गुरुवार, 16 जुलाई 2009

कंजूस, कैसे-कैसे ( - :

एक शहर में धनपति नाम का आदमी रहता था। एक पैसा खर्च करने में उसकी जान निकलती थी। उसको कभी कुछ खरीदते किसी ने नहीं देखा था। लोगों को आश्चर्य था कि वह अपना जीवन-यापन कैसे करता है। लेकिन धनपति को अपने पर बड़ा घमंड़ था। वह अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा कंजूस समझता था। पर एक दिन उसे पता चला कि एक दूसरे शहर में एक लक्ष्मीधर नाम का महा कंजूस रहता है। उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। यह सुन धनपति के मन में जिज्ञासा हुई कि चल कर उसे देखना चाहिये और नहीं तो कुछ कंजूसी के टिप ही मिल जायेंगे। सो एक दिन शुभ मुहूर्त देख वह पैदल उससे मिलने चल पड़ा। उसके यहां पहुंचने पर थके-हारे धनपति का लक्ष्मीधर ने आगे बढ कर स्वागत किया। कुछ देर आराम करने के बाद लक्ष्मीधर बोला, आप सबेरे से चले हो, भूख भी लग आयी होगी, चलिये बाजार से कुछ खा कर आते हैं। धनपति ने मन में सोचा कि यह कैसा कंजूस है, जो मुझे बाहर खाना खिलाने ले जा रहा है। मन ही मन वह खुश भी हुआ कि मुझसे बड़ा धन रक्षक और कोई नहीं है।
दोनो जन बाजार के लिये निकले, लक्ष्मीधर उसे हलवाई की दुकान पर ले गया और उसने हलवाई से पूछा, क्यूं भाई मालपुए ताजे हैं ? हलवाई ने जवाब दिया, अरे सरकार मालपुए तो मक्खन की तरह मुलायम हैं। लक्ष्मीधर ने धनपति की तरफ देख कर कहा कि जब यह मालपुए की तुलना मक्खन के साथ कर रहा है तो क्यों ना हम मक्खन ही खायें। धनपति को क्या एतराज हो सकता था। अब लक्ष्मीपति उसे बेकरी वाले के पास ले गया। वहां उसने पूछा कि क्यूं भाई मक्खन कैसा है? बेकरी वाला बोला महाशय मक्खन तो एकदम ताजा और तेल की तरह साफ है। लक्ष्मीधर फिर धनपति की तरफ मुखातिब हो बोला, आप इतनी दूर से आये हैं तो आप की खातिर मैं उत्तम चीज से ही करना चाहता हूं। इसके अनुसार तेल मक्खन से बेहतर है, चलिये उसे ही चख कर देखते हैं। ऐसा कह वह थके-हारे भूखे-प्यासे धनपति को तेली के कोल्हू पर ले गया और तेली से पूछने लगा कि हां भाई तुम्हारा तेल कैसा है? तेली ने तुरंत जवाब दिया कि क्या पूछते हो बाबूजी मेरा तेल तो एकदम पानी की तरह पारदर्शी और साफ है। इतना सुनना था कि लक्ष्मीधर मुड़ कर धनपति से बोला, नाहक ही आपको भी कष्ट दिया, अरे पानी तो हमारे पड़ोसी के यहां भी मिल जायेगा। चलिये घर चलते हैं। धनपति को अपना जवाब मिल गया था।
यह तो कहानी है पर अपने ही देश में हैदराबाद के निजाम भी हुए हैं। जिनकी आदतों के सामने ऐसे बहुत से धनपति और लक्षमीधर पानी भरा करते थे। कोशिश करता हूं कि जल्द ही निजाम साहब आपके सामने हों।

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

गुरू, गुरू ही होता है.

