मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008

कमजोर केन्द्र का नतीजा

वर्षों पहले, ताऊ ने भी अपना वर्चस्व बनाने के लिए ऐसी ही हरकत की थी। अपने भड़काउ भाषणों के द्वारा महाराष्ट्र की जनता को दो फाड़ कर वहां अपना एकाधिकार जमाने की। पर उस समय दिल्ली में एक मजबूत सरकार के हाथों में देश की बागडोर थी, एक निडर और दबंग महिला के नेतृत्व में। एक सिर्फ एक घुड़की मिली थी और तथाकथित शेर अपनी मांद में दुबक गया था। हिम्मत नहीं हुई थी कि कोई जवाब भी दे पाता। पर आज मामला बिल्कुल उल्टा है। कोई भी आता है आंख दिखा कर चला जाता है। सरकार को अपनी ही भसूड़ी पड़ी हुई है। अपने आप को बचाएं या देश को देखें। हिमाकत इतनी बढ़ गयी है, छुटभैइयों तक की, कि चोरी भी करते हैं फिर सीनाजोरी भी दिखाते हैं। महाराष्ट्र सरकार की तो छोड़ीए केन्द्र ही हिम्मत नहीं जुटा पा रहा कोई सख्त कदम उठाने का। एक कमजोर, हताश, हिचकोले खाते नेतृत्व से आशा करना भी बेवकूफी ही है।

यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे बिहार, यू.पी. के निवासियों के धैर्य और संयम की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। इनकी चुप्पी इनकी कमजोरी नहीं समझदारी है। प्रभू से यही प्रार्थना है कि इनकी बनाए रखे और उनकी लौटा दे।

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

बिना शीर्षक के

ठंड़ के दिन थे। एक गिद्ध पहाड़ की चोटी पर बैठा गुनगुनी धूप का आनंद ले रहा था। इतने में उधर से यमराज गुजरे। वहां गिद्ध को बैठा देख उनकी भृकुटी में बल पड़ गये। उन्होंने कुछ कहा नहीं, बस अपने रस्ते चले गये। पर इधर गिद्ध महाराज के तो देवता ही कूच कर गये। सही भी था जिसको साक्षात यमराज ही टेढ़ी नज़र से देख गये हों, उसका तो भगवान ही मालिक है। गिद्ध बेचारा डर के मारे कांपे जा रहा था, उसे आज अपना अंत साफ दिखाई पड़ रहा था। इतने में उधर से नारद मुनि निकले। गिद्ध की ऐसी बुरी दशा देख उन्होंने उससे पूछा, गिद्ध राज, क्या हुआ ऐसे क्यूं कांप रहे हो। गिद्ध की तो आवाज ही नहीं निकल रही थी। बड़ी मुश्किल से उसने सारी बात नारद जी को बताई। नारद जी बोले तुम डरो मत। यमराज तो धर्मराज हैं, बिना बात वे किसी को भी दंडित नहीं करते। फिर भी तुम सुरक्षा की दृष्टि से यहां से सौ योजन दूर मलय पर्वत पर चले जाओ, वहां एक गुफा है, उसके अंदर जा कर बैठ जाना। मैं यमराज जी से तुम्हारे बारे में बात करता हूं।
इस तरह गिद्ध को सुरक्षित जगह भेज नारद जी यमराज जी के पास गये और उनसे पूछा, महाराज, उस बेचारे गिद्ध से क्या भूल हो गयी, जो आप उस पर क्रुद्ध हो गये। यमराज जी बोले, नहीं तो, मैं क्रोधित नहीं इस बात को लेकर आश्चर्यचकित था, कि उस गिद्ध की मौत तो सौ योजन दूर मलय पर्वत की गुफा में होनी है। वह यहां कैसे बैठा हुआ है।

रविवार, 19 अक्टूबर 2008

उसे अपनी माँ से विवाह करना पड़ा था, दुनिया की दर्दनाक कहानियों में से एक

कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। इन्होंने भी प्रारब्ध को चुन्नौती दी थी, जिससे जन्म हुआ संसार की सबसे दर्दनाक कथा का।

