शनिवार, 29 अप्रैल 2017

क्या बालाजी धाम का ट्रस्ट 20-25 की.मी. की सड़क का रख-रखाव भी नहीं कर सकता ?

बात तो खटकने वाली होनी ही है, चाहे सरकार हो, नेता हो, संत्री हो, मंत्री हो, पंडा हो पुजारी हो सब के लिए मध्यम वर्ग, गरीब की बकरी है, जिसे कभी भगवान् के नाम पर, कभी सहूलियत के नाम पर, कभी देश के नाम पर, कभी कानून के नाम पर जो आता है, अपनी मर्जी से दुह कर चल देता है और चाहा जाता है कि वह उफ्फ भी ना करे !

धार्मिक स्थलों की यात्रा करने वाला हर यात्री आस्था, श्रद्धा, विश्वास से ओत-प्रोत हो कर ही अपने आराध्य के दर्शन करने हेतु तन-मन-धन से समर्पित हो घर से निकलता है। पर उसके भक्ति-भाव को तब ठेस पहुंचती है जब उसे धर्मस्थलों पर पैसों के लिए कुछ भी होते-करते दिखता है। पर उस सब को भी अपने धार्मिक स्वभाव के कारण वह उसे भी प्रभू की इच्छा मान सहज स्वीकार कर अपनी आस्था में कमी नहीं होने देता। पर मन में कहीं ना कहीं दुःख तो होता ही है। ऐसा ही एक बार फिर इस बार की सालासर धाम की यात्रा के दौरान हुआ। 

इस बार बैसाखी के दिन तेरह अप्रैल को फिर सालासर का कार्यक्रम बना। इस बार भी कोरम में पिछली यात्रा पर जाने वाले सारे सदस्य थे। आठ बड़े और दो बच्चे। पर इस बार सिर्फ सालासर बालाजी के दर्शनों का ही लक्ष्य रखा गया था। हनुमान जयंती बीत चुकी थी, इसलिए भीड़-भाड़ बहुत
कम थी। दर्शन भी बहुत आराम और तसल्ली से हुए। पर वहीँ एक छोटी सी बात भी खटकी। दर्शनों के दौरान वहाँ खड़े पंडों में से एक ने मेरे सामने वाले तोंदियल पंडे को, चढ़ावे में से लोगों को कुछ दे देने को कहा, पर सामने वाले ने साफ़ मना कर दिया। एक क्षण के लिए मन में आया कि कैसे लालची लोग प्रभू की सेवा में नियुक्त हुए, हुए हैं। जो मुफ्त के चढ़ावे को भी वितरित न कर खुद हड़पना चाहते हैं। जबकि दर्शनार्थियों की जेब से तरह-तरह के बहानों से पैसा निकलवाने से नहीं चूका जाता। लगता है भगवान भी पंडों और ट्रस्टियों की अमानत बन कर रह गए हैं। नहीं तो ऐसा क्यों कि ट्रस्टियों, पंडों, उनके रिश्तेदारों या उनके जान-पहचान के लोगों को अलग से सहूलियतें दी जाती हैं, गर्भ-गृह तक जाने की इजाजत मिलती है, पूजा में समय अड़चन नहीं बनाया जाता, और इधर आम इंसान लाइन में लगा कीर्तन ही करता रहता है। TRUST यानी भरोसा। मतलब जिन पर भरोसा कर प्रभू की पूजा, अर्चना, रख-रखाव  सौंपा जाता है वही अपने-आप को आम से ख़ास मान सुविधाएं संजोने लगता है। पंडे-पुजारी तो भगवान् को अपनी धरोहर ही समझते आए हैं सदा से !! दूसरी ओर आम इंसान, जिसकी आस्था और धन पर स्थल को ख्याति मिलती है उसके हिस्से में धक्के ही आते हैं !!!  

बात तो खटकने वाली ही है, चाहे सरकार हो, नेता हो, संत्री हो, मंत्री हो, पंडा हो पुजारी हो सब के लिए मध्यम वर्ग, गरीब की बकरी है जिसे कभी भगवान् के नाम पर, कभी सहूलियत के नाम पर, कभी देश के नाम पर, कभी कानून के नाम पर जो आता है, अपनी मर्जी से दुह कर चल देता है और चाहा जाता है कि वह उफ्फ भी ना करे ! 

इधर दो-तीन साल से लक्ष्मण गढ़ की तरफ से, #राजमार्ग_65_से_सालासर_बालाजी_धाम तक जाने वाली #सड़क को यात्रियों की सुविधा के नाम पर #टोल_मार्ग कर दिया गया है। पहली नजर में तो यह बात अच्छी लगती है, पर करोड़ों रुपयों का चढ़ावा संभालने वाला #बालाजी_धाम-का_ट्रस्ट-क्या #20-25_की.मी. की सड़क का रख-रखाव भी नहीं कर सकता जबकि पंडों-पुजारियों के घरों की कीमत पचासों लाख के भी ऊपर है। ऊपर से यह मार्ग ट्रस्टियों, ख़ास लोगों, पण्डे-पुजारियों की गाड़ियों के लिए कर मुक्त है। 

देश में सैकड़ों ऐसे धर्म-स्थल हैं, जहां की आमदनी की कोई हद नहीं है। पर कुछेक को छोड़ कर किसी की ओर से भी जनता के पैसे को जनता के लिए शायद ही खर्च किया जाता हो।जबकि उनसे जुड़े लोगों के घर, महल-अट्टालिकाओं में बदलते रहते हैं। हम सदा से धर्म-भीरु रहे हैं। जन्मों-जन्म से धर्म के नाम पर लुटते-पिटते आए हैं। जानते-बुझते जगह-जगह जेबें ढीली कर देते हैं। पर ऐसी जगहों पर होती अनियमितताओं के खिलाफ कभी खड़े नहीं होते। कभी विरोध न होने की वजह भी है कि सामनेवाला सदा मध्यम-वर्ग को कोई तवज्जो नहीं देता।    

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

"पतंजलि" तो खुद इतना सक्षम है कि पांच सितारा होटलों की श्रृंखला खोल ले

जब पतंजलि की तरफ से इजाजत नहीं मिली है तो फिर कैसे ये लोग उसके नाम और लोगो का इस्तेमाल कर रहे है। ऐसा तो नहीं कि उन्होंने सोच रखा हो कि इजाजत मिलने में तो समय लगेगा ही तब तक उनके नाम का इस्तेमाल करते रहो, पब्लिक को क्या पता कि अधिकृत हैं की नहीं, वह तो नाम देखती है, यदि इजाजत ना भी मिली तब तक पब्लिक को आदत पड़ चुकी होगी !!  

पिछले कुछ दिनों से मीडिया पर #पतंजलि-के-नाम-का-रेस्त्रां खुलने की खूब चर्चा हो रही है। जिसे अपने आप को बाबा रामदेव का अनुयायी कहने वाले दो  सज्जनों द्वारा "पौष्टिक" नाम से पंजाब के जीरकपुर इलाके में खोला गया है। उनका दावा है कि उनके द्वारा सिर्फ पतंजलि के उत्पाद ही उपयोग में लाए जाते हैं। वैसे तो उनके अनुसार अभी बाबा रामदेव की तरफ से हरी झंडी नहीं मिली है, जिसके लिए उन्होंने आवेदन कर रखा है, फिर भी उनके रेस्त्रां में हर जगह बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के फोटो के साथ-साथ पतंजलि के उत्पादों से दीवालें सजी पड़ी हैं, यहां तक की उनके मेनू-कार्ड पर भी पतंजलि का 'लोगो' लगा हुआ है। 

आज हर आदमी स्वास्थ के प्रति जागरूक होने लगा है। उसका रुझान ऑर्गेनिक यानी प्राकृतिक वस्तुओं की तरफ बढ़ता जा रहा है। इसी मनोवृत्ति का फ़ायदा व्यवसायिक वर्ग उठाने में लगा हुआ है। FMCG बनाने वाली हर कंपनी हर दूसरे दिन कोई न कोई नया पदार्थ "आर्गेनिक" का ठप्पा लगा बाज़ार में उतार देती है। पर इनमें से अधिकांश पर सिर्फ ठप्पा ही लगा होता है जो सिर्फ लोगों को भरमाने का ही काम करता है। इसका मुख्य कारण पतंजलि के वे उत्पाद हैं जिन्होंने देसी-विदेशी हर उपभोक्ता वस्तुओं को बनाने वाली कंपनियों के नाक के नीचे से बाजार खींच कर उस पर कब्जा कर लिया है। पतंजलि और बाबा रामदेव का नाम बाजार में "हॉट केक" बना हुआ है। लोग आँख बंद कर उनके उत्पादों का उपयोग करने लग गए हैं। शहर-शहर, गांव-गांव, गली-गली पतंजलि के उत्पादों की दुकानें खुल चुकी हैं। छोटे-बड़े हर घर में उसकी उपस्थिति दर्ज है। उनके नाम से हर कोई जुड़ना 
चाहता है। उसकी लोकप्रियता का फायदा उठाने के लिए लालायित हो रहा है। इसीलिए इस रेस्त्रां पर भी तुरंत भरोसा करने का मन नहीं हो पा रहा। हो सकता है कि इसके संस्थापकों की मंशा जन-हित की ही हो पर इससे नकारा भी नहीं जा सकता कि आज के समय में सिर्फ संस्था का नाम उपयोग कर लोगों को आकर्षित कर अपने को सफल करने का प्रयास किया जा रहा हो। आज जहां बाजार आर्गेनिक-आर्गेनिक के खेल में दस की चीज को सौ का बता खपाने में माहिर है। वहीँ आम-जन अपनी सेहत को लेकर कुछ भी खर्च करने को तत्पर नजर आता है। इसलिए शक की गुंजायश कुछ ज्यादा ही हो रही है।   

#पतंजलि_को_ब्रांड_बनने_और_लोगों_का_विश्वास_जीतने_में_वर्षों_का_समय_और_मेहनत_लगी_है। आज वह जिस मुकाम पर है वहां उन्हें किसी भी चीज के लिए किसी का मुंह जोहने  की जरुरत नहीं है। वे आज इतने सक्षम हैं कि पतंजलि के नाम से पांच सितारा होटलों की श्रृंखला खोली जा सकती है। इसलिए उन्हें इस तरह के किसी भी प्रस्ताव और प्रस्तावित करने वाले की मंशा को बहुत सोच-समझ कर ही स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि साख बनाने में सालों लग जाते हैं उसे मिटने में वक्त नहीं लगता। इस रेस्त्रां की एक और बात खटकने वाली है कि जब पतंजलि की तरफ से इजाजत नहीं मिली है तो फिर कैसे ये लोग उसके नाम और लोगो का इस्तेमाल कर रहे है। ऐसा तो नहीं कि उन्होंने सोच रखा हो कि इजाजत मिलने में तो समय लगेगा ही तब तक उनके नाम का इस्तेमाल करते रहो, पब्लिक को क्या पता कि अधिकृत हैं की नहीं, वह तो नाम देखती है, यदि इजाजत ना भी मिली तब तक पब्लिक को आदत पड़ चुकी होगी !!  जिसका फ़ायदा तो मिलता ही रहेगा !!!

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

सालासर बालाजी धाम जाएं तो तुलसीदेवी सेवासदन को जरूर आजमाएं

यदि किसी ख़ास दिन ही बालाजी के दर्शन की मानता ना मानी हो तो दिवाली के तुरंत बाद या इस समय, अप्रैल में, चाहे गर्मी भले ही हो, हनुमान जयंती के बाद जाना ही श्रेयस्कर है। भीड़-भाड़ कम हो जाने की वजह से प्रभु खुले दिल से निश्चिंतता से दर्शन देते हैं। कोई हड़बड़ी नहीं, कोई मारा-मारी नहीं, रहने को उचित जगह मिल जाती है। खान-पान साफ़-सुथरा..............