"गुरू ने अपनी सात फिट की म्यान से तीन फिट की तलवार निकाल शिष्य की गरदन पर रख दी "
पूराने समय में शिष्य आश्रमों में रह कर शिक्षा ग्रहण किया करते थे। गुरू भी अपनी समस्त विद्यायें अपने होनहार विद्यार्थियों को सौंप उन्हें जीवन पथ पर अग्रसर होने का पथप्रदर्शित कर संतोष का अनुभव करते थे। समय के साथ-साथ गुरू शिष्य के रिश्ते भी बदलते गये। कुछ 'होनहार' अपने को गुरू से भी ज्यादा अक्लमंद समझने लग गये। ऐसे ही एक शिष्य की यह कहानी है।
एक मठ में एक बहुत ही योग्य गुरूजी पूरे तन-मन से अपने शिष्यों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दिया करते थे। उनके यहां से शिक्षा प्राप्त युवकों को अनेक राज्यों में अच्छे पद प्राप्त हो जाते थे। उन्हीं के यहां सोमदत्त नाम का युवक शिक्षा ग्रहण किया करता था। वह काफी होनहार तथा मेधावी युवक था। गुरूजी भी उस पर विशेष ध्यान दिया करते थे। अपने लगाव के चलते उन्होंने उसे सर्वगुण संम्पन्न बना दिया। अब वह किसी भी तरह अपने गुरू से कम नहीं था। धीरे-धीरे उसमें घमंड ने स्थान बना लिया। उसे लगने लगा कि उम्र की ढलान पर खड़े गुरू से वह कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है। लोग नाहक ही गुरू को सम्मान देते हैं। इसी द्वेष के मारे उसने अपने गुरू को द्वंद युद्ध की चुन्नौती दे दी। गुरूजी ने इस चुन्नौती को स्वीकार कर एक महीने बाद का दिन निश्चित कर दिया।
सोमदत्त ने अपने गुरू को ललकार तो दिया था पर उसके मन के किसी कोने में यह डर था कि शायद गुरू ने उसे सारे दांव ना सिखाये हों, इसीलिये वह छिप कर एक दिन अपने गुरू को अभ्यास करते देखने आया। उसने पाया कि उसके गुरू सात फुट की तलवार से अभ्यास कर रहे हैं। यह देख उसने भी वापस आ सात फुट की तलवार से अभ्यास करना शुरू कर दिया। निश्चित दिन अपार जन समुह के बीच दोनो योद्धा अपने अस्त्रों के साथ मैदान में उतरे। दोनों के हाथों में सात-सात फुट की म्यानें थीं। डंके पर चोट पड़ते ही सोमदत्त ने अपनी सात फुटी तलवार निकालने की कोशिश की, पर तब तक गुरूजी ने अपनी सात फुट की म्यान से तीन फुट की तलवार निकाल सोमदत्त की गरदन पर टिका दी। गुरूजी की जयजयकार होने लगी। सोमदत्त शर्मिंदगी से जैसे भूमी में गड़ा जा रहा था।

रविवार, 12 जुलाई 2009

न भूलने वाला जायका अमृतसर का.

