छुटपन से पढ़ते आ रहे हैं की चतुर कौवे ने कंकड़ ला-ला कर घडा भरा और अपनी प्यास बुझाई। पर सोचने की बात है की क्या सचमुच थके-बेहाल कौवे ने इतनी मेहनत की होगी, या कुछ और बात थी। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ था ------------
बात कुछ पुरानी है। कौआ सभी पशु-पक्षियों में चतुर सुजान समझा जाता था। उसकी बुद्धिमत्ता की धाक चारों ओर फैली हुई थी। ऐसे ही वक्त बीतता रहा। समयानुसार गर्मी का मौसम भी आ खड़ा हुआ, अपनी पूरी प्रचंडता के साथ। सारे नदी-नाले -पोखर-तालाब सूख गए। पानी के लिए त्राहि- त्राहि मच गई। ऐसे ही एक दिन हमारा कौवा पानी की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था। उसकी जान निकली जा रही थी। पंख जवाब दे रहे थे। कलेजा मुहँ को आ रहा था। तभी अचानक उसकी नजर एक झोंपडी के बाहर पड़े एक घडे पर पड़ी। वह तुरंत वहां गया, उसने घड़े में झांक कर देखा, उसमे पानी तो था पर एक दम तले में। उसकी पहुँच के बाहर। कौवे ने अपनी अक्ल दौडाई और पास पड़े कंकडों को ला-ला कर घडे में डालना शुरू कर दिया। परन्तु एक तो गरमी दुसरे पहले से थक कर बेहाल ऊपर से प्यास। कौवा जल्द ही पस्त पड़ गया । अचानक उसकी नजर झाडी के पीछे खड़ी एक बकरी पर पड़ी जो न जाने कब से इसका क्रिया-कलाप देख रही थी। यदि बकरी ने उसकी नाकामयाबी का ढोल पीट दिया तो ? कौवा यह सोच कर ही काँप उठा। तभी उसके दिमाग का बल्ब जला और उसने अपनी दरियादिली का परिचय देते हुए बकरी से कहा कि कंकड़ डालने से पानी काफी ऊपर आ गया है तुम ज्यादा प्यासी लग रही हो सो पहले तुम पानी पी लो। बकरी कौवे की शुक्रगुजार हो आगे बढ़ी पर घडे से पानी ना पी सकी। कौवे ने फिर राह सुझाई कि तुम अपने सर से टक्कर मार कर घडा उलट दो इससे पानी बाहर आ जायेगा तो फिर तुम पी लेना। बकरी ने कौवे के कहेनुसार घडे को गिरा दिया। घडे का सारा पानी बाहर आ गया, दोनों ने पानी पी कर अपनी प्यास बुझाई।
बकरी का मीडिया में काफी दखल था। उसने कौवे की दरियादिली तथा बुद्धिमत्ता का जम कर प्रचार किया। सो आज तक कौवे का गुणगान होता आ रहा है। नहीं तो क्या कभी कंकडों से भी पानी ऊपर आता है ?
