपने चेहरे की मुस्कान के पीछे छुपाओ,

बातें करो पर अपना दुख ना बताओ,

खुद ना रूठो कभी पर सब को मनाओ,

यही राज है जिंदगी का बस ऐसे ही जीते जाओ।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

जो सब को मारे वह भगवान

GOD
G :- Generator
O :- Operator
D :- destroyer

कुछ अलग सा :-

१, जो किसी एक को मारे - खूनी

सारा समाज, क़ानून, सारे लोग उसके विरुद्ध खड़े होते हैं।

२, जो किन्हीं दस को मारे - पुलिस

उनके काम पर भी ऊंगलियाँ उठती हैं। उन्हें अपने कृत्य की सफाई में कई पापड बेलने पड़ते हैं।

३, जो सौ को मारे - फौजी या सैनिक

सारे संसार की नजरें रहती है। भले-बुरे का जवाब देना और भुगतना पड़ता है।

४, जो सब को मारे - भगवान

कुछ भी हो जाए, दुनिया तहस-नहस हो जाए। फिर भी पूजा-अर्चना में कमी न आ कर और बढोत्तरी ही होती है।

गुरुवार, 25 मार्च 2010

तीन टायलेटी चुटकले।

चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :)

1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे पर बैचैनी साफ झलक रही थी। उनकी हालत देख सहयात्री ने पूछा, परेशान लग रहे हैं, कोई तकलीफ है?

हां, टायलेट जाना है। श्रीमान जी ने जवाब दिया।

तो जाते क्यों नहीं? साथ वाले ने पूछा ।

ट्रेन जो चल रही है। श्रीमान जी बोले।

तो उससे क्या होता है? सहयात्री कुछ समझ ना पाया।

वहां लिखा है, चलती गाड़ी मे अपने शरीर का कोई अंग बाहर ना निकालें। श्रीमान जी ने अपनी परेशानी का कारण बताया।


2, बंता ट्रेन में टायलेट जाकर लौटा तो बदहवास था। सहयात्री ने पूछा, क्या हो गया?
बंता बोला टायलेट के छेद से मेरा पर्स नीचे गिर गया।
अरे, तो चेन खींचनी थी ना। सहयात्री ने कहा।

दो बार खींची पर हर बार पानी बहने लगा।



3, रेलगाड़ी में एक बुजुर्गवार अपनी सीट से बार-बार उठ कर टायलेट जा रहे थे। कुछ परेशान भी थे। सहयात्री बार-बार उनके आने-जाने से तंग आ चुका था। अंत में उसने चिढ कर कह ही दिया, कि बाबा आपको "चैन" नहीं है?

है तो सही बेटा पर खुल नहीं रही है।

बुधवार, 24 मार्च 2010

सचिन इसीलिए कुछ अलग सा है.

आई पी एल नामक क्रिकेट के तमाशे में सम्मिलित टीमों के नामों पर गौर किया है आपने?

चलिए मान लेते हैं कि ऐसी हुल्लड़ भरी नौटंकियों में भाग लेना है तो नाम भी ऐसे, वैसे, कैसे, कैसे ही होंगे, लोगों को रोमांचित व उत्तेजित करने के लिए, बिल्कुल WWF की कुश्तियों की तरह।

आईए जरा नामों पर गौर करें :- (लिप्यान्तरण पर ज्यादा ध्यान न दें)

1, Chennai Super Kings :- राजाओं के राजा।

२, Bangalore Royal Challengers :- शाही चुन्नौति पेश करने वाले।

3, Deccan Chargers :- तेज तर्रार युद्ध के घोड़े।

4, Delhi Dare Davils :- खतरनाक शैतान।

5, Kings XI Punjab :- राजाओं का जमावड़ा।

6, Kolkata Knight Riders :- नाईट की उपाधि प्राप्त घुड़सवार।

7, Rajasthan Royals :- राजसी लोगों का समूह।

8, Mumbai Indians :- मुम्बई के भारतीय या हिंदोस्तानी।

मुम्बई की टीम भी कोई ऐसा नाम रख सकती थी जैसे - मुम्बई डान, मुम्बई मोनार्क, मुम्बई एलीट, मुम्बई थ्रस्टर या ऐसा ही कुछ।

