उपदेश :- जिंदगी में खुश रहना है तो सदा खुदा और बीवी से डर कर रहना चाहिए।
सार :- खुदा को भी कभी किसीने देखा है?
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विज्ञापन :- कैंसर का इलाज़ हमसे करवाएं।
खुलासा :- इसका इलाज़ तो असली डाक्टरों के पास भी नहीं है। पर हम सस्ते में मारते हैं।
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तलाश :- बाबा, कोई ऐसा वशीकरण-मंत्र दो, जिससे मैं अपनी झगड़ालू बीवी को बस में कर सकुं। बच्चा, ऐसा कोई मंत्र मेरे पास होता तो मैं साधू ही क्यों बनता।
सच्चाई :- वैरागी बनने का कारण आस-पास भी हो सकता है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
बुधवार, 29 अक्टूबर 2008
सोमवार, 27 अक्टूबर 2008
अनदेखे 'अपनों' को दीप-पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं
इस विधा यानि ब्लागिंग से आप सब से जो स्नेह, अपनापन, हौसला मिला है, उससे मन अभिभूत है। यह कैसी अजीब बात है कि जब तक एक बार रोज सबके नाम ना देख लिए जाएं तो कुछ खाली-खाली सा लगता है। तीन चार दिनों तक किसी की उपस्थिति न दिखे तो मन बरबस उसकी ओर लगा रहता है। ये जो "अनदेखे अपनों" से लगाव है उसे क्या नाम दिया जाए? इन रिश्तों को कैसे प्रभासित किया जाए? आज तक samajh में naheen aa paayaa है। in तीन सालों में apnii kuupamandukataa ke kaaran bahut kam logon से aamane-saamane milanaa ho paayaa है। sabhii se milane की ichchhaa मन me hone ke baawajuud किसी न किसी kaaran से waisaa sambhaw nahiin ho sakaa। khair yah aapasii स्नेह aise ही banaa rahe yahii kaamanaa है।
इस दीपोत्सव पर आप सभी को सपरिवार मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं।
इस दीपोत्सव पर आप सभी को सपरिवार मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं।
आने वाले दिन और बेहतर हों। सभी जने सदा सुखी, स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें।
यही प्रभू से प्रार्थना है।
रविवार, 26 अक्टूबर 2008
कैसी रही
एक गडेरिया अपना रेवड़ चरा रहा था कि एक बड़ी सी गाड़ी उसके पास आ कर रुकी। उसमें से कीमती कपड़े पहने हुए एक युवक उतरा और गड़ेरिये के पास आ बोला, कि मैं यदि तुम्हारे रेवड़ में कितनी भेड़ें हैं , बतला दूं तो क्या तुम मुझे एक भेड़ दोगे? गड़ेरिए के मान जाने पर युवक ने अपना लैप टाप निकाला, सैटेलाईट से कनेक्शन जोड़ा, उस जगह को स्कैन किया, जटिल आंकड़ों को जोड़ा घटाया, फिर गड़ेरिये को बताया कि तुम्हारे पास 1352 भेड़ें हैं। गड़ेरिए के सही है, कहने पर युवक ने अपनी पसंद का जानवार उठा कर अपनी गाड़ी में रख लिया। तब चरवाहे ने कहा कि यदि मैं बता दूं कि तुम्हारा पेशा क्या है, तो क्या तुम मेरा जानवर वापस कर दोगे? युवक ने भी उसकी बात मान ली। इस पर चरवाहे ने कहा कि तुम प्रबंधन सलाहकार हो। युवक आश्चर्यचकित हो बोला, अरे! तुम्हें कैसे पता चला? चरवाहे ने जवाब दिया, यह तो बहुत आसान था। तुम बिना बुलाए मेरे पास आए। बिना मेरे मांगे अपनी सलाह दी, ऐसे सवाल का जवाब दिया जिसका उत्तर मुझे मालुम था, और इस सब की कीमत भी ली, जब की तुम मेरे काम के बारे में कुछ भी नहीं जानते।
"लाओ मेरा कुत्ता वापस करो"
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तीन पागलों को उनके चेक-अप के लिए एक खाली पड़े स्विमिंग पूल के पास ले जाकर डाक्टर ने कहा, कूदो। दो पागल तुरंत कूद गये और चोट खा बैठे। तीसरे की तरफ देख कर डाक्टर ने कहा, अरे वाह, तुम तो ठीक हो गये हो। अच्छा बताओ तुम क्यों नहीं कूदे?
उसने जवाब दिया "मुझे तैरना कहां आता है"
"लाओ मेरा कुत्ता वापस करो"
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तीन पागलों को उनके चेक-अप के लिए एक खाली पड़े स्विमिंग पूल के पास ले जाकर डाक्टर ने कहा, कूदो। दो पागल तुरंत कूद गये और चोट खा बैठे। तीसरे की तरफ देख कर डाक्टर ने कहा, अरे वाह, तुम तो ठीक हो गये हो। अच्छा बताओ तुम क्यों नहीं कूदे?
