सोमवार, 9 मार्च 2009

क्या लालू जी की यादाश्त कमजोर है ?

राजनीति की खबर रखने वाले भूले नहीं होंगें बिहार में कुछ वर्षों पहले दिनदहाड़े हुए एक हत्याकांड़ को। जिसमें एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ जिलाधिकारी जी. कृष्णैया को मौत के घाट उतार दिया गया था। इसमें बाहूबली नेता आनंद मोहन को कसूरवार पाया गया था और उसे फांसी की सजा दी गयी थी। जो बाद में आजीवन कारावास में बदल दी गयी। उस समय वहां लालू जी का राज था।
उसी आनंद मोहन की पत्नी और पार्टीनेत्री, लवली आनंद को भी उसी मामले में सजा हुई थी पर वह हाईकोर्ट से बरी हो गयी थी। तब लालू यादव ने इन दोनों पति-पत्नी को, एक दलित समाज से आए ईमानदार अफसर की हत्या करने के अपराध में फांसी दिलाने की कसम खाई थी। आज विडंबना देखिए, उसी लवली आनंद को लालू यादव की पार्टी, राजद, ने मधेपुरा या सुपौल से आगामी चुनावों लोकसभा के लिए अपना उम्मीदवार बनाने का निश्चय किया है।
क्या जनता इतनी भुलक्कड़ है या स्वच्छ राजनीति की बात करने वाले ये नेता ?

रविवार, 8 मार्च 2009

क्या कभी स्वर्ग में महिला का राज सुना है ?

आठ मार्च, महिला दिवस। सभी खुश हैं जैसे किसी लुप्तप्राय प्रजाति को बचाने के लिए प्रयास किया जा रहा हो। वे और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर आज का दिन मनाया जा रहा है।
आश्चर्य होता है, दुनिया के आधे हिस्से के हिस्सेदारों के लिए, उन्हें बचाने के लिए, उन्हें पहचान देने के लिए, उनके हक की याद दिलाने के लिए, उन्हें जागरूक बनाने के लिए, उन्हें उन्हींका अस्तित्व बोध कराने के लिए एक दिन, 365 दिनों में सिर्फ एक दिन निश्चित किया गया है। इस दिन वे तथाकथित समाज सेविकाएं भी कुछ ज्यादा मुखर हो जाती हैं, मीडिया में कवरेज इत्यादि पाने के लिए, जो खुद किसी महिला का सरेआम हक मार कर बैठी होती हैं। पर समाज ने, समाज में उन्हें इतना चौंधिया दिया होता है कि वे अपने कर्मों के अंधेरे को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं। दोष उनका भी नहीं होता, आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगं।
ऐसा भी नहीं है कि महिलाएं उद्यमी नहीं हैं, लायक नहीं हैं, मेहनती नहीं हैं। उन्होंने हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। पर पुरुष वर्ग ने बार-बार, हर बार उन्हें दोयम होने का एहसास करवाया है। आज सिर्फ माडलिंग को छोड दें, हालांकि वहां और बहुत से तरीके हैं शोषण के, तो हर जगह महिलाओं का वेतन पुरुषों से कम है। हो सकता है इक्की दुक्की जगह इसका अपवाद हो।
इतिहास को छोड़ पौराणिक ग्रंथ इसके गवाह हैं कि जब-जब पुरुष को महिला की सहायता की जरूरत पड़ी है उसने उसे सिर-आंखों पर बैठाया है, मतलब निकलते ही तू कौन तो मैं कौन?
देवता, चाहे कल्पना हो चाहे हकीकत, जो अपने आप को बहुत दयालू, न्यायप्रिय, सबका हित करने वालों की तरह पेश करती आये हैं, उन पर जब-जब मुसीबतें पड़ीं उन्होंने एकजुट हो कर शक्ति रूपी नारी का आवाहन किया पर मुसीबत टलते ही उसे पूज्य बना कर एक कोने में स्थापित कर दिया। कभी सुना है कि स्वर्ग में किसी महिला का राज रहा हो। इस धरा पर माँ जैसा जन्मदाता, पालनहार, ममतायुक्त, गुरू जैसा कोई नहीं है फिर भी अधिकांश माओं की हालत किसी से छिपी नहीं है।
आज के दिन का नामकरण अमेरिका में घटी एक घटना से हुआ। जो तथाकथित रूप से दुनिया का सबसे ज्यादा सम्पन्न, शिक्षित, न्यायप्रिय और सर्व साधन सम्पन्न देश है। वहां महिलाओं को अपने हितों के लिए लड़ना पड़ा। तो बाकि जगहों की क्या कहें।
होना तो यह चाहिए कि महिलाएं खुद इस दिन का बहिष्कार कर यह जतातीं कि जब पुरुषों ने अपने लिए कोई दिन निश्चित नहीं किया तो हमें क्यों एक दिन समर्पित कर एहसान जता रहे हो। पर ऐसा कैसे हो। इस एक दिन के बहाने, एक और दिन मिल जाता है, पांच सितारा होटलों में, लज़ीज़ व्यंजनों की महक लेते हुए घड़ियाली आंसू बहाने का। यहां इकठ्ठा बहूरूपिए कभी खोज-खबर लेते हैं, सिर पर ईंटों का बोझा उठा मंजिल दर मंजिल चढती रामकली की। अपने घरों में काम करतीं, सुमित्रा, रानी, कौशल्या, सुखिया की। कभी सोचा है तपती दुपहरी में खेतों में काम करती रामरखिया के बारे में। कभी ध्यान दिया है दिन भर सर पर सब्जी का बोझा उठाए घर-घर घूमती आसमती पर।
नहीं ! क्योंकि उससे अखबारों में सुर्खियां नहीं बनतीं, टी.वी. पर चेहरा नज़र नहीं आता। ऐसा यदि करना पड़ जाता है तो पहले कैमरे और माईक का इंतजाम होना जरूरी होता है। ऐसे दिखावे जब तक खत्म नहीं होंगें, महिला जब तक महिला का आदर करना नहीं शुरु करेगी तब तक चाहे एक दिन इनके नाम करें चाहे पूरा साल, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

