इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 28 जून 2009
उनके लिए जो शादी शुदा हैं या शादी करने जा रहे हैं.
शनिवार, 27 जून 2009
बेचारे नारद जी ने तो भला ही चाहा था, पर...........
शुक्रवार, 26 जून 2009
एक झंडा जिसे सलामी नहीं मिलती
1969 से 1972 के बीच 12 अंतरिक्ष यात्रियों ने मिल कर करीब 170 घंटे चांद पर बिताये हैं। इस दौरान उन्होंने वहां करीब 100 कि.मी. चहलकदमी की है। वे चांद से लगभग 400 के.जी. मिट्टी तथा चट्टानों के टुकड़े तथा करीब 30000 फोटोग्राफ अपने साथ धरती पर लाने में सफल रहे हैं।
अपोलो 17 का अभियान चांद पर अमेरिका का अंतिम प्रयास था। उसके यात्री अपने पीछे एक धातु के टुकड़े पर खुदा संदेश छोड़ कर आये थे जिस पर खुदा हुआ था कि, दिसम्बर 1972 एडी मे मनुष्य ने अपना पहला चांद की खोज का अभियान पूरा किया। हमारा आशय था कि मनुष्य जाति का शांति संदेश चारों ओर फैले।
नील आर्मस्ट्रांग पहला इंसान था धरती के बाहर किसी आकाशीय पिंड पर अपना पैर रखने वाला। और उस समय उसके कहे शब्द दुनिया जानती है। पर चांद पर किसी मनुष्य के अबतक के अंतिम कदम और शब्द कमाण्डर सरमन के थे जो उन्होंने 11 दिसम्बर 1972 को कहे थे - "America's challenge of today has forged man's destiny of tomorrow"
गुरुवार, 25 जून 2009
ब्लाग जगत लौंडे-लफाड़ियों तथा चाटुकारों का जमावडा है - बकलम बेनामी।
इधर अविनाश जी ढाल बने खड़े थे उधर वह महाशय अपना तरकश खाली करते-करते कटुता की सीमा पार कर कह गये कि “ब्लाग जगत लौंड़े-लफाड़ियों तथा चाटुकारों का जमावड़ा है” इस पर जहां अविनाश जी ने उन महाशय जी को उनकी उम्र का अंदाज लगवा दिया वहीं मुझे उनकी सेहत को मद्देनजर रख उन्हें चेताना पड़ा कि महाशय जब आप को यहां की आबो-हवा रास नहीं आती हमारा हंसना खुश होना आपको नहीं सुहाता तो क्यूं बार-बार इधर ताका-झांकी करने आ जाते हैं ? अरे भाई उस जगह जाना ही क्यूं जहां जाते ही रक्त चाप बढ कर सेहत के लिये खतरे की घंटी बजाना शुरु कर देता हो।
हो सकता है, कयी बार किसी विषय पर सहमत ना होने के कारण मन करता हो कि अपनी बात भी रखी जाय, पर झिझक के कारण कि अगले को शायद बुरा लगेगा, ऐसा कर पाना संभव न लगता हो तो लोग नकाब का उपयोग कर लेते हों। ठीक है अपनी राय रखने को सब स्वतंत्र हैं पर मेरी एक ही गुजारिश है कि कृपया शालीनता के साथ अपनी बात रखें। अपने गुस्से के कारण शब्दों में कटुता ना आने दें। ऐसे में तो वैमनस्य ही बढेगा।
एक बार फिर अविनाश वाचस्पति जी का आभारी हूं जिन्होंने मेरी और ब्लाग परिवार की तरफ से शालीनता को ना छोड़ते हुए मोर्चा संभाले रखा। जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि बहुत बार ऐसी परिस्थितियां आने पर हम खुद विवादाग्रस्त होने के ड़र से सच्चाई का साथ ना दे किनारे खड़े हो जाते हैं।
बुधवार, 24 जून 2009
वृक्ष सिखाता जीवन-दर्शन
मंगलवार, 23 जून 2009
एक बार फिर बेचारे संता की खिंचाई (-:
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संता रात में सड़क किनारे लैंप-पोस्ट के नीचे कुछ खोज रहा था। तभी उनका पड़ोसी उधर से निकला। वहां संता को देख उसने पूछा, संता साहब क्या ढूंढ रहे हो ?संता, मेरा पांच का सिक्का गिर गया है।पड़ोसी ने पूछा, कहां गिरा था ?संता ने एक तरफ हाथ से इशारा कर कहा, उधर।अरे जब गिरा उधर है तो आप यहां क्यों खोज रहे हैं ?संता, यार उधर अंधेरा है।
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संता के बचपन का एक किस्सा :-
संता और उसके दो दोस्त जंगल में घूमते-घूमते भटक कर रास्ता भूल गये। रात होने वाली हो गयी। डर के मारे तीनों की हालत पतली होती जा रही थी। तभी उनमें से एक ने अपने इष्ट को याद किया। आकाशवानी हुई बोलो क्या चाहते हो? बच्चे ने कहा प्रभू मन घबड़ा रहा है, मुझे घर पहुंचा दीजिये। पलक झपकते ही वह वहां से गायब हो घर पहुंच गया। ऐसा देख दूसरे ने भी अपने आराध्य को याद किया। उसके साथ भी वैसा ही हुआ, वह भी घर पहुंच गया। अब जंगल में संता अकेला। अंधेरा घिर आया था। ड़र के मारे इसके हाथ-पैर फूल रहे थे। पर थोड़ी हिम्मत कर इसने भी अपने इष्ट को याद किया। आकाशवाणी हुई, बोल बालक क्या चाहता है? संता बोला, प्रभू अकेले अंधेरे में बहुत ड़र लग रहा है। मेरे दोनों साथियों को मेरे पास ला दो। अगले ही क्षण दोनों (: (: (:
सोमवार, 22 जून 2009
इसका कोई जवाब है क्या ?
कोरिया की कोयम नदी के किनारे एक उंचा टीला है। जिसे नाक्वाहा नाम से जाना जाता है। इस पर हर साल इकहत्तर पौधे उगते हैं और उन पर इकहत्तर ही फूल खिलते हैं और सारे के सारे फूल एक साथ ही नदी में गिर जाते हैं। आज तक इसका रहस्य या कोई भी वैज्ञानिक कारण किसी की समझ में नहीं आ पाया है। पर इतिहास इसका कुछ-कुछ खुलासा करता है। उसके अनुसार सन ६६० में चीन ने यहाँ के राजा को हमला कर बंदी बना लिया था। युद्ध के बाद जब राजा और उसकी इकहत्तर रानियों को गिरफ्तार कर चीन ले जाया जा रहा था तो उन सब ने इसी टीले से नदी में छलांग लगा कर आत्महत्या कर ली थी। यहाँ के निवासियों का विश्वास है की ये इकहत्तर फूल उन्हीं रानियों के प्रतीक हैं।
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संता, बंता से चींटी और हाथी के बच्चे में कौन बड़ा होता है ?
बंता, नैचुरली हाथी का बच्चा।
संता, रहा न खोते का खोता। अरे पागल जो पहले पैदा हुआ होगा वही बड़ा होगा। (-:
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राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है
इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...
