pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

उस्ताद बिस्मिल्ला खां को बालाजी का आशीर्वाद प्राप्त था.

उस्ताद बिसमिल्ला खां, संगीत की दुनिया का एक बेमिसाल फनकार, सुरों का बादशाह। जिन्होंने सिर्फ शादी-ब्याह के मौकों पर बजने वाली शहनाई को एक बुलंद ऊंचाई तक पहुंचा दिया। उन्हीं के जीवन से जुड़ी एक अनोखी और अलौकिक घटना उन्हीं की जुबानी :-

मेरा बचपन मेरे मामू के घर ही बीता था। वही मेरे प्रारंभिक गुरु भी थे। वे घंटों बालाजी के मंदिर में बैठ कर रियाज किया करते थे। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो उन्होंने मुझे भी वहीं बैठ कर सुर साधने का आदेश दिया। मैं भी मंदिर में बिना दिन रात की परवाह किये रियाज करने लगा। इसमें कभी-कभी आधी रात भी हो जाती थी। करीब ड़ेढ-दो साल बाद एक दिन मामू साहब ने मुझे अकेले में बुला कर कहा कि यदि मंदिर में तुम कुछ देखो तो उसका जिक्र किसी से भी नहीं करना। बात मेरी समझ में कुछ आयी कुछ नहीं आयी पर मैं तन-मन से शहनाई पर सुर साधने में लगा रहा। ऐसे ही एक दिन काफी रात हो गयी थी मैं एकाग्रचित हो गहरे ध्यान में डूबा शहनाई बजा रहा था कि अचानक मंदिर एक अलौकिक सुगंध से भर गया। मैं उस सुगंध का ब्यान नहीं कर सकता। मुझे लगा शायद किसी ने गंगा किनारे लोबान आदि जलाया होगा, पर धीरे-धीरे वह सुगंध तेज होती गयी। मेरी आंखें खुल गयीं। मैंने देखा मेरे सामने साक्षात बालाजी खड़े हैं। ठीक मंदिर में लगी तस्वीर के रूप में। मैं पसीने-पसीने हो गया। उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाया और बोले, बेटा बजाओ। मेरी तो घीघ्घी बंध गयी थी। फिर वे मुस्कुराये और अदृश्य हो गये। ड़र के मारे मेरा सारा बदन कांप रहा था। मैं वहीं सब कुछ छोड़-छाड़ कर घर की ओर भागा और मामू को जगा सारी बात बतानी शुरू की ही थी कि उन्होंने कस कर एक थप्पड़ मुझे जड़ दिया और कहा कि तुम्हें मना किया था ना कि कुछ भी घटित हो किसी को मत बताना। फिर उन्होंने मुझे पुचकारा और कभी भी ना घबड़ाने की हिदायत दी।
इसके बाद मैं वर्षों एकांत में शहनाई बजाता रहा और अपने ऊपर बालाजी का आशीर्वाद और मामू के प्यार का एहसास महसूस करता रहा।

आज यह महान आत्मा हमारे बीच नहीं हैं। पर क्या उनके अनुभवों से हम कुछ सीख सकते हैं ?

यह सब सच है !!!

* नीलगिरि के जंगलों में पाये जाने वाले गिरगिट की जीभ उसके शरीर की लंबाई से तीन गुनी लंबी होती है।          इसका कद करीब 45 से।मी। होता है जबकि जीभ 1.25 मी. लंबी होती है। अफ्रीका और मेडागास्कर के जंगलों    में पाये जाने वाले गिरगिटों की जीभ तो दो मीटर लंबी पायी गयी हैं।

* पेंसिल को लेड़ पेंसिल के नाम से जाना जाता है, पर वह ग्रेफाइट और चिकनी मिट्टी के मिश्रण से बनती है।

* अंग्रेजों के समय में “कोर आफ गाइड्स” नामक पल्टन के कर्नल ने सबसे पहले खाकी रंग के कपड़ों को              अपनाया था, क्योंकि उसके अनुसार इसे पहन कर जमीन पर लेटा आदमी दूर से नज़र नहीं आ पाता।

