इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
गुरुवार, 17 सितंबर 2009
क्या हम सब सुविधा भोगी नहीं हो गए हैं?
अरब से ज्यादा आबादी वाले देश को नचा रहे हैं पाँच-साढ़े पाँच सौ लोग। तमाशा हो रहा है संसद में। तमाशे में शामिल कुछ लोग अपना उल्लू सध जाने के बाद ऊँघ रहे हैं कुछ बतिया रहे हैं कुछ, कुछ बोलना जरूरी है इसलिए बोल रहे हैं और कुछ सिर्फ़ अपनी उपस्थिति टी वी पर दर्शाने के लिए बार-बार खड़े हो कर व्यवधान डाल रहे हैं।आधे से ज्यादा को तो शायद पता भी नहीं होगा की मुद्दा क्या है। कारों के काफिलों और उनमे से उतरते सजे सजायेअपने भाग्य विधातायों को देख लगता ही नहीं कि देश में गरीबी या मंहगाई जैसी भी कोई समस्या है। अभी मुहीम चल रही है, खर्च कम कराने की। इस पर कईयों की त्योरियां चढ़ गयी हैं। हैं !!!! , हम क्या "मैंगो मैंन" हैं की हमारे खर्च में कटौती की जा रही है। कुछ ऐसे हैं जो मीडिया के सामने दो-तीन दिन सायकिल पर ख़ुद को बैठा दिखला सुर्खियाँ बटोरने की कोशिश करेंगे। हवाई जहाज में क्लास बदलने का फैशन भी अब आम हो गया है। हम सब को भी यह सब देख अब शायद अजीब सा नहीं लगता। आज हमें भी अंधेरे की इतनी आदत हो गयी है कि हम रोशनी के लिए लड़ना ही नहीं चाहते। केवल नेतायों और व्यवस्था को दोष देने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि हम सब इस भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा हैं। आज जिस बदलाव की जरूरत है उसे वे लोग नहीं ला सकते जो ख़ुद दोहरा जीवन जीते हैं। बाजार की ताकतों ने एक नकली संसार रच दिया है जिसकी माया ने सब को ठग रखा है। हम सब सुविधा भोगी हो गए हैं।
मंगलवार, 15 सितंबर 2009
रमन सिंह, एक मुख्य मंत्री ऐसा भी
हमारे प्रणव दा की खर्चों में कटौती की अपील पर जहां कुछ 'तकदीर के धनियों' के माथे पर बल पड़ गये हैं, अपनी शानो-शौकत में किफायत बरतने के निर्देश पर। वहीं कुछ 'राज महल' में मत्था टेकते वक्त अपनी किफायतों का वर्णन कर सर्वोच्च सत्ता की कृपा दृष्टि का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में जुटे हैं। गोया यह भी एक मौका हो गया भविष्य संवारने का।
यहां इनके कच्चे चिट्ठे खोलने की बजाय मैं एक ऐसे मुख्य मंत्री की ओर सबका ध्यान ले जाना चाहता हूं जो सत्ता में आने के बावजूद किफायत के पक्ष में रहा है। ना ज्यादा ताम-झाम, ना दिखावा, नाहीं उपलब्ध होने के बावजूद सरकारी साधनों का उपयोग। ये हैं छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री, श्री रमन सिंह।
मैं ना किसी पार्टी के पक्ष में हूं ना विपक्ष में, पर जो दिखता है वह बतला रहा हूं। यह भला आदमी प्रणव दा की अपील के पहले से ही जहां तक हो सकता है अपने क्षेत्र का पैसा बचाने की सोचता रहता है। एक पिछड़े और गरीब प्रांत की उन्नति यदि कोई चाहता है तो उसकी टांग खिंचाई के बदले उसे प्रोत्साहन मिलना ही चाहिये। भले ही यह विपक्ष का नेता है, पर जो चीज जनता के हित में है उसे तो उजागर होना ही चाहिये। जिनके लिये आज प्रणव जी को निर्देश देने पड़ रहे हैं उन भले लोगों के भी आंख, कान, दिमाग है। उन्हें देश और देश की जनता क्यों नहीं दिखाई पड़ती। प्रधान मंत्री की बात ना भी करें, क्योंकि उनकी मजबूरी हो सकती है, पद की गरिमा के कारण। वैसे भी आज सोनिआ जी का एकानामी क्लास से सफर एयर इंडिआ को काफी मंहगा पड़ा सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर, तो रमन सिंह जी के अलावा एक और शख्शियत है जो किफायत में विश्वास रखती है। वह हैं हमारी रेल मंत्री ममता बनर्जी।
अंत में मैं आप सबसे एक बात पूछना चाहता हूं। अभी दो-चार दिन पहले दो मंत्री श्रेष्ठों ने कहा था कि वह होटलों का खर्च अपनी जेब से दे रहे हैं। इस बात पर कितने लोगों ने विश्वास किया होगा ?
