गुरुवार, 17 मार्च 2016

प्रभुता पाइ काहु मद नाहीं

ऐसे लोगों का अपने पर काबू नहीं रह जाता, इन्हें यह भी भान नहीं रहता कि क्रोध की ज्वाला के सम्पर्क में आ जब  इनके सत्ता का मद, उफान खा, विस्फोट करता है तो उससे दूसरे का कम इनका खुद का नुक्सान ज्यादा होता है। ऐसे उदाहरण हमें आए-दिन दिखलाई दे जाते हैं..... 

सैकड़ों साल पहले तुलसीदास जी ने इस बात की फिर पुष्टि कर दी थी, जता दिया था कि समय के साथ भले ही लोगों के स्वभाव में, उनके विचारों में, उनके रहन-सहन में, कितने भी बदलाव आ जाएं पर कुछ ऐसा है जो कभी नहीं बदल पाएगा। उसी में एक है यह मदांधता का स्वभाव। जैसे ही मनुष्य को सत्ता, धन, बल मिलता है उसका सबसे पहला असर उसके दिमाग पर ही होता है। अपनी शक्ति के नशे में अंधे हो जाना आम बात  हो जाती है।  उसे अपने सामने हर कोई तुच्छ कीड़ा-मकोड़ा नज़र आने लगता है। 

कुछ समय पहले तक हालत ऐसी नहीं थी। किसी उच्च पद को पाने के लिए, शिखर तक पहुंचने के लिए, कुछ हासिल करने के लिए, उसके लायक योग्यता होनी जरूरी समझी जाती थी, मेहनत करनी पड़ती थी अपने इष्ट को पाने के लिए। साबित करना पड़ता था अपने-आप को। इसलिए बड़े लोगों में भी विनम्रता, त्याग, मानवता जैसी भावनाएं कभी भी विलुप्त नहीं होतीं। ऐसे लोग बिरले ही होते हैं जो शक्तिशाली होते हुए भी विनम्र हों, क्योंकि शक्ति और विनम्रता दोनों विपरीत स्वभाव के गुण हैं, लेकिन अगर ये एक ही इंसान में आ जाएं तो उस व्यक्ति को महान बना देते हैं। 

आज सारे संसार में एक अजीब सा माहौल है। पता नहीं कैसी प्रतिस्पर्द्धा चल रही है कि हर कोई एक अंधी दौड़ में शामिल है। हरेक को कहीं न कहीं पहुंचने की हड़बड़ी है और विडंबना यह है कि ज्यादातर लोग मेहनत या योग्यता की सहायता से नहीं बल्कि कुछ तिकड़म से, कुछ बाहुबल से और ज्यादातर धन-बल के सहारे वह स्थान हासिल कर लेना चाहते हैं, और वे सफल भी हो जाते हैं। ऐसे लोगों में लियाकत तो होती नहीं इसलिए उन्हें सदा अपना स्थान खोने की आशंका बनी रहती है। इसी आशंका के कारण उनके दिलो-दिमाग में क्रोध और आक्रोश ऐसे पैवस्त हो जाते हैं कि उन्हें हर आदमी अपना दुश्मन और दूसरे की ज़रा सी विपरीत बात अपनी तौहीन लगने लगती है। फिर इनका अपने पर काबू नहीं रह जाता, इन्हें यह भी भान नहीं रहता कि क्रोध की ज्वाला पर सत्ता का मद जब उफान खा विस्फोट करता है तो उससे दूसरे का कम इनका खुद का नुक्सान ज्यादा होता है। ऐसे उदाहरण हमें आए-दिन दिखलाई दे जाते हैं। 

इस तरह के लोग समाज के हर तबके में उपलब्ध हैं। ये लियाकतहीन, मौकापरस्त, विवेकहीन लोग जहां भी रहते हैं वहीँ अराजकता विराजती है। पर सबसे चिंतास्पद बात यह है कि अब इस तरह के लोगों की पैठ राजनीती में भी बहुलता से होने लगी है। देश की नीतियों, योजनाओं, कार्य शैली पर भी इनके साये की छाया पड़ने लगी है। जो कि अशनि-संकेत की तरह है। इसके लिए आम नागरिक के साथ-साथ, मीडिया को, प्रबुद्ध-जनों को, राजनैतिक दलों को अपनी महत्वकांक्षाओं, अपने अहम, अपने स्वार्थ से ऊपर उठ, देश हित के लिए ऐसे लोगों को किसी भी कीमत पर दरकिनार करने की पुरजोर कोशिश करनी होगी। काम मुश्किल है, क्योंकि स्वार्थ आड़े आएगा पर कोशिश तो करनी ही है।      

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-03-2016) को "दुखी तू भी दुखी मैं भी" (चर्चा अंक - 2286) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'