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 5 अप्रैल 2009
शनिवार, 4 अप्रैल 2009
ऊँट, प्रकृति की एक अजूबी करामात
ऊंट के बारे में हम बचपन से ही पढते-सुनते आए हैं। फिर भी प्रकृति के इस अजीबोगरीब जानवर के बारे में लगता है कि इसे हम पूर्णतया नहीं जान पाए हैं। आईए देखें इसको सूक्ष्मदर्शी से :-
ऊंट के होंठ खरगोश की तरह के होते हैं।
इसके दांत और पेट चूहे से मेल खाते हैं।
इसके पैर हाथी से मिलते-जुलते होते हैं।
इसकी गर्दन हंस जैसी होती है।
इसका खून पक्षियों जैसा होता है और इसका पित्ताशय (gall bladder) नहीं होता।
यह पलकें बंद कर भी देख सकता है।
यह अपने नथुने बालू के बवंडर में बंद कर रह सकता है।
यह अपने पेट और कूबड़ में पानी जमा कर, बिना पानी बहुत दिनों तक रह सकता है। यह तो बहुत से लोगों को मालुम है। पर स्वच्छ जल इसके लिए हानिकारक हो सकता है। इसे खारा पानी ज्यादा पसंद है, यह कम ही लोगों को मालुम होगा।
इसकी पलकों पर मुलायम रेशमी बाल होते हैं जो इसकी आंखों को सूर्य की चकाचौंध से बचाते हैं।
किसी मरे हुए ऊंट को देख कर इसकी हालत बिगड़ जाती है।
कहते हैं कि एक बार पूराने जमाने में कोई व्यापारी इस पर दूध लाद कर ले जा रहा था। इसकी अजीबोगरीब चाल से धचके लग-लग कर दूध, मक्खन में बदल गया। इस तरह मनुष्य के लिए अमृत समान एक पौष्टिक खुराक की ईजाद हुई।
जानवरों के विशेषज्ञ, जिन्होंने अपनी जिंदगी ऊंटों के अध्ययन में गुजार दी, उनका भी मानना है कि वे इस जानवर के बारे में अधिक नहीं जानते। तो फिर हम कहां टिकते हैं।
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009
अजब-गजब दुनिया ( - :
हमारी दुनिया अजूबों से भरी पड़ी है। कभी-कभी तो विश्वास ही नहीं होता कि क्या ऐसा भी हो सकता है ? आज बाप-बेटों के कुछ नमूने देखें -
मोरोक्को के शाह, मुलाइ ईस्माइल (1646-1727) के 888 बच्चे थे। उसकी सेना की एक रेजिमेंट थी जिसमें 540 सैनिक थे और वे सारे के सारे उसके बेटे थे।
टर्की के सुल्तान, मुस्तफा IV (1717-1774) के 582 बच्चे थे। सारे के सारे लड़के। सत्रह सालों तक कन्या पाने की उसकी सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं।
सुल्तान अब्दुल हमीद II, (1876-1909) के सिर्फ 500 के करीब बच्चे थे। आश्चर्य इस बात का नहीं है, आश्चर्य इस बात का है कि उसकी 30,000 पत्नियां थीं।
पोलैंड के अगस्ट II और सैक्सोनी (1670-1733) के 355 बच्चे थे, जिनमें 354 नाजायज औलादें थीं। एकमात्र जायज बेटा अगस्ट III था, जो बाद में राजा बना।
फ्रांस में बोरडिक्स के जीन गाई साहब की किस्मत देखिए। उन्होंने 16 बार शादी की। हर बार वधू अपने साथ अपने बच्चों को लाई। अंत में इन्होंने जब सारे बच्चों का हिसाब लगाया तो पाया कि वे 121 बच्चों के सौतेले पिता हैं।
अंत में फ्रांस के ही पुयी-दि-डोम के जैक्स दि थियर्स (1630-1747) की खुशकिस्मति देखिए। इनके 25 लड़के और एक लड़की थी। इनका प्रत्येक बेटा फ्रांस की सेना में कर्नल बना। हरेक ने युद्ध में अपनी-अपनी रेजिमेंट के साथ लड़ते हुए नाम कमाया। युद्ध के बाद लुइस XIV ने उन्हें प्रशस्ति पत्र दिया जिसमें उल्लेख था कि इन 25 थियर्स भाईयों, जो कि श्रीमान जैक्स थियर्स के बेटे हैं के कारण ही युद्ध जीता जा सका। गर्वोनत जैक्स थियर्स ने 117 साल की उम्र प्राप्त की।
मोरोक्को के शाह, मुलाइ ईस्माइल (1646-1727) के 888 बच्चे थे। उसकी सेना की एक रेजिमेंट थी जिसमें 540 सैनिक थे और वे सारे के सारे उसके बेटे थे।
टर्की के सुल्तान, मुस्तफा IV (1717-1774) के 582 बच्चे थे। सारे के सारे लड़के। सत्रह सालों तक कन्या पाने की उसकी सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं।