यहां इनके कच्चे चिट्ठे खोलने की बजाय मैं एक ऐसे मुख्य मंत्री की ओर सबका ध्यान ले जाना चाहता हूं जो सत्ता में आने के बावजूद किफायत के पक्ष में रहा है। ना ज्यादा ताम-झाम, ना दिखावा, नाहीं उपलब्ध होने के बावजूद सरकारी साधनों का उपयोग। ये हैं छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री, श्री रमन सिंह।
मैं ना किसी पार्टी के पक्ष में हूं ना विपक्ष में, पर जो दिखता है वह बतला रहा हूं। यह भला आदमी प्रणव दा की अपील के पहले से ही जहां तक हो सकता है अपने क्षेत्र का पैसा बचाने की सोचता रहता है। एक पिछड़े और गरीब प्रांत की उन्नति यदि कोई चाहता है तो उसकी टांग खिंचाई के बदले उसे प्रोत्साहन मिलना ही चाहिये। भले ही यह विपक्ष का नेता है, पर जो चीज जनता के हित में है उसे तो उजागर होना ही चाहिये। जिनके लिये आज प्रणव जी को निर्देश देने पड़ रहे हैं उन भले लोगों के भी आंख, कान, दिमाग है। उन्हें देश और देश की जनता क्यों नहीं दिखाई पड़ती। प्रधान मंत्री की बात ना भी करें, क्योंकि उनकी मजबूरी हो सकती है, पद की गरिमा के कारण। वैसे भी आज सोनिआ जी का एकानामी क्लास से सफर एयर इंडिआ को काफी मंहगा पड़ा सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर, तो रमन सिंह जी के अलावा एक और शख्शियत है जो किफायत में विश्वास रखती है। वह हैं हमारी रेल मंत्री ममता बनर्जी।
अंत में मैं आप सबसे एक बात पूछना चाहता हूं। अभी दो-चार दिन पहले दो मंत्री श्रेष्ठों ने कहा था कि वह होटलों का खर्च अपनी जेब से दे रहे हैं। इस बात पर कितने लोगों ने विश्वास किया होगा ?