बुधवार, 4 मार्च 2009

तोप का लायसेंस

संता ने हथियारों के लायसेंस देने वाले दफ्तर में तोप के लिये अर्जी लगाई। वहां से उसे तुरंत बुलावा आया। जैसे ही संता वहां पहुंचा, वहां के सबसे बड़े अधिकारी ने उससे पूछा, कि क्या तुमने तोप लेने के लिए अर्जी दी है? क्या करोगे तोप का? तुम्हें मालुम नहीं नागरिकों को ऐसे हथियार नहीं दिए जाते?
मालुम है सरकार। पर पिछले साल अपनी लड़की की शादी में पांच बोरे चीनी के लिए अर्जी दी थी तो मुश्किल से एक बोरी मिली थी। अब मुझे बंदूक की जरूरत है तो मैने सोचा तोप की अर्जी दुंगा तब बंदूक तो मिल ही जाएगी।
संता ने मासुमियत से जवाब दिया।
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संता की पत्नी ने विज्ञापन पढा "विज्ञान का चमत्कार आप सबको देखें पर आप को कोई ना पहचान पाए, तुरंत मंगाएं, सीमित स्टाक। पैसे अग्रिम भिजवाएं।"
इसके पहले कि पड़ोसन को पता चले उसने तुरंत पैसे भिजवा दिये। चार दिन बाद एक पार्सल भी आ गया, खोल कर देखा तो बुरका निकला।