सुल्तान अब्दुल हमीद II, (1876-1909) के सिर्फ 500 के करीब बच्चे थे। आश्चर्य इस बात का नहीं है, आश्चर्य इस बात का है कि उसकी 30,000 पत्नियां थीं।
पोलैंड के अगस्ट II और सैक्सोनी (1670-1733) के 355 बच्चे थे, जिनमें 354 नाजायज औलादें थीं। एकमात्र जायज बेटा अगस्ट III था, जो बाद में राजा बना।
फ्रांस में बोरडिक्स के जीन गाई साहब की किस्मत देखिए। उन्होंने 16 बार शादी की। हर बार वधू अपने साथ अपने बच्चों को लाई। अंत में इन्होंने जब सारे बच्चों का हिसाब लगाया तो पाया कि वे 121 बच्चों के सौतेले पिता हैं।
अंत में फ्रांस के ही पुयी-दि-डोम के जैक्स दि थियर्स (1630-1747) की खुशकिस्मति देखिए। इनके 25 लड़के और एक लड़की थी। इनका प्रत्येक बेटा फ्रांस की सेना में कर्नल बना। हरेक ने युद्ध में अपनी-अपनी रेजिमेंट के साथ लड़ते हुए नाम कमाया। युद्ध के बाद लुइस XIV ने उन्हें प्रशस्ति पत्र दिया जिसमें उल्लेख था कि इन 25 थियर्स भाईयों, जो कि श्रीमान जैक्स थियर्स के बेटे हैं के कारण ही युद्ध जीता जा सका। गर्वोनत जैक्स थियर्स ने 117 साल की उम्र प्राप्त की।
रविवार, 29 मार्च 2009
एक सकून दायी ख़बर पाकिस्तान से
कभी-कभी तपती गर्मी में घने पेड़ की छाया पाकर जो सुख मिलता है, वैसे ही पड़ोसी देश से कोई ठंड़ी बयार सी खबर आ मन को सकून पहुंचा जाती है। अभी जाहिदा हिना जी, जो पाकिस्तान की जानी-मानी लेखिका हैं, का एक लेख पढने को मिला। आप भी जायजा लीजिए।
23 मार्च के दिन लाहौर में में भगत सिंह और उनके साथियों को याद किया गया। शादमान चौक पर भगत सिंह की बड़ी तस्वीर रखी गयी, इंकलाबी गाने गाये गये, शहीदों के नाम के नारे लगाए गये। यह सारा कार्यक्रम "भगत सिंह फाउंडेशन फार पीस एंड कल्चर" ने करवाया था। यह तो वह वाकया था जो इंसानियत के जिंदा होने का एहसास करवाता है। अब भाग्य के खेल को देखिए --
उस दिन वहां आने वाले लोगों को बताया गया कि जिस दिन भगत सिंह फांसी चढ रहे थे उस दिन शहर के तमाम मजिस्ट्रेटों ने इस फांसी का गवाह बनने से इंकार कर दिया था। तब एक आनरेरी मजिस्ट्रेट नवाब मोहम्मद अहमद खान ने सरकारी कागजात पर बतौर गवाह दस्तखत किए थे कि उसने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी लगते और दम तोड़ते देखा। संयोग देखिए वही नवाब मोहम्मद लाहौर के शादमान चौक पर गोली मार कर कत्ल कर दिए गये। यह वही जगह है जहां ब्रिटिश काल में फांसीघर हुआ करता था। काल का पहिया फिर घूमता है। नवाब मोहम्मद के बेटे अहमद रज़ा खान ने पाकिस्तान के प्रधान मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के खिलाफ एफ आइ आर दर्ज करवाई और भुट्टो इसी कत्ल के इल्जाम में फांसी चढे।
23 मार्च के दिन लाहौर में में भगत सिंह और उनके साथियों को याद किया गया। शादमान चौक पर भगत सिंह की बड़ी तस्वीर रखी गयी, इंकलाबी गाने गाये गये, शहीदों के नाम के नारे लगाए गये। यह सारा कार्यक्रम "भगत सिंह फाउंडेशन फार पीस एंड कल्चर" ने करवाया था। यह तो वह वाकया था जो इंसानियत के जिंदा होने का एहसास करवाता है। अब भाग्य के खेल को देखिए --
उस दिन वहां आने वाले लोगों को बताया गया कि जिस दिन भगत सिंह फांसी चढ रहे थे उस दिन शहर के तमाम मजिस्ट्रेटों ने इस फांसी का गवाह बनने से इंकार कर दिया था। तब एक आनरेरी मजिस्ट्रेट नवाब मोहम्मद अहमद खान ने सरकारी कागजात पर बतौर गवाह दस्तखत किए थे कि उसने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी लगते और दम तोड़ते देखा। संयोग देखिए वही नवाब मोहम्मद लाहौर के शादमान चौक पर गोली मार कर कत्ल कर दिए गये। यह वही जगह है जहां ब्रिटिश काल में फांसीघर हुआ करता था। काल का पहिया फिर घूमता है। नवाब मोहम्मद के बेटे अहमद रज़ा खान ने पाकिस्तान के प्रधान मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के खिलाफ एफ आइ आर दर्ज करवाई और भुट्टो इसी कत्ल के इल्जाम में फांसी चढे।