बालाजी महाराज 
साल शुरू होते ही नौकरीपेशा इंसान शायद सबसे पहले छुट्टियों की तारीखें ही ढूंढता है। होता तो सब प्रभू की इच्छा से है पर छुट्टियों के अनुसार कुछ कार्यक्रम निर्धारित कर ही लिए जाते हैं। ऐसा ही कुछ इस साल की शुरुआत में भी हो चुका था, जिसमें अप्रैल माह के दूसरे सप्ताहांत पर फिर सालासर बालाजी के दर्शनार्थ जाना तय कर लिया गया था। हालांकि पिछली बार वहाँ की भीड़ के कारण मेरा मन कुछ डांवाडोल था पर यह जान कर बहुत अच्छा लगा कि लाख "Modernity" के बावजूद मैं अपने बच्चों में प्रभू के प्रति आस्था व विश्वास का बीजारोपण करने में सफल   रहा हूँ। उनके आग्रह पर ही मेरे जाने का मन बन पाया।    

चमेलीदेवी अग्रवाल सेवासदन 
इस बार भी कोरम में पिछली यात्रा पर जाने वाले सारे सदस्य थे। आठ बड़े और दो बच्चे। हर बार झुंझनूं के रानीसती मंदिर से सालासर धाम फिर खाटू श्याम, इस त्रिकोणात्मक यात्रा को ही अंजाम देते आना हुआ है। जो करीब-करीब अफरा-तफरी में ही पूरी की जाती रही है, जिससे थकान का होना स्वाभाविक होता था। इसलिए इस बार सिर्फ सालासर बालाजी के दर्शनों का ही लक्ष्य रखा गया था। 13 अप्रैल को दोपहर एक बजे निकलना तय हुआ था। पर बैसाखी का त्यौहार होने के कारण ट्रैवेहलर को आने में तो देर हुई ही दिल्ली से निकलते-निकलते ही चार बज गए थे।  फिर वाहन-चालक के चालन में भी कुछ नौसिखियापन था, जिसके फलस्वरूप गंतव्य तक पहुंचते-पहुंचते घडी ने पौने एक बजा दिया था। हर बार की तरह चमेलीदेवी अग्रवाल सेवासदन  में तीन कमरों की बुकिंग थी, फिर भी सोते-सोते दो तो बज ही गए थे। रास्ते की थकान और देर के कारण सुबह आलस कुछ देर से टूटा। निश्चिंतता भी थी कि पूरा दिन अपना ही है। नहा-धो कर बाहर निकले तो ज्यादा चहल-पहल नहीं थी। इसके दो कारण थे पहला तो यह था कि यहां दो दिन पहले हनुमान जयंती के मेले का समापन हो चुका था, उसकी भीड़ भी अबतक घर जा चुकी थी। दूसरा गर्मी अपने पूरे शबाब पर थी। यही कारण था कि मुख्य द्वार का शटर खोल दिया गया था जिससे सीधे अंदर जा आराम और शाँति के साथ खुले दर्शन पाने का पांच साल पहले जैसा सौभाग्य प्राप्त हो सका। हालांकि लोग आ-जा रहे थे पर मंदिर के भीतर भी एक बार में    30-35 जनों से ज्यादा दर्शनार्थी नहीं थे। पंडित-पुजारी भी आराम से प्रसाद वगैरह का वितरण कर रहे थे। ना शोर-शराबा ना हीं धक्का-मुक्की। नहीं तो करीब एक-डेढ़ की. मी. का चक्कर zig-zag करते हुए लगाने और भीड़ संभालने में तीन-चार घंटे लगना तो मामूली बात होती है। इस तरह से दर्शन-लाभ मिलने से, तन थकान रहित और मन प्रसन्न व प्रफुल्लित रहता है।

अंजनी माता 
दर्शनोपरांत यहां से तीस-पैंतीस की.मी. दूर डूंगर बालाजी जाना भी सदा कार्यक्रम में शामिल रहता आया है। पर इस बार एक तो गर्मी के कारण निकलना देर से हुआ ऊपर से वहां जा कर पता चला कि दो-तीन महीने पहले हुए एक हादसे के कारण अब गाड़ियों के ऊपर मंदिर तक जाने पर रोक लगा दी गयी है। सात बज रहे थे, अंधेरा घिरना शुरू होने ही वाला था पर आए थे तो बिना दर्शन किए लौटना भी बनता नहीं था। चढ़ाई इतनी सीधी थी कि कहीं-कहीं बिना रेलिंग पकड़े सीधा खड़े होना भी मुश्किल लगता था। करीब साढ़े चार सौ सीढ़ियों के साथ ही कहीं-कहीं समतल कठिन चढ़ाई भी थी। वैसे जब से वाहन मार्ग बंद किया गया है तब से गर्मी से बचाने के लिए इस पूरे मार्ग को ढक दिया गया है, अंधेरे की वजह से फोटो नहीं ली जा सकी। पोस्ट में पुरानी फोटो ही है। जैसे-तैसे साढ़े सात बजे तक दरबार में पहुंचे, प्रभू का आशीर्वाद था, आरती हो रही थी, आना सफल रहा। हालांकि कदम जी नीचे ही रही थीं। सालासर लौटते-लौटते नौ बज गए थे। इस बार खाना वगैरह निपटा सब जने जल्दी से नींद का आह्वान करने चले गए। सुबह फिर प्रभू के दर्शन कर इजाजत ली गयी। माता अंजनी के दर्शन कर दोपहर का भोजन कर वापस दिल्ली घर पहुंचते-पहुंचते रात के दस तो बज ही गए थे। पर  बालाजी की कृपा के कारण इतनी गर्मी (सालासर में पारा 44* छू रहा था) के बावजूद सब जने स्वस्थ व प्रसन्न रहे, यह भी बहुत बड़ी बात थी।

डूंगर बालाजी 
सालासर में वैसे तो साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, मंगलवार और शनिवार तो मेले का दृश्य उत्पन्न कर देते हैं। हनुमान जयंती और कार्तिक पूर्णिमा के दिन तो पूरे इलाके में पैर रखने की जगह नहीं बचती। लोग-बाग़ खुले में, टिलों पर, सड़क के किनारे, गलियों में जहां जगह मिले ठौर बना लेते हैं। आधा-आधा दिन निकल जाता है दर्शन के लिए लाइन में लगे-लगे। इसलिए यदि किसी ख़ास दिन ही बालाजी के दर्शन की मानता ना मानी हो तो दिवाली के तुरंत बाद या इस समय, अप्रैल में, चाहे गर्मी भले ही हो, हनुमान जयंती के बाद जाना ही श्रेयस्कर है। भीड़-भाड़ कम हो जाने की वजह से प्रभु खुले दिल से निश्चिंतता से दर्शन देते हैं। कोई हड़बड़ी नहीं, कोई मारा-मारी नहीं, रहने को उचित जगह मिल जाती है। खान-पान साफ़-सुथरा। 

मेरा सपरिवार सालासर जाना कई बार हो चुका है। वहां सौ के ऊपर ही आवासीय स्थान होंगे। हर साल, दिन ब दिन, नए-नए सेवासदन-धर्मशालाएं बनती भी जा रही हैं। पर जहां तक मेरा अनुभव है, जिसके चलते अब मैं
डूंगर बालाजी पहुँच मार्ग, अब इसे पूर्णतया ढक दिया गया है 
पहली बार जाने वाले को सलाह दे सकता हूँ कि साफ़-सुथरे, आराम-दायक आवास, सफाई के साथ बनाए और परोसे जाने वाले शुद्ध भोजन, जो मनुहार के साथ खिलाया जाता हो और वह सब भी अत्यंत उचित या कहें सस्ते मूल्य में, पाने के लिए #चमेलीदेवी_अग्रवाल_सेवासदन को जरूर आजमाएं। रहने और खाने का इतना सुंदर इंतजाम शायद ही कहीं हो। पिछले पांच-छह सालों में इतनी प्रतिस्पर्द्धा के बावजूद इस संस्था ने रहने और ना ही भोजन की कीमतों में, बिना गुणवत्ता से समझौता किए, कोई बढ़ोत्तरी की है। यहां से मंदिर कुछ दूर जरूर है पर इतनी सुविधाओं के बदले उतना आराम से सहा जा सकता है। इसलिए जब भी सालासर धाम जाना हो इस जगह को जरूर आजमाएं।                

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

"चैरिटी" में हम अपने छोटे-छोटे, निर्धन पडोसी देशों से भी पीछे हैं

आज जो सक्षम हैं वे चतुर-चालाक हो गए हैं। अब वे खुद दान-दक्षिणा नहीं करते, दूसरों से करवाते हैं। जब भी किसी आपात अवस्था में  किसी सहायता की जरुरत होती है तो ये नेता-अभिनेता तुरंत  जनता के सामने झोली फैला कर पहुंच जाते हैं। देश के आम आदमी में लाख धोखों-चोटों के बावजूद अभी भी भावुकता, परोपकारिता, दयालुता बची हुई है इसी के चलते वह पहले से ही फटी अपनी जेब को और खाली करने में संकोच नहीं करता...

हमारे कथा-कहानी-किस्सों में दान की महिमा और दानियों की दरियादिली के अनगिनत किस्से दर्ज हैं। प्राचीन काल से ही देश-समाज और जनकल्याण के लिए राजाओं, ऋषि-मुनियों यहां तक की साधारण नागरिकों ने भी समय पड़ने पर जरूरतमंदों के लिए बिना हिचके अपना सर्वस्व दान कर दिया था। पर अब लगता है कि अतीत की यह बातें सिर्फ दिल खुश करने के लिए ही रह गयी हैं। पहले हम, हमारा देश, हमारा समाज हुआ करता था। पर अब हमें धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता और ना जाने  किस-किस चीज पर बांट दिया गया है ! दिलों में कलुषता और दिमाग में वैमनस्य भर दिया गया है। हमें एक-दूसरे पर शक करना सीखा दिया गया है। ऐसे में कौन किसकी सहायता करेगा ! 

इस बात का तो खूब शोर मचाया जाता है कि फलानी जगह फलाने इंसान की भूख से मौत हो गयी। जो भी सत्ता के विपक्ष में होता है वह राशन-पानी लेकर कुर्सी-धारियों पर चढ़ बैठता है। पर कभी सुना गया है कि इन अरब-खरबपतियों ने, जो जमीन पर चलना अपनी हेठी समझते हैं, जिन्हें जनता के पैसे पर घर-वाहन-दफ्तर सब वातानुकूलित चाहिए, जिन्हें मंहगे खाद्य-पदार्थ भी तकरीबन मुफ्त में मिलते हैं, जिनकी संपत्ति दो-तीन साल में सैकड़ों गुना बढ़ जाती है, जो खुद तो राजा और उनके दूर-दराज के रिश्तेदार भी नवाब बन जाते हैं, कभी किसी बदहाल परिवार की एक पैसे की भी मदद की हो ? यही कारण है कि आज हम इस देने की प्रक्रिया में विश्व में दूर कहीं 133वें नंबर पर खड़े हैं। शर्म आती है यह देख कर कि हमारे छोटे-छोटे, निर्धन, पडोसी देश, नेपाल, श्री लंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान यहां तक की पाकिस्तान भी हमसे कहीं बेहतर साबित हुए हैं इस काम में ! जबकि विडंबना यह है कि, एक सर्वे के अनुसार, पिछले कई वर्षों से दुनिया के मुकाबले हमारे यहां करोड़ और अरबपतियों की सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है पर यह सब ज्यादातर छोटे दिल वाले ही साबित हुए हैं। 

आज जो सक्षम हैं वे चतुर-चालाक हो गए हैं। अब वे खुद दान-दक्षिणा नहीं करते, दूसरों से करवाते हैं। जब भी किसी आपात अवस्था में  किसी सहायता की जरुरत होती है तो ये नेता-अभिनेता तुरंत  जनता के सामने झोली फैला कर पहुंच जाते हैं। देश के आम आदमी में लाख धोखों-चोटों के बावजूद अभी भी भावुकता, परोपकारिता, दयालुता बची हुई है इसी के चलते वह पहले से ही फटी अपनी जेब को और खाली करने में संकोच नहीं करता। इसमें उस छवि का भी हाथ है जो आज के मीडिया ने नेताओं-अभिनेताओं को महिमामंडित कर गढ़ी है। उनके "औरे" से वह इतना चौन्धियाया रहता है कि वह कभी पूछने तो क्या सोचने की भी हिम्मत नहीं कर पाता कि आपने अपनी तरफ से क्या मदद की है ? उल्टा वह तो  उनमें से किसी के द्वारा अपने ही बेटे-बेटियों को अपना धन बांटने के बेशर्म खुलासे पर उसको महानता की श्रेणी में खड़ा कर उसकी वाह-वाही करने लगता है !! 