मंगलवार, 3 मार्च 2009

जानवरों की कुछ विस्मित करती जानकारियाँ

हम मनुष्य अपने संसार में अपने में ही खोए रहते हैं। पर जब हमें अन्य जीव-जन्तुओं और उनकी क्षमताओं के बारे में जानकारियां मिलती हैं तो दांतो तले उंगली दबाने के सिवा और कुछ नहीं सूझता। ऐसे ही कुछ तथ्य दे रहा हूं। देखिए दांतों तले उंगली जाती है कि नहीं : -
1, एक छोटी सी चींटी अपने वजन का 30गुना भार उठा लेती है और अपने वजन का 50गुना भार खींच कर अपने बिल तक ले जा सकती है। क्या हम आप अपने द्वारा इसकी कल्पना भी कर सकते हैं ?
2, नीली व्हेल की सीटी की आवाज पानी में मिलों तक सुनाई पड़ती है। यह किसी भी जानवर के द्वारा उत्पन्न ध्वनी से तेज और तीखी होती है।
3, मगरमच्छ कुछ चबा नहीं सकता पर उसका पाचन रस इतना तेज होता है कि वह लोहे की कील को भी हजम कर सकता है।
4, कुत्तों में हम मनुष्यों से 40गुना ज्यादा सूंघने की क्षमता होती है।
5, जिराफ की जीभ एक से ड़ेढ फुट लम्बी होती है।
6, शेर जैसा ताकतवर और तेज जानवर 24 में 20घंटे आराम ही करता रहता है। ज्यादातर शिकार शेरनी के द्वारा किया जाता है पर खाने में अपने बच्चों से भी आगे सिंहराज रहते हैं।

रविवार, 1 मार्च 2009

महाबलीपुरम में क्यूं नहीं हैं गणेश जी की प्रतिमाएँ

जैसा कि सुब्रमणियन जी ने बताया कि महाबलीपुरम के शिव मंदिरों में गणेश जी की प्रतिमा नहीं मिलती तो मेरे ख्याल से इसके लिये शायद वह पौराणिक घटना जिम्मेवार हो सकती है जिससे कार्तिकेय जी नाराज हो गये थे। कथा तो बहुत से लोगों को मालुम होगी फिर भी प्रसंगवश दिये दे रहा हूं :-
पुराणों के अनुसार एक बार कार्तिकेय और गणेश जी में इस बात पर बहस हो गयी कि उन दोनों में कौन श्रेष्ठ तथा माता-पिता को ज्यादा प्रिय है। फैसला करवाने दोनों भाई शिव जी तथा माता पार्वती जी के पास पहुंचे और इस गुत्थी को सुलझाने के लिये कहा। शिव जी तथा मां पार्वती दोनों पेशोपेश में पड़ गये फिर भी उन्होंने एक रास्ता निकाला और कहा कि जो पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा पहले आएगा वही श्रेष्ठ कहलायेगा। इतना सुनते ही कार्तिकेय जी अपने वाहन मयूर पर सवार हो निकल पड़े। इधर गणेश जी कभी अपने भारी भरकम शरीर को देखें और कभी अपने वाहन छोटे से चूहे को, जिस पर सवार हो पूरी यात्रा करने में उन्हें महिनों लग जाने थे। तभी उनकी तीव्र बुद्धी ने उन्हें एक मार्ग सुझाया कि सारे ब्रह्मांड़ से बड़ा और श्रेष्ठ मां-बाप का पद होता है। फिर क्या था उन्होंने झट अपने माता-पिता की सात प्रदक्षिणाएं कीं और हाथ जोड़ दोनों की स्तुति कर उनके चरणों में बैठ गये। उनकी इस चतुराई से दोनों जने बहुत खुश हुए और उन्हें श्रेष्ठ होने का पुरस्कार प्रदान कर दिया।
उधर जब पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा कार्तिकेय लौटे तो उन्हें इस बात की जानकारी से बहुत दुख हुआ और वे नाराज हो विंध्य पर्वत के पार कभी भी लौट कर ना आने की कसम ले चले गये। उनके इस तरह नाराज हो चले जाने से अब तक दोनों भाईयों की बहस को बच्चों की झड़प मानने वाले शिव तथा पार्वती जी ने बात की गंभीरता को समझा और वे तुरंत अपने बड़े बेटे को मनाने निकल पड़े, पर तब तक बात बहुत बिगड़ चुकी थी। कार्तिकेय को न मानना था और न वह माने। हां उन्होंने अपने माता-पिता की बात रखते हुए अपनी नाराजगी तो दूर कर ली और पर साथ ही यह भी कहा कि मैं तो कैलाश नहीं आउंगा पर आप मुझसे मिलने इधर विंध्य पार जरूर आते रहें। तब से ही दक्षिण में कार्तिकेय जी, जिन्हें वहां मुरुगन जी के नाम से भी जाना जाता है, के मंदिरों की बहुतायद है।
हो सकता है कि यही कारण हो जो यहां के मंदिरों में गणेश जी की प्रतिमाएं नहीं पायी जातीं।
* एक छोटी सी जिज्ञासा, यदि ऐसा हुआ था तो क्या यह कार्तिकेय जी, जिन्होंने माता-पिता की आज्ञा को शिरोधार्य कर उनके आदेश को सर्वोपरि माना, उनका रूठना क्या जायज नहीं था ?
पर ऐसा भी हो सकता है कि अपने-अपने देवों को प्रमुखता देने के लिये भक्तों ने अपनी-अपनी तरफ से कथाएं गढ ली हों। ऐसा पाया भी गया है और इसकी संभावना भी बहुत है।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