एक चैनल पर विनोद दुआ जी को घूम-घूम कर लोगों को देश भर के जायके दिलवाते देख कर मुझे भी अपनी अमृतसर यात्रा की याद आ गयी। सारी दुनिया में, पवित्र नगर, अमृतसर स्वर्ण मंदिर के लिये मशहूर है। है ही ऐसी जगह जहां आकर मन को एक अद्भुत शक्ति मिलती है। लगता है कि कोई जरूर है जो सदा हमारे पर अपनी दया दृष्टि बनाये रख रहा है। यहां का "कडाह प्रसाद" जो शुद्ध देशी घी में मंदिर परिसर में ही बनाया जाता है अपने अद्भुत स्वाद के कारण एक अनोखी तृप्ति प्रदान करता है। शायद इसी के प्रभाव से अमृतसर की भोज्य सामग्री अपने आप में अनूठी है। मेरे इस प्रवास पर मेरे मौसेरे भाई (भाई कम दोस्त ज्यादा) जीवन जी का बड़ा सहयोग रहा था। चुन-चुन कर उन्होंने जो स्वाद चखाए, वह किसी नवांगतुक के लिये थोड़े समय में खोज पाना मुश्किल होता है। क्योंकि बाहर से आने वाले के लिये तो सभी दुकाने अमृतसर की ही होती हैं। उनमें से सिरमौर के यहां ले जाने के लिये किसी जानकार का होना जरूरी होता है। मैं उनका सदा शुक्रगुजार रहुंगा।
आप एक बार आकर यहां के ढाबों का स्वाद जीभ को ले लेने भर दें, मजाल है कभी वह इस स्वाद को भूल पाये। बात चाहे पीढियों से चले आ रहे 'केसर के ढाबे' की हो चाहे 'भ्राबां के ढाबे' की, इनके भरवां पराठे, दाल और मोटी मलाई वाला दही कितना भी खालें पेट भर जाता है पर मन नहीं। सारा खेल धीमी आंच और शुद्ध घी का होता है। यह इनकी ईमानदारी की ही बरकत है कि मंहगाई के इस जमाने में जबकि यह ग्राहक से कुछ भी वसूल सकते हैं, ये सिर्फ जायज कीमतों पर ही लोगों का पेट भरने का व्रत ले अपना काम करते जाते हैं।
अमृतसर की बात हो और यहां के कुलचों का जिक्र ना हो यह कैसे हो सकता है। यहां के कुलचे जब देशी घी में नहा कर निकलते हैं तो उनका रूप-रंग तथा उनमें भरे गये अनारदाने और किसमिस का स्वाद बड़े-बड़े उपवासियों को अपना उपवास तोड़ने पर मजबूर कर देते हैं। इन कुलचों का अभिन्न अंग होते हैं मसालेदार चने। जिनको बनाने का तरीका जानने के लिये देश के बड़े-बड़े पंचतारा होटलों के शेफ भी लालायित रहते हैं।
पूरे खाने की बात हो या चाट पकौड़ी की अमृतसर किसी बात में पीछे नहीं है। यहां के 'बृजवासी चाट भंडार' पर कभी चखी, आलू की टिक्की का जायका आज भी यह लिखते-लिखते मुंह में पानी ला दे रहा है। सादी आलू की टिक्की हो या सोयाबीन की पिठ्ठी से भरी दही, सोंठ और हरी चटनी के साथ या पनीर वाली, मिलती बहुत से शहरों में हैं पर इनके जैसा स्वाद अन्यत्र दुर्लभ है। एक बात और जब कभी भी आप यहां आयें तो पनीर की भुजिया खाना तथा पेड़ा ड़लवा कर लस्सी पीना ना भूलें। इसके अलावा आप यहां का स्वाद अपने साथ बांध कर भी ले जा सकते हैं। यहां की आलूबुखारा भरी बड़ियां या अनारदाने वाले पापड़, ये घर पर भी आपको अपनी यात्रा का स्वाद दिलवाते रहेंगे।
ऐसा नहीं है कि यहां सिर्फ शाकाहारी भोजन ही मिलता है। सुना है यहां का मांसाहार लोगों को लखनवी या हैदराबादी स्वाद भूलने पर मजबूर कर देता है। ऐसे रेस्त्रांओं पर जुटी भीड़ इस बात का साक्षी थी। पर मुझ जैसों के लिये वह स्वाद लेना मुश्किल था। सो उसका जायका तो आपको खुद ही लेना पड़ेगा जाकर।
तो कब जा रहे हैं अमृतसर बताईयेगा।

शनिवार, 11 जुलाई 2009

पान खाना स्वास्थ्यकर है. / संता ने भी पान खाया (-:

पान या तांबुल का प्रयोग भारत में कब से हो रहा है नहीं पता, पर प्राचीन काल से ही इसका उल्लेख सामने आता रहा है। इसने वह स्थान प्राप्त किया हुआ है कि पूजा अर्चना में इसे भगवान को भी अर्पित किया जाता है। अपने गुणों की खातिर इसे हमारी दिनचर्या में भी जगह मिली हुई है। आयुर्वेद में भी इसका उपयोग लाभकारी बताया गया है।
पर जैसी हमारी आदत है स्वाद के लिये हम अच्छी चीजों पर अपने 'प्रयोग' कर उन्हें कुछ हद तक बिगाड़ कर रख देते हैं। अब पान को ही लें, तो पता नहीं इसमें जर्दा, किमाम, सुगंधी और न जाने क्या-क्या मिला इसे भी नशीला बना कर ग्रहण किया जाता है जो स्वास्थ्य के लिये हानीकारक होता ही है, धीरे-धीरे इसका व्यसन लग जाता है, जो मुंह और गले के बहुत सारे रोगों को जन्म देने का जरिया बन जाता है। बहुतेरे लोग इसे मिठाई की तरह गुलकंद, नारियल का चूरा और ना जाने क्या-क्या डलवा कर खाते हैं (अब क्या छिपाना, मैंने खुद ऐसा बहुत बार खाया है, मीठे स्वाद के लिये) जिससे इसका फायदा लगभग खत्म हो जाता है।
पान का पूरा लाभ लेने के लिये उसमें जरा सी मात्रा में चूना, कत्था, जायफल, लौंग, ईलायची तथा पक्की सुपारी ड़ाल उपयोग करना चाहिये। कच्ची सुपारी का सेवन हानीकरक माना जाता है।
पान के सेवन से मुंह का स्वाद ठीक रहता है, जीभ साफ रहती है, गले के रोगों में भी फायदा होता है तथा चूने के रूप में शरीर को कैल्शियम की प्राप्ति हो जाती है। इसका उपयोग खाना खाने के बाद ही फायदेमंद रहता है। पर कुछ परिस्थितियों में इसे खाना मना है। जैसे थकान में, रक्तपित्त में, बहुत कमजोर व्यक्ति को, आंखें आने पर, शरीर में सूजन होने पर या गरम प्रकृति के लोगों के लिये इसका सेवन उचित नहीं होता।
*****************************************
संता ने शहर आ पहली बार लोगों को एक 'खोखे' से हरा सा पत्ता ले खाते हुए देखा तो उत्सुकतावश वह भी वहां जा पहुंचा, पूछने पर उसे पता चला कि इस चीज को पान कहते हैं और यह खाने के काम आता है। उसने भी कहा खिलाओ भाई। पनवाड़ी ने एक दिया उसे निगल संता बोला और दो, इस तरह पन्द्रह- बीस पान खा संता ने पैसे दिये और चला गया। दूसरे दिन पनवाड़ी को फिर संता दिखाई पड़ा उसने फिर मुर्गा फांसने के लिये आवाज लगाई, बाबूजी, पान खाते जाओ। संता ने चलते-चलते जवाब दिया, नहीं भाईया आज खाना खा के निकले हैं।

शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

श्रीराम की बहन "शांता" इतनी उपेक्षित क्यूं ?

हिमाचल के कुल्लू जिले से करीब पचास की. मी. के फासले पर बंजार नामक इलाके में  ऋष्यश्रृंग ऋषि का मंदिर है जिसमें देवी शांता की मूर्ति भी स्थापित है। कर्नाटक में भी श्रृंगेरी नगर इन्हीं के नाम पर बसा हुआ है।


श्रीराम जिनका नाम बच्चा-बच्चा जानता है। उनके भाईयों के साथ-साथ उनकी पत्नियों के बारे में सारी जानकारी उपलब्ध है। उनके परिवार की बात छोड़िये उनके संगी साथियों, यहां तक की उनके दुश्मनों के परिवार वालों के नाम तक लोगों की जुबान पर हैं। उन्हीं श्रीराम की एक सगी बहन भी थी। यह बात शायद बहुत से लोगों की जानकारी में नहीं है।

भागवत के अनुसार राजा दशरथ और कौशल्या की एक पुत्री भी थी। जिसे उन्होंने अपने मित्र रोमपाद को गोद दे दिया था। उग्र स्वभाव के रोमपाद अंग देश के राजा थे। एक बार उनके द्वारा राज्य के ब्राह्मणों का अपमान कर दिये जाने के कारण सारे ब्राह्मण कुपित हो राज्य छोड़ कर अन्यत्र चले गये। इस कारण राज्य में अकाल पड़ गया। राजा को अपनी भूल मालुम पड़ी उन्होंने द्विजगणों से माफी मांगी और दुर्भिक्ष निवारण का उपाय पूछा। उन्हें बताया गया कि यदि ऋषि ऋष्यश्रृंग अंगदेश आ जायें तो वर्षा हो सकती है। राजा रोमपाद के अथक प्रयास से ऋषि ऋष्यश्रृंग अंगदेश आए। उनके आते ही आकाश में मेघ छा गये और भरपूर वर्षा होने लगी। इस पर खुश हो राजा रोमपाद ने अपनी गोद ली हुई कन्या का विवाह ऋषि के साथ कर दिया। बेचारी राजकन्या की नियति में वनवास था वह पति के साथ वन में रहने चली गयी।

