सोमवार, 22 सितंबर 2008

हिचकी, कारण और निवारण

दूध पीते बच्चे को परेशान करती हिचकी, बड़ों को अचानक शुरु हो तंग करती हिचकी, शराबियों की पहचान बनी हिचकी और कभी-कभी जिंदगी की अंतिम हरकत हिचकी। देखने सुनने में शरीर की एक सामान्य सी हलचल, परन्तु ज्यादा देर तक टिक जाये तो मुसीबत।
सांस अंदर लेने से उतकों की कठोर परतों से बना, वक्षस्थल के निचले हिस्से में स्थित, 'डायाफ़्राम' पेट की ओर संकुचित हो फेफडों में हवा भरने देता है। इससे भोजन को श्वास नली में जाने से रोकने वाला 'एपिग्लाटिस' और वाक तंतुओं का प्रवेशद्वार 'ग्लाटिस' दोनो खुल जाते हैं। इस क्रिया में व्यवधान आने पर हिचकी शुरु हो जाती है। इसके आने पर 'डायाफ्राम' में ऐंठन शुरु हो जाती है जिससे हवा तेजी से ग्लाटिस और एपिग्लाटिस पर पडती है, जिससे दोनों झटके से बंद होते हैं और वही आवाज हिचकी के रूप में सुनाई पड़ती है। जब तक व्यवधान दूर नहीं हो जाता यह क्रिया चलती रहती है।
कुछ क्षण सांस रोकने, चीनी चूसने, ठंडा पानी पीने या गिलास के बाहर वाले किनारे से पानी पीने या एक लिफ़ाफ़े को मुंह से फुलाकर उसमें सांस लेने से राहत मिलती है। कागज़ के थैले में नाक द्वारा सांस लेने से कार्बन डाई आक्साईड के मस्तिष्क में पहुंचने से तंत्रिकाओं की क्रियाशीलता में कमी आने के कारण हिचकी रुक जाती है। यदि मस्तिष्क को भ्रमित या अचंभित कर दिया जाए तो भी फ़र्क पडता है। शायद इसीलिए हमारे देश में हिचकी आने पर कहा जाता है कि कोई याद कर रहा है, इस तरह दिमाग का ध्यान बटाने से फ़र्क पड जाता है।
एलोपैथी में उपचार तब ही किया जाता है, जब हिचकी ना रुकने से मनुष्य तनाव में आ जाता है। इन परिस्थितियों में क्लोरप्रोमेज़िन या एमाइल नाइट्रेट जैसी दवाएं प्रयोग में लाई जाती हैं। इनसे फायदा ना होने पर आप्रेशन द्वारा फ्रेनिक तंत्रिका के डायाफ्राम तक जाने वाले भाग को निकाल दिया जाता है। पर इससे सांस लेने की क्षमता कम हो जाती है।

रविवार, 21 सितंबर 2008

द्वादस ज्योतिर्लिंग, एक यात्रा

पुराणों के अनुसार शिवजी जहां-जहां खुद प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है।  
     
