एक शहर में धनपति नाम का आदमी रहता था। एक पैसा खर्च करने में उसकी जान निकलती थी। उसको कभी कुछ खरीदते किसी ने नहीं देखा था। लोगों को आश्चर्य था कि वह अपना जीवन-यापन कैसे करता है। लेकिन धनपति को अपने पर बड़ा घमंड़ था। वह अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा कंजूस समझता था। पर एक दिन उसे पता चला कि एक दूसरे शहर में एक लक्ष्मीधर नाम का महा कंजूस रहता है। उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। यह सुन धनपति के मन में जिज्ञासा हुई कि चल कर उसे देखना चाहिये और नहीं तो कुछ कंजूसी के टिप ही मिल जायेंगे। सो एक दिन शुभ मुहूर्त देख वह पैदल उससे मिलने चल पड़ा। उसके यहां पहुंचने पर थके-हारे धनपति का लक्ष्मीधर ने आगे बढ कर स्वागत किया। कुछ देर आराम करने के बाद लक्ष्मीधर बोला, आप सबेरे से चले हो, भूख भी लग आयी होगी, चलिये बाजार से कुछ खा कर आते हैं। धनपति ने मन में सोचा कि यह कैसा कंजूस है, जो मुझे बाहर खाना खिलाने ले जा रहा है। मन ही मन वह खुश भी हुआ कि मुझसे बड़ा धन रक्षक और कोई नहीं है।
दोनो जन बाजार के लिये निकले, लक्ष्मीधर उसे हलवाई की दुकान पर ले गया और उसने हलवाई से पूछा, क्यूं भाई मालपुए ताजे हैं ? हलवाई ने जवाब दिया, अरे सरकार मालपुए तो मक्खन की तरह मुलायम हैं। लक्ष्मीधर ने धनपति की तरफ देख कर कहा कि जब यह मालपुए की तुलना मक्खन के साथ कर रहा है तो क्यों ना हम मक्खन ही खायें। धनपति को क्या एतराज हो सकता था। अब लक्ष्मीपति उसे बेकरी वाले के पास ले गया। वहां उसने पूछा कि क्यूं भाई मक्खन कैसा है? बेकरी वाला बोला महाशय मक्खन तो एकदम ताजा और तेल की तरह साफ है। लक्ष्मीधर फिर धनपति की तरफ मुखातिब हो बोला, आप इतनी दूर से आये हैं तो आप की खातिर मैं उत्तम चीज से ही करना चाहता हूं। इसके अनुसार तेल मक्खन से बेहतर है, चलिये उसे ही चख कर देखते हैं। ऐसा कह वह थके-हारे भूखे-प्यासे धनपति को तेली के कोल्हू पर ले गया और तेली से पूछने लगा कि हां भाई तुम्हारा तेल कैसा है? तेली ने तुरंत जवाब दिया कि क्या पूछते हो बाबूजी मेरा तेल तो एकदम पानी की तरह पारदर्शी और साफ है। इतना सुनना था कि लक्ष्मीधर मुड़ कर धनपति से बोला, नाहक ही आपको भी कष्ट दिया, अरे पानी तो हमारे पड़ोसी के यहां भी मिल जायेगा। चलिये घर चलते हैं। धनपति को अपना जवाब मिल गया था।
यह तो कहानी है पर अपने ही देश में हैदराबाद के निजाम भी हुए हैं। जिनकी आदतों के सामने ऐसे बहुत से धनपति और लक्षमीधर पानी भरा करते थे। कोशिश करता हूं कि जल्द ही निजाम साहब आपके सामने हों।
दोनो जन बाजार के लिये निकले, लक्ष्मीधर उसे हलवाई की दुकान पर ले गया और उसने हलवाई से पूछा, क्यूं भाई मालपुए ताजे हैं ? हलवाई ने जवाब दिया, अरे सरकार मालपुए तो मक्खन की तरह मुलायम हैं। लक्ष्मीधर ने धनपति की तरफ देख कर कहा कि जब यह मालपुए की तुलना मक्खन के साथ कर रहा है तो क्यों ना हम मक्खन ही खायें। धनपति को क्या एतराज हो सकता था। अब लक्ष्मीपति उसे बेकरी वाले के पास ले गया। वहां उसने पूछा कि क्यूं भाई मक्खन कैसा है? बेकरी वाला बोला महाशय मक्खन तो एकदम ताजा और तेल की तरह साफ है। लक्ष्मीधर फिर धनपति की तरफ मुखातिब हो बोला, आप इतनी दूर से आये हैं तो आप की खातिर मैं उत्तम चीज से ही करना चाहता हूं। इसके अनुसार तेल मक्खन से बेहतर है, चलिये उसे ही चख कर देखते हैं। ऐसा कह वह थके-हारे भूखे-प्यासे धनपति को तेली के कोल्हू पर ले गया और तेली से पूछने लगा कि हां भाई तुम्हारा तेल कैसा है? तेली ने तुरंत जवाब दिया कि क्या पूछते हो बाबूजी मेरा तेल तो एकदम पानी की तरह पारदर्शी और साफ है। इतना सुनना था कि लक्ष्मीधर मुड़ कर धनपति से बोला, नाहक ही आपको भी कष्ट दिया, अरे पानी तो हमारे पड़ोसी के यहां भी मिल जायेगा। चलिये घर चलते हैं। धनपति को अपना जवाब मिल गया था।
यह तो कहानी है पर अपने ही देश में हैदराबाद के निजाम भी हुए हैं। जिनकी आदतों के सामने ऐसे बहुत से धनपति और लक्षमीधर पानी भरा करते थे। कोशिश करता हूं कि जल्द ही निजाम साहब आपके सामने हों।