यूनान में एक राज्य था थीबिज। इसके राजा लायस तथा रानी जोकास्टा के कोई संतान नहीं थी। कफी मिन्नतों और प्रार्थनाओं के बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी। पर खुशियां ज्यादा दिन नहीं टिक सकीं। एक भविष्यवक्ता ने भविष्वाणी की कि उनका पुत्र, पित्रहंता होगा और अपनी ही मां से विवाह करेगा। यह जान दोनो आतंकित हो गये और अपने नवजात शिशु के हाथ पैर बंधवा कर उसे सिथेरन पर्वत पर फिंकवा दिया। पर बच्चे की मृत्यु नहीं लिखी हुई थी। जिस आदमी को यह काम सौंपा गया था, वह यह अमानवीय कार्य ना कर सका। उसने पहाड़ पर शिशु को पड़ोसी राज्य, कोरिंथ, के चरवाहे को दे बच्चे की जान बचा दी। उस चरवाहे ने अपने राजा 
पोलिबस, जिसकी कोई संतान नहीं थी, को खुश करने के लिए बच्चे को उसे सौंप दिया। रस्सी से बंधे होने के कारण शिशु के पांव सूज कर कुछ टेढे हो गये थे, जिनको देख कर पोलिबस के मुंह से निकला “ईडिपस” याने सूजे पैरोंवाला और यही नाम पड़ गया बच्चे का।     

समय बीतता गया। ईडिपस जवान हो गया। होनी ने अपना रंग दिखाया। एक समारोह में एक अतिथी ने उसका यह कह कर मजाक उड़ाया कि वह कोई राजकुमार नहीं है। वह तो कहीं पड़ा मिला था। ईडिपस के मन में शक घर कर गया। एक दिन बिना किसी को बताए वह अपोलो के विश्वप्रसिद्ध भविष्य वक्ता से मिलने निकल पड़ा। मंदिर की पुजारिन ने उसे स्पष्ट उत्तर तो दिया नहीं पर एक चेतावनी जरूर दी कि वह अपने पिता की खोज ना करे नहीं तो वह तुम्हारे हाथों मारा जाएगा और तुम अपनी ही मां से शादी करोगे।

ईडिपस यह सुन बहुत डर गया। उसने निर्णय लिया कि वह वापस कोरिंथ नहीं जाएगा। जब इसी उधेड़बुन में वह चला जा रहा था उसी समय सामने से लेयस अपने रथ पर सवार हो उधर से गुजर रहा था। लेयस का अंगरक्षक रास्ते से सबको हटाता जा रहा था। ईडिपस के मार्ग ना देने पर, अंगरक्षक से उसकी तकरार हो गयी, जिससे खुद को अपमानित महसूस कर ईडिपस ने उसकी हत्या कर दी। यह देख लेयस ने क्रोधित हो उस पर वार कर दिया, लड़ाई में लेयस मारा गया। अनजाने में ही सही ईडिपस के हाथों उसके पिता की हत्या हो ही गयी। इसके बाद भटकते-भटकते वह थीबिज जा पहुंचा। वहां जाने पर उसे मालुम पड़ा कि वहां के राजा की मौत हो चुकी है। जिसका फायदा उठा कर स्फिंक्स नामक एक दैत्य वहां के लोगों को परेशान करता रहता है। उसने एक शर्त रखी हुई थी कि जब तक कोई मेरी पहेली का जवाब नहीं देगा तब तक मैं यहां से नहीं जाऊंगा। उसकी उपस्थिति का मतलब था मौत, अकाल और सूखा। राज्य की ओर से घोषणा की गयी थी कि इस मुसीबत से जो छुटकारा दिलवाएगा उसे ही यहां का राजा बना दिया जाएगा तथा उसीके साथ मृत राजा की रानी की शादी भी कर दी जाएगी। ईडिपस ने यह घोषणा सुनी, उसने वापस तो लौटना नहीं था, एक अलग राज्य पा जाने का अवसर मिलते देख उसने पहेली का उत्तर देने की इच्छा जाहिर कर दी। उसे स्फिंक्स के पास पहूंचा दिया गया। डरावना स्फिंक्स उसे घूर रहा था पर इसने बिना डरे उससे सवाल पूछने को कहा। स्फिंक्स ने पूछा कि वह कौन सा प्राणी है जो सुबह चार पैरों से चलता है, दोपहर में दो पैरों से और शाम को तीन पांवों पर चलता है और वह सबसे ज्यादा शक्तिशाली अपने कम पांवों के समय होता है। ईडिपस ने बिना हिचके जवाब दिया कि वह प्राणी इंसान है। जो अपने शैशव काल में चार पैरों पर, जवानी यानि दोपहर में दो पैरों पर और बुढ़ापे में लकड़ी की सहायता से यानी तीन पैरों से चलता है। इतना सुनना था कि स्फिंक्स वहां से गायब हो गया। थीबिज की जनता ने राहत की सांस ली। घोषणा के अनुसार ईडिपस को वहां का राजा बना दिया गया और रानी जोकास्टा से उसका विवाह कर दिया गया।