सौराष्ट्रे सोमनाथ च श्री शैले मल्लिकार्जुनम, उज्जयिन्या महाकाल, मोंधारे परमेश्वरम, केदार हिमवत्पृष्ठे, डाकिन्या भीमशंकरम वारासास्था च विश्वेश, त्र्यम्बक गौतमी तीरे, वैद्यनाथ चिता भूमौनागेश द्वारका वने। सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवाल्ये। द्वादशेतानिनामानि प्रातरुत्थायय: पठेत, सर्व पापैर्विनिर्मुक्त: सर्व सिद्धि फल लभत्।
1, सौराष्ट्र में सोमनाथ :- काठियावाड के प्रभाष क्षेत्र में विराजमान हैं। दक्ष के श्राप से चंद्रमा को क्षय रोग से मुक्त करने के लिए यहां प्रगट हुए थे।
2, श्री शैल :- नारदजी के भ्रमित करने से नाराज, अपने पुत्र कार्तिकेय को, मनाने के लिए, दक्षिण भारत में मल्लिकार्जुन के रूप में प्रगट हुए थे।
3, महाकालेश्वर :- दूषण नामक दैत्य द्वारा अवन्तीनगर (उज्जैन) पर आक्रमण करने पर काल रूप में भगवान शिव ने सारे दैत्यों का नाश कर जहां से उजागर हुए थे उसी गड्ढे में अपना स्थान बना लिया।
4, ओंकारेश्वर :- मध्य प्रदेश के मांन्धाता पर्वत पर नर्मदा नदी के उद्गम स्थल पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश हो, वरदान देने हेतु, यहां प्रगट हुए थे।
5, केदारेश्वर :- हिमालय के केदार नामक स्थान पर विराजमान हैं। यह स्थान हरिद्वार से 150मील दूर है। विष्णुजी के अवतार नर-नारायण की प्रार्थना पर यहां स्थान ग्रहण किया था।
6, भीमशंकर :- यह स्थान मुंबाई से 60मील दूर है। यहां कुंभकर्ण के पुत्र भीम का वध करने के लिये अवतरित हुए थे।
7, विश्वेश्वर :- विश्वेश्वर महादेव काशी में विराजमान हैं। प्रभू ने माँ पार्वती को बताया कि मनुष्यों के कल्याण के लिये उन्होंने इस जगह पर निवास किया है।
8, त्र्यम्बकेश्वर :- महाराष्ट्र में नासिक रोड स्टेशन से 25किमी की दूरी पर स्थित हैं। गौतम ऋषी और उनकी पत्नी अहिल्या की तपस्या से प्रसन्न हो कर यहां विराजमान हुए थे।
9, वैद्यनाथेश्वर :- बिहार में वैद्यनाथधाम में विराजमान हैं। रावण को लंका ले जाकर स्थापित करने के लिए शिवजी ने एक शिवलिंग दिया था, जिससे वह अजेय हो जाता। पर विष्णुजी ने उसको अजेय ना होने देने के कारण शिवलिंग को यहां स्थापित करवा लिया था।
10, नागेश्वर :- द्वारका के समीप दारुकावन मेँ स्थित हैं। यहां शिवजी तथा पार्वतीजी की पूजा नागेश्वर और नागेश्वारी के रूप में होती है।
11, रामेश्वर :- दक्षिण भारत के समुंद्र तट पर पाम्बन स्थान के निकट स्थित है। लंकाविजय के समय भगवान राम ने इनकी स्थापना की थी।
12, घुश्मेश्वर :- महाराष्ट्र के मनमाड से 100किमी दूर दौलताबाद स्टेशन से 20किमी की दूरी पर वेरुल गांव में स्थित हैं। घुश्मा नाम की अपनी भक्त की पूजा से प्रसन्न हो कर यहां प्रगट हुए और घुश्मेश्वर कहलाये।
* पूरी कथाएं फिर कभी।

अति तो आक्सीजन की भी खतरनाक है

आक्सीजन मिलना यानि नयी जिंदगी मिलना। यह एक मुहावरा ही बन गया है। परंतु वैज्ञानिकों के अनुसार वही आक्सीजन जिसके बिना जिंदा नहीं रहा जा सकता, प्राणियों के लिए खतरनाक भी हो सकती है। सौ साल के भी पहले वैज्ञानिक पाल बर्ट ने यह चेतावनी दी थी कि शुद्ध आक्सीजन में सांस लेना जानलेवा हो सकता है। ज्यादा खोज करने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि हम ज्यादा से ज्यादा 24 घंटे तक शुद्ध आक्सीजन सहन कर सकते हैं, उसके बाद निमोनिया हो जाता है। यह भी पाया गया है कि मनुष्य सिर्फ़ दो घंटों तक ही दो-तीन वायुमंडलीय दवाब सहन कर सकता है, इसके बाद आक्सीजन की अधिकता से उसका मानसिक संतुलन बिगडने लगता है, उसकी यादाश्त लुप्त हो जाती है। अगर यह दवाब और बढ़ जाए तो दौरे पड़ने शुरु हो जाते हैं। अंत में मृत्यु हो जाती है।
शुद्ध आक्सीजन ऐसे प्राणियों के लिए भी हानिकारक होती है जो प्राकृतिक तौर पर कम आक्सीजन वाली दशाओं में रहते हैं। इस बात का उपयोग हमारी आंतों में रहनेवाले बहुत से खतरनाक कृमियों को खत्म करने में किया जाता है।
क्या तमाशा है भाई, हो तो मुसीबत और नहो तब तो है ही। सब प्रभू की माया है।