रविवार, 13 सितंबर 2009
श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को दो बार गीता का उपदेश दिया था
छोटी अवधी के बड़े युद्ध का खात्मा हो चुका था। धीरे-धीरे चारों ओर जन-जीवन सामान्य होने की ओर अग्रसर था। युधिष्ठिर सिंहासनारूढ हो चुके थे। सारे मित्र राजाओं की उचित सम्मान के साथ विदाई हो चुकी थी। श्री कृष्ण भी कुछ समय पश्चात द्वारका लौटने की मंशा जाहिर कर चुके थे। हांलाकि पांड़व खास कर अर्जुन अभी उन्हें जाने देना नहीं चाहते थे। फिर भी जाना तो था ही।
इसी तरह एक बार उद्यान में घूमते-घूमते दोनों सखाओं, श्रीकृष्ण और अर्जुन में, विभिन्न विषयों पर वार्तालाप हो रहा था। ऐसे ही बातों-बातों में युद्धभूमि और फिर गीता के उपदेशों की बात होने लगी। तभी अचानक अर्जुन ने कहा, केशव, आपने युद्धभूमि में गीता का उपदेश देकर मेरे साथ-साथ सारी दुनिया का उपकार किया था। आपका वह विराट स्वरूप आज भी मेरे मन-मस्तिष्क में छाया हुआ है। पर मेरी एक प्रार्थना है कि आप यहां से जाने के पहले मुझे फिर एक बार उस अमृत का पान करवा जायें। क्योंकि उस समय के माहौल, युद्ध के कारण मानसिक तनाव, विचलित मन और आपके विराट स्वरूप के दर्शन से दिग्भ्रमित बुद्धी के कारण मैं तब गीता की सारगर्भिता को पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं कर पाया था। इसलिये कृपया एक बार फिर मुझे अपनी मोक्षदायिनी वाणी से कृतार्थ करने की कृपा करें।
श्रीकृष्ण अपने सबसे प्रिय सखा की बात कैसे टालते। वे अर्जुन को ले राजमहल के सभागार में आये और फिर एक बार गीता के उपदेशों की अमृत धारा बहाई।
विद्वानों के अनुसार दोनों बार दिये गये उपदेशों के आध्यात्मिक महत्व में कोई फर्क नहीं है। सिर्फ परिस्थितियों और समय को छोड़ कर। पहली बार सुनने वाले अर्जुन मोहग्रस्त थे तो दूसरी बार विस्मृतिग्रस्त। पहली बार गीता युद्धभूमि में तनाव ग्रस्त माहौल में सुनाई गयी थी, दूसरी शांत माहौल में थोड़े विस्तार के साथ। पहली गीता में कुल अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं, जबकि बाद वाली गीता में छत्तीस अध्याय और करीब एक हजार श्लोक हैं। क्योंकि पहली बार समयाभाव था, पर दूसरी बार ऐसी कोई बात नहीं थी। पहली बार महर्षि वेदव्यासजी ने पूरे उपदेश श्रीकृष्णजी से कहलवाए थे जबकी दूसरी बार परोक्ष रूप से अनेक ऋषी गण, जैसे जनमेजय, नारद, कश्यप, वैशंपायन आदि विद्वान उपदेश देते हैं। जबकि सब का सार एक ही है।
दूसरी बार कही गयी गीता को "अनुगीता" के नाम से जाना जाता है, यानि बाद की गीता।
इसी तरह एक बार उद्यान में घूमते-घूमते दोनों सखाओं, श्रीकृष्ण और अर्जुन में, विभिन्न विषयों पर वार्तालाप हो रहा था। ऐसे ही बातों-बातों में युद्धभूमि और फिर गीता के उपदेशों की बात होने लगी। तभी अचानक अर्जुन ने कहा, केशव, आपने युद्धभूमि में गीता का उपदेश देकर मेरे साथ-साथ सारी दुनिया का उपकार किया था। आपका वह विराट स्वरूप आज भी मेरे मन-मस्तिष्क में छाया हुआ है। पर मेरी एक प्रार्थना है कि आप यहां से जाने के पहले मुझे फिर एक बार उस अमृत का पान करवा जायें। क्योंकि उस समय के माहौल, युद्ध के कारण मानसिक तनाव, विचलित मन और आपके विराट स्वरूप के दर्शन से दिग्भ्रमित बुद्धी के कारण मैं तब गीता की सारगर्भिता को पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं कर पाया था। इसलिये कृपया एक बार फिर मुझे अपनी मोक्षदायिनी वाणी से कृतार्थ करने की कृपा करें।