* बुड़ापेस्ट, एक नगर नहीं, बल्कि दो शहरों के नाम से मिल कर बना है। ड़ेन्यूब नदी के एक किनारे बुडा तथा        दूसरी ओर पेस्ट नगर बसे हुए हैं।

* इसी तरह बिस्कुट जिसे रोज लाखों लोग खाते हैं, वह भी दो शब्दों से मिल कर बना है। बिस और कुट जो फ्रेंच      भाषा के शब्द हैं, जिनका अर्थ है दो बार पकाया हुआ।

* “ट्रैफिक जाम” आधुनिक युग की देन नहीं है। इसके कारण जूलियस सीजर को भी आदेश पारित करना पड़ा       था कि रोम में दिन के समय कोई पहियेदार वाहन नहीं चलेगा।

रविवार, 13 दिसंबर 2009

कथा का "री मंचन" पर अब सुधार के साथ

मूषकराज ने कहा, देवी मुझे क्षमा करें। सच बहुत कटु होता है। आपकी अस्थिर बुद्धि और चंचल मन सुयोग्य पात्रों को भी नहीं पहचान पाए। मैं तो एक तुच्छ जीव हूँ..........................

कहते हैं ना कि इतिहास अपने आप को दोहराता है, सच मानिये सब कुछ वैसे ही हुआ जैसा वर्षों पहले घटा था बस घटना का अंत जरा बदल गया है। आज कल की नारियों की प्रचंड़ सफलता की आंधी में हमारे इस नायक के फैसले का पता भी नहीं चलना था यदि दंड़कारण्य के बीहड़ जंगलों का दौरा ना किया होता। कहानी पूरानी है पर उसका अंत अप्रत्याशित है।

घूमने का शौक फिर एक बार दंड़कारण्य के जंगलों तक ले आया था। दैवयोग से एक सुबह नदी किनारे एक साधू महाराज के दर्शन हो गये। उनसे कुछ ज्ञान पाने की गरज से मैं उनके साथ हो लिया। उन्होंने मुझसे पिंड़ छुड़ाने की बहुत कोशिश की पर अंत में वे मुझे अपने साथ अपनी कुटिया में ले गये। वहां एक सुलक्षिणी कन्या को देख मैंने, अपनी जिज्ञासा को रोक ना पा, उसका परिचय जानना चाहा। साधू महाराज एक अनजान को कुछ बताने से झिझक रहे थे पर कुछ देर बाद शायद सुपात्र समझ उन्होंने जो बताया वह आश्चर्य जनक था। उन्हीं के शब्दों में पूरी कथा सुनिये............