आज संसार में नवधनाढ्यों की सबसे बड़ी जमात भारत में है। धर्म के नाम पर या अनिश्चित भविष्य से आशंकित हो, भय के कारण हम भले ही धर्मस्थलों पर लाखों का चढ़ावा चढ़ा दें पर किसी जरूरतमंद को, किसी सर्वहारा को कुछ देने में सदा कंजूसी बरतते है। दान-पुण्य में हम बहुत पीछे हैं। यह सही है कि किसी से जबरदस्ती "चैरिटी" नहीं करवानी चाहिए यह तो दिल से होना चाहिए जिसकी हमें आदत नहीं है। हमें खुद को बदलने की सख्त जरुरत है यह जानते हुए कि विश्व भर के गरीबों की एक तिहाई संख्या हमारे ही देश में है।  

मंगलवार, 28 मार्च 2017

हनुमान जी का यह नाम शायद ही आपने सुना होगा

करीब साढ़े छः का समय था, एक आदमी मलिन से टी शर्ट-पैंट पहने, मुंह को कपडे से लपेटे वहां रखी मूर्तियों की आरती जैसा कुछ कर रहा था। काम ख़त्म होने पर मुझे नमस्ते की और मेरे कहने पर अपने चेहरे से कपड़ा हटाया। लगा कि वह नहाया हुआ भी नहीं है

अपने देश में या यूं कहिए कि विश्व भर में हिंदू धर्म के पांच प्रमुख देवों में हनुमान जी का भी नाम है। इन्हें सबसे शक्तिशाली, अमर, अजेय, आशुतोष, विनम्र व दयालु माना जाता है। इनकी लोकप्रियता का कोई  पारावार नहीं है। हिंदू तो हिंदू अन्य धर्मावलंबी भी इन्हें खूब जानते और मानते हैं। पर शायद इनकी विनम्रता और दयालुता का अर्थ कुछ लोगों ने अपनी तरह से परिभाषित कर, अपने लाभ के लिए, देश भर में, दक्षिणी भाग को छोड़ कर, जगह-जगह गली-नुक्कड़-पैदलपथ, पेड़ों के नीचे, दीवारों पर और न जाने कहां-कहां इनके चित्र या मूर्तियां लगा, धर्मभीरु आम जनता को बरगला कर, उनकी भावनाओं को उभाड़, अपनी रोटी सेकनी शुरू कर दी !! 

इस तरह के मंदिरों के तरह-तरह के लोक-लुभावन नाम रखे जाते हैं, जैसे दक्षिण मुखी, सर्व कामना, प्राचीन, बालाजी इत्यादि। आपने भी हनुमान जी के मंदिरों के अलग-अलग नाम सुने होंगे पर मेरा दावा है, मैं जो बताने जा रहा हूँ, वह नाम आपने शायद ही कभी सुना होगा ! नई दिल्ली के जनकपुरी इलाके के सुपर स्पेसियालिटी अस्पताल से दशहरा पार्क होते हुए डिस्ट्रिक सेंटर जाने वाली सड़क के पासंगीपुर मोड़ के कुछ आगे फुटपाथ पर अतिक्रमण कर उस जगह को नाम दिया गया है "श्री ग्रेजुएट बालाजी धाम", जी हाँ, यह नाम है उस जगह का जिसे कुछ वक्त पहले पैदल चलने वालों की कठनाइयों-परेशानियों को दरकिनार कर, पैदल-पथ को अजीबोगरीब तरीके से घेर कर, सिर्फ धनोपार्जन के लिए बनाया गया है। जो इसके रख-रखाव से साफ़ जाहिर होता है। 8 x 3 की तंग सी अंधेरी जगह में एक थड़े के ऊपर करीब दो फुट की हनुमान जी की
मूर्ति स्थापित कर उसकी अर्चना जैसा कुछ करना शुरू कर दिया गया है।


वहां जा कर बात करने की इच्छा होते हुए भी जाना नहीं हो पाता था पर कल शाम को वहां पहुँच ही गया। करीब साढ़े छः का समय था, एक आदमी मलिन से टी-शर्ट, पैंट पहने, मुंह को गंदे से कपडे से लपेटे वहां रखी मूर्तियों की आरती जैसा कुछ कर रहा था। काम ख़त्म होने पर मुझे नमस्ते की और मेरे कहने पर अपने चेहरे से कपड़ा हटाया। लगा कि वह नहाया हुआ भी नहीं है। मैंने सीधा प्रश्न यही किया कि जगह का इस तरह का नाम रखने की कैसे सूझी ? वह कुछ हडबडाया, पर मेरे कहने पर कि मैं विरोध नहीं कर रहा हूँ सिर्फ औचित्य जानना चाहता हूँ, बोला कि मैं तो सिर्फ देख-रेख करता हूँ असल वाले बाबा जी गांव गए हुए हैं। मेरे यह पूछने पर कि आपके इस मंदिर को बनाते समय और नामकरण के समय तो कई लोग होंगे जिन्होंने ऐसे नाम का सुझाव दिया होगा या फिर आपके बाबाजी ग्रेजुएट हैं जिन्होंने कहीं काम ना मिलने पर हनुमान जी की शरण ली है ? पर उस बंदे के पास कोई जवाब नहीं था। मैंने उसे दिलासा दी कि मैं किसी अखबार वगैरह से नहीं हूँ सिर्फ जिज्ञासावश यहां चला आया हूँ, तो चलो यही बताओ कि इस जगह ऐसा


करने की कैसे सूझी ? अब तक वह थोड़ा खुल चुका था, बताया कि यहां वर्षों से रह रहा है। आस-पास की कालोनियों में जो काम मिलता है कर लेता है। साथ की दिवार पर पता नहीं कब-कौन एक दो मूर्तियां रख गया था। जब आने-जाने वाले राहगीरों को यहां रुक कर उन्हें प्रणाम करते देखा तो यहां छत डालने का विचार आया। मेरे पूछने पर कि किसी ने रोका नहीं, तो दृढ़ता से जवाब दिया, सालों से यहां रह रहे हैं, आते हैं 'पैलिटी' वाले, 'पोलिस' वाले, पर हम हटेंगे नहीं ! मैंने पूछा कि लोग आते हैं, चढ़ावा चढ़ता है ? जवाब मिला, मंगल-शनि भीड़  होती है, लोग जुटते हैं, चढ़ावा भी चढ़ता है।  मेरे लिए इतना ही काफी था !

भले आदमी का नाम मालुम है, पर यहां उजागर करने से क्या हासिल ? देश भर में हजारों-लाखों ऐसे मिल जाएंगे जो भगवान को घर मय्यसर करवा रहे हैं !! उन पर वह मेहरबान है तो......... 

शनिवार, 25 मार्च 2017

पेड़ों के नीचे "पवित्र कूड़े" का ढेर

देश के चाहे किसी भी हिस्से में निकल जाइए, शहर हो या क़स्बा, आपको किसी न किसी पेड़ के नीचे हमारे भगवानों की भग्न, बदरंग या पुरानी मुर्तिया, टूटे कांच या फ्रेम में जड़ी देवी-देवताओं की कटी-फटी तस्वीरें, 
पूजा,  हवन इत्यादि से संबंधित वस्तुएं जरूर दिख जाएंगी। कभी बड़े सम्मान के साथ घर ला कर इनकी पूजा-
अर्चना की गयी होगी। इनमें अपने प्रभू या इष्ट की कल्पना की गयी होगी। पर आज गंदगी के माहौल में जानवरों-कीड़े-मकौड़ों के रहमो-करम पर लावारिस पड़ी, धूल फांक रही हैं। क्यों ऐसा होता है या किया जाता है ? धार्मिक प्रवित्ति के होते हुए भी हम क्यों ऐसा करते हैं ? तो इसका एक ही उत्तर दिखता है कि इस बारे में आम इंसान को सही विधि मालुम नहीं है, जब कि धार्मिक पुस्तकों में इसके लिए दिशा-निर्देश उपलब्ध हैं।ऐसी मान्यता है कि भग्न, बेरंग, कटी-फटी  या कुरूप प्रतिमा की घर में पूजा नहीं करनी चाहिए। ऐसा निर्देश है कि खंडित प्रतिमा को बहते जल में या फिर बड़े तालाब में छोड़ देना चाहिए। पर जहां जल ना हो ? वहां किसी पवित्र जगह में उन्हें जमीन में दबा देना चाहिए। अब पवित्र जगह को लेकर असमंजस हो सकता है इसलिए पीपल के वृक्ष के पास की भूमि इस कार्य के लिए उपयुक्त बताई गयी है। पर लोग कष्ट ना कर पीपल के तने के पास ही मूर्तियां रख अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं। यह सोचे बिना कि समय के साथ मूर्तियों का और उसके साथ-साथ, आस-पास के पर्यावरण का क्या होगा ! यही हाल फ्रेम में जड़ी तस्वीरों का होता है जिसमें लगा कांच और भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है। इसके लिए चाहिए कि पहले लकड़ी और कांच को अलग कर लिया जाए और कागज को जला दिया जाए। जलाना पढ़ कर कुछ अजीब और गलत सा लगता है पर वैसे ही छोड़ दिए जाने की बेकद्री से तो बेहतर ही है। वैसे हिन्दू धर्म के अनुसार अग्नि एक पवित्र तत्व है, इसलिए ऐसी पवित्र वस्तुओं को अग्नि तत्व में मिला देना चाहिए और फिर भस्म होने के बाद बची हुई राख को पीपल की जड़ के आस-पास दबा दें।  

घर में टूटी-फूटी प्रतिमा नहीं रखनी चाहिए उससे अनिष्ट हो सकता है, यह तो हम सोच लेते हैं और डर कर उन्हें बाहर कर देते हैं। यहां दो बातें हैं, आध्यात्मिक र्रूप से पहली यह कि हम बड़ी श्रद्धा-भक्ति से धार्मिक
वस्तुओं में प्रभू की छवि या मौजूदगी का अहसास कर उन्हें घर में स्थापित करते हैं पर खंडित होने पर शंकाग्रस्त हो उन्हें लावारिस रूप में कहीं बाहर रख देते हैं, ऐसा करते हुए हमारी निष्ठा, भक्ति, आस्था सब गायब हो जाती हैं ! घर लाते समय जिसमें हमें भगवान् नज़र आते हैं खण्डित होते ही वह सिर्फ एक मिटटी या धातु का टुकड़ा मात्र रह जाता है ! यदि अनिष्ट का इतना ही डर है तो भी यह तो सुनिश्चित करना बनता ही है ना कि ऐसी वस्तुओं का अनादर ना हो !    

दूसरी बात, धार्मिक पक्ष को छोड़ दें तो भी ऐसी चीजों को बाहर करते समय हम इसका ध्यान नहीं रखते कि जाने-अनजाने कूड़ा-कर्कट बढ़ा कर हम पर्यावरण की क्षति का कारण बन जाते हैं। जिस वृक्ष के नीचे हम ऐसी चीजों का ढेर लगाते हैं धर्मभीरुता के कारण किसी की चाह के बावजूद वहां सफाई नहीं हो पाती। फिर फूल वगैरह की वजह से वहां कीड़े-मकौड़ों-जानवरों की आवक बढ़ जाती है, अच्छी-भली जगह कूड़ा घर में तब्दील हो जाती है जो उस पादप के लिए समय के साथ बहुत ही हानिकारक और खतरनाक साबित होता है।  

इसीलिए अब जब भी कोई ऐसी स्थिति सामने आए तो हमें  इन कुछ जरुरी बातों का ध्यान तो रखना ही चाहिए साथ ही अपने आस-पास के माहौल को भी बिना झिझक, बिना अनदेखा किए जागरूक करने में योगदान करना चाहिए। 

सोमवार, 20 मार्च 2017

पतंजलि, बढ़ता मुनाफा, घटता सेवाभाव

आपकी फ्रेंचाइजी वाले दुकानदार तो आपकी वस्तुओं पर पांच से दस प्रतिशत की छूट दे देते हैं पर आप अपने "मेगा-स्टोर" पर पांच रुपये भी नहीं छोड़ते, ऊपर से थैले के पैसे और धरवा लेते हो यह कैसा स्वदेशी प्रेम है ? अरे भाई ! यदि कोई आपके यहां से सात-आठ सौ, जो आपके यहां से खरीदारी की मामूली रकम है, का सामान लेता है तो आप उसे एक  15-20 रुपये का थैला भी नहीं दे सकते ?   गजब है !!    