होनी का खेल चलता रहा। दिन बीतते गये। ईडिपस सफलता पूर्वक थीबिज पर राज्य करता रहा। प्रजा खुशहाल थी। पूरे राज्य में सुख-शांति व समृद्धि का वातावरण था। यद्यपि रानी जोकास्टा ईडिपस से उम्र में काफी बड़ी थी फिर भी दोनों में अगाध प्रेम था। इनकी चार संतानें हुयीं। बच्चे जब जवान हो गये तो समय ने विपरीत करवट ली। राज्य में महामारी फैल गयी। लोग कीड़े-मकोंड़ों की तरह मरने लगे। तभी देववाणी हुई कि इस सब का कारण राजा लेयस का हत्यारा है। दुखी व परेशान जनता अपने राजा के पास पहुंची। ईडिपस ने वादा किया कि वह शीघ्र ही लेयस के हत्यारे को खोज निकालेगा। उसने राज्य के प्रसिद्ध भविष्यवक्ता टाइरसीज को आमंत्रित कर समस्या का निदान करने को कहा। टाइरसीज ने कहा, राजन कुछ चीजों का पता ना लगना ही अच्छा होता है। सच्चाई आप सह नहीं पायेंगें। पर ईडिपस ना माना उसने कहा प्रजा की भलाई के लिए मैं कुछ भी सहने को तैयार हूं । जब टाइरसीज फिर भी चुप रहा और ईडिपस के सारे निवेदन बेकार गये तो ईडिपस को गुस्सा आ गया और उसने टाइरसीज और उसकी विद्या को ही ठोंग करार दे दिया। इससे टाइरसीज भी आवेश में आ गया। उसने कहा कि आप सुनना ही चाहते हैं तो सुनें, आप ही राजा लेयस के हत्यारे हैं। वर्षों पहले आपने मार्ग ना छोड़ने के कारण जिसका वध किया था वही राजा लेयस आपके पिता थे। ईडैपस को सब याद आ गया। उसने चिंतित हो रानी से पूछ-ताछ की तो उसने विस्तार से अपनी बीती जिंदगी की सारी बातें बताईं कि राजा की मौत अपने ही बेटे के हाथों होनी थी। पर आप चिंता ना करें हमारा एक ही बेटा था जिसे राजा ने उसके पैदा होते ही मरवा दिया था। जोकास्टा ने ईडिपस को आश्वस्त करने के लिए उस आदमी को बुलवाया जिसे शिशु को मारने की जिम्मेदारी दी गयी थी। पर इस बार वह झूठ नहीं बोल पाया और उसने सारी बात सच-सच बता दी। रानी जोकास्टा सच जान पाप और शर्म से मर्माहत हो गयी। इतने कटु सत्य को वह सहन नहीं कर पायी। उसने उसी वक्त आत्महत्या कर ली। ईडिपस देर तक रानी जोकास्टा के शव पर यह कह कर रोता रहा कि तुमने तो अपने दुखों का अंत कर लिया, लेकिन मेरी सजा के लिए मौत भी कम है। उसी समय ईडिपस ने अपनी आंखें फोड़ लीं और महल से निकल गया। कुछ ही समय में उसका पूरा परिवार नष्ट हो गया क्योंकि वह भी उसी पाप की उत्पत्ति था, जो भाग्यवश अनजाने में हो गया था।

