रविवार, 14 फ़रवरी 2010

वेलेंटाइन ऐसा होता है।

पहली बार बचपन में सर के ऊपर से गुजर गयी "उसने कहा था" को पढा और देखा था तो ना कुछ महसूस हुआ था नाहीं होना था। फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये। लगता नहीं कि आज के अधिकांश युवा इससे परीचित होंगे। पहले तो कोर्स वगैरह में भी यह होती थी। पर धीरे-धीरे सब कुछ बदल ही तो रहा है। इस अमर कहानी का सार देने की कोशिश करता हूं।

अमृतसर में अपने मामा के घर आए दस-ग्यारह साल के लहनासिंह का बाज़ार में अक्सर एक सात-आठ साल की लडकी से सामना हो जाता है। ऐसे ही बाल-सुलभ छेड़-छाड़ के चलते लहना उससे पूछता रहता है "तेरी कुड़माई (सगाई)हो गयी" और लड़की "धत्" कह कर भाग जाती है। पर एक दिन वह बालसुलभ खुशी से जवाब देती है "हां, हो गयी। देखता नहीं मेरा यह रेशमी सालू"।
वह तो चली जाती है, पर लहना पर निराशा छा जाती है। दुख और क्रोध एक साथ हावी हो बहुतों से लड़वा, भिड़वा, गाली खिलवा कर घर पहुंचवाते हैं।

पच्चीस साल बीत जाते हैं। फौज में लहना सिंह जमादार हो जाता है। अपनी बटालियन के सूबेदार हज़ारा सिंह के साथ अच्छा दोस्ताना है। एक ही तरफ के रहनेवाले हैं। हज़ारा सिंह का बेटा बोधा सिंह भी इनके साथ उसी मोर्चे पर तैनात है। कुछ दिनों पहले छुट्टियों में ये घर गये थे। तभी पहला विश्वयुद्ध शुरु हो जाता है। सबकी छुट्टियां रद्द हो जाती हैं। हज़ारा सिंह खबर भेजता है, लहना सिंह को कि मेरे घर आ जाना, साथ ही चलेंगे। लहना वहां पहुंचता है तो सूबेदार कहता है कि सूबेदारनी से मिल ले, वह तुझे जानती है। लहना पहले कभी यहां आया नहीं था, चकित रह जाता है कि वह मुझे कैसे जानती होगी। दरवाजे पर जा मत्था टेकता है। आशीष मिलती है। फिर सूबेदारनी पूछती है "पहचाना नहीं? मैं तो देखते ही पहचान गयी थी। ...तेरी कुड़माई हो गयी....धत्....अमृतसर....."
सब याद आ जाता है लहना को। सूबेदारनी रोने लगती है। बताती है कि चार बच्चों में अकेला बोधा बचा है। अब दोनों लाम पर जा रहे हैं। जैसे तुमने एक बार मुझे तांगे के नीचे आने सा बचाया था, वैसे ही इन दोनों की रक्षा करना। तुमसे विनती है।

मोर्चे पर बर्फबारी के बीच बोधा सिंह बिमार पड़ जाता है। खंदक में भी पानी भरने लगता है। लहना किसी तरह बोधे को सूखे में सुलाने की कोशिश करता रहता है। अपने गर्म कपड़े भी बहाने से उसे पहना खुद किसी तरह गुजारा करता है। इसी बीच जर्मन धोखे से हज़ारा सिंह को दूसरी जगह भेज खंदक पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं पर लहना सिंह की चतुराई से हज़ारा सिंह की जान और खंदक दोनों बच जाते हैं। पर खुद बुरी तरह घायल होने पर भी चिकित्सा के लिये बाप-बेटे को पहले भेज देता है, हज़ारा सिंह से यह कहते हुए कि घर चिठ्ठी लिखो तो सूबेदारनी से कह देना उसने जो कहा था मैने पूरा कर दिया है।
उनके जाने के बाद अपने प्राण त्याग देता है।

यह तो कहानी का सार है। पर बिना पढे इसकी मार्मिकता नहीं समझी जा सकती। गुलेरीजी के शब्दों मे ही, अमृतसर के तांगेवालों की चाकू से भी तेज धार की जबान, दोनों बच्चों की चुहल, खंदक की असलियत, लड़ाई की विभीषिका, सूबेदारनी की याचिका, लहना की तुरंत-बुद्धि और फिर धीरे-धीरे करीब आती मौत के साये में स्मृति के उभरते चित्र, वह सब बिना पढे महसूस करना मुश्किल है।
यदि कभी मौका मिले तो इसी नाम पर बनी पूरानी फिल्म देखने का मौका चूकें नहीं। जिसमें स्व. सुनील दत्त और नंदा ने काम किया था।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