बाबा रामदेव, एक ऐसा नाम जिसने भारतीय जन-मानस की नब्ज समझ अपने #पतंजलि ब्रांड के व्यापार को ऐसी ऊचाइयों की ओर अग्रसर कर दिया जो नित नए मानक बनाते हुए आसमान की बुलंदियों से आँखें चार करने को तत्पर है। स्वामी जी ने बहुत नपे-तुले अंदाज से धीरे-धीरे लोगों के दिलो-दिमाग में पैठ बनाई। उनको
मालुम था कि आम भारतीय बाहर से चाहे कितना भी आधुनिक हो जाए, मन में कहीं ना कहीं वह अभी भी देशज जरूर है। साथ ही ये आकलन भी हो चुका था कि आजकल लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर बहुत जागरूक रहने लगे हैं, बहुतों का अंग्रेजी दवाओं से मोहभंग हो चुका है, लोग स्वदेशी के नाम को प्रमुखता देने लगे हैं।  इसी से उन्होंने अपने व्यापार के भविष्य का सही अंदाजा लगा लिया। बहुत सोच-समझ कर रण-नीति तैयार की गयी। प्रतिस्पर्द्धा में वर्षों से जड़ें जमाए सिर्फ विदेशी ही नहीं कई स्वदेशी कंपनियां भी मजबूती से सामने खड़ी थीं। लोगों के मन से उनके उत्पादनों से मोहभंग करना और योग गुरु द्वारा बनाई वस्तुओं के प्रति आकर्षण उपजाना बहुत कठिन काम था, पर नामुमकिन नहीं। सबसे पहले टी. वी. पर, फिर चुने हुए शहरों में, फिर देश भर में कक्षाएं लगा कर स्वस्थ रहने के नुस्खे सुझाए गए, योग की महत्ता समझाई गयी, स्वदेशी को अपनाने का आह्वान किया गया। इसके साथ ही रोजमर्रा की कुछ गिनी-चुनी आवश्यक वस्तुओं को बाजार में प्रयोग के तौर पर प्रस्तुत भी कर दिया गया। लोगों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया, इससे जाहिर है हौसला अफजाई तो होनी ही थी। सो अब व्यापक रूप से लोगों को विदेशी चीजों द्वारा होने वाले देश और जनता के नुक्सान को मुद्दा बनाने के साथ-साथ बाजार में #पतंजलि उत्पादों की बाढ़ ला दी गयी। फ्रेंचाइजी की जगह अपनी दुकानें खुलने
लगीं फिर उनको स्टोर और फिर मेगा-स्टोर में बदलने का काम शुरू हो गया। कमाई ने सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए, स्थापित ब्रांडों की ऐसी-की-तैसी होने लगी। पढने-दिखने-सुनने वाले हर मीडिया पर बाबा रामदेव के सहारे पतंजलि छा गया। हम जैसे लोगों को अच्छा लगाने लगा कि अब विदेशी कंपनियों को नानी याद आएगी और नहीं तो कम से कम उचित मूल्य में सही सामान  मिलेगा !

मेरे जैसे बहुत से लोग विदेशी पर स्वदेशी को हावी होने देने की चाह में इस संस्थान से इसके शैशवास्था से ही जुड़े हुए थे। शुरू-शुरू में जब लोग इनकी वस्तुओं पर संशय जाहिर करते थे तो उन्हें अपना उदाहरण दे इन चीजों का प्रयोग करने को उत्साहित करते थे। पता नहीं कितने विदेशी मुरीदों को इस संस्था से जोड़ने के लिए क्या-क्या कहा, किया गया। पर अब आहिस्ता-आहिस्ता यह बात हम सब के दिलों में घर करने लगी है कि कहीं आँख मूँद कर स्वामी जी का अनुसरण कर बेवकूफी तो नहीं कर रहे। इनके प्राकृतिक, शुद्ध, स्वदेशी के चक्कर में भावनात्मक रूप से लुट तो नहीं रहे। इसका कारण भी सामने है। इनके बहुत सारे उत्पाद आर्डर दे कर दूसरी जगह तैयार किए जाते हैं, उनकी प्रमाणिकता का आकलन सही ढंग से होता भी है कि नहीं ? जितनी भारी संख्या में प्राकृतिक जड़ी-बूटियां बाज़ार में उपलब्ध हैं उतनी खुद प्रकृति भी
उपजा पाती है या नहीं ? सबसे बड़ी और अहम बात यदि संस्था को भारत और उसकी जनता से इतना ही लगाव है तो हर चीज इतनी मंहगी क्यों, कि उसे एक गरीब आदमी छू भी ना सके ? क्या बाबाजी या उनके सहयोगियों ने कभी सर्वे किया है कि उनकी औषधियां कितने सर्वहारा तक पहुँच पाती हैं ? क्या फर्क है इनकी स्वदेशी और दूसरों की विदेशी में जबकी दोनों का उद्देश्य तो एक ही रहा........सिर्फ उपार्जन !!!

अब लोग तरह-तरह के सवाल भी उठाने लगे हैं। किसी भी दूसरी दूकान में आप जाएं, सौदा-सुल्फ लेने के बाद वह दुकानदार कोई झोला-थैली आपको जरूर उपलब्ध करवाता है। जिससे आपको अपना  में आसानी रहे। कहीं-कहीं तो ज्यादा सामान को घर तक पहुंचाने की व्यवस्था भी है। पर #पतंजलि मेगा स्टोर में यदि आप थैला लेंगें तो उसके 25/- अलग से लिए जाते हैं। अब कोई पूछे कि आपकी फ्रेंचाइजी वाले दुकानदार तो आपकी वस्तुओं पर पांच से दस प्रतिशत की छूट दे देते हैं पर आप अपने मेगा-स्टोर पर पांच रुपये भी नहीं छोड़ते, ऊपर से थैले के पैसे और धरवा लेते हो यह कैसा स्वदेशी प्रेम है ? अरे भाई ! यदि कोई आपके यहां से सात-आठ सौ, जो आपके यहां से खरीदारी की मामूली रकम है, का सामान लेता है तो आप उसे एक  20-25 रुपये का थैला भी नहीं दे सकते ?  तो अब क्या धारणा बने लोगों की ?

सोमवार, 13 मार्च 2017

कुछ वाकये सहसा पुरानी कहानिया याद दिला देते है, जैसे हंस और कौवा

सपनों को पूरा करने में कोई बुराई नहीं है। पर उसके लिए अपनी तैयारी, अपनी क्षमता, अपनी औकात का एहसास होना बहुत जरुरी है। सिर्फ किसी को नीचा दिखाने के लिए ईर्ष्या या द्वेष की भावना से उठाया गया कदम कहीं का भी नहीं छोड़ता...... 

बचपन मे सुनी-पढ़ी कहानियां सदा ही सीख से भरी होती थीं। वे कभी भी अप्रसांगिक नहीं हुईँ । कारण भी है उन्हें यूं ही नहीं गढ़ दिया गया था।  उनमें अनुभवों का निचोड़ होता था। ऐसी ही एक कहानी है हंस और कौवे की।

एक बार कुछ हंसों का दल कहीं से उड़ता हुआ आया और अपने गंतव्य पर जाने के पहले एक वृक्ष पर अपनी थकान मिटाने के लिए उतर गया। वहीँ पर एक कौवा भी बैठा उनको आते हुए देख रहा था।  उसने बिना यह जाने कि वे कितनी दूर से आ रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं, उनका मजाक उड़ाते हुए कहा कि तुम लोग एक ही तरह से धीमे-धीमे पंख हिला कर उड़ते हो, फिर भी बड़ी जल्दी थक जाते हो ! मुझे देखो मैं पचीसों तरह की कलाबाजियों के साथ तेज उड़ान भरने के बावजूद तरोताजा रहता हूँ। कभी निढाल नहीं होता।  हंसों के सरदार ने उसे समझाया कि तुम एक सिमित दायरे में रहने वाले पक्षी हो तुम्हें ज्यादा उड़ना नहीं पड़ता और अपनी हैसियत से ज्यादा कोशिश करनी भी नहीं चाहिए। पर हमें दूर-दूर तक उड़ान भरनी होती है, इसीलिए प्रकृति ने हमें उसी के अनुसार क्षमता व् पंख दिए हैं, यदि हम भी करतब दिखाने लगें तो अपने गंतव्य तक कभी भी नहीं पहुँच पाएंगे। पर नासमझ, घमंडी कौवा हंसों को नीचा दिखाने और अपने को श्रेष्ठ साबित करने पर तुला रहा। हंसों ने उसका जवाब ना देते हुए कुछ समय बाद फिर अपनी यात्रा शुरू कर दी। उनको जाते देख कौवा भी उनकी उड़ान का मजाक बनाते हुए और अपने कौशल के प्रदर्शन की नादानी दिखाते हुए उनके पीछे  लग गया। कुछ ही समय बाद वे लोग उड़ते हुए जमीनी हद को छोड़ समुद्र के ऊपर पहुँच गए। कौवा ना कभी लगातार इतना उड़ा था ना ही इतनी दूर आया था, परिणामस्वरूप उस पर इतनी थकान हावी हो गयी कि उसे लगने लगा कि वह कभी भी नीचे पानी में गिर कर अपनी जान गंवा सकता था। मौत को सामने देख उसकी सारी हेकड़ी गायब हो गयी,  उसने हंसों से अपने प्राण बचाने की गुहार लगाईं। उसकी दशा देख हंसों को उस पर दया आ गयी और उन सब ने मिल कर किसी तरह उसको वापस उसके क्षेत्र में पहुंचा दिया।  

सपनों को पूरा करने में कोई बुराई नहीं है। पर उसके लिए अपनी तैयारी, अपनी क्षमता, अपनी औकात का एहसास होना बहुत जरुरी है। सिर्फ किसी को नीचा दिखाने के लिए ईर्ष्या या द्वेष की भावना से उठाया गया कदम कहीं का भी नहीं छोड़ता।   

गुरुवार, 9 मार्च 2017

हांडी में पकते चावल के एक दाने से अंदाज

लोगों का कहना है कि ये राजनीती वाले बहुत सक्षम और चतुर होते हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने हश्र का अंदाज कुछ ही दिनों में लग गया था इसीलिए कोई भी बड़ा नेता प्रचार में नहीं आया एक-दो जगह प्रियंका को भेज उसे भी वापस बुला  लिया गया क्योंकि नतीजों से ख्याति पर असर पड़ता है। राहुल के बारे में आम ख्याल है की उनको बलि का बकरा बना देती है पार्टी

पिछले दिनों दो बार दिल्ली से लगे उत्तर प्रदेश के दो अलग-अलग इलाकों में जाने का मौका मिला था। चुनावों का समय था तो लगे हाथ कुछ लोगों से उसके परिणाम की जानकारी कुतुहल-वश लेने से खुद को रोका नहीं जा सका। इसे किसी भविष्यवाणी के लिए तो करना नहीं था फिर भी इतना ध्यान जरूर रखा था कि लोग अलग-अलग तबके, उम्र और परिवेश से हों। इस सारे क्रिया-कलाप को ऐसे ही छोड़ दिया था पर जब रोज टी.वी. के चैनलों पर लुटे-पिटे दलों द्वारा भी बढ़-चढ़ कर दावे पेश होते देखे तो सोचा अपनी मेहनत को भी ब्लॉग पर उजागर करते बनता है। भले ही कम ही लोगों से बात-चीत हुई पर कहते हैं ना कि हांडी में पकते चावलों के एक ही दाने से आभास मिल जाता है, पर इसके साथ ही यह भी सच है कि ठेठ यू. पी. और इधर गाजियाबाद, शालीमार गार्डन या नोयडा में जमीन-आसमान का फर्क है फिर भी यहां जो जवाब मिले वे बहुत रोचक थे।