शांता का उल्लेख अपने यहां तो जगह-जगह मिलता ही है, लाओस और मलेशिया की कथाओं में भी उसका विवरण मिलता है। पर आश्चर्य इस बात का है कि रामायण या अन्य राम कथाओं में उसका उल्लेख क्यूं नहीं है? क्यूं नहीं असमान उम्र तथा जाति में ब्याह दी गयी कन्या का अपने समाज तथा देश के लिये चुपचाप किये गये त्याग का कहीं उल्लेख किया गया? क्या सिर्फ गोद दे दिये जाने की वजह से ?

हिमाचल के कुल्लू जिले से करीब पचास की. मी. के फासले पर बंजार नामक इलाके में  ऋष्यश्रृंग ऋषि का मंदिर है जिसमें देवी शांता की मूर्ति भी स्थापित है। कर्नाटक में भी श्रृंगेरी नगर इन्हींके नाम पर बसा हुआ है। इनके वंशज सेंगर राजपूत कहलाते हैं जो अकेली ऋषिवंशी राजपूत कौम है। 

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

यह 'घाट' तकदीर बदलने की क्षमता रखता है.

आज कल नदियों के घाटों की महत्ता ना के बराबर रह गयी है। दिन त्यौहार छोड़ लोग वहां जाने से कतराने लगे हैं। ऐसे समय में भी एक घाट ऐसा है जो अपनी शरण में आने वाले को दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की बख्शता है। वह घाट है राजनीति का। यहां बहने वाला जल रूपी 'कनक' अपने आश्रित की पीढियां तारने की क्षमता रखता है वह भी इसी जन्म में। बस एक बार यहां आना ही बहुत है।
यहां किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं है। कोई कैसा भी अनपढ गंवार हो, चोर-डकैत हो, किसी भी समुदाय का हो यहां कोई फर्क नहीं किया जाता। एक बार यहां डुबकी लगाते ही वह आम आदमी से ऊपर उठ जाता है। उसे अपनी महत्ता समझ आ जाती है। गीता का अर्थ वह सही मायनों में पा लेता है कि ना कोई भाई है ना बहन, ना मां है ना बाप, ना सगा है ना सम्बन्धी। सब माया है।
जिंदगी भर धर्म की ऐसी की तैसी करने वाला भी धर्म निरपेक्षता का परचम लहराने लगता है। पचासों लोगों को यमपुरी का रास्ता दिखाने वाला भी मानवाधिकारों का पोषक बन जाता है। कभी दो जून की रोटी का जुगाड़ ना कर सकने वाला भी यहां ड़ुबकी लगा इंसान का भोजन तो क्या दुनिया भर के सारे अखाद्य पदार्थों को हजम करने की क्षमता हासिल कर लेता है। इस घाट की यह विषेशता है कि यहां पूर्ण मनोयोग से अपने तन मन को ड़ुबो देने वाला अपने से बुजुर्गों को भी अपनी चरण वंदना करने के लिये मजबूर कर सकता है। यहां आने वाले किशोर व किशोरियां बाबा और अम्मा का संबोधन पा अपने अग्रजों के कान कतरने की क्षमता पा जाते हैं। इसके अलावा इस घाट की सबसे बड़ी विषेशता यह है कि यहां डूब कर पानी पीने वाला चाहे कितना बड़ा भ्रष्टाचारी हो, उसकी आत्मा पवित्र और निर्मल हो जाती है। उसे संसार का कोई दुख, कष्ट, विद्वेष नहीं व्यापता। उसे अलौकिक शक्तियां उपलब्ध हो जाती हैं। यदि द्वेष वश किसी बुद्धिहीन दुनियादार के कारण उसे कारागार के अंदर जाना भी पड़े तो इस घाट की महत्ता से वहां भी उसे पंचतारा सुविधायें उपलब्ध हो जाती हैं। यही नहीं वहां से निकलते ही उसका 'ओरा' यानि आभा मंडल और भी ज्योतिर्मय हो उठता है। एक कहावत है कि जिसने चंबल नदी का पानी पी लिया वह बागी हो जाता है। पता नहीं इस बात में कितनी सच्चाई है पर यह बात तो सोलह आना, राई-रत्ती सच है कि जिसने इस राजनीति के घाट पर डुबकी लगा ली उसके लिये इस संसार में कुछ भी अलभ्य नहीं रह जाता है। हां यह अलग बात है कि पहले तो यहां आना और फिर ड़ुबकी लगाना सबके वश की बात नहीं है। उसके लिये भी एक खास तरह के जिगरे की जरुरत होती है। शुक्र है भगवान का जो ऐसा जिगरा सब को नहीं देता।