पर जैसा उसका कप्तान है, धीर, गंभीर, शांत, मितभाषी। वैसा ही उसकी टीम का नाम भी है। जाहिर है नाम रखते समय कप्तान की सहमति भी जरूर ली गयी होगी।

पर इस तमाशे, नौटंकी की चकाचौंध में भी तेंदुलकर ने अपने देश और देशवासियों को याद रखा। यही उसका बड़्ड़पन है, उसकी महानता है। यही सोच उसे औरों से कुछ अलग करती है।

हे श्रीराम, आज हमें तुम्हारा जन्मदिन नहीं, तुम्हारा सान्निध्य चाहिए.

हे श्री राम,
प्रणाम।

आज तुम्हारा जन्म दिवस है। चारों ओर उल्लास छाया हुआ है। भक्तिमय वातावरण है। पूजा अर्चना जोरों पर है। पर यह सब भी आज के भौतिक युग की बाजारू संस्कृति का ही एक अंग है। एक बहुत छोटा सा प्रतिशत ही होगा जो सच्चे मन से तुम्हें याद कर रहा होगा। आधे से ज्यादा तो आज के अवकाश से खुश हैं। कुछ लोगों की दुकानदारी है और कुछ लोगों की तुम्हारे नाम की आड़ में अपनी रोटी सेकने का बहाना।

तुम्हारे जन्म दिवस का तो सब को याद है, पर तुम्हारे आदर्शों, तुम्हारी मर्यादा, तुम्हारे चरित्र, तुम्हारी बातों का इस देश से तिरोहण होता जा रहा है।
तुमने माँ-बाप की आज्ञा शिरोधार्य की, आज के माँ-बाप ड़रे रहते हैं कि ऐसा कुछ ना हो जाए जिससे उनके कुलदीपक को कुछ नागवार गुजरे। माँ-बाप की बात मानना तो दूर उनकी बात सुननी भी बच्चे गवारा नहीं करते। तुमने नारी के सम्मान करने की बात कही तो आज यहां हालात ऐसे हैं कि जन्म से पहले ही उन्हें परलोकगमन की राह दिखा दी जाती है। नारी उद्धार के पीछे अपना उद्धार करने पर कटिबद्ध हैं आज के समाज के कर्णधार। तुमने भाईयों के लिए सर्वत्याग किया आज अपने लिए लोग भाईयों को त्यागने में नहीं हिचकते। तुमने अपनी शरण में आनेवाले का सदा साथ दिया चाहे उसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़ी हो पर आज मुसीबत में पड़े लोगों से भी कीमत वसूली जाती है। तुमने दीन-हीन-दुखियारे-पिछड़ों को सदा गले लगाया, उन्हें सम्मान का हकदार बनाया। आज ऐसे ही लोगों के कंधों का सहारा लेकर मतलबपरस्त अपनी पीढीयों का भविष्य सवारने में लगे हैं। तुमने धन-दौलत-एश्वर्य को सदा हेय समझा आज यही प्रतिष्ठा का माध्यम हैं। तुम्हारे समय में तो एक ही रावण था जिसे मार कर तुमने इस धरा को भयमुक्त किया था। पर आज तो घट-घट में रावण विराजमान हैं जो अपनी अभेद्य लंकाओं में बैठे-बैठे जाने कितनी सीताओं को अपमानित, लांछित तथा प्रताड़ित करने के बावजूद समाज में प्रतिष्ठित एवं सम्मानित हैं। तुम्हारे समय में शिक्षा, आध्यात्म, मोक्ष आदि पाने का जरिया होता था ऋषि, मुनियों का सान्निध्य, जिसमें वे आदरणीय पुरुष अपना जीवन लगा देते थे, आज के बाबा अपने एश्वर्य, भोग, लिप्सा के लिए दूसरों का जीवन ले रहे हैं। तुमने तो अपने शत्रु की अच्छाईयों को अपनाने में भी कभी देर नहीं की आज ऐसा करने की कोई सोचता भी नहीं है उल्टा उसके लिए कोई भी बुराई अपनाने में लोग नहीं हिचकते। तुमने अपने धूर विरोधियों को भी सम्मान दिया आज लोग अपने विरोधियों को मिटा देने में विश्वास करते हैं।

हे प्रभू आज हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है। एक बार सिर्फ एक बार अपने सुंदर, सजीले, उतंग शिखरों वाले मंदिरों से बाहर आकर आप अपनी मातृभूमी की हालत देखो। तुम तो अंतर्यामी हो, दीनदयाल हो, सर्वशक्तिमान हो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी अगम नहीं है.