अधिकतर का कहना था कि स्पष्ट बहुमत मुश्किल है। बहुतों का यह मानना था कि भाजपा का बर्चस्व बढ़ेगा और आश्चर्य  नहीं होगा यदि उसकी सरकार बन जाए। भाजपा का प्लस-प्वाइंट मोदी जी हैं। करीब पच्चीस साल बाद केंद्र में उनके बहुमत की सरकार आई जिसने कुछ तो आशा जगाई ही है।   उनकी कार्य-शैली, उनकी मेहनत, उनके खुद को खतरे में डाल कर लिए गए निर्णयों से लोग प्रभावित हैं और उन्हें राज्य की बदहाली को दूर करने में सहायक मानते हैं। जनता में इस बात का भी आक्रोश है कि बाकी के दलों के नेता देश-समाज की भलाई या विकास की बात न कर बात-बेबात सिर्फ मोदी के पीछे पड़े हुए हैं। सपा की "नौटँकी" और उसका कांग्रेस को साथ लेना भाजपा के लिए फायदेमंद होगा। लोगों का कहना कि मौका पाते ही कांग्रेस धत्ता बता जाएगी।  ऐसे लोगों ने जिन्हें अपने इलाके से बाहर जाने की जरुरत नहीं पड़ती, जैसे चायवाला, सब्जीवाला, जूते गांठने वाला आदि उनसे जब विकास के रूप में यमुना हाइवे के बारे में पूछा तो बोले, साहब हमें उससे क्या लेना-देना, वह तो गाडी-घोड़े वालों के लिए है, हमें तो यहां की सडकों से साबका पड़ता है जिस पर ध्यान से ना चलें तो मुंह के बल गिरें.  सायकिल चालकों की सुविधा के लिए बने मार्ग को चुनाव प्रपंच बताया गया क्योंकि इसके पूरा होने क्र पहले ही उसमें टूट-फूट शुरू हो गयी है। सपा के विपरीत जा रही बातों में उनकी आपसी कलह, कुर्सी की चाहत में कांग्रेस से हाथ मिलाना और  नेताजी की बेरुखी रही। फिर भी बहुत से लोगों को अखिलेश भाते हैं। उनका युवा होना, बाहुबलियों-कट्टरपंथियों से दूरी बनाने की कोशिश आम लोगों को हौसला देती है। बसपा को लोग मौका-परस्त पार्टी मानते हैं। उसके वादों पर भी लोगों को भरोसा नहीं रह गया है पर उसका अपना वोट बैंक भी है यह भी मान्यता है। इसलिए उसे छुपा रुस्तम मानते हैं लोग। ये खबरें भी चौंका गयीं थीं कि यू. पी. के बाबूओं ने अचानक बसपा की सरकार में बनी मूर्तियों को साफ कर चमकाना शुरू कर दिया था।  सबसे बुरी हालात कांग्रेस की है। लोगों का कहना है कि ये राजनीती वाले बहुत सक्षम और चतुर होते हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने हश्र का अंदाज कुछ ही दिनों में लग गया था इसीलिए कोई भी बड़ा नेता प्रचार में नहीं आया एक-दो जगह प्रियंका को भेज उसे भी वापस बुला  लिया गया क्योंकि नतीजों से ख्याति पर असर पड़ता है। राहुल के बारे में आम ख्याल है की उनको बलि का बकरा बना देती है पार्टी।

तो लब्बो-लुआब यही रहा कि जनता भी कंफ्यूज है पर यदि चावल के एक दाने पर विश्वास करें तो भाजपा की राह प्रशस्त दिख रही है।  

गुरुवार, 2 मार्च 2017

यहां हरे रंग का गुलाब उपलब्ध है

वैज्ञानिकों और यहां के कर्मचारियों की अथक मेहनत और लगन का ही परिणाम है कि आपको यहां पौधों की ऐसी-ऐसी जातियां-प्रजातियां फलते-फ़ूलते मिलेंगी जिनका आपने या तो नाम ही नहीं सुना होगा या फिर नाम ही सुना होगा। कुछ तो ऐसी भी प्रजातियां हैं जिनके पूर्वज लाखों-लाख साल पहले डायनासॉर्स के जमाने में भी अस्तित्व में थे ....

आजकल लगता है कि शरीर धीरे-धीरे शंटिंग करते, माल गाडी के डिब्बे जैसा होता जा रहा है। इंजिन आ कर धकेल दे तो चलते चले जाओ नहीं तो लाख इच्छा होते हुए भी कहीं जाने का समय यूँ ही टल जाता है।  बहुत दिनों से, यह पढने के बाद कि, दिल्ली से लगे यू. पी. के #नोएडा इलाके में बने #बॉटैनिकलगार्डेन में पौधों की अद्भुत किस्में हैं, वहां जाने की इच्छा थी। पर सीधी मेट्रो होने के बावजूद बस ऐसे ही समय निकलता गया ! पर अब जब मौसम ने कोंचा कि भइया देख लो, हफ्ते-दस दिन के बाद मत कहना कि धूप तेज हो गयी है ! तो बिना इंजिन का इंतजार किए, जी को मना, निकल लिया गया।    

मेट्रो स्टेशन 


मेट्रो के बॉटैनिकल गार्डेन स्टेशन से #बी.जी.आई.आर. यानी BOTANICAL GARDEN OF INDIAN REPUBLIC नामक इस वनस्पति उद्यान का मुख्य द्वार बमुश्किल सौ गज की दूरी पर है। जबकि मेट्रो रेल इसके ऊपर से ही आगे जाती है।


महऋषि चरक प्रतिमा 


नोएडा के सेक्टर "38 A" में करीब 160 एकड़ में फैले इस बाग़ पर 2002 में काम शुरू हुआ था। जो कि इस इलाके के मौसम, जलवायु व परिवेश को देखते हुए एक भागीरथ या दुस्साहसिक प्रयत्न ही कहा जाएगा। वैज्ञानिकों और यहां के कर्मचारियों की अथक मेहनत और लगन का ही परिणाम है कि आपको यहां पौधों की ऐसी-ऐसी जातियां-प्रजातियां फलते-फ़ूलते मिलेंगी जिनका आपने या तो नाम ही नहीं सुना होगा या फिर नाम ही सुना होगा। कुछ तो ऐसी भी प्रजातियां हैं जिनके पूर्वज लाखों-लाख साल पहले डायनासॉर्स के जमाने में भी अस्तित्व में थे  जैसे Skeleton fork,  Bare naked, Horse Tail इत्यादि। 

कल्पवृक्ष
सफ़ेद चंदन का पेड़ 


लाखों साल पहले के फर्न का वंशज, हॉर्स टेल 

कदली पादप 
उद्यान को कई भागों में बाँट कर उसी हिसाब से  संरक्षण, रोपण तथा संवर्धन किया गया है।  जिनमें फल, फूल, औषधि और प्राचीन पौधों की देखभाल-सार-संभाल की जाती है। यहीं यदि बेशकीमती चंदन के पेड़ मिलेंगे तो कल्पवृक्ष जैसा अनमोल और दुर्लभ वृक्ष भी दिखाई देगा, यदि 15 से 20 फुट का केले का पादप दिखेगा तो वर्षों-वर्ष पुरानी वंशावली वाला कैक्टस भी नज़र आ जाएगा। सिर्फ यहीं आपको बिलकुल अंजान, दुर्लभ हरे रंग के गुलाब को देखने का सुयोग भी मिल पाएगा। सही पढ़ा "हरे रंग का गुलाब" ! जिसे पौधों की दुनिया में Rosa Chinensis Viridiflora  के नाम से जाना जाता है। कहते हैं इसकी खोज कोई 300-350 वर्ष पहले हुई थी। इस असाधारण पौधे में पंखुडियों की जगह कली के बाहर हरे रंग की पत्तियों की संरचना होती है। सुंगध भी गुलाब जैसी भीनी न होकर कुछ तीखी होती है।  
हरे गुलाब का पौधा 

जैसा कि मुझे बताया गया यहां तकरीबन 250 ऐसे औषधीय पौधों पर अन्वेषण किया 
जा रहा है  जिनका उल्लेख हमारे प्राचीन ग्रन्थों में मिलता हैं और इनसे मनुष्य की करीब आठ श्रेणियों की बिमारियों को ठीक करने में सहायता मिल सकती है। फिलहाल पूरे देश से तरह-तरह के सैकड़ों जातियों-प्रजातियों के पौधे यहां ला उन्हें रोपित कर उनकी देख-भाल की जा रही है और भविष्य में एक वृहदाकार मानव देह का खाका बना, उसके हर अंग में वहां होने वाली बिमारी को ठीक करने वाले पौधे लगाए जाएंगे जिससे लोगों का ज्ञान बढ़ सके।  कुछ ऐसा ही उद्यान से अंदर  आते ही कुछ दूरी पर भारत का 68' x 61.4'  का एक नक्शा बनाया गया है जिसमें हर प्रदेश को विभिन्न रंग के पौधों से अलग-अलग दर्शाया गया है। पर एक कमी रह गयी है कि उसकी स्थिति और बनावट की वजह से उसकी तस्वीर आसानी से नहीं खींची जा सकती।  


  उद्यान के ऑफिस से प्राप्त पौधों द्वारा बनाया गया नक्शा 



उस दिन धूप तो तेज थी ही वहां कोई सेमीनार भी चल रहा था, जिससे किसी जानकार का साथ नहीं मिल पा रहा था, गार्डों की जानकारी भी सिमित थी। बीते ठंड के मौसम के कारण पूरे उद्यान में जैसे सूखा पसरा पड़ा था पर मुख्य भाग को बड़े जतन से सँभाला जा रहा है यह साफ़ दिखलाई पड़ रहा था। कुछ देर बाद वहीँ के एक सज्जन श्री मानवर सिंह ने वहां के प्रमुख "केयर टेकर" श्री राजपाल सिंह से मिलवाया जिन्होंने घूम-घूम कर तरह-तरह के पौधों की जानकारी से अवगत करवाया। उनका तहे-दिल से शुक्रगुजार हूँ।  

देश के अन्य पुराने वनस्पति उद्यानो से तो अभी इसकी तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि यह बाग़ अभी अपने शैशव काल में ही है, जिसे विकसित होने में दसियों वर्षों का सहयोग चाहिए होगा। उस पर विपरीत जलवायू भी इसकी बढ़त में कहीं ना कहीं अड़चन तो डालेगी ही पर यहां कार्यरत समर्पित कर्मचारी-गण हर परिस्थिति का सामना करने को तत्पर  दिखते हैं जिससे साफ़ मालुम पड़ता है कि आने वाले समय में यह उद्यान अपने-आप में एक खासियत होगा।   

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

सिनेमा घरों में राष्ट्रगान

बात सम्मान की है, यदि कोई जबरदस्ती खड़ा हो भी जाता है पर उसका ध्यान कहीं और होता है तो उसका क्या फ़ायदा ! अभी दो दिन पहले फिल्म देखने जाना हुआ था, शुरू होने के पहले जब राष्ट्रगान बजा तो सब खड़े तो हुए पर दसियों लोग अपने मोबाइल में ही उलझे दिखे। मेरी सामने वाली कतार में भी एक युवक अपने मोबाइल पर झुका हुआ था, गान के दौरान तो मैंने उससे कुछ न कहा, उचित भी नहीं था, पर गान ख़त्म होने पर रहा नहीं गया और सिर्फ यही कहा कि सिर्फ 52 सेकेंड की अवधि का ही होता है नेशनल सांग....

