मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

हँसना नहीं है तो मुस्कुराईये तो सही

पोता दादा जी से जिद कर रहा था सर्कस दिखाने की। चलिए ना दादा जी सर्कस में नयी-नयी चीजें दिखा रहे हैं। हाथी और गैंडा फुटबाल खेलते हैं। जोकर बहुत हंसाते हैं। पर दादा जी मान ही नहीं रहे थे, क्या बिटवा वही सब पुराने खेल हैं। पोता भी कहां मानने वाला था बोला सुना है इस में ढेर सारे घोड़े ताल में नाचते हैं। दादा जी भी नहीं मान रहे थे बोले देख तो रहे हो मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है। पर पोता भी अड़ा हुआ था, बताने लगा, उपर झूले में एक साथ दस जने झूलते हैं और अबकी चीन से लड़कियां आयीं हैं जो छोटे-छोटे कपड़ों में पोल डांस करती हैं।
दादा जी उठे बोले चल इतनी जिद करता है तो चले चलता हूं। मैने भी घोड़ों को ताल पर नाचते नहीं देखा है।
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गांव के गरीब किसान दुखीराम की दस लाख की लाटरी निकल आयी। ये खबर ले कर आने वाला एजेंट सोच रहा था कि इतनी बड़ी राशि मिलने की बात सुन कर कहीं दुखीराम को हार्ट अटैक ना हो जाये इस लिये उसने एक योजना बनाई।
दुखीराम के पास जा कर उसने कहा कि दादा यदि आप को एक लाख रुपये मिल जायें तो क्या करोगे ? दुखीराम बोला भाई घर का छप्पर ठीक कराउंगा, एक-दो बैल ले लुंगा। अच्छा दादा पांच लाख मिले तो क्या करोगे ? बिटिया की शादी कर दूंगा। अच्छा दादा यदि तुम्हें दस लाख रुपये मिल जायें तो क्या करोगे ? दस लाख!!! दुखीराम बोला, दस लाख मिल जायेंगे तो आधे तुम्हें दे दूंगा।
इतना सुनना था कि एजेंट का हार्ट फेल हो गया।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

लोहार्गल, जहाँ पांडवों के हथियार गले थे.

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था, पर पांडव स्वजनों की हत्या के पाप से व्यथित थे। श्री कृष्ण के निर्देश पर वह सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन करते भटक रहे थे। श्री कृष्ण ने उन्हें बताया था कि जिस तीर्थ में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पांण्ड़व लोहार्गल आये तथा जैसे ही उन्होंने यहां के सूर्य कुंड़ में स्नान किया उनके सारे हथियार गल गये। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ राज की उपाधी से विभूषित किया। फिर शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की।
राजस्थान के शेखावटी इलाके के झुंझुनूं जिले से 70 कि. मी. दूर आड़ावल पर्वत की घाटी में बसे उदयपुरवाटी कस्बे से करीब दस कि.मी. की दूरी पर स्थित है लोहार्गल। जिसका अर्थ होता है जहां लोहा गल जाए। पुराणों में भी इस स्थान का जिक्र मिलता है। पहले यहां सिर्फ साधू-सन्यासी ही रहा करते थे, पर अब गृहस्थ लोग भी रहने लगे हैं। यहां एक बहुत विशाल बावड़ी है जो महात्मा चेतन दास जी ने बनवाई थी, यह राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में से एक है। साथ के पहाड़ पर प्राचीन सूर्यमंदिर बना हुआ है। साथ ही वनखंड़ी जी का मंदिर है। कुंड़ के पास ही प्राचीन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर तथा पांड़व गुफा स्थित है। इनके अलावा चार सौ सीढियां चढने पर मालकेतु जी के दर्शन किये जा सकते हैं। यहां समय-समय पर मेले लगते रहते हैं। हज़ारों नर-नारी यहां आ कुण्ड़ में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।
लोहार्गल एक प्राचीन, धार्मिक, ऐतिहासिक स्थल है। लोगों की इसके प्रति अटूट आस्था भी है। भक्तों का यहां आना-जाना लगा रहता है फिर भी इस क्षेत्र की हालत सोचनीय है। सरकार की ओर से पूर्णतया उपेक्षित इस जगह पर प्राथमिक सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। चारों ओर गंदगी का आलम है। पशु-मवेशी खुले आम घूमते रहते हैं। सड़कों की हालत दयनीय है। नियमित बस सेवा भी उपलब्ध नहीं है। रहने खाने का भी कोई माकूल इंतजाम नहीं है। यदि इस ओर थोड़ा सा भी ध्यान पर्यटन विभाग दे तो यहां देशी-विदेशी पर्यटकों का आना शुरु हो सकता है।