रविवार, 22 मार्च 2009
कुंभकर्ण, जिसे अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाया।
कुंभकर्ण एक महान वैज्ञानिक, ईश्वर भक्त, अपनी जाति और परिवार को अपनी जान से भी ज्यादा चाहने वाला एक प्रचंड योद्धा था। परंतु रावण के प्रभामंडल में गुम तथा एक पराजित पक्ष का सदस्य होने के कारण उसे अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाया। जबकि उसी की उपलब्धियों के कारण रावण अपना साम्राज्य चारों ओर फैला सका था। कुंभकर्ण महीनों एकांत में, अपने परिवार और जनता से दूर रह कर तरह-तरह के आविष्कारों को
मूर्तरूप देने में लगा रहता था। इसीलिए उसके बारे में यह बात प्रचलित हो गयी थी कि वह महीनों सो कर गुजारता है।
अलग-अलग भाषाओं में, अलग-अलग स्थानों में लिखी गयी रामायणों में यथा वाल्मीकि रामायण, कम्ब रामायण, आध्यात्म रामायण, गाथा राम-रावण में तथ्यों के आधार पर कुंभकर्ण की उपलब्धियों का विस्तृत वर्णन किया गया है। कुंभकर्ण शुरु से ही सात्विक विचारों वाला कट्टर शिवभक्त था। शिव जी ने उसे अनेकों सिद्धियां प्रदान की हुई थीं। इसके अलावा महर्षि भारद्वाज ने उसे निद्रा पर काबू पाने का रहस्य बताया हुआ था जिससे वह दिन-रात अपने वैज्ञानिक प्रयोगों में जुटा रहता था। उसने अपने बल-बूते पर तरह-तरह के अंतरिक्ष यान, अतिशय तेज गति वाले तथ, भयंकर क्षमता वाले अस्त्र-शस्त्रों का आविष्कार कर लंका की सेना को अजेय बना दिया था। इतना ही नहीं इसके साथ-साथ सैंकड़ों विद्यार्थीयों को निपुण बनाने के लिए उसने कई प्रयोगशालाएं, अपनी देख-रेख में संचालित कर रखी थीं। एक बार दोनों भाईयों ने शिव जी को आमंत्रित कर अपने सारे संस्थान और प्रयोगशालाएं दिखलाई थीं जिससे खुश होकर उन्होंने दोनों को आशीर्वाद दिया था पर साथ ही साथ आदेश भी दिया था कि इन सारी उपलब्धियों का सदुपयोग धरती के जीवों की भलाई के लिये ही किया जाय इसी में जगत की भलाई है।
पर जैसा की हर चीज का अंत होता है। इस फलती-फूलती सभ्यता का भी सर्वनाश, रावण के अहम और उसकी बहन शूर्पणखा की चारित्रिक दुर्बलता के कारण हो गया। शूर्पणखा के तथाकथित अपमान का बदला लेने के लिए जब रावण सीता जी को उठा कर ले आया और युद्ध ने तहस-नहस मचा दी तो रावण ने कुंभकर्ण को समर में अपने आयूधों के साथ उतरने की आज्ञा दी। कुंभकर्ण ने उसे बहुत समझाया तथा सीता जी को वापस भेजने की सलाह भी दी पर रावण ने उसकी एक ना सुनी उल्टे उसे धिक्कारते हुए कायर तक कह डाला। तब मजबूर हो कर
कुंभकर्ण ने युद्ध करने का निश्चय किया और यहीं से राक्षस वंश के विनाश की नींव पड़ गयी।
युद्धक्षेत्र में कुंभकर्ण के आते ही तहलका मच गया। उसके यंत्रों का कोई तोड़ किसी के पास नहीं था। वानर सेना तिनकों की भांति बिखर कर रह गयी। तब विभीषण अपने बड़े भाई से मिलने गये। विभीषण को सामने देख कुंभकर्ण ने उन्हें अपनी विवशता बताई। उसने कहा कि रावण की गलत आज्ञा माननी पड़ी है मुझे। अब मेरा मोक्ष श्री राम के ही हाथों हो सकता है। यदि वे मेरे अस्त्रों को किसी तरह गला सकें तो मेरी मृत्यु निश्चित है। ऐसा ही किया गया। राम जी ने अपने मंत्रपूत बाणों से कुंभकर्ण और उसके यत्रों को नष्ट कर दिया। इस प्रकार एक महान वैज्ञानिक का दुखद अंत हो गया। उसके काम को आगे बढाने वाला भी कोई नहीं था क्योंकि उसका एकमात्र पुत्र सुमेतकेतु पहले से ही संन्यास धारण कर वनगमन कर चुका था।
शुक्रवार, 20 मार्च 2009
मुसीबतें हमें खत्म करने नहीं बल्कि ...........