अपने यहां तर्क-वितर्क बहुत होते हैं। हर आदमी हर चीज का विशेषज्ञ बना हुआ है। कोई भी बात हो उसमें कमी खोजना फैशन बन गया है। आए दिन एक विवाद ख़त्म होता नहीं दूसरा शुरू हो जाता है। नयी बहस सिनेमा हॉलों में फिल्म शुरू होने के पहले राष्ट्रध्वज दिखलाने के साथ-साथ राष्ट्रगान बजाते समय उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों पर  कर हुई है। जिस दिन न्यायालय ने सिनेमाघरों में फिल्म के पहले राष्ट्रगान बजाने का नियम लागू किया उसी दिन से कुछ लोगों में असमंजस की स्थिति बन गयी। कुछ जगह इस बात को ले लोगों
में विवाद हो गया कि कहानी के अनुसार यदि फिल्म में राष्ट्रध्वज और गान हो तो खड़े होना है कि नहीं ! बात बढ़ते देख न्यायालय ने फिर आदेश पारित किया कि फिल्म के बीच में बजने वाले गान के दौरान खड़ा होना जरुरी नहीं है। पर बात यहां ख़त्म नहीं हुई हमारे कुछ ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों ने, जिनमें सिनेमा घरों के मैनेजर तक हैं, फिल्म के बीच का अर्थ निकाल लिया कि अब राष्ट्र गान मध्यांतर के समय बजेगा ! उन्होंने आपत्ति दर्ज कर दी कि उस समय लोग कुछ खा-पी रहे होते हैं और हॉल के डिलीवरी बॉय भी कुछ न कुछ वितरित करते रहते हैं, इससे फिर अव्यवस्था फ़ैलाने की पूरी गुंजाइश हो सकती है। बिना सोचे-समझे, बिना पूरी जानकारी हासिल किए कुछ भी समझ कर कुछ भी बोल देना हमारी आदत में शुमार हो चुका है। इसमें देश का हर वर्ग शामिल है। 

कुछ वर्षों पहले ऐसे ही फिल्म के खत्म होने पर राष्ट्रगान बजाया जाता था। जिसे लोग अनमने ढंग से सुनते थे। दरवाजों तक आ पहुंचे बाहर निकलने को आतुर दर्शकों को द्वार बंद कर एक तरह से जबरदस्ती गान सुनवाया जाता था। फिर अनचाही परिस्थितियों के कारण उसे बंद कर दिया गया। अब फिर एक आदमी की याचिका पर इसे शुरू किया गया है।

इंसान की फ़ितरत है कि बिना मजबूरी के, वह किसी के कहने या थोपे गए आदेश के चलते, सहज नहीं रहता, जैसे कि अपनी मर्जी से भले ही वह एक जगह घण्टों बैठा रहे पर किसी के कहने पर वह दस मिनट में ही ऊब जाता है। वैसा ही हाल राष्ट्रगान के बजाने का है।  पर क्या किसी में जबरदस्ती राष्ट्र-प्रेम की भावना भरी जा सकती है। यह नहीं कहा सकता कि गान के दौरान खड़ा ना होने वाला वाला इंसान देश विरोधी है पर उसके ऐसा करने पर माहौल तो असहज हो ही जाता है।  

बात सम्मान की है, यदि कोई जबरदस्ती खड़ा हो भी जाता है पर उसका ध्यान कहीं और होता है तो उसका क्या फ़ायदा ! अभी दो दिन पहले फिल्म देखने जाना हुआ था, शुरू होने के पहले जब राष्ट्रगान बजा तो सब खड़े तो हुए पर दसियों लोग अपने मोबाइल में ही उलझे दिखे। मेरी सामने वाली कतार में भी एक युवक अपने मोबाइल पर झुका हुआ था, गान के दौरान तो मैंने उससे कुछ न कहा, उचित भी नहीं था, पर गान ख़त्म होने पर रहा नहीं गया और सिर्फ यही कहा कि सिर्फ 52 सेकेंड की अवधि का होता है नेशनल सांग, उसने तो बात  समझ कर सॉरी कहा, पर सवाल वही रहा कि क्या जबरदस्ती खड़ा करवा कर किसी से सम्मान करवाया जा सकता है ? वह तो दिल से होना चाहिए !  इन सब को मद्दे नज़र रख क्या राष्ट्रगान को सिनेमा हॉल में दिखाए जाने वाले नियम पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए ?

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

इतने अपशब्द तो महाभारत में भी नहीं बोले गए होंगे

हमारे देश में अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं। सब का अलग-अलग लहजा और उच्चारण हैं। इसी कारण लाखों लोग अभी भी शुद्ध हिंदी नहीं बोल पाते हैं। उनका तो हम बुरा नहीं मानते। कहना तो नहीं चाहिए पर हमारे कुछ राष्ट्रपति भी कहां साफ़ हिंदी बोल पाते थे। अभी भी कई  कलाकार हैं जिन्होंने जिंदगी फिल्मों में गुजारने के बावजूद भाषा पर काबू नहीं पाया है। पर उनकी फिल्मों का ना कोई बायकॉट हुआ नाहीं उनका विरोध किया गया....

लगता नहीं, कि हमें बोलने की कुछ ज्यादा ही आजादी मिल गयी है। ख़ासकर इस चुनावी माहौल में तो हर हद पार कर दी गयी है। हर मर्यादा तोड़ दी गयी है। नाहीं किसी की उम्र का लिहाज बचा है नाहीं किसी पद की गरिमा। महिलाओं तक की बेइज्जती करने से ये तथाकथित नेता बाज नहीं आए !!!

आजादी के बाद काफी लंबे  समय तक नेताओं ने अपनी गरिमा बनाए रखी, एक दूसरे का मान-सम्मान  करते रहे। एक दूसरे अच्छाइयों की कदर की जाती रही। पर धीरे-धीरे धर्म-जाति-परिवारवाद का समीकरण रंग लाने लगा। राज्यों में येन-केन-प्रकारेण सत्ता का वरण करने के लिए, उल्टे-सीधे, मर्यादाहीन, उसूल विहीन, क्षणभंगुर गठबंधनों का चलन शुरू हो गया। जाहिर है यह मौका बन गया, स्तरहीन, अशिक्षित, असमाजिक तत्वों  का अपने बाहुबल, जातिबल, परिवारबल, संपर्कबल, धनबल के सहारे संकरी गलियों से होते हुए राजनीती में प्रवेश करने का। राज्यों की राजनीती केंद्र में भी पहुंचनी ही थी जिसके साथ ही अनियंत्रित भाषा और आचरण ने भी वहां स्थान बना, आरक्षण प्राप्त कर लिया।

नैतिकता को परछत्ती पर फेंक, किसी की अच्छाई की ओर ना ताकने की कसम खा, शुरू हो गया खोज-खोज कर एक-दूसरे की जानी-अनजानी, कमियों-विफलताओं-दोषों को बढ़ा-चढ़ा, घुमा-फिरा कर उजागर कर जनता के सामने उसकी छवि धूमिल करने का दौर !  किसी को विदेशी बता उसका अपमान किया जाने लगा, किसी की भाषा का मजाक बनाया जाने लगा, किसी के हाव-भाव की खिल्ली उड़ाई जाने लगी, किसी की पारिवारिक स्थिति की सरेआम तौहीन की जाने लगी तो किसी के भूतपूर्व पेशे को ही बहस का मुद्दा बना दिया गया। अब जिस पर हमला हुआ उसके चाटुकारों, चापलूसों ने भी उसका उसी रूप में जवाब दे-दे कर वातावरण में कडुवाहट घोलने से परहेज नहीं किया। सहनशीलता, सहिष्णुता, क्षमाशीलता सब तिरोहित हो गयीं।

हिंदीं को कमोबेश राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल ही गया है। पर हमारे देश में अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं। सब का अलग-अलग लहजा और उच्चारण हैं। इसी कारण लाखों लोग अभी भी शुद्ध हिंदी नहीं बोल पाते हैं। उनका तो हम बुरा नहीं मानते। कहना तो नहीं चाहिए पर हमारे कुछ राष्ट्रपति भी कहां साफ़ हिंदी बोल पाते थे। अभी भी कई  कलाकार हैं जिन्होंने जिंदगी फिल्मों में गुजारने के बावजूद भाषा पर काबू नहीं पाया है। पर उनकी फिल्मों का ना कोई बायकॉट हुआ नाहीं उनका विरोध किया गया। ऐसे ही किसी की सभा में हुई अफरा-तफरी को मजाक का विषय बनाने में किसी को झिझक नहीं हुई। खुद ऐसे लोग जो जिम्मेदारी के बावजूद किसी ना किसी बहाने अपना राज्य छोड़ दूर-दराज के प्रदेश में छुट्टियां मनाने में नहीं शर्माते, वही विरोधी दल के किसी सदस्य, जिस पर कोई बोझ भी नहीं है, की विदेश यात्रा को गुनाह का रूप देते नहीं हिचकते !

इसी संदर्भ में कम से कम उन तीन बातों का जिक्र जरुरी है जिनका प्रयोग लाक्षणिक रूप से हुआ था। पहली कुछ रकम का लोगों की जेब में आने का जिक्र था जिसका मंतव्य था कि यदि बाहर से सारा धन आ जाए तो इतनी-इतनी रकम हर आदमी के हिस्से आ सकती है इस बात का बतंगड़ बना यह प्रचार होने लगा कि उतनी रकम देने का वादा किया गया था। इसी को नाकामियों का मुद्दा बना दिया गया !  दूसरी बात अपने देश की हर एक प्राणी के प्रति लगाव रखने की थी; कि यदि कुत्ते का बच्चा भी गाडी से कुचल जाए तो हमें तकलीफ होती है इस बात का भी गलत अर्थ लगा लोगों की भावनाओं को भड़काने की कोशिश की जाने लगी। तीसरी स्नानागार से ताल्लुक रखने वाली बात का भी बतंगड़ बना जनता को भरमाने की कुत्सित चेष्टा शुरू कर दी गयी। जबकि असलियत बच्चे-बच्चे को पता है !!

वैसे ही कुछ लोग सिर्फ विरोध करने के लिए ही विरोध करते हुए एक ही जगह लक्ष्य साध अपनी दूकान चलाने में प्रयासरत हैं। कुछ लोग जान-बूझ कर कुछ ख़ास मौकों पर, जैसे अभी चुनाव के माहौल में तनाव पैदा करने वाले विवादास्पद बयान दे सुर्ख़ियों में बने रहना चाहते हैं। इन सब को देखना-समझना चाहिए कि कुछ लोग कुछ देर के लिए ही सब को बेवकूफ बना सकते हैं, सदा के लिए नहीं। अधिकतम लोग समझदार हैं जो इनकी बातों को सुनते तो हैं पर अपना काम सोच-समझ कर करते हैं पर अधिकांश अभी भी अशिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण जाति-धर्म के साथ-साथ मुफ्त की चीजों के चक्कर में पड़ अपने हाथ कटवा बैठते हैं। इन्हीं की बदौलत अवसरवादी अपना खेल, खेल जाते हैं। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि अधिकाँश जनता की बदहाली ऐसे ही कारण है क्योंकि ये लोग जानते हैं कि जिस दिन अवाम शिक्षित हो गया वही दिन इनकी आकांक्षाओं का अंतिम दिन होगा।

वैसे भी इतिहास गवाह है कि जब-जब एक ही आदमी को लक्ष्य कर उसको बदनाम करने की कोशिश की गयी है, तब-तब उसी खास इंसान को जनता की सहानुभूति मिली है। दलों का राजनितिक मतभेद हो सकता है, होना भी चाहिए पर व्यक्तिगत आक्षेप करना कतई स्वागत योग्य नहीं है।  

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

वेलेंटाइन दिवस पर वह कहानी, जो प्रेम की पराकाष्ठा है

पहली बार बचपन में जब "उसने कहा था" कहानी को पढने और फिल्म देखने का मौका मिला तो ना कुछ महसूस हुआ नाहीं उसकी गहराई समझ में आई थी, सब सर के ऊपर से गुजर गया था। पढाई के दौरान इस कहानी के कोर्स में होने के कारण फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये........ 

आज वेलेंटाइन दिवस है। पश्चिम से आयातित इस त्यौहार को बाज़ार ने प्रेम दिवस के रूप में भी खूब प्रचारित किया है । जिसने भारतीय युवाओं को भी खूब लुभाया है। सब इसे अपने-अपने अर्थ लगा, अपनी-अपनी समझ के अनुसार, अपने-अपने तरीके से मनाने की होड़ या कोशिश करते हैं। पर कितनों में अपने प्रिय के प्रति सच्चे प्रेम या त्याग की भावना रहती है ?   