कल जिन्हें हिज्जे ना आते थे, वे ही हमें पढाने चले हैं। खुदा की कुदरत है।

फिर एक बार संत वेलेंटाइन का संदेश ले फरवरी का माह आ खड़ा हुआ। बाजारों में, अखबारों में युवाओं में काफी उत्साह उछाल मार रहा है। हमारे सदियों से चले आ रहे पर्व "वसंतोत्सव" का भी तो यही संदेश है। प्रेम का, भाईचारे का, सौहार्द का। पर इसे कभी भुनाया नहीं गया। लेकिन यही संदेश जब "बाजार" ने वेलेंटाइन का नाम रख 'वाया' पश्चिम से भेजा तो हमारी आंखें चौंधिया गयीं हमें चारों ओर प्यार ही प्यार नज़र आने लगा।
हालांकि शुरु-शुरु में इस नाम को कोई जानता भी नहीं था। यहां तक कि एक स्थानीय अखबार में भी कुछ का कुछ छपा था। फिर धीरे-धीरे खोज खबर ली गयी और कहानियां प्रचारित, प्रसारित की जाने लगीं। युवाओं को इसमें मौज-मस्ती का सामान दिखा और वे बाजार के शिकंजे में आते चले गये। जबकि सदियों से हमारी प्रथा रही है, अपने-पराए-गैर-दुश्मन सभी को गले लगाने की। क्षमा करने की। प्रेम बरसाने की। इंसान की तो छोड़ें इस देश में तो पशु-पक्षियों से भी नाता जोड़ लिया जाता है। उन्हें भी परिवार का सदस्य माना जाता है। खुद भूखे रह कर उनकी सेवा की जाती है। जीवंत की बात भी ना करें यहां तो पत्थरों और पेड़ों में भी प्राण होना मान उनकी पूजा होती रही है। सारे संसार को ज्ञान-विज्ञान देने वाले को आज प्रेम सीखना पड़ रहा है पश्चिम से।
गोया "कल जिन्हें हिज्जे ना आते थे, आज वे हमें पढाने चले हैं। खुदा की कुदरत है।"
प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं है। पर ये जो व्यवसायिकता है। अंधी दौड़ है या इसी बहाने शक्ति प्रदर्शन है उसे किसी भी हालत में ठीक नहीं कहा जा सकता।

प्रेम सदा देने में विश्वास रखता है। त्याग में अपना वजूद खोजता है। पर आज इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। सिर्फ पाना और हर हाल में पाना ही इसका उद्देश्य हो गया है। आज भोग की संस्कृति ने सब को पीछे छोड़ रखा है। जिस तरह के हालात हैं, मानसिक विकृतियां हैं, दिमागी फितूर है उसके चलते युवाओं को काफी सोच समझ कर अपने कदम उठाने चाहिए। खास कर युवतियों को। इस उम्र में अपना हर कदम, हर निर्णय सही लगता है। पर आपसी मेल-जोल के पश्चात किसी युवक व युवती का प्रेम परवान ना चढ सके और युवती का रिश्ता उसके घरवाले कहीं और कर दें, इस घटना से युवक अपना आपा खो अपने पास के पत्र या फोटो वगैरह गलत समय में गलत जगह जाहिर कर दे तो अंजाम स्वरूप कितनी जिंदगियां बर्बाद होंगी, कल्पना की जा सकती है। ऐसा होता भी रहा है कि नाकामी में युवकों ने गलत रास्ता अख्तियार कर अपना और दूसरे का जीवन नष्ट कर दिया हो।
किसी की अच्छाई लेना कोई बुरी बात नहीं है। वह चाहे किसी भी देश, समाज या धर्म से मिलती हो। ठीक है। अच्छा लगता है। दिन हंसी-खुशी में गुजरता है। मन प्रफुल्लित रहता है तो त्यौहार जरूर मनाएं। पर एक सीमा में, बिना भावुकता में बहे। उचित-अनुचित का ख्याल रखते हुए।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

:) हसाईयाँ (:

* बाज़ार पहुंचने पर एक मित्र ने दूसरे से कहा, यार सामान लेना था पर पर्स घर ही भूल आया हूं। अब तुम ही कुछ मदद करो। अरे, वह मित्र ही क्या जो समय पर काम ना आए। यह लो दस रुपये घर जा कर अपना पर्स ले आओ।