हिमालय की तराई में एक किसान अपने परिवार के साथ रहता था। वह धार्मिक प्रवृत्ति का इंसान था। अपने काम-काज को निपटा कर गीता का पाठ करना उसका नित्य का काम था। उसका छोटा बेटा उसकी देखा-देखी उसी की तरह गीता पढा करता था। एक दिन बेटे ने अपने पिता से कहा कि मैं रोज गीता पढता हूं पर पुस्तक बंद करते ही सब भूल जाता हूं। कुछ समझ में भी नहीं आता है।
किसान ने उसे कुछ जवाब देने की बजाय उसे कोने में पड़ी एक कोयला रखने की टोकरी दिखाते हुए उसमें नदी से पानी भर कर लाने को कहा। लड़के ने टोकरी उठाई और नदी की ओर चल पड़ा। वहां जा कर उसने टोकरी में पानी भरा और घर की तरफ लौट पड़ा। पर घर तक आते-आते टोकरी का सारा पानी बह गया। यह देख किसान ने बेटे से कहा कि तुमने पूरी कोशिश नहीं की इसलिए टोकरी खाली हो गयी। इस बार जल्दि आने की चेष्टा करना। लड़के ने फिर टोकरी उठाई और नदी किनारे जा उसमें पानी भरा और दौड़ते हुए घर पहुंचा, पर पानी फिर बह गया। लड़के ने पिता से कहा कि टोकरी में पानी नहीं आ सकता मैं बाल्टी में पानी ले आता हूं। यह सुन किसान ने कहा कि तुम आधे-अधुरे मन से काम करते हो इसीलिए ऐसा हो रहा है। लड़का भी पिता के सामने शर्मिंदा नहीं होना चाहता था। उसने फिर टोकरी उठाई और नदी से पानी भर जितनी तेजी से संभव था दौड़ता हुआ घर पहुंचा। पर पानी फिर भी टोकरी से बह गया और टोकरी खाली की खाली रह गयी थी। लड़के ने टोकरी एक तरफ रखी और पिता से बोला कि यह बेकार का काम है। इसमें कोई फायदा नहीं है।
किसान अपने बेटे से बोला, तुम समझते हो कि यह बेकार का काम है, क्योंकि तुमने टोकरी की तरफ ध्यान नहीं दिया है। लड़के ने टोकरी की तरफ देखा तो आश्चर्चकित रह गया। वह कोयलों के कारण काली, गंदी हुई टोकरी बार-बार अंदर बाहर धुल कर नयी के समान चमक रही थी।
किसान ने बेटे से कहा कि जब भी तुम गीता पढते हो, भले ही तुम पूरी ना समझ पाओ या याद ना रख सको पर वह तुम्हें ऐसे ही अंदर और बाहर से स्वच्छ करती रहती है, बदलती रहती है। यही हमारी जिंदगी में प्रभू करते रहते हैं। बिना हमारे जाने। मुसीबतें हमारी जिंदगी में हमे खत्म करने नहीं आतीं वे हमें अपने जीवन पथ पर और मजबूती से आगे बढने के लिए तैयार कर जाती हैं।
किसान ने उसे कुछ जवाब देने की बजाय उसे कोने में पड़ी एक कोयला रखने की टोकरी दिखाते हुए उसमें नदी से पानी भर कर लाने को कहा। लड़के ने टोकरी उठाई और नदी की ओर चल पड़ा। वहां जा कर उसने टोकरी में पानी भरा और घर की तरफ लौट पड़ा। पर घर तक आते-आते टोकरी का सारा पानी बह गया। यह देख किसान ने बेटे से कहा कि तुमने पूरी कोशिश नहीं की इसलिए टोकरी खाली हो गयी। इस बार जल्दि आने की चेष्टा करना। लड़के