वर्षों पहले श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरीजी की अमर कहानी "उसने कहा था" उसी प्रेम की पवित्रता और गहराई के कारण खुद और अपने लेखक को अमर कर गयी है। पहली बार बचपन में जब "उसने कहा था" कहानी को पढा और फिर फिल्म भी देखी तो ना कुछ महसूस हुआ था नाहीं उसकी गहराई समझ में आई थी, सब सर के ऊपर से गुजर गया था। पढाई के दौरान इस कहानी के कोर्स में होने के कारण फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये। लगता नहीं कि आज के अधिकांश युवा इससे परीचित होंगे। पहले तो कोर्स वगैरह में भी यह होती थी। पर धीरे-धीरे सब कुछ बदल ही तो रहा है। इस अमर कहानी का सार देने की कोशिश करता हूं। जो बताती है कि "वेलेंटाइन" कैसा होना चाहिए ।   

अमृतसर में अपने मामा के घर आए दस-ग्यारह साल के लहनासिंह का बाज़ार में अक्सर एक सात-आठ साल की लडकी से सामना हो जाता है। ऐसे ही छेड़-छाड़ के चलते लहना उससे पूछता रहता है "तेरी कुड़माई (सगाई)हो गयी" और लड़की "धत्" कह कर भाग जाती है। पर एक दिन वह बालसुलभ खुशी से जवाब देती है "हां, हो गयी। देखता नहीं मेरा यह रेशमी सालू"।

वह तो चली जाती है, पर लहना पर निराशा छा जाती है। दुख और क्रोध एक साथ हावी हो, बहुतों से लड़वा, भिड़वा, गाली खिलवा कर ही उसे घर पहुंचवाते हैं। पच्चीस साल बीत जाते हैं। फौज में लहना सिंह जमादार हो जाता है। उसका अपनी बटालियन के सूबेदार हज़ारा सिंह के साथ अच्छा दोस्ताना है। एक ही तरफ के रहनेवाले हैं। हज़ारा सिंह का बेटा बोधा सिंह भी इनके साथ उसी मोर्चे पर तैनात है। कुछ दिनों पहले छुट्टियों में ये घर गये थे। तभी पहला विश्वयुद्ध शुरु हो जाता है। सबकी छुट्टियां रद्द हो जाती हैं। हज़ारा सिंह खबर भेजता है, लहना सिंह को
कि मेरे घर आ जाना, साथ ही चलेंगे। लहना वहां पहुंचता है तो सूबेदार कहता है कि सूबेदारनी से मिल ले, वह तुझे जानती है। लहना पहले कभी यहां आया नहीं था, चकित रह जाता है कि वह मुझे कैसे जानती होगी। दरवाजे पर जा मत्था टेकता है। आशीष मिलती है। फिर सूबेदारनी पूछती है "पहचाना नहीं?  मैं तो देखते ही पहचान गयी थी....तेरी कुड़माई हो गयी.......धत्.....अमृतसर"

सब याद आ जाता है लहना को। सूबेदारनी रोने लगती है। बताती है कि चार बच्चों में अकेला बोधा बचा है। अब दोनों लाम पर जा रहे हैं। जैसे तुमने एक बार मुझे तांगे के नीचे आने से बचाया था, वैसे ही इन दोनों की रक्षा करना। तुमसे विनती है।

मोर्चे पर बर्फबारी के बीच बोधा सिंह बिमार पड़ जाता है। खंदक में भी पानी भरने लगता है। लहना किसी तरह बोधे को सूखे में सुलाने की कोशिश करता रहता है। अपने गर्म कपड़े भी बहाने से उसे पहना खुद किसी तरह गुजारा करता है। इसी बीच जर्मन धोखे से हज़ारा सिंह को दूसरी जगह भेज खंदक पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं पर लहना सिंह की चतुराई से हज़ारा सिंह की जान और खंदक दोनों बच जाते हैं। पर वह खुद बुरी तरह घायल होने पर भी चिकित्सा के लिये बाप-बेटे को पहले भेज देता है, हज़ारा सिंह से यह कहते हुए कि घर चिठ्ठी लिखो तो सूबेदारनी से कह देना उसने जो कहा था मैने पूरा कर दिया है। उनके जाने के बाद वह अपने प्राण त्याग देता है।

यह तो कहानी का सार है। पर बिना इसे खुद पढे इसकी मार्मिकता नहीं समझी जा सकती।  गुलेरीजी के शब्दों मे ही, अमृतसर के तांगेवालों की चाकू से भी तेज धार की जबान, दोनों बच्चों की चुहल, खंदक की असलियत, लड़ाई की विभीषिका, सूबेदारनी की याचिका, लहना की तुरंत-बुद्धि और फिर धीरे-धीरे करीब आती मौत के साये में स्मृति के उभरते चित्र, वह सब बिना पढे महसूस करना मुश्किल है।

यदि कभी भी मौका मिले तो इसी नाम पर बनी पुरानी फिल्म "उसने कहा था" देखने से ना चूकें।  जिसमें स्व. सुनील दत्त और नंदा जी ने काम किया था।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

तकनीक को सेवक बना कर ही रखें

इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिक फोन के अनगिनत लाभ, ढेरों अच्छाइयां, विशेषताएं तथा उपयोग हैं पर साथ ही कुछ बुराइयां भी हैं। सही मायने में यह फोन की भी बुराइयां नहीं हैं हमारी ही गलतियां हैं, जो हम बिना सोचे-समझे उसका अनियंत्रित तरीके से प्रयोग करते रहते हैं। अति तो किसी भी चीज की बुरी होती है फिर चाहे वह अमृत ही क्यों न हो !

आजके युग में जितनी क्रांति, जितनी खोज, संचार-माध्यम में हुई है उतना शायद और किसी भी क्षेत्र में नहीं हो पाया है। यहां तो अभी भी तूफान चल  रहा है। नयी-नयी ईजादें, नयी-नयी तकनीकें, नए-नए उपकरण दुनिया भर के बाज़ारों में तहलका मचा  रहे हैं। उपकरणों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय आज स्मार्ट फोन है जिसका उपयोग
बाल, वृद्ध, नौजवान सभी धड्डले से कर रहे हैं पर जिसका सबसे बड़ा ग्राहक आजका युवा वर्ग है। जो बुरी तरह इसको अपनी लत बना चुका है, दिन-दोपहर-शाम-रात जब देखो, जहां देखो फोन से चिपका नज़र आता है, जाने-अनजाने, बिना इसकी फ़िक्र किए कि यह आदत सेहत और शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक है। अब तो डॉक्टरों ने भी यह प्रमाणित कर दिया है कि जहां मोबायल फोन का अनियंत्रित उपयोग कान, गर्दन, हाथो, उँगलियों, कलाइयों और उनके जोड़ों में तरह-तरह की समस्याएं उत्पन्न कर गठिया रोग तक का कारण बन जाता है, वहीँ यह आँखों की रौशनी के लिए भी अत्यंत खतरनाक सिद्ध हो चुका है।  

आजकल देखा गया है कि घरों में बाकी सदस्यों के सो जाने के बाद बच्चे और युवा अंधेरे में भी अपने स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते रहते हैं जिससे शरीर के सबसे नाजुक अंग आँख पर बहुत जोर पड़ता है। लगातार ऐसा होने से वह अपनी देखने की क्षमता खो बैठती है। अभी "जर्नल ऑफ मेडिसिन" पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दो महिलाओं में ट्रांजिएट स्मार्टफोन ब्लाइंडनेस पाया गया। इस बिमारी में किसी के अंधेरे में लगातार स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने पर एक आंख की रौशनी कुछ मिनटों के लिए चली जाती है। यदि आदत ना बदली जाए तो आँख स्थाई तौर पर देखने की शक्ति गंवा देती है।

हमारी आँख का रेटिना बहुत ही संवेदनशील तथा नाजुक अवयव होता है। उजाले से अँधेरे में जाने या फिर अँधेरे से तुरंत प्रकाश में आने पर इसे स्थिति से सामंजस्य बैठाने में कुछ समय लगता है। इसीलिए जब हम
रौशनी से अँधेरे में जाते हैं तो पहले कुछ भी दिखाई नहीं देता पर धीरे-धीरे वातावरण से आँखें अभ्यस्त हो जाती हैं वैसे ही अँधेरे से उजाले में जाने पर आँखें चौधिया जाती हैं जिसके अनुकूलन में समय लगता है। बहुत से लोगों की आदत है कि सुबह उठाते ही वे फोन की ओर लपकते हैं जबकि आँखें अभी प्रकाश की अभ्यस्त नहीं हुई होतीं इससे रेटिना पर जबरदस्त जोर पड़ता है जो आँखों के लिए नुक्सान-दायक होता है। दूसरी ओर पाया गया है कि अधिकतर लोग सोते समय रात के अँधेरे में फोन पर एक ही आँख से नज़र गड़ा उसका प्रयोग करते हैं जिससे एक आँख फोन की तीव्र सफ़ेद रौशनी में तथा दूसरी अँधेरे में होने की वजह से आपस में तारतम्य नहीं बैठा पातीं और क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। 

इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिक फोन के अनगिनत लाभ, ढेरों अच्छाइयां, विशेषताएं तथा उपयोग हैं पर साथ ही कुछ बुराइयां भी हैं। सही मायने में यह फोन की भी बुराइयां नहीं हैं हमारी ही गलतियां हैं, जो हम बिना सोचे-समझे उसका अनियंत्रित तरीके से प्रयोग करते रहते हैं। अति तो किसी भी चीज की बुरी होती है फिर चाहे वह अमृत ही क्यों न हो ! इसीलिए जहां तक हो सके इसका संभल कर उपयोग करना चाहिए वहीँ दूसरों को खासकर बच्चों को इसके गुण-दोषों से अवगत कराते रहना चाहिए। वैसे तो इसका जहां तक हो सके काम उपयोग करना चाहिए जो की संभव नजर नहीं आता फिर भी सोने के पहले इस पर अपने काम बीसेक मिनट पहले निपटा लें, सोते समय इसे अपने शरीर से करीब चार फिट दूर रखें, रात को बहुत जरुरी हो तो इसका स्क्रीन "डार्क" कर इसका उपयोग करें और सुबह उठाने के बाद करीब पन्द्रह मिनट बाद ही इसे प्रयोग में लाएं। सदा ध्यान रखें शरीर ही है जिससे दुनिया का उपभोग है यही साथ नहीं देगा तो दुनिया किस काम की !

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

पहले प्रावधान हो फिर विधान हो

सत्तर के दशक में कलकत्ता शहर के लिए एक कानून पारित किया गया था, जिसके तहत यदि कोई मूत्रालय के अलावा कहीं और मूत्र-विसर्जन करते पकड़ा जाता था तो उसे जुर्माना भरना पड़ता था ! शहर को साफ़-सुथरा रखने के लिए उठाया गया था यह कदम, सोच अच्छी थी, पर नियम लागू करते समय किसी ने शहर की आबादी के अनुपात में, ना के बराबर मूत्रालयों की संख्या पर नाहीं सोचा था, नाहीं ध्यान दिया था ! परिणाम, संघर्ष, अराजकता, असंतोष, टकराव !

कई बार लगता है कि जोश में, भावनाओं के अतिरेक में, कुछ कर गुजरने की चाह में, बिना मौजूदा स्थिति का आकलन किए ऐसे नियम पारित कर दिए जाते हैं जिनका तत्काल लागू होना लगभग नामुमकिन होता है। फिर बिना सोचे-समझे "टारगेट" पूरा करने के चक्कर में आम आदमी की पीसाईं शुरू हो जाती है ! इसी संदर्भ में याद आता है, सत्तर के दशक के कलकत्ता शहर के लिए पारित किया गया एक कानून, जिसके तहत यदि कोई मूत्रालय के अलावा कहीं और मूत्र-विसर्जन  करते पकड़ा गया तो उसे जुर्माना भरना पड़ता था ! शहर को साफ़-सुथरा रखने के लिए उठाया गया था यह कदम। सोच अच्छी थी, पर नियम लागू करते समय किसी ने शहर की करीब एक करोड़ की आबादी के अनुपात में नहीं के बराबर मूत्रालयों की संख्या पर नाहीं सोचा था, नाहीं ध्यान दिया था ! यदि उचित व्यवस्था के बाद किसी को दोषी पाया जाता तो बात समझ में आती थी पर यहां तो सिर्फ मनाही लागू कर दी गयी थी ! अंजाम; संघर्ष, अराजकता, असंतोष, टकराव !