* संता हांफते-हांफते घर पहुंचा और पत्नी से बोला, भागवान, आज मैने पांच रुपये बचा लिये।
वो कैसे? बीवी ने पूछा।
मैं बस स्टाप पर खड़ा था, बस आयी पर रुकी नहीं। मैं उसके पीछे दौड़ते-दौड़ते घर आ गया।
रहे ना वही के वही। अरे किसी टैक्सी के पीछे दौड़ते तो पचास रुपये ना बच जाते। बीवी ने उलाहना दिया।

* परदेसीजी की की पत्नी बहुत तेज स्वभाव की थी। रोज घर में महाभारत होता था। एक दिन उसका देहांत हो गया। परदेसीजी उसका क्रिया-करम कर लौट रहे थे, तभी तेज हवाएं चलने लगीं, काले-काले बादल घिर आए, बिजली कौंधने लगी, मेघ गरजने लगे।
लगता है पहुंच गयी। परदेसीजी ने ऊपर देखते हुए कहा।

* बास के साथ पहली बार सेक्रेटरी बाहर टूर पर गयी थी। होटल में एक ही कमरा मिल पाया था। सोते समय बास ने कहा, तुम्हें नहीं लगता कि हमारा रिश्ता आत्मिय होना चाहिये। एकदम परिवार की तरह?
जी, बिल्कुल। कुछ और ही सोच सेक्रेटरी ने तुरंत जवाब दिया।
तो ठीक है, उठ कर खिड़की बंद कर दो। ठंड़ी हवा आ रही है।
दूसरी तरफ करवट बदलते हुए बॉस ने कहा।

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

श्रीरामजी को भी श्राप का सामना करना पडा था.

देवताओं ने सदा अपना हित साधा है। श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री में सुग्रीव का सूर्य पुत्र होना एक बड़ा कारण था

किस कारण या किस परिस्थितिवश प्रभू श्रीराम को किष्किंधा नरेश बाली का वध कर सुग्रीव को साथी बनाना पड़ा इसका न्यायोचित उत्तर नहीं मिलता।  

बाली भी राम भक्त था पर उससे मिलने से पहले ही एक तरफा पक्ष रख, सुग्रीव के प्रति सहानुभुति का माहौल बना, उसे दीन-हीन दिखा श्री राम की उदारता का फायदा उठा लिया गया। जबकी सुग्रीव का निष्काषन उसके भीरूपन और समय पर उचित निर्णय ना ले सकने की क्षमता के कारण किया गया था। वह हर हाल में, चाहे युद्ध कला हो, चाहे चारित्रिक विशेषता, बाली से कमतर था।

तो ऐसा तो नहीं कि यह सब सोची समझी योजना के तहत किया गया हो। कुछ पहले की कथाओं को याद करें। हनुमानजी के बाल्यावस्था की घटना जब उन्होंने सूर्य देव से शिक्षा ग्रहण की थी। तब "सूर्यदेव ने गुरुदक्षिणा के रूप में अपने पुत्र सुग्रीव की रक्षा का वचन" उनसे लिया था। देवताओं ने सदा अपना स्वार्थ साधा है। यहां भी वही स्वार्थ श्रीराम और बाली के बैर का कारण बना लगता है।

स्वंय श्रीराम भी बाली के वध से व्यथित थे तभी तो उन्होंने उसे फिर जीवन दान की बात कही थी। जिसे बाली ने विनय पूर्वक अस्वीकार कर सिर्फ अपने पुत्र अंगद के भविष्य को सुरक्षित करने के लिये प्रभू से वचन लिया था।
सुग्रीव से मैत्री तथा बाली के वध का खमियाजा श्री राम को बाली की पत्नी के श्राप के रूप में उठाना पड़ा था। अपने पति की असमय और अकारण मृत्यु पर रोती-बिलखती तारा ने प्रभू से अपने जीवन का भी अंत मांगा था। पराए पुरुष के साथ रहने के बजाय उसने मर जाना बेहतर समझ कर बार-बार प्रभू से अपना भी वध कर देने की प्रार्थना की थी। पर श्रीराम के ऐसा ना करने पर उस साध्वी पतिव्रता नारी ने दुखित और कुपित हो श्रीराम को भी भीषण श्राप दे डाला कि मैं तुम्हें भी पत्नी वियोग का शाप देती हूं।
श्री राम की लीला तो श्री राम ही जाने, पर यह तो उनकी महानता ही थी कि इस जहर को भी उन्होंने सहज स्वभाव से स्वीकार कर लिया था। यदि बाली और श्रीराम का साथ हो गया होता तो महाकाव्य रामायण का अंत किसी और तरह से लिखा जाता।