उसने जवाब दिया "मुझे तैरना कहां आता है"
शनिवार, 25 अक्टूबर 2008
''स्वयंप्रभा'', रामायण का एक उपेक्षित पात्र
थके-हारे, निश्चित समय में सीता माता को ना खोज पाने के भय से व्याकुल, वानर समूह को उचित मार्गदर्शन दे, लंका का पता बताने वाली सिद्ध तपस्विनी "स्वयंप्रभा" को वाल्मीकि रामायण के बाद कोई विशेष महत्व नहीं मिल पाया। हो सकता है, श्री राम से इस पात्र का सीधा संबंध ना होना इस बात का कारण हो।
#हिन्दी_ब्लागिंग
शबरी की तरह ही स्वयंप्रभा भी श्री राम की प्रतीक्षा, एकांत और प्रशांत वातावरण में संयत जीवन जीते हुए कर रही थी। परन्तु ये शबरी से ज्यादा सुलझी और पहुंची हुई तपस्विनी थीं। इनका उल्लेख किष्किंधा कांड के अंत में तब आता है, जब हनुमान, अंगद, जामवंत आदि सीताजी की खोज में निकलते हैं। काफी भटकने के बाद भी सीताजी का कोई सुराग नहीं मिल पाता है। सुग्रीव द्वारा दिया गया समय भी स्माप्ति पर आ जाता है। थके-हारे दल की भूख प्यास के कारण बुरी हालत होती है। सारे जने एक जगह निढ़ाल हो बैठ जाते हैं। तभी हनुमानजी को एक अंधेरी गुफा में से भीगे पंखों वाले पक्षी बाहर आते दिखते हैं। जिससे हनुमानजी समझ जाते हैं कि गुफा के अंदर कोई जलाशय है। गुफा बिल्कुल अंधेरी और बहुत ही डरावनी थी। सारे जने एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अंदर प्रविष्ट होते हैं। वहां हाथ को हाथ नहीं सूझता था। बहुत दूर चलने पर अचानक प्रकाश दिखाई पड़ता है। वे सब अपने आप को एक बहुत रमणीय, बिल्कुल स्वर्ग जैसी जगह में पाते हैं। पूरा समूह आश्चर्य चकित सा खड़ा रह जाता है। चारों ओर फैली हरियाली, फलों से लदे वृक्ष, ठंडे पानी के सोते, हल्की ब्यार सब की थकान दूर कर देती है। इतने में सामने से प्रकाश में लिपटी, एक धीर-गंभीर साध्वी, आती दिखाई पड़ती है। जो वल्कल, जटा आदि धारण करने के बावजूद आध्यात्मिक आभा से आप्लावित लगती है। हनुमानजी आगे बढ़ कर प्रणाम कर अपने आने का अभिप्राय बतलाते हैं, और उस रहस्य-लोक के बारे में जानने की अपनी जिज्ञासा भी नहीं छिपा पाते हैं। साध्वी, जो कि स्वयंप्रभा हैं, करुणा से मंजुल स्वर में सबका स्वागत करती हैं तथा वहां उपलब्ध सामग्री से अपनी भूख-प्यास शांत करने को कहती हैं। उसके बाद शांत चित्त से बैठ कर वह सारी बात बताती हैं।
यह सारा उपवन देवताओं के अभियंता मय ने बनाया था। इसके पूर्ण होने पर मय ने इसे देवराज इंद्र को समर्पित कर दिया। उनके कहने पर, इसके बदले कुछ लेने के लिए जब मय ने अपनी प्रेयसी हेमा से विवाह की बात कही तो देवराज क्रुद्ध हो गये, क्योंकि हेमा एक देव-कन्या थी और मय एक दानव। इंद्र ने मय को निष्कासित कर दिया, पर उपवन की देख-भाल का भार हेमा को सौंप दिया। हेमा के बाद इसकी जिम्मेदारी स्वयंप्रभा पर आ गयी।
इतना बताने के बाद, उनके वानर समूह के जंगलों में भटकने का कारण पूछने पर हनुमानजी उन्हें सारी राम कथा सुनाने के साथ-साथ समय अवधी की बात भी बताते हैं कि यदि एक माह स्माप्त होने के पहले सीता माता का पता नहीं मिला तो हम सब की मृत्यु निश्चित है। स्वयंप्रभा उन्हें कहती हैं कि घबड़ायें नहीं, आप सब अपने गंतव्य तक पहुंच गये हैं। इतना कह कर वे सबको अपनी आंखें बंद करने को कहती हैं। अगले पल ही सब अपने-आप को सागर तट पर पाते हैं। स्वयंप्रभा सीताजी के लंका में होने की बात बता वापस अपनी गुफा में चली जाती हैं। आगे की कथा तो जगजाहिर है।