एक सुबह मैं नदी मे स्नान करने के पश्चात सूर्यदेव को अर्ध्य दे रहा था, तभी आकाशगामी एक चील के चंगुल से छूट कर एक छोटी सी चुहिया मेरी अंजली मे आ गिरी। वह बुरी तरह से घायल थी। मैं उसे अपने आश्रम में ले आया तथा मरहम-पट्टी कर उसे जंगल मे छोड़ देना चाहा पर शायद ड़र के मारे या किसी और कारणवश वह जाने को राजी ही नहीं हुई। मैने भी उसकी हालत देख उसे अपने पास रहने दिया। समय बीतता गया और कब मैं उसे पुत्रीवत स्नेह करने लग गया इसका पता भी नहीं चला और इसी मोहवश एक दिन अपने तपोबल से उसे मानव रूप दे दिया। कन्या जब बड़ी हुई तो उसके विवाह के लिए मैने एक सर्वगुण सम्पन्न मूषक के बारे मे उसकी राय जाननी चाही तो उसने अपनी पसंद दुनिया की सबसे शक्तिशाली शख्सियत को बताया। बहुत समझाने पर भी जब वह ना मानी तो उसे मैने सूर्यदेव के पास भेज दिया, जो मेरी नजर मे सबसे तेजस्वी देवता थे। चुहिया ने उनके पास जा अपनी इच्छा बतायी। इस पर सूर्यदेव ने उसे कहा कि मुझसे ताकतवर तो मेघ है, जो जब चाहे मुझे ढ़क लेता है तुम उनके पास जाओ। यह सुन मुषिका मेघराज के पास गयी और अपनी कामना उन्हें बताई। मेघराज ने मुस्कुरा कर कहा बालिके तुमने गलत सुना है। मुझ से शक्तिशाली तो पवन है जो अपनी मर्जी से मुझे इधर-उधर डोलवाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया ने पवनदेव को जा पकड़ा। पवनदेव ने उसकी सारी बात सुनी और फिर उदास हो बोले कि वह तो सदियों से पर्वत के आगे नतमस्तक होते आए हैं जो उनकी राह में सदा रोड़े अटकाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया मुंह बिचका कर वहां से सीधे पहाड़ के पास आई और उनसे अपने विवाह की इच्छा जाहिर की। अब आज के युग मे छोटी-छोटी बातें तेज-तेज चैनलों से पल भर में दुनिया मे फैल जाती हैं तो पर्वतराज को चुहिया की दौड़-धूप की खबर तो पता लगनी ही थी, वह भी तब जब उनके शिखर पर एक विदेशी कंपनी का टावर लगा हुअ था। सैकड़ों वर्षों पहले की तरह उन्होंने फिर उसे वही बताया कि चूहा मेरे से भी ताकतवर है क्योंकि वह अपने मजबूत पंजों से मुझमे भी छिद्र कर देता है। यह कह उन्होंने अपना पीछा छुड़वाया। इतना सुन चुहिया ने वापस मेरे पास आ चूहे से अपने विवाह की स्विकृति दे दी। मैने मूषकराज को खबर भेजी और यहीं इतिहास भी धोखा खा गया। मूषकराज मेरे घर आए और सारी बातें सुन कर कुछ देर चुप रहे फ़िर बोले देवी क्षमा करें। मैं आपसे विवाह नहीं कर सकता। सच कटू होता है। आपकी अस्थिर बुद्धी तथा चंचल मन, इतने महान और सुयोग्य पात्रों की काबलियत और गुण ना पहचान सके। मैं तो एक अदना सा चूहा हूं। मेरे साथ आपका निर्वाह ना हो सकेगा। इतना कह साधू महाराज उदास हो चुप हो गये। कुछ देर बाद मैने पूछा कि वह आज कल क्या कर रही है। तो ठंड़ी सांस ले मुनि बोले कि लेखिका हो गयी है और पानी पी-पी कर पुरुष वर्ग के विरुद्ध आग उगलती रचनाएं लिखती रहती है।

अब आप सब यह बतायें कि मेरी जंगल यात्रा सफल रही कि नहीं।

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

यहाँ होती है, संसार की सर्वोत्तम भांग की खेती.

मलाणा गाँव, जिसे भारत के बाहर ज्यादा जाना जाता है।
मलाणा, हिमाचल के सुरम्य पर दुर्गम पहाड़ों की उचाईयों पर बसा वह गांव जिसके ऊपर और कोई आबादी नहीं है। आत्म केन्द्रित से यहां के लोगों के अपने रीति रिवाज हैं, जिनका पूरी निष्ठा तथा कड़ाई से पालन किया जाता है, और इसका श्रेय जाता है इनके ग्राम देवता जमलू को जिसके प्रति इनकी श्रद्धा, खौफ़ की हद छूती सी लगती है। अपने देवता के सिवा ये लोग और किसी देवी-देवता को नहीं मानते। यहां का सबसे बडा त्योहार फागली है जो सावन के महिने मे चार दिनों के लिये मनाया जाता है। इन्ही दिनों इनके देवता की सवारी भी निकलती है, तथा साथ मे साल मे एक बार बादशाह अकबर की स्वर्ण प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। कहते हैं एक बार अकबर ने अपनी सत्ता मनवाने के लिये जमलू देवता की परीक्षा लेनी चाही थी तो उसने अनहोनी करते हुए दिल्ली मे बर्फ़ गिरवा दी थी तो बादशाह ने कर माफी के साथ-साथ अपनी सोने की मूर्ती भिजवाई थी। इस मे चाहे कुछ भी अतिश्योक्ति हो पर लगता है उस समय गांव का मुखिया जमलू रहा होगा जिसने समय के साथ-साथ देवता का स्थान व सम्मान पा लिया होगा। सारे कार्य उसी को साक्षी मान कर होते हैं। शादी-ब्याह भी यहां, मामा व चाचा के रिश्तों को छोड, आपस मे ही किए जाते हैं। वैसे तो यहां आठवीं तक स्कूल,डाक खाना तथा डिस्पेंसरी भी है पर साक्षरता की दर नहीं के बराबर होने के कारण इलाज वगैरह मे झाड-फ़ूंक का ही सहारा लिया जाता है।भेड पालन यहां का मुख्य कार्य है, वैसे नाम मात्र को चावल,गेहूं, मक्का इत्यादि की फसलें भी उगाई जाती हैं पर आमदनी का मुख्य जरिया है भांग की खेती। यहां की भांग जिसको मलाणा- क्रीम के नाम से दुनिया भर मे जाना जाता है, उससे बहुत परिष्कृत तथा उम्दा दरजे की हिरोइन बनाई जाती है तथा विदेश मे इसकी मांग हद से ज्यादा होने के कारण तमाम निषेद्धों व रुकावटों के बावजूद यह बदस्तूर देश के बाहर कैसे जाती है वह अलग विषय है।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

