शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

अपने मुंह में खबरिया चैनलों के शब्दों को जगह ना दें

आज  "मरीज" खुद  भी चाहता है कि वह ठीक हो, उसके हालात सुधरें, जिसके लिए वह किसी भी तरह का कष्ट किसी भी हद तक सहने को राजी है पर उसे भड़काया जा रहा है, अरे ! तुम्हारा आपरेशन होगा, तुम्हें कष्ट होगा, तुम्हें परेशानी होगी। आज कल नहाने का मौसम है तुम नहाओगे कैसे, तुम्हें सोचने -समझने का  समय ही नहीं दिया गया इत्यादि, इत्यादि। बजाए मरीज का हौसला बढ़ाने और उसकी मदद करने के उसे भरमाया जा रहा है, जिससे लोगों में और घबड़ाहट फ़ैल रही है ! पर कुछ लोग शायद चाहते भी यही हैं .....      

धन तो सदा ही आदमी को नचाता रहा है, हो तब भी और ना हो तब भी। अब जब उसके रूप-रंग में कुछ बदलाव आ रहा है तब भी इंसान चकरघिन्नी बना हुआ है। पर इस तिगनी के नाच में कुछ मजबूरीवश, कुछ घबड़ाहट के तहत, कुछ अफवाहों के चलते तो कुछ "प्रयोजित लोग" भी शामिल हैं, जो अलग-अलग गुटों में बंटे खबरिया चैनलों  की बीन की धुन पर, बिना अपने जमीर की सुने नाचे जा रहे हैं, नाचे जा रहे हैं। 

अभी एक मित्र की बच्ची की शादी के सिलसिले में जयपुर जाना हुआ था। बारात अगवानी के पहले जब हम कुछ लोग विवाह स्थल का जायजा लेने पहुंचे तो वहां माइक थामे एक मैडम, जो हिंदी चैनल में होने के बावजूद इंग्लिश में बतिया रही थीं, अपने सहयोगी कैमरा-मैन के साथ उपस्थित थीं। हमें देखते ही उनका पहला सवाल यह था कि नोटों के बदलने से आप को जो परेशानी हो रही है, उसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगे ?  मेरे मित्र ने कहा यह देश-हित में उठाया गया कदम है और इससे हमें कोई परेशानी नहीं हैं। हम सब प्लान कर के ही चल रहे है। उनके लिए यह एक अप्रत्याशित उत्तर था, क्योंकि उनके आका शादियों के मौसम में इस कदम को मुद्दा बना सरकार के कदम को अनुचित सिद्ध करने में जुटे हुए है ! माइक-धारी महिला ने फिर सवाल उछाला, तो आप इस सारे खर्च का पेमेंट कैसे करेंगे, उसमें तो आपको असुविधा होगी ! मित्र का जवाब था, वह मेरी व्यक्तिगत समस्या है, जिससे पार पाने के लिए मैंने हर संभव इंतजाम कर रखे हैं। जिनको भुगतान करना है वह भी वस्तुस्थिति से अवगत हैं और वे भी पूरा सहयोग कर रहे हैं। 

यहां अपने मन-मुताबिक़ जवाब ना पाने पर माइक और कैमरा दोनों ने साज-सज्जा तथा स्टालों को अपना निशाना बनाना शुरू किया और वहां खड़े स्टाफ से कुछ ना कुछ उगलवाना चाहा पर जब वहां भी उन्हें अपने चैनल के नाम, अपनी भाषा और अपने रोब-दाब से भी मनवांछित फल नहीं मिला, तब उन्होंने बौखला कर तरह-तरह के उल-जलूल उदाहरण और सवाल-जवाब शुरू किए तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूरे सौजन्यता के साथ अंग्रेजी में ही उनसे कहा कि क्यों आप हमारे मुंह में अपने शब्द  में डालने की कोशिश कर रही हैं और हिंदी भाषी चैनल के बावजूद यह बीच-बीच में धारा-प्रवाह इंग्लिश क्यूँ ? हर तरफ अपना विरोध देख उनका हत्थे से उखाडना लाजमी था, फिर वैसा ही हुआ जैसा हम अक्सर फिजूल की बहसें ऐसे चैनलों पर देखते-झेलते रहते हैं। टी वी पर तो रिमोट अपने हाथ होता है पर यहां तो साक्षात आमना-सामना था ! उसी सिलसिले में मैंने कहा कि सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि आपलोग किसी की सुनना नहीं चाहते सिर्फ अपनी बात को सही मनवाना चाहते हैं।  आप इसलिए नहीं माइक थामे हैं कि आप सरकार के कदम को गलत साबित करें यह जिम्मेदारी इसलिए दी गयी है कि आप सही छवि लोगों के सामने लाएं नाकि अपनी बनाई हुई तस्वीर !  अगली के हाथ में माइक था वे अपनी आदतानुसार बोले भी जा रही थीं पर उपस्थित लोगों की सहमति मेरे साथ होने के कारण पस्त भी थीं। मैंने कहा कि यदि किसी बीमार व्यक्ति का आपरेशन जरूरी हो तो भी आप विरोध में चिल्लाने लगिएगा कि देखो उस पर कितना अत्याचार हो रहा है उसके शरीर पर चाक़ू चलाया जा रहा है, इत्यादि-इत्यादि, जब कि उस आदमी को बचाने के लिए आपरेशन जरुरी है। यहां तक कि "मरीज" भी चाहता है कि वह ठीक हो, उसके हालात सुधरें, जिसके लिए वह कष्ट सहने को भी राजी है पर आप उसे भड़का रहे हो। इस पर माइक से जवाब आया कि उसके पहले मरीज को एनेस्थेसिया दिया जाता है, दवाएं दी जाती हैं। मैंने कहा वैसे उपाय यहां भी किए गए हैं, आप उन्हें भी तो "हाइलाइट" कीजिए, लोगों को हौसला बनाए रखने में मदद करने की बजाए आप सिर्फ कमियों का रोना रोए जा रहे हो जिससे लोगों में और घबड़ाहट फ़ैल रही है ! पर आप शायद चाहते भी यही हो !! 