यह सारा प्रसंग अपने-आप में रोचक तो है ही, साथ ही साथ कहानी का महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित होता है। पर पता नहीं, स्वयंप्रभा जैसा इतना महत्वपूर्ण पात्र उपेक्षित क्यूं रह गया।
हाय, कितने गरीब हैं हम
अखिल भारतीय जेम्स एंड ज्वैलरी ट्रेड फेडरेशन के सर्वे की मानें तो दीवाली से पहले अक्टूबर के दौरान सिर्फ बीस दिनों में पांच टन सोने की बिक्री हुई इस गरीब देश में। जो पिछले आंकड़ों से 66 फीसदी ज्यादा है। इस साल दुकानों में पहुंचने वाले ग्राहकों की संख्या में भी 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गयी। और यह सब तब है जबकि सोने की कीमतों में पिछले पांच सालों की तुलना में 160 प्रतिशत उछाल आ चुका है।
शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2008
टिप्पणीयों को खुले दिल से स्वीकार करें
टिप्पणी देना और पाना किसे अच्छा नहीं लगता। हरेक को अपनी पोस्ट की प्रशंसा पा खुशी होती है। उत्साहित हो वह भी किसी और को भी प्रोत्साहित करना चाहता है। इसी उमंग में किसी अच्छे लेख की प्रशंसा में जब अपने विचार व्यक्त करता है तो वे, टिप्पणी माडरेशन सक्षम किया होने की वजह से, तुरंत प्रकाशित नहीं होते। ऐसा लगता है कि किसी के घर गये हों और चौकीदार अंदर जाने से यह कह कर रोक दे कि पूछ कर आता हूं कि अंदर आने दूं कि नहीं।
ऐसा क्यूं है। क्या लिखने वाला सिर्फ अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है, अपनी जरा सी आलोचना उसे पसंद नहीं। क्या यह डर है कि मैंने जो लिखा है उससे बहुत से लोग नाराज हो जायेंगे और उल्टी-सीधी बातें लिख मारेंगे, या और कुछ। यह तो सर्वविदित है कि सब को खुश नहीं किया जा सकता, मुंड़े-मुंड़े मत्रिभिन्ना, और जो लिखा गया है वह वैसा लिखने वाले को ठीक लगा इसलिये लिखा गया, यह पूर्णतया अपने विचार हैं। तो पढ़ने वाले को भी पूरी आजादी होनी चाहिए कि वह भी अपने विचारों से सबको अवगत करा सके, सबको यानी सबको। ऐसा मुझे लगता है।
अक्सर कहा जाता है कि ब्लागर परिवार में संदेशों का आदान-प्रदान होते रहना चाहिये। किसी को प्रोत्साहित करना बहुत अच्छी बात है। नवागत की झिझक मिटती है, हौसला बढ़ता है। पर सिर्फ टिप्पणी देनी है इसलिए टिप्पणी दे देने से लगता है कि सिर्फ औपचारिकता पूरी कर दी गयी हो। पर टिप्पणी निष्पक्ष होनी चाहिए। जरूरी तो नहीं कि कटु आलोचना कर द्वेष पैदा किया जाए। पर लेख के बारे में अपने विचार बिना ठेस पहुंचाए कहे जाएं तो सामने वाले को और अच्छा लिखने में मदद मिलेगी, ऐसा मेरा सोचना है। अपने बारे में सिर्फ अच्छे ही अच्छे कमेंट पा कर अपनी गल्तियों की तरफ ध्यान नहीं जाता। इसलिए दरवाजे हर्रक के लिए खुले होने चाहियें। सबका स्वागत होना चाहिए। ऐसा नहीं कि मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू।
मैंने अपने विचार रखे हैं, अन्यथा ना लिजियेगा।
ऐसा क्यूं है। क्या लिखने वाला सिर्फ अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है, अपनी जरा सी आलोचना उसे पसंद नहीं। क्या यह डर है कि मैंने जो लिखा है उससे बहुत से लोग नाराज हो जायेंगे और उल्टी-सीधी बातें लिख मारेंगे, या और कुछ। यह तो सर्वविदित है कि सब को खुश नहीं किया जा सकता, मुंड़े-मुंड़े मत्रिभिन्ना, और जो लिखा गया है वह वैसा लिखने वाले को ठीक लगा इसलिये लिखा गया, यह पूर्णतया अपने विचार हैं। तो पढ़ने वाले को भी पूरी आजादी होनी चाहिए कि वह भी अपने विचारों से सबको अवगत करा सके, सबको यानी सबको। ऐसा मुझे लगता है।