यहाँ के लोगों ने कभी कचहरी का दरवाजा नहीं देखा

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। अनोखे लोग, अनोखे रीति-रिवाज, अनोखे स्थल। ऐसी ही एक अनोखी जगह है, हिमाचल की पार्वती घाटी या रूपी घाटी मे 2770मी की ऊंचाई पर बसा गावं "मलाणा"।

विद्वानों के अनुसार यह विश्व का लोकतांत्रिक प्रणाली से चलने वाला सबसे पुराना गावं है। यहां पहुंचने के दो रास्ते हैं, पहला कुल्लू जिले के नग्गर इलाके का एक दुर्गम चढ़ाई और तिक्ष्ण उतराई वाला, जिसका बरसातों मे बहुत बुरा हाल हो जाता है, पर्यटकों के लिये तो खास कर ना जाने लायक। दूसरा अपेक्षाकृत सरल, जो 'जरी' नामक स्थान से होकर जाता है। यहां मलाणा हाइडल प्रोजेक्ट बन जाने से जरी से बराज तक सुंदर सडक बन गयी है, जिससे गाडियां बराज तक पहुंचने लग गयीं हैं। यहां से पार्वती नदी के साथ-साथ करीब 2किमी चलने के बाद शुरू होती है 3किमी की सीधी चढ़ाई, पगडंडी के रूप मे। घने जंगल का सुरम्य माहौल थकान महसूस नहीं होने देता पर रास्ता बेहद बीहड तथा दुर्गम है। कहीं-कहीं तो पगडंडी सिर्फ़ दो फ़ुट की रह जाती है सो बहुत संभल के चलना पड़ता है। पहाडों पर रहने वालों के लिए तो ऐसी चढ़ाईयां आम बात है पर मैदानों से जाने वालों को तीखी चढ़ाई और विरल हवा का सामना करते हुए मलाणा तक पहुंचने मे करीब चार घंटे लग जाते हैं।

कुछ सालों पहले तक यहां किसी बाहरी व्यक्ती का आना लगभग प्रतिबंधित था। चमडे की बनी बाहर की कोई भी वस्तु को गावं मे लाना सख्त मना था। पर अब कुछ-कुछ जागरण हो रहा है,लोगों की आवाजाही बढ़ी है, पर अभी भी बाहर वालों को दोयम नजर से ही देखा जाता है। यहां करीब डेढ सौ घर हैं तथा कुल आबादी करीब पांच-छह सौ के लगभग है जिसे चार भागों मे बांटा गया है। यहां के अपने रीति-रिवाज हैं जिनका पूरी निष्ठा तथा सख्ती के साथ पालन होता है। अपने किसी भी विवाद को निबटाने के लिये यहां दो सदन हैं, ऊपरी तथा निचला। यही सदन यहां के हर विवाद का फ़ैसला करते हैं। यहां के निवासियों ने कभी भी कचहरी का मुंह नही देखा है।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

ये वो हैं जिनके बिना देशों की सुरक्षा दाँव पर लग सकती है.