बहस का अंत तो होना नहीं था, समय बीत रहा था सारे इंतजाम भी देखने थे, सो वातावरण को बोझिल ना बना, बात ख़त्म कर उन्हें कुछ लेने का आग्रह किया पर वे भी हताशा-वश वहां के विपरीत माहौल से निकलने का मौका तलाश रहे थे सो ज़रा सा इशारा पाते ही जल्दी से खिसक लिए।

आज लगता है कि देश कहीं पीछे छूट गया है। देश-प्रेम की भावना तिरोहित हो चुकी है। अपने ज़रा से हित के लिए, ज़रा सी सहूलियत के लिए बिना भविष्य की सोचे दिवास्वपन दिखलवाने वालों के बहकावे में आ जाते है। हम अपने जमीर का उपयोग करना चाहते ही नहीं। अफवाहें कहीं भी, कभी भी हमें बेवकूफ बना सकती हैं। हमें पकी-पकाई खाने की आदत पड़ चुकी है। हमारी भेड़-चाल ख़त्म नहीं होने वाली, हमारे कंधे मौकापरस्तों की बंदूकों के लिए अलभ्य नहीं होने वाले, झूठ को सौ बार कह-दिखा कर सच बनाने वाले अपनी आदतों से बाज नहीं आने वाले। इतिहास गवाह है कि हमें लतखोरी की आदत पड़ी हुई है, बिना डंडे के हम सुधर नहीं सकते !!

पर सच्चाई यह है कि हममें किसी भी परिस्थिति का सामना करने का माद्दा है। सेना की तो बात ही ना करें उनके समान तो कुछ हो ही नहीं सकता। पता नहीं सृष्टि ने उन्हें किस मिटटी का बनाया है, कौन से जज्बात भरे हैं दिलो-दिमाग में, किस धातु का हौसला घड़ा है कि सिवा देश के उन्हें और कुछ सूझता ही नहीं जबकि उसी देश के कुछ नाशुक्रिए पीछे नहीं रहते उनकी बेकद्री करने को। सेना जैसा ही कुछ जज्बा आज भीतरी "फ्रंट" पर तैनात बैंक कर्मियों ने पेश किया है उसके लिए पूरे देश को उन पर गर्व है। विपरीत परिस्थितियों में, गहरे दवाब में, थकान-भूख-प्यास को भूल उन्होंने दिनों-दिन, घंटे दर घंटे, लोगों की बेकाबू भीड़, उनके गुस्से, उनकी तकरार को सहते हुए खुद को शांत रख जिस कर्मठता के साथ अपने काम को अंजाम दिया है उसके लिए तो तारीफ में शब्द ही कम पड़ जाते हैं। साधूवाद है इन सारे कर्मियों के लिए। पर खेद यहां भी वही है कि उनके प्रयास को उतनी तवज्जो नहीं मिल पा रही जिसके वे हकदार हैं।     

1 टिप्पणी:

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

तरह-तरह के चैनल आम आदमी के मुंह से अपने मन-मुताबिक़ उगलवाने की कोशिश करते हैं, लोग भी टी वी के पर्दे पर दिखने के लालच में उनके शब्द दोहरा देते हैं :(