pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

रविवार, 8 नवंबर 2009

रामदेव जी, सारी सृष्टि का जन्म ही "वैसी" जगह से होता है तो?

वैसे ऐसे लोगों के खिलाफ़ कुछ कहना नहीं चाहिए जो लोगों की भलाई में जुटे हुए हों। पर कभी-कभी कुछ ऐसी बात हो जाती है कि मजबूर हो कर कहना ही पड़ता है।
दो-एक दिन पहले श्रीमति जी, अपने हद से ज्यादा पसंदिदा चैनलों को छोड़ सर्च के चक्कर में पड़ी हुईं थीं (बहुत ज्यादा संभावाना थी कि उनके वालों पर विज्ञापन फेंके जा रहे हों) कि अचानक रामदेव बाबा सामने आ गये, और मेरे कानों में कुछ अंडे जैसे शब्द पड़े। सर्चिंग रोकी गयी।
रामदेव जी अंडे की बुराईयों को तरह-तरह के उदाहरण दे कर समझा रहे थे। इतना तो ठीक था पर अचानक उन्होंने उसे और बदतर दिखाने के लिये कहा कि जो चीज (क्षमा चाहता हूं इसमें एक शब्द भी मेरा नहीं है) पैखाने के रास्ते बाहर आती है वह कैसे अच्छी हो सकती है। इस बात को उन्होंने दो-तीन बार दोहराया। बोले कि उसकी सिर्फ पैकिंग ही अच्छी है बाकी उसमेँ ऐसा कुछ नहीं होता कि उसे खाया जाय। "ऐसी जगह से निकलने वाली कोई भी चीज अच्छी हो ही नहीं सकती। वह त्याज्य होती है।" यह बात ठीक है कि वे अपनी रौ में बोलते चले गये और उनका आशय लोगों को मांस भक्षण से दूर करना था, पर अतिरेक में उनका तर्क कुतर्क में बदल गया। इतने विद्वान आदमी के मुच से ऐसी बातें कुछ शोभा नहीं देतीं। आगे उन्होंने कुछ गंद खाने वाले पशुओं का भी जिक्र किया। वह अलग विषय है।
मैं और मेरा पूरा परिवार पुर्णतया शाकाहारी हैं। रामदेव जी की और उनके अभियान के भी हम सब प्रसंशक हैं। पर जो बात उन्होंने अंडे के उद्गम को ले कर कही वही खलने वाली है। उन्हें भी पता ही होगा कि सारी सृष्टि का सुत्रपात ही जन्नेद्रिंयों से होता है। बड़-बड़े ऋषि-मुनि, विद्वान, प्रभू भक्त, यहां तक कि हमारे आराध्यों को भी मां की कोख से ही जन्म लेना पड़ा है। तो ऐसे रास्ते से आने पर वह सब त्याज्य तो नहीं हो गये। मैं खाने-खिलाने की बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ उनका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि कुछ कर्मकांडों में गो-मुत्र पान करने का विधान है। ऐसी भी कथाएं मिलती हैं कि ऋषियों ने गाय के गोबर में अनपचे अन्न को ग्रहण किया था। फिर धरती का अमृत कहे जाने वाले शहद को क्या कहेंगे जो मक्खी के पेट से बाहर आया उसका लार रूपी भोजन होता है।
हर चीज का आज व्यवसायी करण होता जा रहा है। रामदेव जी भी उससे बच नहीं पा रहे हैं। बाज़ार में खुद को टिका पाना किसी के लिये भी टेढी खीर होता जा रहा है। पर जो भी हो अतिरेक से बचना भी बहुत जरूरी है।

शनिवार, 7 नवंबर 2009

किस्मत से ज्यादा क्या सचमुच नहीं मिलता ? (:

बात कुछ पूरानी जरूर है पर है बड़ी दिलचस्प। उस समय संचार व्यवस्था तो थी नहीं। लोग आने-जाने वालों, व्यापारियों, घुम्मकड़ों, सैलानियों से ही देश विदेश की खबरें, जानकारियां प्राप्त करते रहते थे।