इतना ही नहीं श्रीराम की दया से राज मिल जाने के बाद सुग्रीव की भोग लोलुपता भी सामने आ जाती है। जब वह रास-रंग में लिप्त हो सीताजी को खोजने के अभियान को ही भुला बैठता है। बाली वध का दुख तब और उग्र हो सामने आता है जब प्रभू उसके लिये कठोर शब्दों का प्रयोग कर उसको भी दंड़ित करने का संकल्प करते हैं। तब उसे अपने कर्तव्य की याद आती है।

युद्ध के समय समरांगण में भी उसका रण कौशल किसी अन्य वानर योद्धा के समान ही नजर आता है, बढ कर नहीं। ऐसा लगता है कि यदि हनुमानजी की कृपा और अनुराग उस पर ना होता तो वह कभी भी राजा बनने की योग्यता ना पा सकता था।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

एक सैम्नार ऐसा भी

रायपुर के मोतीबाग से आयकर भवन जाने वाली सड़क पर कुछ आगे जा कर घने इमली के पेड़ हैं। जिनकी शाखाओं पर ढेरों तरह-तरह के परिंदे वास करते हैं। शाम होते ही जब पक्षी अपने-अपने घोंसलों की ओर लौटते हैं तो अक्सर शरारती लडके उन्हें अपनी गुलेलों का निशाना बनाते रहते हैं। इसी को देख यह ख्याल आया था :-

पर्यावरणविदों और पशू-पक्षी संरक्षण करने वाली संस्थाओं ने मेरे सोते हुए कस्बाई शहर को ही क्यूं चुना अपने वार्षिक सैम्नार के लिए, पता नहीं। इससे शहरवासियों को कोई फ़ायदा हुआ हो या ना हुआ हो पर शहर जरूर धुल पुछ गया। सड़कें साफ़-सुथरी हो गयीं। रोशनी वगैरह की थोड़ी ठीक-ठाक व्यवस्था कर दी गयी। गहमागहमी काफ़ी बढ़ गयी। बड़े-बड़े प्राणीशास्त्री, पर्यावरणविद, डाक्टर, वैज्ञानिक, नेता, अभिनेता और भी ना जाने कौन-कौन बड़ी-बड़ी गाड़ियों मे धूल उड़ाते आने लगे। नियत दिन, नियत समय पर, नियत विषयों पर बहस शुरू हुई। नष्ट होते पर्यावरण और खास कर लुप्त होते प्राणियों को बचाने-सम्भालने की अब तक की नाकामियों और अपने-अपने प्रस्तावों की अहमियत को साबित करने के लिए घमासान मच गया। लम्बी-लम्बी तकरीरें की गयीं। बड़े-बड़े प्रस्ताव पास हुए। यानि कि काफी सफल आयोजन रहा।

दिन भर की बहस बाजी, उठापटक, मेहनत-मसर्रत के बाद जाहिर है, जठराग्नि तो भड़कनी ही थी। सो खानसामे को हुक्म हुआ, लज़िज़, बढिया, उम्दा किस्म के व्यंजन बनाने का। खानसामा अपना झोला उठा बाजार की तरफ चल पड़ा। शाम का समय था। पेड़ों की झुरमुट मे अपने घोंसलों की ओर लौट रहे परिंदों पर कुछ शरारती बच्चे अपनी गुलेलों से निशाना साध रहे थे। पास आने पर खानसामे ने तीन-चार घायल बटेरों को बच्चों के कब्जे में देखा। अचानक उसके दिमाग की बत्ती जल उठी और चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। उसने बच्चों को डरा धमका कर भगा दिया। फिर बटेरों को अपने झोले में ड़ाला और गुनगुनाता हुआ वापस गेस्ट हाउस की तरफ चल दिया।

खाना खाने के बाद, आयोजक से ले कर खानसामे तक, सारे लोग बेहद खुश थे। अपनी-अपनी जगह, अपने-अपने तरीके से, सैम्नार की अपार सफलता पर।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

ताश के बादशाह, बेगम तथा गुलाम सब का अपना-अपना चरित्र होता है.