शायद यह दुनिया की सबसे दर्दनाक कहानी है।

शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

हंसाईयां

एक बार, एक नाई और एक जाट में बहस हो गयी। बतों-बातों में नाई ने कह दिया, जाट रे जाट तेरे सर पर खाट। जाट को इसका कोई उत्तर नहीं सूझा। वह चुप-चाप घर आ गया। रात भर वह सोचता रहा पर ऐसी कोई तुकबंदी उससे नहीं बन पायी। दूसरे दिन फिर दोनों का आमना-सामना हुआ। नाई जाट को देख व्यंग पूर्वक मुस्कुराने लगा तो जाट को ताव आ गया। उसने नाई से कहा, नाई रे नाई तेरे सर पर कोल्हू। नाई बोला, तुक नहीं मिला, तुक नहीं मिला। जाट ने जवाब दिया, तुक नहीं मिला तो क्या हुआ, खाट से भारी तो है।
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कूड़ा बिनने वाले संता और बंता को एक दिन कूडेदान में तीन बम मिल गये। आपस में सलाह कर वे बमों को थाने में जमा कराने चल पड़े। रास्ते में बंता ने पूछा कि यार इनमें से कोई फट गया तो?संता ने कुछ देर सोच कर जवाब दिया, कह देंगें कि दो ही मिले थे।
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पांच सितारा होटल में काम करते संता को कामचलाउ अंग्रेजी सिखाने के लिए बास ने उसे कोचिंग क्लास में भेजने का इंतजाम करवा दिया। एक महीने बाद उन्होंने अपने सहयोगियों को बताया कि कल मैंने संता की प्रोग्रेस की जानकारी के लिए उससे कहा कि अंग्रेजी की वर्णमाला सुनाओ, तो संता पूछने लगा कि सर बड़ी A B C D सुनाऊं या छोटी। यह सुन सारे जनों को हंसता देख बंता भी हंसने लगा। सारे जनों के जाने के बाद बंते ने बास से पूछा, सर फिर संते ने बड़ी A B C D सुनाई कि छोटी वाली।

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

'उपहार' जिसे लेने में अमेरीका हिचकता रहा

ऐसा ही हुआ था। अमेरीका अपनी स्वाधीनता की शताब्दी बड़े धूमधाम से मना रहा था। उनकी खुशी में खुद को शामिल करते हुए और अपनी मैत्री को मजबूत करने के लिए फ्रांस ने एक बेहतरीन तोहफा पेश करने की पेशकश की। परन्तु अमेरीका उसे स्वीकारने से हिचकिचाता रहा। कारण था उस तोहफे की स्थापना पर आनेवाला एक लाख डालर का खर्च। तोहफा था, स्वातंत्र्य प्रतिमा "Statue of Liberty"
इस प्रतिमा को फ्रांसीसी शिल्पकार फ्रैडरिक आगस्ट बार्थोल्डी ने बनाया था। इस पर लागत आयी थी करीब 2,50,000 डालर। जिसकी व्यवस्था फ्रांसीसी जनता ने स्वेच्छा से चंदा देकर की थी। फ्रांस ने इसके गढ़ने का खर्च उठाया था, पर इसकी स्थापना की जिम्मेदारी अमेरीकियों पर थी। न्यूयार्क के गवर्नर ने इस मैत्री प्रतीक को गले का फंदा ही कह दिया था। वहीं एक प्रमुख दैनिक ने इसे ऊल-जलूल रचना करार दिया तो एक दूसरे पत्र ने तो इसको बेच कर कुछ रकम कमाने की नसीहत ही दे डाली थी। अर्से तक यह प्रतिमा, जो आज अमेरीका का गौरव है, उपेक्षित सी पेरिस में ही पड़ी रही। लेकिन जोजेफ पुलित्जर ने, जो न्यूयार्क वर्ल्ड के प्रकाशक थे, इस कलात्मक प्रतिमा को अमेरीका लाने के उद्देश्य से एक कोष की स्थापना की, जिसमें देखते ही देखते लाखों डालर जमा हो गये। इसी बीच अमेरीकी कांग्रेस ने इसकी स्थापना के लिए बेडलोज टापू के उपयोग की स्वीकृति भी दे दी। जिसे सन 1960 में 'लिबर्टी आइलैंड' का नाम दिया गया।
सारी बाधाएं दूर होने पर May 1885 में, प्रतिमा को विखंडित कर, 214 बक्सों में बंद कर, इसेरो नामक जहाज में लाद कर बेडलोज टापू पर लाया गया और 4 जुलाई 1886 को अपने स्थान पर स्थापित कर दिया गया। 151 फीट ऊंची, तांबे की सवा तीन इंच मोटी चादर से बनी इस प्रतिमा का कुल वजन 4,50,000 पौंड है। इसकी दहिनी भुजा की लंबाई 42 फीट है, जो 29 फीट 2 इंच बड़ी मशाल थामे हुए है। इसके बायें हाथ में 23 फीट की एक चौकोर पट्टिका है, जिस पर 4 जुलाई 1886 अंकित है। अपने आधार स्तंभ, जिसकी ऊंचाई 149 फीट है, को लेकर इस प्रतिमा की कुल ऊंचाई 300 फीट है।
सन 1924 में इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया। आज इसे देखने के लिए दुनिया के कोने-कोने से भीड़ उमड़ती है और कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब बैट्री पार्क से यात्रियों को ले जाने वाले स्टीमर को कुछ आराम मिल पाता हो।