ऐसे ही अपने आस-पास के व्यापारियों की माली हालत अचानक सुधरते देख छोटी-मोटी खेतीबाड़ी करने वाले जमुना दास ने अपने पड़ोसी की मिन्नत चिरौरी कर उसकी खुशहाली का राज जान ही लिया। पड़ोसी ने बताया कि दूर देश के राज में बहुत खुशहाली है। वहां इतना सोना है कि लोग रोज जरूरत की मामूली से मामूली आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी सोने का उपयोग करते हैं। वहां हर चीज सोने की है। सोना मिट्टी के मोल मिलता है।

ऐसी बातें सुन जमुना दास भी उस देश की जानकारी ले वहां जाने को उद्यत हो गया। पर उसके पास जमा-पूंजी तो थी नहीं। पर इस बार प्याज की फसल ठीक-ठाक हुई थी, उसी की बोरियां ले वह अपने गंत्व्य की ओर रवाना हो गया। उसकी तकदीर का खेल कि वहां के लोगों को मसाले वगैरह की जानकारी नहीं थी, प्याज को चखना तो दूर उसका नाम भी नहीं सुना था। जब जमुना दास ने उसका उपयोग बताया तो वहां के लोग उसे खा खूशी से पागल हो गये और जमुना का सारा प्याज मिनटों में खत्म हो गया। उसकी बोरियों को उन लोगों ने सोने से भर दिया। जमुना वापस अपने घर लौट आया। उसके तो वारे-न्यारे हो चुके थे। अब वह जमुना दास नहीं सेठ जमुना दास कहलाने लग गया था।

उसकी जिंदगी बदलते देख उसके पड़ोसी समर से भी नहीं रहा गया। एक दिन वह भी हाथ जोड़े जमुना दास के पास आया और एक ही यात्रा में करोड़पति होने का राज पूछने लगा। उस समय लोगों के दिलों में आज की तरह द्वेष-भाव ने जगह नहीं बनाई थी। पड़ोसी, रिश्तेदारों की बढोत्तरी से, किसी की भलाई कर लोग खुश ही हुआ करते थे। जमुना ने भी समर को सारी बातें तथा हिदायतें विस्तार से बता समझा दीं और उस देश जाने के लिये प्रोत्साहित किया। पर बात वही थी जमुना जैसी, समर की जमा-पूंजी भी उसकी खेती ही थी। संयोग से उसने इस बार लहसुन की अच्छी फसल ली थी सो वही ले कर वह विदेश रवाना हो गया।

ठीक-ठाक पहुंच कर उसने भी अपना सामान वहां के लोगों को दिखाया। भगवान की कृपा, लहसुन का स्वाद तो उन लोगों को इतना भाया कि वे सब प्याज को भी भूल गये, इतने दिव्य स्वाद से परिचित करवाने के कारण वे सब अपने को समर का ऋणी मानने लग गये। पर उन लोगों के सामने धर्मसंकट आ खड़ा हुआ। इतनी अच्छी चीज का मोल भी वे लोग कीमती वस्तु से चुकाना चाहते थे। उनके लिये सोने का कोई मोल नहीं था। तो क्या करें ? तभी वहां के मुखिया ने सब को सुझाया कि सोने से कीमती चीज तो अभी उनके पास कुछ दिनों पहले ही आई है। उसी को इस व्यापारी को दे देते हैं। क्योंकि इतनी स्वादिष्ट चीज के बदले किसी अनमोल वस्तु को दे कर ही इस व्यापारी का एहसान चुकाया जा सकता है। सभी को यह सलाह बहुत पसंद आयी और उन्होंने समर के थैलों को प्याज से भर अपने आप को ऋण मुक्त कर लिया।
बेचारा समर (: (: (: (:

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

क्या बाप या अभिभावक अक्लमंद नहीं हो सकते ?