बुधवार, 8 जुलाई 2009

उनकी मौत का जन्म हवन कुंड से हुआ था.

राजकुमार द्रुपद और द्रोण गुरु भाई थे। शिक्षा समाप्त होने पर दोनों अपने-अपने नगर को चले गये। पर समय के साथ जहां एक तरफ द्रुपद राजा बने वहीं द्रोण का गरीबी ने पीछा नहीं छोड़ा। गरीबी भी कैसी कि परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गया। बालक अश्वस्थामा, जो द्रोण को जान से भी प्यारा था, के पोषण के लाले पड़ गये। उसको दूध के लिये रोता देख मांग कर लाये गये आटे को घोल कर उसे पिलाते माँ-बाप का कलेजा मुंह को आ जाता था। ऐसी हालत में द्रोण अपनी पत्नि के कहने पर अपने बचपन के मित्र द्रुपद के पास कुछ झिझकते हुए सहायता की आशा में जा पहुंचे। पर वहां का रवैया ही कुछ और था। द्रुपद बचपन की मित्रता को भुला बैठे थे। बातों ही बातों में उन्होंने अपने गरीब मित्र का मजाक बना ड़ाला। उनकी बातों ने द्रोण का कलेजा चीर कर रख दिया। उन्होंने मन ही मन द्रुपद को सबक सिखाने का प्रण कर ड़ाला।
समय बीतता गया। द्रोण द्रोणाचार्य बन कुरु राजवंश के राजकुमारों के गुरु बन गये। युद्ध विद्या में पारांगत करने के बाद जब गुरु दक्षिणा की बारी आयी तो उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिये द्रुपद का राज्य मांग लिया। पांडवों ने द्रुपद को बंदी बना अपने गुरु के चरणों में ला डाला। फिर भी द्रोणाचार्य ने द्रुपद का आधा राज्य यह कहते हुए वापस कर दिया कि गरीबी अभिशाप होती है सो तुम्हें मैं जीवन यापन के लिये आधा राज्य वापस करता हूं।
संतान विहीन द्रुपद इस अपमान को कभी भूल नहीं पाये। पर पांडव रक्षित द्रोण को हराना भी उनके वश में नहीं था। तब पुत्र प्राप्ति कि इच्छा से उन्होंने कपिल मुनि के द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। महाभारत कथा के अनुसार यज्ञ कुंड से दो बच्चों का जन्म हुआ, धृष्टद्युम्न और द्रोपदी का।
समय के साथ द्रोपदी महाभारत युद्ध का कारण बनी वहीं अपने पिता के अपमान का बदला लेने के लिये धृष्टद्युम्न ने जो द्रोणाचार्य के वध का संकल्प लिया था वह भी महासमर में पूरा किया गया।
फर्रूखाबाद जिले के एक गांव कम्पिल में वह प्राचीन हवन कुंड पुराविदों ने खोज निकाला है जिससे गुरु द्रोणाचार्य के काल के रूप में धृष्टद्युम्न ने जन्म लिया था। कभी पांचाल राज्य की राजधानी के रूप में विकसित कम्पिल आज एक नामालुम सा गांव भर रह गया है। पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि यहां खुदाई करने पर महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकती है।

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...