अब तो हम भी आस्कर वाले हो गए हैं

चलो आखिर आस्कर मिल ही गया। उनको भी सकून मिलेगा जो शहर के अंदेशे से परेशान रहते थे। उनको भी जिन्हें इसके अब तक छलने का गम होता रहता था। वे तो बहुत ही खुश होंगे जिनके लिये हर बेहतरीन चीज तब तक कोई पहचान नहीं रखती जब तक पश्चिम का ठप्पा ना लग जाए।
फिर भी रहमान और गुलज़ार साहब को उनकी मेहनत, समर्पण, लगन तथा उत्कृष्टता के लिये सम्मान मिला, पहचान मिली विश्व स्तर पर, तो हम भी तो गौर्वान्वित हुए ही हैं। ये आस्कर वाले वर्षों से हमें पूर्वाग्रहों के कारण नकारते चले आ रहे थे पर प्रतिभा को कब तक नज़रंदाज़ किया जा सकता है।
जय हो, जय हो

"आप सब को महा शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं"

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

जल चिकित्सा, कई रोगों का आसान इलाज.

आज जबकि किसी भी रोग की चिकित्सा कराना दिनों-दिन मंहगा होता चला जा रहा है, वहीं दसियों साल पहले "जापानी रोग संघ" द्वारा एक सरल, सुलभ तथा तकरीबन मुफ्त की चिकित्सा विधि बतलाई गयी थी। जिसका नाम है "जल-चिकित्सा"। संघ द्वारा प्रकाशित लेख में बताया गया है कि यदि जल-उपचार को विधिपूर्वक किया जाए तो बहुत से कठिन रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है।
विधी :- सबेरे सोकर उठते ही बिना ब्रश किये या मुंह धोये एक साथ चार गिलास, करीब ड़ेढ लीटर, पानी पीना होता है। इसके बाद 40-45 मिनट तक कुछ भी खाना या पीना नहीं नहीं चाहिए। हां ब्रश वगैरह कर सकते हैं। इस उपचार के दौरान किसी भी भोजन (नाश्ता, दोपहर या रात्रि भोजन) के बाद कम से कम दो घंटे तक पानी नहीं पीना चाहिए। इसके अलावा सोने के पहले कुछ भी खाने की मनाही है। दिन भर अपनी जरूरत के अनुसार जल ग्रहण किया जा सकता है।
जो लोग एक साथ चार गिलास पानी नहीं पी सकते हों उन्हें एक या दो गिलास से शुरु कर धीरे-धीरे चार गिलास तक पहुंचना चाहिए। पर प्रक्रिया को बीच में खत्म नहीं करना चाहिए। इस उपचर को कोई भी अपना सकता है वह चाहे स्वस्थ हो या बीमार। यह एक साधारण उपचार विधि है, जिस पर कोई लागत नहीं आती। चार गिलास पानी पीने से कोई विपरीत प्रभाव भी नहीं पड़ता। केवल प्रकृति की पुकार बढ जाती है वह भी 2-3 बार के लिए, फिर वह आदत में शुमार हो जाती है।
जापानी रोग संघ के अनुसार निम्न रोगों को समाप्त होने में दिया गया संभावित समय लगता है - -
1, उच्च रक्तचाप :- 1 माह,
2, मधुमेह :- 1 माह,
3, कैंसर :- 1 माह,
4, आमाशायी रोग :- 10 दिन,
5, कब्ज :- 10 दिन,
6, क्षय रोग :- 3 माह,
आज तो हर चिकित्सक ज्यादा से ज्यादा पानी पीने की सलाह देता है, तो एक बार आजमाने में कोई दिक्कत भी नहीं है सिर्फ नियम बद्ध हो कर और थोड़ा विश्वास रखते हुए शुरु करने भर की देर है। मैं तो शुरु हूं आप भी हो जाईये।

पंचकेदार, जिनका स्मरण ही काफी है.