आज किसी भी देश के लिये उसका गुप्तचर विभाग उसकी सेना का एक आवश्यक अंग बन चुका है। इसके बिना देश की सुरक्षा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हर देश का अपना गुप्तचर संगठन और प्रणाली है। अमेरिका और रूस जैसी बड़ी शक्तियों के बारे में तो अक्सर समाचार आते रहते हैं। इसीलिये उनकी गुप्तचर एजेंसियों का नाम सब को पता रहता है पर अन्य दूसरे देशों के बहुत से ऐसे संगठन हैं जो किसी भी मायने में किसी से कम नहीं हैं। इनमें से कुछ की जानकारी निम्नानुसार है।

सी.आई.ए. :- अमेरिका की यह संस्था दुनिया का सबसे बड़ा गुप्तचर संगठन है। इसका जाल सारे संसार में फैला हुआ है। परन्तु इसके कारण बहुत बार अमेरिका को बदनामी भी सहनी पड़ी है।

के.जी.बी. :- इसका पूरा नाम कामिटेट गोसुदस्त्रवेनाई बीजोपास्तनोस्ती है। इसका मुख्य काम रूस में कम्युनिस्ट शासन को मजबूत बनाना, देश की सीमाओं की देख-रेख तथा विदेशों में गुप्तचरी करना है। करीब दो लाख सदस्यों वाली यह संस्था हर तरह से सी.आई.ए. के समकक्ष है।

डी.जी.आई. :- क्यूबा की इस जासूसी संस्था को रूस की के.जी.बी. की कार्बन कापी माना जाता है। इसके अनेक ऊंचे पदों पर रुसी अधिकारी पदासीन हैं। इसका मुख्य काम अमेरिका समेत उसके सहायक देशों की जासूसी करना है।

सिक्योरिटि इंटेलिजेंस सर्विस :- कनाडा सरकार ने इसका गठन 1981 में किया था। यह “नाटो” की सहायता से अपना काम-काज करती है।

मोस्साद :- इजरायल का यह संगठन अपने आप में एक मजबूत एजेंसी है। इजरायल को सदा युद्धों का सामना करना पड़ता रहा है और उसमें इसकी प्रभावी भूमिका रही है।

सावाक :- ईरान की यह गुप्तचर संस्था कफी बदनाम रही है। 1956 में इसकी नींव सी.आई.ए. और मोस्साद ने मिल कर डाली थी। ईरान के शाह रजा पहलवी का इस पर वरद हस्त था। कहते हैं इसीके जुल्मों के कारण ईरान में क्रान्ति हुई थी।

एम15 और एम16 :- इन दो संगठनों का अस्तित्व ब्रिटेन में 1909 में आया। जहां अमेरिका के साथ मिल कर इन्होंने कफी नाम कमाया वहीं कयी असफलताओं ने इन्हें हंसी का पात्र भी बनाया है।

ए.एस.आई.ओ. :- आस्ट्रेलियन सिक्यूरिटी एंड इंटेलिजेंस आर्गनाइजेशन की नींव शीत युद्ध के दौरान आंतरिक सुरक्षा संगठन के रूप में डाली गयी थी। बाद में इसके दो भाग कर दिये गये। एक को देश में विदेशी जासूसों पर शिकंजा कसने का काम तथा दूसरे को देश में आंतरिक सुरक्षा बनाये रखने की जिम्मेदारी सौंप दी गयी।

रा :- हमारे इस संगठन को कफी सूझ-बूझ से चलाया जाता रहा। पर एक दिन इसको भी राजनैतिक कारणों से सबके सामने आना पड़ा। इसकी भी अपनी बहुत सी उपलब्धियां हैं।

पढने, सुनने देखने में (फिल्मों इत्यादि में) जासूस और उनके कारनामे चाहे कितने भी आकर्षक लगें पर सच्चाई यही है कि यह एक अलग तरह का संसार है। जिसकी अंधेरी सुरंगों से वापस लौटना बहुत मुश्किल होता है। दुनिया की नज़रों से दूर बिना किसी पहचान के, गुप्त जगहों में, गुप्त रह कर, गुप्त योजनाओं को कार्यान्वित करने वाले यह गुप्तचर हर समय कितने तनाव और आशंका में जीते हैं इसका अंदाजा भी आम आदमी नहीं लगा सकता। ऊपर से विड़ंबना यह है कि चाहे कितने भी बड़े काम को ये अंजाम दें, ना तो इनके नाम का किसी को पता चलता है और नही उसका कोई सार्वजनिक पारितोषिक इन्हें मिलता है।

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

नारद मुनि संभवत: गुप्तचरों के सरताज हैं.