एनिवर्सरी :- सिल्वर, गोल्ड, डायमंड के अलावा भी नाम हैं.

एनिवर्सरी या वार्षिकोत्सव ज्यादातर 25वीं सिल्वर या रजत, 50वीं गोल्ड या स्वर्ण और 60वीं डायमंड के रूप में ही जानी जाती हैं जब कि इनका नामकरण 'पहली' से निम्नानुसार जाना जाता है। जैसे :-
First : Paper, Second : Calico,
Third : Leather, Fourth : Silk,
Fifth : Wood, Sixth : Iron
Seventh : Sandle wood, Eighth : Bronze
Ninth : Pottery, Tenth : Tin
Fifteenth : Crystal, Twentieth : China
Twe.fifth : Silver, Thirtieth : Pearl
Thi.fifth : Jade, Fortieth : Ruby
F. fifth : Sapphire, Fiftieth : Gold
F. fifth : Emerald, Sixtieth : Diamond
इस बारे में और ज्यादा जानकारी हो तो जानना चाहूंगा।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

समाधी, तथ्य क्या है?

बहुत बार सुनने में आता है कि किसी जादुगर ने जमीन के नीचे इतना समय बिताया या किसी साधू ने भूमि में समाधी लगाई। तो आश्चर्य चकित रह जाते हैं लोग। कोई इसे दैवी शक्ति बताता है और कोई कुछ और। पर विज्ञान क्या कहता है देखें -------
भू समाधी के लिये सबसे बड़ी जरूरत होती है अभ्यास की। इसके लिये एक कमरेनुमा स्थान बनाया जाता है, जिसमें आराम से बैठा जा सके। कमरे को पानी से सींच कर दिवारें चूने से पोत दी जाती हैं। फिर उसमें दीया जला कर आक्सीजन गैस की मात्रा देख ली जाती है। समाधी लेने वाले के प्रवेश के बाद गड्ढे की छत को बांस-टाट आदि से ढ़क कर मिट्टी गोबर आदि से पोत दिया जाता है।
वैज्ञानिक आकलन के अनुसार दस फिट लंबे, दस फिट चौडे तथा दस फिट गहरे (10x10x10) गड़्ढे में 1000 घन फिट हवा रहती है। जबकि एक स्वस्थ आदमी को एक घंटे में सिर्फ 5 घन फिट हवा की जरूरत पड़ती है। जिसका सीधा अर्थ है कि उस आकार के गडढे में एक इंसान 200 घंटे यानि 8 दिन तक रह सकता है। इसके साथ-साथ विश्राम की अवस्था में श्वसन में भी कम वायू की जरूरत होती है। इसके अलावा कमरे की मिट्टी भी भुरभुरी रहती है जिससे सुक्ष्म मात्रा में ही सही, वायू का आवागमन बना रहता है। सो समाधी के लिये दृढ इच्छाशक्ति और अभ्यास के साथ-साथ मानसिक संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है।
समाधी की तुलना अंतरिक्ष यात्रियों, टैंक में बैठे फौजियों तथा पनडुब्बियों में रहने वाले सैनिकों से की जा सकती है। काम कठिन है पर अभ्यास से संभव है।

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...