शनिवार, 20 सितंबर 2008

टेंशन मुक्त होने के लिए

दो चलाकू टाईप के आदमी दिल्ली से, रात में कहीं जाने के लिए ट्रेन के डिब्बे में चढ़े, तो पाया कि कहीं बैठने तक की जगह नहीं है। तभी उनमें से एक चिल्लाने लगा, सांप-साप, भागो-भागो। इतना सुनना था कि सारे यात्री सर पर पैर रख भग लिए। दोंनो ने एक दूसरे को मुस्करा कर देखा और ऊपर की बर्थ पर चादर बिछा कर सो गये। सबेरे नींद खुलने पर उन्होने पाया कि गाड़ी कहीं खड़ी है, उन्होनें बाहर झाड़ु देते आदमी से पूछा कि भाई कौन सा स्टेशन है? उसने जवाब दिया, दिल्ली। अरे दिल्ली तो कल रात में थी, इन्होंने पूछा। तो जवाब मिला, साहब, कल रात इस डिब्बे में सांप निकल आया था तो इस डिब्बे को काट कर अलग कर बाकी गाडी चली गयी थी।
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संताजी का स्टेशन रात दो बजे आता था, सो वे अटैंडेंट को रात में उठाने को कह सो गये। पर जब आंख खुली तो सबेरा हो चुका था। इनका पारा गरम, जा कर अटैंडेंट का गला पकड लिया और दुनिया भर की सुना उस की ऐसी की तैसी कर दी। अटैंडेंट को चुप देख संताजी दहाडे कि बोलता क्यूं नहीं कि मुझे क्यों नहीं जगाया? अटैंडेंट बोला क्या बोलुं सर, आप तो फिर भी ट्रेन में हैं, मैं तो उस बेचारे का सोच कर परेशान हूं, जिसको मैने जबरदस्ती रात को सुनसान स्टेशन पर उतार दिया है।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

हैप्पी बर्थडे स्माइली :-)

चलिए आज एक अनोखे जन्मदिन पर चलते हैं। आज प्रोफेसर स्काट ई फ़ालमैन के मानस पुत्र :-) स्माइली (-: की 26वीं सालगिरह है। उनकी गुजारिश है कि आप सब जरूर आएं। वैसे भी ना-नुकुर का सवाल ही नहीं उठता है।
आज से करीब 26 साल पहले कारनेगी मेलन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्काट ई फालमेन ने अपनी भावनाओं को इंटरनेट के जरिए संदेश भेजते समय प्रदर्शित करने का एक रोचक तरीका इजाद किया। उन्होंने की बोर्ड़ के तीन चिन्हों की मदद से स्माइली को जन्म दिया। ये चिन्ह थे - कोलन " : ", हायफ़न " - ", और पैरेंथीसिस" ) "।
प्रो फ़ालमैन ने एक बहस में हिस्सा लेते समय पहली बार 19 सितम्बर को इस टिप्पणी के साथ स्माइली को पोस्ट किया "मैं चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाने के लिए यह चिन्ह :-) प्रस्तावित करता हूं।" उनके इस प्रस्ताव को बहस में मौजूद सभी विशेषज्ञों ने हर्ष ध्वनी के साथ सहारा और स्वीकार किया। उस बहस का विषय था "इंटरनेट पर मैसेज भेजते समय अपनी भावनाओं को किस तरह प्रदर्शित किया जाए।
भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि स्माइली और उस जैसे दूसरे चिन्हों की मदद से ई-मेल करने वालों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने का आसान रास्ता मिल गया है। आज इंटरनेट का उपयोग करने वालों को इन चिन्हों का प्रयोग बेहद सुविधाजनक साबित हो रहा है।
जाहिर है अपने मानस पुत्र की इतनी सफलता देख प्रो फ़ालमैन फूले नहीं समाते हैं।

बुधवार, 17 सितंबर 2008

हल्का-फुल्का

जब आदमी की तबियत ठीक नहीं होती तो उसे खाने में परहेज़ करने को कहा जाता है। आज टिप्पणियों के चक्कर में परेशान दिमागों के लिए हल्का-फुल्का ही ठीक रहेगा शायद---------------------

गांधीजी के तीन बंदरों को तो सब जानते हैं। आज उनके नाम भी जान लिजिए। इन जापानी गुरुओं के नाम हैं - 1:- मिजारु {बुरा मत देखो}2:- मिकाजारु {बुरा मत सुनो}3:- माजारु {बुरा मत कहो}