श्रीकृष्ण अपने सबसे प्रिय सखा की बात कैसे टालते। वे अर्जुन को ले राजमहल के सभागार में आये और फिर एक बार गीता के उपदेशों की अमृत धारा बहाई।
विद्वानों के अनुसार दोनों बार दिये गये उपदेशों के आध्यात्मिक महत्व में कोई फर्क नहीं है। सिर्फ परिस्थितियों और समय को छोड़ कर। पहली बार सुनने वाले अर्जुन मोहग्रस्त थे तो दूसरी बार विस्मृतिग्रस्त। पहली बार गीता युद्धभूमि में तनाव ग्रस्त माहौल में सुनाई गयी थी, दूसरी शांत माहौल में थोड़े विस्तार के साथ। पहली गीता में कुल अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं, जबकि बाद वाली गीता में छत्तीस अध्याय और करीब एक हजार श्लोक हैं। क्योंकि पहली बार समयाभाव था, पर दूसरी बार ऐसी कोई बात नहीं थी। पहली बार महर्षि वेदव्यासजी ने पूरे उपदेश श्रीकृष्णजी से कहलवाए थे जबकी दूसरी बार परोक्ष रूप से अनेक ऋषी गण, जैसे जनमेजय, नारद, कश्यप, वैशंपायन आदि विद्वान उपदेश देते हैं। जबकि सब का सार एक ही है।
दूसरी बार कही गयी गीता को "अनुगीता" के नाम से जाना जाता है, यानि बाद की गीता।
शुक्रवार, 11 सितंबर 2009
जब-जब जो-जो होना है, तब-तब सो-सो होना ही है, तो घबडाहट क्यूं?
फिजिक्स की क्लास में एक बच्चे ने सर से कहा कि बरसात में मुझे जब बिजली चमकती है और बादल गरजते हैं तो बहुत ड़र लगता है, मैं क्या करूं? टीचर ने समझाया, देखो बेटा, जब बिजली चमकती है और बादल गरजते हैं तो जो कुछ होना होता है वह हो चुका होता है। हमें कुछ देर बाद ही आवज और चमक दिखाई पड़ती है। इसलिये डरने की कोई बात ही नहीं है। यदि पहले कुछ होता है तो हमें पता चलने से पहले ही हो चुका होता है। उसमें फिर ड़रने के लिये कोई बचता ही नहीं है। इस डर को बाहर निकालो और अपने अध्ययन में दिल लगाओ। जब जो होना है उसे कोई नहीं रोक पायेगा। सब निश्चित है।
उस बच्चे की तरह हम सब अंत से डरते, अनहोनी की आशंका में इस खुदा की नेमत जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा एवंई गवां देते हैं। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारे, चर्च में जा कर अपनी रक्षा, अनहोनी से बचाव या संकट में उससे सहायता की गुहार लगाते रहते हैं। कितने जने हैं जो वहां जा कर कुछ मांगने की अपेक्षा उसे इस सुंदर जीवन को देने का धन्यवाद करते हैं?
उस बच्चे की तरह हम सब अंत से डरते, अनहोनी की आशंका में इस खुदा की नेमत जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा एवंई गवां देते हैं। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारे, चर्च में जा कर अपनी रक्षा, अनहोनी से बचाव या संकट में उससे सहायता की गुहार लगाते रहते हैं। कितने जने हैं जो वहां जा कर कुछ मांगने की अपेक्षा उसे इस सुंदर जीवन को देने का धन्यवाद करते हैं?
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क्या आप जानते हैं कि श्री कृष्णजी ने अर्जुन को दो बार गीता का उपदेश दिया था?
आगामी कल।
बुधवार, 9 सितंबर 2009
मुर्गे को मुर्गी की फीगर की चिंता
डान की बेटी शादी की दुसरी सुबह गुस्से से तमतमाई हुई अपने कमरे से बाहर निकली। उसकी मां ने उसे ऐसी हालत में देख उसे नार्मल करने को कहा, बेटी सब ठीक हो जायेगा। बेटी बोली वह तो ठीक है, पर अंदर पड़ी लाश का क्या करूं ?