ने फिर टोकरी उठाई और नदी किनारे जा उसमें पानी भरा और दौड़ते हुए घर पहुंचा, पर पानी फिर बह गया। लड़के ने पिता से कहा कि टोकरी में पानी नहीं आ सकता मैं बाल्टी में पानी ले आता हूं। यह सुन किसान ने कहा कि तुम आधे-अधुरे मन से काम करते हो इसीलिए ऐसा हो रहा है। लड़का भी पिता के सामने शर्मिंदा नहीं होना चाहता था। उसने फिर टोकरी उठाई और नदी से पानी भर जितनी तेजी से संभव था दौड़ता हुआ घर पहुंचा। पर पानी फिर भी टोकरी से बह गया और टोकरी खाली की खाली रह गयी थी। लड़के ने टोकरी एक तरफ रखी और पिता से बोला कि यह बेकार का काम है। इसमें कोई फायदा नहीं है।
किसान अपने बेटे से बोला, तुम समझते हो कि यह बेकार का काम है, क्योंकि तुमने टोकरी की तरफ ध्यान नहीं दिया है। लड़के ने टोकरी की तरफ देखा तो आश्चर्चकित रह गया। वह कोयलों के कारण काली, गंदी हुई टोकरी बार-बार अंदर बाहर धुल कर नयी के समान चमक रही थी।
किसान ने बेटे से कहा कि जब भी तुम गीता पढते हो, भले ही तुम पूरी ना समझ पाओ या याद ना रख सको पर वह तुम्हें ऐसे ही अंदर और बाहर से स्वच्छ करती रहती है, बदलती रहती है। यही हमारी जिंदगी में प्रभू करते रहते हैं। बिना हमारे जाने। मुसीबतें हमारी जिंदगी में हमे खत्म करने नहीं आतीं वे हमें अपने जीवन पथ पर और मजबूती से आगे बढने के लिए तैयार कर जाती हैं।
शुक्रवार, 13 मार्च 2009
गणित कठिन है या आसान, आप ही बताएं.
दुनिया में बहुत कम शूरवीर होते हैं, जिन्हें गणित से भय नहीं लगता। मुझे तो बहुत लगता था। पर इसे देख-पढ कर आप क्या कहेंगें? शायद यही कि, काश! पहले पता होता -
1, 7101449275362318840579 को 7 से भाग देना है। न न, कैलकुलेटर मत उठाईए। सिर्फ संख्या के पहले स्थान के 7 को उठा कर अंतिम स्थान पर रख दें।
2, 105263157894736842 को 2 से गुणा करना है, वैसे तो यह आसन है, फिर भी 2 को अंतिम स्थान से उठा कर सबसे पहले रख दें तो समय बचेगा।
3, 1034482758620689655172413793 को 3 से गुणा करना हो तो सिर्फ सबसे पीछे बैठे 3 को ला कर समने रख दें आपकी प्रोब्लम खत्म।
4, 2 का स्क्वायर रूट ? हां यह थोड़ा मुश्किल है। पचास स्थानों तक का मुल्य ही थका देता है -
1.41421356237309504880168872420969807856967187537694 और यह अंत नहीं है। आप चाहें तो 110 स्थानों तक खात्मा ना हो।
5, क्या आप जानते हैं कि कितना होता है "कुछ" (A FEW) का मुल्य ?
बाईबिल में इसका मुल्य "आठ" बताया गया है।**********************************************************************
संता और बंता शतरंज खेल रहे हैं !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
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