रविवार का दिन है, आईए कुछ ही..ही.., हा..हा.. हो जाए
@ भाषण चल रहा था। नेताजी बार-बार कह रहे थे कि हमें अपने पैरों पर खड़े होना है। तभी भीड़ के पीछे से कोई चिल्लाया, अरे साहब हम तो कब से कोशिश कर रहे हैं पर यह हवलदार हमें जबरदस्ती बैठा देता है।
@ एक आदमी अपना सर पकड़े डाक्टर के पास आ कर अपनी नकली टांग की तरफ इशारा कर बोला, डाक्टर साहब, इस लकड़ी की टांग के कारण मेरे सर में दर्द हो रहा है।
नकली टांग से सर में कैसे दर्द हो सकता है? डाक्टर ने आश्चर्य से पूछा।
असल में आज मेरी बीवी ने इसे उठा कर मेरे सर पर दे मारा है।
@ दादाजी ने अपने पोते का साधारण ज्ञान परखने के लिए पूछा, बताओ बगुला तालाब में एक टांग पर क्यों खड़ा होकर मछलियां पकड़ता है?
आप भी दादाजी!!!, अरे दोनों पैर उठा लेगा तो गिर नहीं पड़ेगा क्या ?
@ श्रीमतीजी ने पूछा, ए जी, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर में क्या अंतर होता है? वही जो तुम्हारे मुझसे मांग कर पैसे लेने और चुपचाप निकाल लेने में होता है।
श्रीमानजी ने जवाब दिया।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
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मनुष्य एक आशंकित जीव है
हम सब धर्मपरायण लोग हैं ! आस्थावान हैं ! धर्म-भीरु भी हैं ! हम अपने-अपने तरीके से अपने इष्ट की आराधना करते हैं ! पर साथ ही साथ, कहीं ना कहीं...
8 टिप्पणियां:
हा-हा और ही-ही!
hu hu hu hu hu hu hu
हा-हा ही-ही हूं हूं
...बेहतरीन!!!
बहुत मजेदार!
हा हा हा बहुत बढ़िया
मजेदार.. मजा आ गया
:) बढिया!
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