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एक मुर्गी ने बेकरी वाले के यहां जा दो अंडे मांगे। बेकरी वाले ने हैरान हो पूछा, अरे तुम्हें अंडों की क्या जरूरत है? मुर्गी ने शर्माते हुए कहा, मेरा मुर्गा कहता है कि दो रुपयों के लिये तुम अपनी फ़ीगर मत खराब करो।
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एक मुर्गी ने बेकरी वाले के यहां जा दो अंडे मांगे। बेकरी वाले ने हैरान हो पूछा, अरे तुम्हें अंडों की क्या जरूरत है? मुर्गी ने शर्माते हुए कहा, मेरा मुर्गा कहता है कि दो रुपयों के लिये तुम अपनी फ़ीगर मत खराब करो।
सोमवार, 7 सितंबर 2009
पानी की समस्या इतिहास बनने की कगार पर
चलो देर से ही सही नींद तो खुली। वैसे इसे देर भी नहीं कह सकते क्योंकी जब-जब, जो-जो, होना है। तब-तब सो-सो होता है। आखिर में सागर के अथाह जल की ओर ध्यान गया ही सरकार का। वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धी हासिल कर ही ली। रोज दिल दहलाती, जी जलाती, आग उगलती खबरों के बीच ठंड़ी हवा का झोंका बन कर आयी यह खबर कि समुद्री पानी को पीने योग्य बना लिया गया है।
ऐसा नहीं है कि इससे पहले सागर से पीने का पानी बनाने की बात नहीं सोची गयी पर उस पर खर्च इतना आता था कि उसका वहन सब के बस का नहीं था। और तब ना ही इतना प्रदुषण था ना ही बोतलबंद पानी का इतना चलन। अब जब पानी दूध से भी मंहगा होता जा रहा है, तो कोई उपाय तो खोजना ही था। फिलहाल लक्षद्वीप के कावारती द्वीप के रहने वालों को सबसे पहले इसका स्वाद चखने को मिल गया है। और यह संभव हो पाया है "राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान" के अथक प्रयासों के कारण। आशा है साल के खत्म होते-होते तीन संयत्र काम करना शुरु कर देंगे। एक लाख लीटर रोज की क्षमता वाले एक संयत्र ने तो 2005 से ही काम करना शुरु कर दिया है।
शुरु-शुरु में समुद्र तटीय इलाकों में इस पानी को पहुंचाने की योजना है। समुद्री पानी को पेयजल में बदलने के लिये निम्न ताप वाली "तापीय विलवणीकरण प्रणाली (L.T.T.D.) का उपयोग किया जाता है। यह प्रणाली सस्ती तथा पर्यावरण के अनुकूल है। इस योजना के सफल होने पर सरकार बड़े पैमाने पर बड़े संयत्रों को स्थापित करने की योजना बना रही है। अभी एक करोड़ लीटर रोज की क्षमता वाले संयत्र की रुपरेखा पर काम चल रहा है। सारे काम सुचारू रूप से चलते रहे तो दुनिया में कम से कम पानी की समस्या का तो स्थायी हल निकल आयेगा।
16 जून की अपनी एक पोस्ट में मुझे लगा था कि सागर की इतनी जल राशि के रहते पानी के लिये उतनी चिंता की आवश्यकता नहीं है जितनी की खोज की । सही भी है विज्ञान के इस युग में जब टायलेट का पानी साफ कर उपयोग में लाया जा सकता है तो फिर समुद्री पानी को क्यों नहीं । रही बात खर्चे की तो आज जो कीमत हम बोतलों में बंद पानी की दे रहे हैं, जिसके पूर्ण शुद्ध होने पर भी शक विद्यमान है, उससे तो सस्ता ही पड़ेगा सागर के पानी को साफ करना। आखिर अरबों लोगों, जीव-जंतुओं की प्यास का सवाल है।