हिमालय की विस्तार स्थली का केन्द्र है "गढवाल मंड़ल"। भारतवर्ष का पवित्रतम स्थान। पुराणों के अनुसार एक बार शिव जी घूमते-घूमते यहां पहुंचे और यहां की सुंदरता से प्रभावित हो कर यहीं के हो कर रह गये। उन्हीं के नाम से यहां का नाम "केदार खंड" या "केदारभूमी" कहलाया।
शिवपुराण के अनुसार वर्षों बाद महाभारत युद्ध के बाद स्वजनों की हत्या के पाप से मुक्त हो मोक्ष की प्राप्ति के लिये पांडव शिव जी को खोजते-खोजते यहां भी पहुंच गये। उनसे बचने के लिए शिव जी महिष का रूप धर भूमि में समाने लगे। परन्तु महाबली भीम ने उन्हें देख कर पहचान लिया और महिष रूपी शिव की पूंछ पकड़ ली तथा सभी पांडवों ने उनकी पूजा-अर्चना कर उन्हें प्रसन्न कर लिया। शिव जी ने पांडवों को उनके पापों से मुक्त कर दिया। उसी समय से शिव जी का पिछला भाग केदारनाथ में केदारलिंग के रूप में पूजित है।
महिषरूपी शिव जी के अन्य भाग कालांतर में गढवाल में ही रुद्रनाथ, तुंगनाथ, मध्यमहेश्वर तथा कल्पेश्वर में प्रगट हुए और यह पांचों स्थान पंचकेदार के नाम से प्रसिद्ध हुए।
पंचकेदार के दर्शन अपने आप में सैंकडों तीर्थों की यात्रा का पुण्य प्रदान करते हैं।

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

देवताओं ने किसी को भी नहीं बक्शा

भक्त प्रह्लाद। भगवान का परम भक्त । भक्ति भी ऐसी कि उसके पिता को अपनी जान गंवानी पड़ी। उसी का बेटा विरोचन और विरोचन का बेटा बलि। बलि यानि प्रह्लाद का पोता। उसके जैसा दानी, पराक्रमी, प्रजा पालक शयाद ना हुआ ना होगा। तीनों लोकों का विजेता। देवता फिर संशकित अपने प्रभुत्व को बचाने के लिये विष्णु जी की शरण में गये। भगवान ने वामन रूप धरा और दो पगों में धरती-आकाश नाप लिये तीसरे पग के लिये बलि ने अपनी पीठ नपवा दी। फिर एक बार छल की जीत हुई। बलि को पाताल भेज दिया गया और स्वर्ग फिर देवताओं को मिल गया।
यह नहीं देखा गया कि प्रह्लाद का क्या योगदान था या बलि का कसूर ही क्या था

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

सांदीपनी आश्रम, जहां श्री कृष्ण और सुदामा ने शिक्षा ग्रहण की

समयाभाव के कारण उज्जैन प्रवास के दौरान सांदीपनी आश्रम की जानकारी विस्तार से नहीं ले पाया था। फिर भी इसके बारे में कुछ खास बातें सामने रख रहा हूं। यह वही पावन जगह है जहां श्री कृष्ण जी ने अपने बड़े भाई बलराम जी और अपने मित्र सुदामा के साथ अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की थी। यह उज्जैन शहर से करीब तीन की.मी. की दूरी पर मंगलनाथ मंदिर के पहले स्थित है। आज भी शहरी कोलाहल से दूर हरे-भरे खेतों के बीच स्थित यह आश्रम मन को बहुत सकून पहुंचाता है।

आश्रम के अंदर बहुत सारे प्राचीन दर्शनीय स्थल हैं। जैसे गुरु की पूजा स्थली, श्री कृष्ण-सुदामा विद्यास्थान, सर्वेश्वर महादेव मंदिर, वल्लभ निकुंज, कुण्ड़लेश्वर महादेव मंदिर, गोमती कुंड इत्यादि। श्री कृष्ण विद्या स्थली में श्री कृष्ण, बलराम जी और सुदामा जी की मुर्तियां इतनी सुंदर हैं कि उन्हें सिर्फ देख कर ही महसूस किया जा सकता है। एकदम जिवंत लगती हैं, जैसे अभी बोल उठेंगी। वहीं पास में गुरु पातंजली की भव्य प्रतिमा स्थापित है। पर सबसे दर्शनीय है कुण्डलेश्वर महादेव जी का प्राचीन मंदिर। यहां मैने दो बातें सबसे अनोखी और जीवन में पहली बार देखीं। एक तो स्वयंभू शिव लिंग पर लिपटे सर्प की प्राकृतिक आकृति जो लिंग के साथ ही बनी हुई है, अलग से नहीं लगाई गयी है। दूसरे द्वार पर स्थित नंदी महाराज की प्रतिमा जो खड़ी अवस्था में है। मैंने सभी शिवालयों में नंदी को बैठे हुए ही पाया था, यहां पहली बार उन्हें खडे हुए देखा। आश्रम के पिछवाड़े एक गहरी बावड़ी है फिलहाल उसमें भी जल की मात्रा बहुत कम दिखी।

मेरा जाना 26 जनवरी को हो पाया था। उस दिन सूर्य ग्रहण और मौनी अमावस्या होने के कारण सब जगह बड़ी भीड़ थी सो पूरी जानकारी हासिल करने में सफल नहीं हो पाया था, इसका अफसोस रहेगा। पर एक बार फिर जा कर इतिहास खगांलने का पक्का इरादा है।

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...