ताश, अच्छी है या बुरी यह बहस का विषय हो सकता है। पर सैंकड़ों वर्षों से यह आदमी का मनोरंजन करती आ रही है इसमें दो राय नहीं है। इसके आज के स्वरुप के चार वर्गों के बावन पत्तों में से भी सिर्फ फोटो वाले बारह पत्तों के तीन पात्रों, बादशाह, बेगम और गुलाम को तो सभी जानते हैं पर अपने-अपने वर्ग के अनुसार उनकी खासियत और उनके अलग-अलग स्वभाव तथा चरित्र के बारे में कम ही जानकारी प्रचलित है। अच्छी ताशों की गड्डी बनाते समय इनके स्वरूप का पूरा ध्यान रखा जाता है।
"हुकुम"
बादशाह :- यह क़ानून का पालक, सख्त मिजाज, काले रंग को पसंद करने वाला और तलवार से न्याय करने वाला राजा है, जो इसकी तनी हुई तलवार बताती है। इसकी मूंछें इसके स्वभाव को प्रगट करती हैं।

बेगम :- अपने राजा के कृत्यों से यह दुखी रहती है, जो इसके चेहरे और काले कपड़ों से साफ झलकता है। इसके साथ जलती हुई शमा होती है जो बताती है कि यह रानी भी उसी की तरह घुल-घुल कर मिट जाएगी। इसके साथ एक फूल जरूर है पर वह भी मुर्झाया हुआ और पीछे की तरफ जो इसके दुख को ही प्रगट करता है।

गुलाम :- हुकुम का गुलाम। जैसा मालिक वैसा गुलाम। अपने मालिक के हुक्म का ताबेदार काले कपड़े और हाथ में हंटर धारण करने वाला। सख्त चेहरे वाला, किसी के बहकावे में ना आने वाला और सारे काम अक्ल से नहीं हंटर से करने वाला होता है। इसे कोई फुसला नहीं सकता।

"पान"
बादशाह :- पान यानि दिल यानि कोमल ह्रदय का स्वामी। इसीलिये यह मूंछे भी नहीं रखता। यह मानवता का पूजारी, अहिंसक, धार्मिक और शांतिप्रिय स्वभाव का होता है। ऐसा होने पर भी बहुत सतर्क और कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाला है। यह तलवार से नहीं बुद्धि से काम करता है। इसीलिये इसकी तलवार पीछे की ओर रहती है।

बेगम :- यह बहुत सुंदर, संतोषी स्वभाव, विद्वान पर कोमल ह्रदय तथा शांत स्वभाव वाली रानी है। इसके चेहरे से इसकी गंभीरता साफ झलकती है। हाथ का फूल भी इस बात की गवाही देता है। कोमल स्वभाव के बावजूद यह विदुषि है।
गुलाम :- पान का गुलाम भी अपने मालिकों की तरह शांत और नम्र स्वभाव वाला होता है। सादा जीवन बिताने वाला और प्रकृति प्रेमी है जो इसके हाथ में पकड़ी गयी पत्ती से स्पष्ट है। अनुशासन बनाए रखने के लिये छोटी-छोटी मूंछें रखता है।

"चिडी"
बादशाह :- यह तीन पत्तियों वाला, समझदार और अपने अधिकारों की रक्षा करने वाला राजा है। यह अपने को राजा नहीं सेवक मानता है। रौबदार मूंछों वाले इस राजा का भेद कोई नहीं जान पाता है।

बेगम :- यह एक चतुर, चालाक तथा तीव्र बुद्धिवाली रानी है। तड़क-भड़क से दूर फूलों की शौकीन यह समस्याओं को साम, दाम, दंड़, भेद किसी भी तरह सुलझाने में विश्वास रखती है।

गुलाम :- चिड़ी का गुलाम यह सबसे चर्चित गुलाम है। गंवारों सा दिखने वाला, पगड़ी में पत्ती लटकाए सदा अपने बादशाह की चापलूसी करने में लगा रहता है। साधारण से कपड़े और गोलमटोल मूंछों को धारण करने वाला एक घटिया इंसान है।

"ईंट"
बादशाह :- यह राजा के साथ-साथ हीरों का व्यापारी भी है। हर समय धन कमाने की फिराक में रहता है। जिसके लिये कुछ भी कर सकता है। हाथ जोड़ कर ईमानदारी का दिखावा करता है, पर मन से साफ नहीं है। इसे हिंसा पसंद नहीं है पर एशो-आराम से रहना पसंद करता है।

बेगम :- यह भी अपने राजा की तरह धन-दौलत से प्रेम करने वाली, किसी के बहकावे में ना आनेवाली, कीमती कपड़े और गहनों से लगाव रखने वाली सदा पैसा कमाने की धुन में रहने वाली बेगम है।

गुलाम :- रोनी सूरतवाला तथा बिना मूछों वाला यह गुलाम सदा इसी गम में घुलता रहता है कि कहीं राजा से कोई और पुरस्कार या दान ना ले जाए। अमीर राजा का गुलाम है सो इसके कपड़े भी कीमती होते हैं। यह अपना काम बड़ी चतुराई से करता है।

विशिष्ट पोस्ट

यूपी का रहस्यमयी मंडुक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...