आप कहेंगे कि बार-बार विज्ञापनों का रोना ले बैठता हूं। पर इन्हें आप की अदालत में लाना जरूरी लगता है। सरकारी विज्ञापन तो वैसे ही माशा-अल्लाह होते हैं। "जागो ग्राहक जागो" में एक नया नमूना आया है।
एक बाप अपने कम्प्यूटर पर विदेश से एक बड़ी रकम अपने नाम दर्ज देख खुशी से उछल पड़ता है तो उसका बेटा उसे समझाता है कि यह धोखा-धड़ी है, अपने बैंक इत्यादि के नम्बर किसी को ना दें। कोई मुफ्त में किसी को एक पैसा नहीं देता।
विज्ञापन में या उसे पेश करने वाले की नियत में कोई खराबी नहीं है। पर एक जिम्मेदार, अनुभवी, उम्रदराज इंसान को बेवकूफी करते ना दिखा उसे नयी पीढी, जो कम तजुर्बेकार है, को भी समझाते दिखाया जा सकता था। बाप की जगह बेटे और बेटे की जगह बाप को दे कर अनुभव की गरिमा और बुजुर्गियत की लाज दोनो बचाई जा सकती थीं। वैसे भी रिटायर्ड़ अभिभावक से ज्यादा पैसे की जरूरत युवा को होती है। जिसके सामने सारी जिंदगी पड़ी है। आज नयी पीढी में अधिकांश युवा ऐसे मिल जायेंगे जो कम समय में, रातों-रात अमीर बन जाने के लिये गलत हालातों में फंस जाते हैं। ऐसे में क्या समय के थपेड़ों से अनुभव प्राप्त कर जिंदगी की ठोस हकीकत को समझने वाले बुजुर्गों की नसीहतें युवा पीढी का मार्गदर्शन नहीं कर पातीं ?

सोमवार, 2 नवंबर 2009

गंदा है पर धंधा है, समय बदला है हथकंडे नहीं

एक रपट :-
कुछ सालों पहले सड़क पर तंबू लगा ताकत की दवाईयां बेचने वाले अपने साथ बहुत सारी फोटुएं लिये रहते थे। जिनमें वे खुद किसी,उस समय के लोकप्रिय मर्दानी छवि वाले फिल्मी हीरो जैसे धर्मेंद्र या दारा सिंह के कंधे पर हाथ रखे मुस्कुराते खड़े नजर आते थे। गोया उन लोगों की मर्दानगी इन सड़क छाप व्यापारियों की देन हो। उस समय तकनिकी इतनी सक्षम नहीं थी फिर ऐसी फोटुएं कैसे खींची जाती थीं इसका पता एक खुलासे से हुआ। होता क्या था कि यह चंट लोग येन-केन-प्रकारेण अपने-आप को नायक का बहुत बड़ा पंखा या उसके शहर-गांव का बता किसी तरह स्पाट ब्वाय वगैरह को पटा कर हीरो को एक फोटो खिंचवाने के लिये राजी करवा लेते थे, कैमरा मैन इन्हीं का आदमी होता था, जैसे ही बटन दबने को होता था ये झट से अपना हाथ नायक के कंधे पर मुस्कुराते हुए धर देते थे, फिर यदि कोई नाराज होता भी था तो हाथ-पैर जोड़ क्षमा मांग नौ-दो-ग्यारह हो जाते थे।

एक जानकारी :-
दैनिक भास्कर की एक सहयोगी पत्रिका है 'अहा!जिंदगी'। जिसके अक्टूबर के अंक में किन्हीं मुनीर खान का जिक्र है। जो काफी बढा-चढा कर, विभिन्न बड़ी हस्तियों की तस्वीरों के साथ पेश किया गया है। जिनमें शीला दीक्षित और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा। रामदौस भी शामिल हैं। जानते हैं पत्रिका ने किस खिताब से नवाजा है उन अपने आप को वैज्ञानिक कहने वाले महाशय को, 'सहस्त्राब्दि का मसीहा'। यह दावा किया गया है कि उनकी जादुई दवा से हर रोग का ईलाज हो सकता है बिना किसी साइड़ इफेक्ट के। यह भी लिखा गया है कि दुनिया के नब्बे से ज्यादा देशों में पेटेंट के लिये आवेदन किया जा चुका है।

एक ख़बर :-
दो दिन पहले के भास्कर में ही किसी खबर के बीच छुपी खबर - "कैंसर और ब्रेन ट्यूमर जैसी बिमारियों के इलाज का दावा करने वाले स्वयंभू वैज्ञानिक मुनीर खान भूमिगत। पुलिस अब तक गिरफ्तार करने में नाकाम।

शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

बच्चों की मासूमियत छीनते ये विज्ञापन

भोजन की मेज पर पति-पत्नि बात कर रहे हैं किसी के बच्चे के विदेश जाने की। साथ ही बैठा तीन-चार साल का बच्चा उनकी बातें बुरा सा मुंह बना कर सुन रहा है। उनकी बात खत्म होते ही वह अपने पिता से पूछता है कि मेरे भविष्य के बारे में तुमने क्या सोचा है?
दूसरा दृष्य, बाप थका-हारा काम से लौट कर अभी खड़ा ही होता है कि बच्चा फिर सवाल दागता है, क्या सोचा? बाप पूछता है किस बारे में ? बच्चा कहता है मेरे भविष्य के बारे में। एक अदना सा बच्चा जिसके दूध के दांत भी पूरे नहीं टूटे होंगे, उसके मुंह से ऐसी बातें निकलवा कर यह विज्ञापन दाता क्या जताना चाहते हैं। क्या आज के मां-बापों को अपने बच्चों की फिक्र नहीं है। या कि आदमी की जेब से पैसा निकलवा कर उसके मरने के बाद के हसीन सपने दिखाने वाली ये कंपनियां बताना चाहती हैं कि तुम्हारे बच्चों की फिक्र तुमसे ज्यादा हम करते हैं। या फिर पश्चिम की तर्ज पर बच्चों को बचपन से ही मां-बाप के विरुद्ध खड़े करने की साजिश है। समय के फेर से संयुक्त परिवार तो खत्म होते ही जा रहे हैं, रही-सही कसर यह धन-लोलूप बाजार, जिसके लिये नाते, रिश्ते, ममता, स्नेह का कोई मोल नहीं है, पूरी करने पर उतारू है। यह विज्ञापन है "बजाज आलियांस" का। अभी इसकी दो किश्तें ही प्रसारित हुई हैं शायद। आगे क्या गुल खिलाता है वही जाने!!!!!!

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

उन लोगों के लिए जो हिंदी को हेय समझते हैं

हिंदी को चाहने वालों के लिये अच्छी और उसको दोयम समझने वालों की जानकारी के लिये एक खबर। हमारी एक आदत है कि जब तक पश्चिम किसी बात पर मोहर ना लगा दे हम उसे प्रमाणिक नहीं मानते। खास कर काले अंग्रेज।
तो एक सवाल उठा कि दुनिया में तरह-तरह की अनेकों लिपियां हैं पर उनमें वैज्ञानिक दृष्टि से सर्वोतम या श्रेष्ठ कौन है ? तरह-तरह की खोजें शुरु हुईं और फ्रांस के वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगात्मक तरीके से जो उत्तर प्राप्त किया उससे यह निष्कर्ष सामने आया कि देवनागरी विश्व की श्रेष्ठतम लिपि है।
उन्होंने विभिन्न लिपियों के वर्णों के अनुसार चीनी-मिट्टी के समानुपातिक खोखले खांचे बनाए। जिनके दो सिरे खुले रखे गये। जब देवनागरी लिपि के अक्षरों मे एक ओर से फूंक मारी गयी तो पाया गया कि उसमें से वैसी ही ध्वनि सुनाई पड़ती है जिन अक्षरों के अनुसार उन्हें निरूपित किया गया है। यानि 'अ' अक्षर से 'अ' और 'ग' से 'ग' ही उच्चारित हुआ। देवनागरी के बाद ग्रीक तथा लेटिन लिपियां अपने वर्णों के अनुरूप पायी गयीं।
अन्य लिपियों के वर्ण आकारों से मिलने वाली ध्वनियां त्रुटिपूर्ण पाई गयीं।
पर दुख तो इसी बात का है कि इसी भाषा से नाम-दाम-यश-शोहरत पाने वाले भी जब मंच पर आते हैं तो उन्हें भी हिंदी बोलने में शर्म आती है। और किसी विधा को छोड़ भी दें तो हम सबने देखा ही है कि हिंदी गानों से अपनी पहचान बनाने वाले 'तथाकथित गवैइये' जब बोलना शुरू करते हैं तो अंग्रेजी में बोल कर शायद यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि गाते जरूर हैं हम हिंदी में पर.........

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

धनतेरस और आने वाली दीपावली सब के लिए मंगलमय हो

आप सभी को इन शुभ दिनों की बधाई। सब जने, परिवार सहित, स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें। सोने के समय को छोड़ जीवन में सदा आलोक छाया रहे।
भले ही नोक-झोंक होती रहे पर हमारा आपसी प्रेम, स्नेह तथा अपनापा बना रहे, प्रभू से यही प्रार्थना है।

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नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...