सृष्टि के साथ-साथ ही असुरक्षा की भावना भी अस्तित्व में आ गयी होगी। इसीलिये अपने को सुरक्षित रखने के लिये दूसरों के भेद जानने की प्रवृति भी अपने पैर जमाने लग गयी होगी और इसी से इजाद हुई होगी गुप्तचरी की कला।
देखा जाय तो देवताओं की भलाई के लिये सदा तत्पर रहने वाले नारद जी को सबसे पहला गुप्तचर माना जा सकता है। जिन्होंने एक तरह से खुद बदनामी मोल लेकर भी सुरों का भला करना नहीं छोड़ा।

रामायण-महाभारत में भी गुप्तचरों की वृहद जानकारी मिलती है। रावण की कूटनीति में गुप्तचरी को खासा स्थान प्राप्त था। रामायण में उसके विभिन्न गुप्तचरों के नामों का जगह-जगह उल्लेख मिलता है। शुक, सारण, प्रभाष, सरभ तथा शार्दुल उसके प्रमुख गुप्तचर थे। शुक और सारण को ही युद्ध के समय वानर भेष में रामसेना का भेद लेते पकड़ा गया था। उधर विभीषण के लंका के बाहर रहने के बावजूद उनके गुप्तचर लंका में सक्रिय थे जो समय-समय पर उन्हें रावण की गतिविधियों की जानकारी देते रहते थे। श्री राम के लंका विजय के बाद अयोध्या आने पर उनके गुप्तचर भद्रमुख ने ही उन्हें धोबी के कथन की जानकारी दी थी।

महाभारत में तो पग-पग पर गुप्तचारी के कारनामों का उल्लेख मिलता है। धृतराष्ट्र के प्रमुख गुप्तचर का नाम कणिक था। जिससे उसे सारे राज्य की खबरें मिला करती थीं। पांड़वों के अज्ञातवास के दौरान सैंकड़ों गुप्तचर उनका पता लगाने के लिये दुर्योधन ने छोड़ रखे थे। यह गुप्तचरों का ही काम था जो पांडव लाक्षागृह से सकुशल निकल पाये थे। कौरवों को गुप्तचरों द्वारा ही जयद्रथ वध की अर्जुन की प्रतिज्ञा का पता चला था।
महाभारत में शत्रू की सूचना प्राप्त करने के अनेकों उपाय बताये गये हैं। इस काम के लिये साधू, भिक्षुक, नटों, नर्तकियों और अंधे लोगों को उपयुक्त बताया गया है। पर साथ ही साथ संकट काल में इन्हें देश से निर्वासित करने की भी सलाह दी गयी है।
गुप्तचरों के काम की कोई सीमा नहीं होती। जहां संकट के समय इन्हें हर छोटी-बड़ी सूचना अपने अधिकारी को देनी होती है वहीं शांतिकाल में भी राज्य की आंतरिक व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी भी इनकी होती है।

चाणक्य ने तो इस विधा को नयी ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया था। जिसके फलस्वरूप ही चंद्रगुप्त नि:शंक हो अपना राज कर सके।

आज हालत यह है की इंसान तो इंसान जानवर तथा मशीनो का भी उपयोग जासूसी में होने लग गया है। जिसमें शत्रू मित्र का भेद भी ख़त्म हो चुका है। देशों की बात तो दूर अब तो व्यक्तिगत जासूसी आम हो गयी है। यहाँ तक की शादी के पहले भावी वर तथा वधू के आचरण को जानने के लिए लोग गुप्तचरों की सेवा बेहिचक लेने लगे हैं।

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नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...