ऐसा नहीं है कि इससे पहले सागर से पीने का पानी बनाने की बात नहीं सोची गयी पर उस पर खर्च इतना आता था कि उसका वहन सब के बस का नहीं था। और तब ना ही इतना प्रदुषण था ना ही बोतलबंद पानी का इतना चलन। अब जब पानी दूध से भी मंहगा होता जा रहा है, तो कोई उपाय तो खोजना ही था। फिलहाल लक्षद्वीप के कावारती द्वीप के रहने वालों को सबसे पहले इसका स्वाद चखने को मिल गया है। और यह संभव हो पाया है "राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान" के अथक प्रयासों के कारण। आशा है साल के खत्म होते-होते तीन संयत्र काम करना शुरु कर देंगे। एक लाख लीटर रोज की क्षमता वाले एक संयत्र ने तो 2005 से ही काम करना शुरु कर दिया है।
शुरु-शुरु में समुद्र तटीय इलाकों में इस पानी को पहुंचाने की योजना है। समुद्री पानी को पेयजल में बदलने के लिये निम्न ताप वाली "तापीय विलवणीकरण प्रणाली (L.T.T.D.) का उपयोग किया जाता है। यह प्रणाली सस्ती तथा पर्यावरण के अनुकूल है। इस योजना के सफल होने पर सरकार बड़े पैमाने पर बड़े संयत्रों को स्थापित करने की योजना बना रही है। अभी एक करोड़ लीटर रोज की क्षमता वाले संयत्र की रुपरेखा पर काम चल रहा है। सारे काम सुचारू रूप से चलते रहे तो दुनिया में कम से कम पानी की समस्या का तो स्थायी हल निकल आयेगा।
16 जून की अपनी एक पोस्ट में मुझे लगा था कि सागर की इतनी जल राशि के रहते पानी के लिये उतनी चिंता की आवश्यकता नहीं है जितनी की खोज की । सही भी है विज्ञान के इस युग में जब टायलेट का पानी साफ कर उपयोग में लाया जा सकता है तो फिर समुद्री पानी को क्यों नहीं । रही बात खर्चे की तो आज जो कीमत हम बोतलों में बंद पानी की दे रहे हैं, जिसके पूर्ण शुद्ध होने पर भी शक विद्यमान है, उससे तो सस्ता ही पड़ेगा सागर के पानी को साफ करना। आखिर अरबों लोगों, जीव-जंतुओं की प्यास का सवाल है।
रविवार, 6 सितंबर 2009
सीकरी, फर्श से अर्श और अर्श से फर्श तक
सूर्य की तेज गर्मी और तपते रेगिस्तान में एक व्यक्ति नंगे पैर एक दरागाह की तरफ बढा जा रहा था। दुनिया से बेखबर सिर्फ अपनी मंजिल को पाने के लिये बेताब। उसे तो अपने पैरों में पड़े छालों से रिसते खून से उत्पन्न वेदना का भी एहसास नहीं हो रहा था। यह व्यक्ति था सम्राट अकबर। दरागाह थी शेख सलीम चिश्ती साहब की और जगह थी सीकरी नामक एक गांव की।
दुनिया जानती है कि अपनी संतान ना होने के कारण सम्राट अकबर ने सलीम चिश्ती की दरागाह पर जा मन्नत मांगी थी और शेख साहब के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी। इससे अकबर की खुशी की सीमा ना रही। उसने अपने पुत्र का नाम भी शेख साहब के नाम पर सलीम रखा और उस गांव सीकरी को अपनी राजधानी बनाने का फ़ैसला कर लिया।