बुधवार, 15 अक्टूबर 2008

नोबेल फाउंडेशन ने ग्यारह बार अनदेखी की थी नेहरूजी की

यह तो सभी जानते हैं कि पुर्वाग्रहों के चलते, शांति पुरस्कार के लिए, नोबेल फाउंडेशन ने गांधीजी की अनदेखी की थी। बाद में नोबेल समिति ने अपनी भूल मान भी ली थी। हालांकि सारी कार्यवाही गोपनीय होती है। लेकिन अभी इस समिति ने 1901 से 1956 तक का पूरा ब्योरा सार्वजनिक किया है, जिससे पता चलता है कि इस फाउंडेशन ने भारत के पहले प्रधान मंत्री के नाम को भी गंभीरता से नहीं लिया। वह भी एक-दो बार नहीं, पूरे ग्यारह बार उनके नाम को खारिज किया गया।
1950 में नेहरुजी के नाम से दो प्रस्ताव भेजे गये थे। उन्हें अपनी गुटनिरपेक्ष विदेश नीति और अहिंसा के सिद्धांतो के पालन करने के कारण नामांकित किया गया था। पर उस समय राल्फ बुंचे को फिलीस्तीन में मध्यस्थता करने के उपलक्ष्य में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। 1951 में नेहरूजी को तीन नामांकन हासिल हुए थे। पर उस बार फ्रांसीसी ट्रेड यूनियन नेता लियोन जोहाक्स को चुन लिया गया था। 1953 में भी नेहरुजी का नाम बेल्जियम के सांसदों की ओर से प्रस्तावित किया गया था, लेकिन इस वर्ष यह पुरस्कार, द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिकी सेनाओं का नेतृत्व करनेवाले जार्ज सी. मार्शल के हक में चला गया। 1954 में फिर नेहरुजी को दो नामांकन प्राप्त हुए, पर फिर कहीं ना कहीं तकदीर आड़े आयी और इस बार यह पुरस्कार किसी इंसान को नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय के पक्ष में चला गया। अंतिम बार नेहरुजी का नाम 1955 में भी प्रस्तावित किया गया था। परन्तु इस बार यह खिताब किसी को भी ना देकर इसकी राशि पुरस्कार संबंधी विशेष कोष में जमा कर दी गयी थी।
ऐसा तो नहीं था कि गोरे-काले का भेद भाव या फिर एक ऐसे देश, जो वर्षों गोरों का गुलाम रहा हो, का प्रतिनिधित्व करनेवाले इंसान को यह पुरस्कार देना उन्हें नागवार गुजरा हो।

सोमवार, 13 अक्टूबर 2008

हसने का कोई समय होता है क्या?

बंताजी ने अपने घर के ऊपर का हिस्सा एक फौजी को किराए पर दे दिया। फौजी ठहरा फौजी। रोज आधी रात को अपने भारी-भरकम जूतों के साथ धम-धम करता सीढ़ियां चढ़े, अपने कमरे में जा, अपने जूतों को खोल एक को इधर फेंके दूसरे को उधर, रात को भारी जूतों की आवाज से बंता परिवार परेशान। एक दिन हिम्मत कर बंताजी ने फौजी को कहा कि आप रात को अपने जूते फेंकें नहीं, आवाज से बच्चे डर जाते हैं। फौजी ने कहा कि आज से आवाज नहीं होगी, आप आराम से सोयें। रात को फौजी लौटा, कमरे में जा उसने एक जूता उतार कर फेंका तो उसे सबेरे की बात याद आ गयी। उसने दूसरा जूता धीरे से उतार कर रखा और सो गया। सबेरे उठ उसने बंताजी से पूछा, क्योंजी रात ठीक से नींद आई? बंताजी बोले कहांजी हम तो रात भर दूसरे जूते के गिरने का इंतजार करते रह गये।
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चर्च में पादरी शराब की बुराईयों को उदाहरण दे कर समझा रहा था, यदि शराब पैर से भी छू जाए तो नरक जाना पड़ता है। डेविड बताओ क्या समझे?फ़ादर, ऐसी चीज को जो पैर लगायेगा, वह नरक में जायेगा।
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संता गंभीर अपराध में पकड़ा गया। उसने वकील से कहा कि चाहे लाखों रुपये लग जायें, मुझे सजा नहीं होनी चाहिये। वकील ने सांत्वना दी, इतने रुपये रहते मैं सजा नहीं होने दूंगा। सचमुच संता के पास जबतक एक भी पैसा रहा, वकील ने सजा नहीं होने दी।

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...