एक बार सिर्फ एक बार फिर अवतार लो मेरे देवा !!!!!!

मंगलवार, 23 मार्च 2010

कबीर, जिन्हें एक साथ ही अग्नि और धरती में लीन होना पडा. .

कबीर के समय में काशी विद्या और धर्म साधना का सबसे बड़ा केन्द्र तो था ही, वस्त्र व्यवसायियों, वस्त्र कर्मियों, जुलाहों का भी सबसे बड़ा कर्म क्षेत्र था। देश के चारों ओर से लोग वहां आते रहते थे और उनके अनुरोध पर कबीर को भी दूर-दूर तक जाना पड़ता था।

“ मगहर” भी ऐसी ही जगह थी। पर उसके लिए एक अंध मान्यता थी कि यह जमीन अभिशप्त है। कुछ आड़ंबरी तथा पाखंड़ी लोगों ने प्रचार कर रखा था कि वहां मरने से मोक्ष नहीं मिलता है। इसे नर्क द्वार के नाम से जाना जाता था।

उन्हीं दिनों वहां भीषण अकाल पड़ा। ऊसर क्षेत्र, अकालग्रस्त सूखी धरती, पानी का नामोनिशान नहीं। सारी जनता त्राहि-त्राहि कर उठी। तब खलीलाबाद के नवाब बिजली खां ने कबीर को मगहर चल दुखियों के कष्ट निवारण हेतु उपाय करने को कहा। वृद्ध तथा कमजोर होने के बावजूद कबीर वहां जाने के लिए तैयार हो गये। शिष्यों और भक्तों के जोर देकर मना करने पर भी वह ना माने। मित्र व्यास के यह कहने पर कि मगहर में मोक्ष नहीं मिलता, उन्होंने कहा - “क्या काशी, क्या ऊसर मगहर, जो पै राम बस मोरा। जो कबीर काशी मरे, रामहीं कौन निहोरा”।

सबकी प्रार्थनाओं को दरकिनार कर उन्होंने वहां जा लोगों की सहायता करने और मगहर के सिर पर लगे कलंक को मिटाने का निश्चय कर लिया। उनका तो जन्म ही हुआ था रूढियों और अंध विश्वासों को तोड़ने के लिए।

मगहर पहुंच कर उन्होंने एक जगह धूनी रमाई। जनश्रुति है कि वहां से चमत्कारी ढंग से एक जलस्रोत निकल आया, जिसने धीरे-धीरे एक तालाब का रूप ले लिया। आज भी इसे गोरख तलैया के नाम से जाना जाता है। तालाब से हट कर उन्होंने आश्रम की स्थापना की। यहीं जब उन्होंने अपना शरीर त्यागा तो उनकी अंत्येष्टि पर उनके हिन्दु तथा मस्लिम अनुयायियों में विवाद खड़ा हो गया। कहते हैं कि इस कारण उनके चादर ढके पार्थिव शरीर की जगह सिर्फ पुष्प रह गये थे। जिन्हें दोनों समुदायों ने बांट कर अपनी-अपनी धार्मिक विधियों के अनुसार अंतिम संस्कार किया। आश्रम को समाधि स्थल बना दिया गया। आधे पर तत्कालीन काशी नरेश बीरसिंह ने समाधि बनवाई और आधे पर नवाब बिजली खां ने मकबरे का निर्माण करवाया। लखनऊ -गोरखपुर राजमार्ग पर गोरखपुर के नजदीक यह निर्वाण स्थल मौजूद है। पर यहां भी तंगदिली ने पीछ नहीं छोड़ा है। इस अनूठे सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के भी समाधि और मजार के बीच दिवार बना कर दो टुकड़े कर दिये गये हैं। वैसे भी यह समाधि स्थल उपेक्षा का शिकार है।

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रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...