अक्सर कहा जाता है कि ब्लागर परिवार में संदेशों का आदान-प्रदान होते रहना चाहिये। किसी को प्रोत्साहित करना बहुत अच्छी बात है। नवागत की झिझक मिटती है, हौसला बढ़ता है। पर सिर्फ टिप्पणी देनी है इसलिए टिप्पणी दे देने से लगता है कि सिर्फ औपचारिकता पूरी कर दी गयी हो। पर टिप्पणी निष्पक्ष होनी चाहिए। जरूरी तो नहीं कि कटु आलोचना कर द्वेष पैदा किया जाए। पर लेख के बारे में अपने विचार बिना ठेस पहुंचाए कहे जाएं तो सामने वाले को और अच्छा लिखने में मदद मिलेगी, ऐसा मेरा सोचना है। अपने बारे में सिर्फ अच्छे ही अच्छे कमेंट पा कर अपनी गल्तियों की तरफ ध्यान नहीं जाता। इसलिए दरवाजे हर्रक के लिए खुले होने चाहियें। सबका स्वागत होना चाहिए। ऐसा नहीं कि मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू।
मैंने अपने विचार रखे हैं, अन्यथा ना लिजियेगा।
गुरुवार, 23 अक्टूबर 2008
सनकी, कैसे कैसे
दुनिया का इतिहास तरह-तरह के सनकियों से भरा पड़ा है। आईये दो-एक का जायजा लें।
मुहम्मद बिन तुगलक को पता नहीं क्या सूझी, अच्छी भली अपनी राजधानी दिल्ली को छोड़ कर वहां से 600 मील दूर दौलताबाद में नयी राजधानी बसाने की सनक ने करीब तीस हज़ार परिवारों को बेसहारा भटकने के लिए मजबूर कर दिया था। वह जानता था कि उसके इस कदम से लोग खुश नहीं हैं, ऐसे लोग आने से इंकार ना कर दें, इसलिए उसने दिल्ली के घरों-दुकानों में आग लगवा कर नष्ट करवा दिया। सैकड़ों लोग मौत के मुंह में चले गये। जले पर नमक तब छिड़का गया, जब 15 वर्ष बाद फिर प्रजा सहित राजधानी को उठवा कर वापस दिल्ली ले आया गया।
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रूस का ईवान चतुर्थ तो तुगलक से भी एक कदम आगे निकला। उसने अपने परिवार, नौकरों-चाकरों, सैनिकों और खजाने के साथ अपनी राजधानी मास्को छोड़ दी, और एक बीहड़, सुनसान इलाके की ओर रवाना हो गया। कुछ दिनों बाद उसने वहां से संदेश भेजा कि राज्य की परिस्थितियों से दुखी होकर वह अपनी गद्दी का अधिकार छोड़ रहा है। सबको लगा कि वह गद्दी छोड़ रहा है। पर असल में वह देखना चाहता था कि उसके राज्य छोड़ने से कौन-कौन खुश होता है। पर उसकी यह चाल उसके मंत्री व अधिकारी समझ गये थे। वे सब मिल कर उसके पास गये और उससे प्रार्थना की कि वह राज-पाट ना छोड़े, क्योंकि वही एकमात्र इस लायक है, जो यह भार संभाल सके। इवान खुश हो गया और वापस आ गया। परन्तु आते ही उसने प्रार्थना करने वाले मंत्रियों के सर यह कह कर कटवा डाले कि वे राज्य भार कुछ समय तक संभालने में भी समर्थ नहीं हैं।
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हंगरी की कौन्टेस एलिजाबेथ बाथोरी अत्यंत रूपवती थी और चाहती थी कि उसका रूप सदा वैसा ही बना रहे। कुछ तांत्रिकों ने उसे विश्वास दिला दिया था कि यदि वह कुवांरी कन्याओं का रक्त पियेगी व उनके रक्त से स्नान करेगी तो उसका रूप-रंग कभी खत्म नहीं होगा। उसकी शादी एक अधिकारी से हुई थी। पर धीरे-धीरे उसने अपनी पहुंच शाही दरबार तक बना ली थी। वह एक तानाशाह किस्म की औरत थी। दरबार में प्राप्त अपनी शक्तियों का उसने खूब दुरुपयोग किया। कहा जाता है कि अपने पागलपन में उसने करीब 600 से अधिक कुंवारी लड़कियों का रक्त पिया और उनके रक्त से स्नान किया। लेकिन एक दिन उसके खून पीने का रहस्य खुल गया। उसको कठोर दंड दिया गया। जहां छिप कर वह खून पीती थी उसी जगह उसे कैद कर रखा गया। वहीं एक दिन उसकी मौत हो गयी।
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