बीस करोड़ में कोइ एक इंसान 115 साल या ज्यादा की उम्र पाता है।

स्वचालित कांच साफ करने वाले कार वाइपर का उपयोग सबसे पहले 1916 में किया गया था।

ज़ेबरा क्रासिंग का उपयोग सर्वप्रथम 1911 में अमेरिका में किया गया था।

दुनिया में सबसे पहले इजिप्ट में ताले का आविष्कार किया गया। यह एक लकड़ी का बोल्ट था जो एक खांचे में फ़िट होता था। चाबी के लिए लम्बे राड़ में एक खूंटी {पेग} लगी रहती थी, जिससे घुमा कर बोल्ट को खोला जाता था. 

हर मिनट करीब 6000 बार आकाशीय बिजली हमारी धरती से टकराती है।

आयरलैंड के सर ह्यु बीपर ने अपने दोस्तों, नोटिस एवं रसमैक हिवरटर के साथ मिल कर 1955 में "गिनिज़ बुक" का प्रकाशन शुरु किया था। 1974 में खुद इस पुस्तक का नाम भी गिनिज़ बुक में, अपनी दो करोड़ 39 लाख प्रतियों की बिक्री के कारण आ गया था। आज यह करीब 26 भाषाओं में प्रकाशित होती है।

एस्प्रीन का आविष्कार 1888 में जर्मनी में हुआ था।

150 टन की व्हेल का दिल एक मिनट में 7 बार, 3 टन के हाथी का एक मिनट में 46 बार, ड़ेढ़ किलो की बिल्ली का 240 बार तथा 8 ग्राम के शुद्र कोलटिट का 1200 बार धड़कता है।

मिठास, बँगला भाषा की

स्मार्ट इंडियन के अनुरागजी के ब्लाग में बांग्ला भाषा की मिठास को चखते ही कुछ याद आ गया, लिखने तो कुछ और जा रहा था, पर इसे पहले बांटने की इच्छा हो आयी ----
एक बार हरियाणा में दो बंगाली झगडा करते पकडे गये। कांस्टेबल राम सिंह उन्हें पकड़ कर थाने ले गया। थानेदार शेर सिंह ने पूछा, हाँ भाई क्या नाम है तुम्हारा? जी, अजय मुखर्जी और विनय चटर्जी। थानेदार ने अपना डंडा जोर से मेज पर मारा और बोला, साले दिन दहाडे गुंड़ा गर्दी करते हो और नाम के साथ जी लगाते हो। राम सिंह बंद कर दो चटर मखर को।
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एक पार्क में दो जने बैठे हुए थे। कुछ देर बाद एक उठ कर चला गया। कुछ देर बाद दूसरे सज्जन भी चलने को हुए तो उनका ध्यान अपनी जेब पर गया, जो कट चुकी थी। उन्हें अपने साथ बैठे व्यक्ति पर शक हुआ, पर वह कहीं दिखाई नहीं पड़ा, तो उन्होंने बाग के माली से पूछा कि भाई, तुमने यहां बैठे आदमी को देखा है? माली बोला नहीं तो, पर क्या हुआ? सज्जन ने जवाब दिया, अरे भाई वह भद्र पुरुष मेरी पोकेट मार कर चला गया है। {ओ भद्रलोक आमार पोकेट मेरे चोले गैछे}
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यह तो हुई चुटकुलों की बातें अब एक सच्ची बात बतलाता हूं ------- बांग्ला भाषा में उच्चारण थोड़ा बदल जाता है जैसे, गगन - गोगोन हो जाता है, जल - ज़ोल, कदम - कोदोम, विनय - विनोय, लक्ष्मी का उच्चारण लोक्खी के रूप में होता है, इत्यादि-इत्यादि।
कलकत्ते में सियाल्दा स्टेशन के पास एक मशहूर सुनार लक्ष्मी बाबु की दुकान है। दुकान के दरवाजे के एक तरफ बंग्ला में तथा दूसरी तरफ हिन्दी में ब्योरा लिखा हुआ है। यह मजाक नहीं सच बात है।
बंग्ला में लिखा गया है - लोक्खी बाबुर सोना-चांदिर दोकान। यानि लक्ष्मी बाबु की सोने-चांदी की दुकान।
हिंदी में उसका अनुवाद किया गया है - लोक्खी बाबु का सोना-चांदी का दोकान। {एक कान सोने का एक चांदी का?}

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...