यूं सीकरी के भाग्य ने पलटा खाया। एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित यह छोटा सा गांव देखते-देखते पूरे देश की राजधानी बन गया। अपनी गुजरात विजय को अविस्मरणीय बनाने के लिये अकबर ने इसका नाम फतेहपुर सीकरी रख दिया। इसे ऊंची-ऊंची दिवारों से घेर कर अनेकों सुंदर भवनों, मस्जिदों बाग-बगीचों का निर्माण कर सजा दिया गया। दिवारों में भी आवागमन के लिये सात दरवाजे बनाये गये जिनका नाम, दिल्ली दरवाजा, आगरा दरवाजा, ग्वालियर दरवाजा, अजमेरी दरवाजा, मथुरा दरवाजा, बीरबल दरवाजा और चंद्रफूल दरवाजा रखा गया। यहां के भवन ज्यादातर लाल पत्थरों से बनाये गये हैं। यहीं शेख साहब तथा उनके परिवार वालों की कब्रें भी हैं जिन्होंने समय के साथ-साथ तीर्थ स्थल की जगह ले ली है। यहां हर साल भव्य तरीके से उर्स मनाया जाता है जहां दुनिया भर से लाखों लोग अपनी मन्नत पूरी करवाने आते हैं।
पर काल के गाल में सबको समाना पड़ता है। उसकी मजबूत दाढों से आज तक कोई नहीं बच पाया है। वही सीकरी जिसकी तूती सारे देश में गूंजती थी, राजधानी दिल्ली चले जाने के बाद, अपना महत्व धीरे-धीरे खोती चली गयी। आज हालत यह है कि सारे भवनों, स्मारकों, बावड़ियों का अस्तित्व खतरे में है। हर जगह विराने का साम्राज्य है। पर्यटक आते जरूर हैं पर बुलंद दरवाजे जैसी कुछ जगहों को देख लौट जाते हैं। रह जाता है पूरा शहर अपने गौरवमयी इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने को आतुर।
दुनिया जानती है कि अपनी संतान ना होने के कारण सम्राट अकबर ने सलीम चिश्ती की दरागाह पर जा मन्नत मांगी थी और शेख साहब के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी। इससे अकबर की खुशी की सीमा ना रही। उसने अपने पुत्र का नाम भी शेख साहब के नाम पर सलीम रखा और उस गांव सीकरी को अपनी राजधानी बनाने का फ़ैसला कर लिया।
यूं सीकरी के भाग्य ने पलटा खाया। एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित यह छोटा सा गांव देखते-देखते पूरे देश की राजधानी बन गया। अपनी गुजरात विजय को अविस्मरणीय बनाने के लिये अकबर ने इसका नाम फतेहपुर सीकरी रख दिया। इसे ऊंची-ऊंची दिवारों से घेर कर अनेकों सुंदर भवनों, मस्जिदों बाग-बगीचों का निर्माण कर सजा दिया गया। दिवारों में भी आवागमन के लिये सात दरवाजे बनाये गये जिनका नाम, दिल्ली दरवाजा, आगरा दरवाजा, ग्वालियर दरवाजा, अजमेरी दरवाजा, मथुरा दरवाजा, बीरबल दरवाजा और चंद्रफूल दरवाजा रखा गया। यहां के भवन ज्यादातर लाल पत्थरों से बनाये गये हैं। यहीं शेख साहब तथा उनके परिवार वालों की कब्रें भी हैं जिन्होंने समय के साथ-साथ तीर्थ स्थल की जगह ले ली है। यहां हर साल भव्य तरीके से उर्स मनाया जाता है जहां दुनिया भर से लाखों लोग अपनी मन्नत पूरी करवाने आते हैं।
पर काल के गाल में सबको समाना पड़ता है। उसकी मजबूत दाढों से आज तक कोई नहीं बच पाया है। वही सीकरी जिसकी तूती सारे देश में गूंजती थी, राजधानी दिल्ली चले जाने के बाद, अपना महत्व धीरे-धीरे खोती चली गयी। आज हालत यह है कि सारे भवनों, स्मारकों, बावड़ियों का अस्तित्व खतरे में है। हर जगह विराने का साम्राज्य है। पर्यटक आते जरूर हैं पर बुलंद दरवाजे जैसी कुछ जगहों को देख लौट जाते हैं। रह जाता है पूरा शहर अपने गौरवमयी इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने को आतुर।
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