आज तकरीबन चालीस वर्षों के ऊपर गुजरने के बावजूद सरकारी ढर्रा वैसा ही है। स्वच्छता अभियान का जोरों शोरों से प्रचार हो रहा है, अच्छा है, साफ़-सफाई के बिना जीवन दूभर हो जाता है; पर क्या सिर्फ बोलने, भाषणों-नारों से ही स्वच्छता तारी हो जाएगी ? एक-दो दिन दस-बीस लोगों के झाड़ू के साथ कैमरे के सामने घूमने से ही जागरूकता आ जाएगी ? क्या हर घर में शौचालय कहने से ही बन जाएगा ?  जिनके घर ही नहीं हैं उनका क्या होगा ? किसी के पास क्या सही आंकड़ा है कि भारत में कितने लोग छत-विहीन हैं और वे जीवन भर गर्मी-बरसात-सर्दी हर मौसम में कहां और कैसे सोते हैं ? उन लोगों के लिए प्रकृति की पुकार का शमन करने के लिए कहां जाने का प्रावधान है ?  सुलभ शौचालय बने जरूर हैं पर एक तो उनकी संख्या पर्याप्त नहीं है दूसरे उसमें जाने का "जुर्माना" वे लोग कैसे देंगे जिनकी रोज की आमदनी ही इतनी नगण्य है कि वह यही सोचता रह जाए कि वह खाने पर खर्च करे या "जाने" पर ! अपनी जिंदगी को देखे कि देश की स्वच्छता को ? और ऐसों की गिनती लाखों में है !  तो बिना इनकी मजबूरी दूर किए कैसे स्वच्छता के सपने को पूरा करने का सोचा भी जा सकता है ?

इसी कड़ी में, आज जो कार्य-व्यवसाय को नगद-विहीन करने की कवायद जोरों-शोरों से लागू करने का अभियान चलाया जा रहा है। उसके लिए बहुत ही मजबूत इंटरनेट व्यवस्था की जरुरत है। पर खेद  की बात है कि वह चाहे B.S.N.L. हो या  #M.T.N.L. दोनों ही अपनी कसौटी पर बूरी तरह नाकाम रहे हैं। चाहे वह नेट की "स्पीड" हो या उसकी उपलब्धता। लोगों की अनगिनत शिकायतों के बावजूद कोई भी सुधार होता नजर नहीं आता। जब वे अभी तक का बोझ नहीं उठा पा रहे तो कैसे कोई यकीन कर ले कि आने वाले दिनों में होने वाली व्यवस्था में ये कंपनियां सुचारू रूप से काम कर पाएंगी। लोगों के दिलों में तो अब यह बात घर करने लग गयी है कि यह अक्षमता दूसरी प्रायवेट कंपनियों के लाभ के लिए आयोजित की जाती है। नहीं तो क्या बात है कि हर तरह की सुविधा और सक्षमता के बावजूद इनका नेटवर्क सबसे गया-बीता है। कड़वा सच तो यही है कि कुछेक कर्मचारियों की लापरवाही या अपने तुच्छ लाभ के लिए उनके द्वारा की गयी अनुचित कार्यवाही के चलते बदनामी तत्कालीन सरकार को ही मिलती है ! क्या इस ओर माननीय #संचारमंत्रीजी ध्यान देंगे !

यह बात सही है कि जनहित में लिए गए निर्णयों को जल्द से जल्द लागू हो जाना चाहिए पर हमारे देश की अंग्रेजों के समय से चली आ रही लाल-फीताशाही में अभी भी बदलाव नहीं आया है। जिसके चलते योजनाओं को लागू होने में वर्षों लग जाते हैं। पर साथ ही यह भी ध्यान रखना लाजिमी होता है कि जो योजना बनाई जा रही है उसके लिए उचित व्यवस्था व संसाधन उपलब्ध हैं भी कि नहीं !! 

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

बसंत भी उद्विग्न है !

बसंत के चेहरे पर स्मित हास्य था, बोला मैं तो हर साल आता हूँ। आदिकाल से ही जब-जब शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट होती है, मैं पहुँचता रहा हूँ। सशरीर ना सही पर अपने आने का सदा प्रमाण देता रहा हूँ । आपने भी जरूर महसूस किया ही होगा कि मेरे आगमन से सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक अंगडाई ले, आलस्य त्याग जागने लगती है। जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता है..... 

अभी पौ फटी नहीं थी कि दरवाजे पर कुछ आहट सी सुनाई पड़ी। रात में देर से सोने के कारण अभी भी अर्द्ध-सुप्तावस्था की हालत हो रही थी, इसीलिए सच और भ्रम का पता ही नहीं चल पा रहा था। पर कुछ देर बाद फिर लगा बाहर कोई है। इस बार उठ कर द्वार खोला तो एक गौर-वर्ण अजनबी व्यक्ति को खड़े पाया। आजकल के परिवेश से पहनावा कुछ अलग था। धानी धोती पर पीत अंगवस्त्र, कंधे तक झूलते गहरे काले बाल, कानों में कुण्डल, गले में तुलसी की माला, सौम्य-तेजस्वी चेहरा, होठों पर आकर्षित कर लेने वाली मुस्कान। इसके साथ ही जो एक चीज महसूस हुई वह थी एक बेहद हल्की सुवास, हो सकता है वह मेरे प्रांगण में लगे फूलों से ही आ रही हो !      
मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ?  वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत !
बसंत ! कौन बसंत ? मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा था !
मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ !
अरे भाई, वही बसंत देव, जिसके आगमन की ख़ुशी में आप सब पंचमी मनाते हैं !
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था ! क्या कह रहा है सामने बैठा इंसान !! यह कैसे हो सकता है ?
घबराहट साफ़ मेरे चेहरे पर झलक आई होगी, जिसे देख वह बोला, घबड़ाइये नहीं, मैं जो कह रहा हूँ वह पूर्णतया सत्य है।

मेरे मुंह में तो जैसे जबान ही नहीं थी। लौकिक-परालौकिक, अला-बला जैसी चीजों पर मेरा विश्वास नहीं था। पर जो सामने था उसे नकार भी नहीं पा रहा था। सच तो यह था कि मेरी रीढ़ में एक सर्द लहर सी उठने लगी थी। आश्चर्य यह भी था कि ज़रा सी आहट पर उठ बैठने वाली श्रीमती जी को भी कोई आभास नहीं हुआ था, मेरे उठ कर बाहर आने का। परिस्थिति से उबरने के लिए मैंने आगंतुक को कहा, ठंड है, मैं आपके लिए चाय का इंतजाम करता हूँ, सोचा था इसी बहाने श्रीमती जी को उठाऊंगा, एक से भले दो। पर अगले ने साफ़ मना कर दिया कि मैं कोई भी पेय पदार्थ नहीं लूँगा, आप बैठिए। मेरे पास कोई चारा नहीं था। फिर भी कुछ सामान्य सा दिखने की कोशिश करते हुए मैंने पूछा, कैसे आना हुआ ?

बसंत के चेहरे पर स्मित हास्य था, बोला मैं तो हर साल आता हूँ। आदिकाल से ही जब-जब शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट होती है, मैं पहुँचता रहा हूँ। सशरीर ना सही पर अपने आने का सदा प्रमाण देता रहा हूँ । आपने भी जरूर महसूस किया ही होगा कि मेरे आगमन से सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक अंगडाई ले, आलस्य त्याग जागने लगती है। जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता है। सर्वत्र माधुर्य और सौंदर्य का बोलबाला हो जाता है। वृक्ष नये पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते हैं। सारी प्रकृति ही मस्ती में डूब जाती है। जीव-जंतु, जड़-चेतन सब में एक नयी चेतना आ जाती है। हर कोई एक नये जोश से अपने काम में जुटा नज़र आता है। मौसम की अनुकूलता से मानव जीवन में भी निरोगता छा जाती है, मन प्रफुल्लित हो जाता है, जिससे चारों ओर प्रेम-प्यार, हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता है। इस मधुमास या मधुऋतु का, जिसे आपलोग फागुन का महीना कहते हो, कवि आकंठ श्रृंगार रस में डूब कर अपनी रचनाओं में चिरकाल से वर्णन करते आए हैं। इतना कह वह चुप हो गया। जैसे कुछ कहना चाह कर भी कह ना पा रहा हो। 
मैं भी चुपचाप उसका मुंह देख रहा था। उसके मेरे पास आने की वजह अभी भी अज्ञात थी।

वह मेरी ओर देखने लगा। अचानक उसकी आँखों में एक वेदना सी झलकने लगी थी। एक निराशा सी तारी होने लगी थी। उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब सब धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। ऋतुएँ अपनी विशेषताएं खोती जा रही हैं, उनका तारतम्य बिगड़ता जा रहा है। इसी से मनुष्य तो मनुष्य, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं को भी गफलत होने लगी है। सबकी जैविक घड़ियों में अनचाहे, अनजाने बदलावों के कारण लोगों को लगने लगा है कि अब बसंत का आगमन शहरों में नहीं होता। गलती उन की भी नहीं है। बढ़ते प्रदूषण, बिगड़ते पर्यावरण, मनुष्य की प्रकृति से लगातार बढती दूरी की वजह से मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता। जब कि मैं तो अबाध रूप से सारे जग में संचरण करता हूँ। यह दूसरी बात है कि मेरी आहट प्रकृति-विहीन माहौल और संगदिलों को सुनाई नहीं पडती। दुनिया में यही देश मुझे सबसे प्यारा इसलिए है क्योंकि इसके हर तीज-त्यौहार को आध्यात्मिकता के साथ प्रेम और भाई-चारे की भावना से जोड़ कर मनाने की परंपरा रही है। पर आज उस सात्विक उन्मुक्त वातावरण और व्यवहार का स्थान व्यभिचार, यौनाचर और कुठाएं लेती जा रही हैं। भाईचारे, प्रेम की जगह नफरत और बैर ने ले ली है। मदनोत्सव तो काम-कुंठाओं से मुक्ति पाने का प्राचीन उत्सव रहा है इसे मर्यादित रह कर शालीनता के साथ बिना किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए, बिना किसी को कष्ट या दुख दिए मनाने में ही इसकी सार्थकता रही है। पर आज सब कुछ उल्टा-पुल्टा, गड्ड-मड्ड होता दिखाई पड़ रहा है। प्रेम की जगह अश्लीलता, कुत्सित चेष्टाओं ने ले ली है। लोग मौका खोजने लगे हैं इन तीज-त्योहारों की आड़ लेकर अपनी दमित इच्छाओं, अपने पूर्वाग्रहों को स्थापित करने की। 

आज मेरा आपके पास आने का यही मकसद था कि वक्त आ गया है गहन चिंतन का, लोगों को  अपने त्योहारों, उनकी विशेषताओं,  उनकी उपयोगिताओं,  को बताने का, समझाने का।    जिससे इन उत्सवों की गरिमा वापस लौट सके। ये फकत एक   औपचारिकता ना रह  जाएं बल्कि   मानव जीवन को सुधारने  का उद्देश्य   भी पूरा कर सकें।
कमरे में पूरी तरह निस्तबधता छा गयी। विषय की गंभीरता के कारण  मेरी आँखें पता नहीं कब  स्वतः  ही बंद हो गयीं। पता नहीं इसमें कितना वक्त लग गया !  तभी श्रीमती जी की आवाज सुनाई दी कि रात सोने के पहले तो अपना सामान संभाल लिया करो।   कंप्यूटर अभी भी चल रहा है। कागज बिखरे पड़े हैं। फिर कुछ इधर-उधर होता है तो मेरे पर चिल्लाते हो।    हड़बड़ा कर उठा तो देखा आठ बज रहे थे,   सूर्य निकलने के बावजूद धुंध, धुएं, कोहरे के कारण पूरी तरह रौशनी नहीं हो पा रही थी।

मैंने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, कमरे में मेरे सिवा और कोई नहीं था।   ऐसे बहुत वाकये और कहानियां पढ़ी हुई थीं जिनमें किसी अस्वभाविक अंत  को सपने से जोड़ दिया जाता है, पर जो भी घटित हुआ वह सब मुझे अच्छी तरह याद था। मन यह मानने को कतई   राजी नहीं था    कि मैंने जो देखा,    महसूस किया,   बातें कीं, वह सब रात के आर्टिकल की       तैयारी और थके   दिमाग के  परिणाम का नतीजा था।     कमरे में फैली वह  सुबह वाली हल्की सी सुवास मुझे अभी भी किसी की उपस्थिति महसूस जो करवा रही थी !!