बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

सूरजकुंड का मेला

मेला परिसर में लोगों की नदी नहीं सागर मंडरा रहा था चारों ओर। हर तरफ लोग ही लोग, मजे लेते लोग, खाने के ठीहों पर लोग, स्टालों पर लोग, सेल्फ़ी प्वाइंट्स पर लोग, बैठे लोग, सुस्ताते लोग, खड़े लोग, चलते लोग, बैठने की जगह ढूंढते लोग, एक-दूसरे को खोजते लोग और तो और प्रकृति की पुकार से ग्रसित, महिलाओं और पुरुषों के टॉयलेट के सामने लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े कसमसाते लोग। दूसरे दिन अखबार से पता लगा कि रविवार को 90 से 95 हजार लोगों ने मेले में शिरकत की थी     

सालों-साल लोकप्रियता के नए-नए कीर्तिमान बनाते सूरजकुंड मेले में जाने की इच्छा कई कारणों से पूरी नहीं हो पा रही थी। पर इस बार, मौका-दस्तूर-समय-संगसाथ सबके ग्रह मिल गए और वर्षों से दमित कामना की पूर्ति पिछले रविवार, 07.02, को  हो ही गयी। मौसम के उखड़े मिजाज के बावजूद, "आज नहीं तो फिर नहीं"
प्रवेश द्वार 

मेले में रेला  
की सोच के साथ करीब एक बजे दोपहर को पहुँच ही गए।  वहाँ का तो हाल, बेहाल था।  चप्पे-चप्पे पर मानुष-जात उमड़ी पड़ी हुई थी। यह तो हमारी दूरगामी सोच का नतीजा था कि हमने रास्ते में उत्तम नगर मेट्रो से मेले की टिकटें ले लीं थीं। वहाँ तो एक-एक टिकट घर पर सैकड़ों लोग कतार में लगे घंटों के हिसाब से समय खर्च कर रहे थे। अंदर भी वही हाल था, स्त्री-पुरुष-जवान-बुजुर्ग-बच्चों से सारा परिसर पटा पड़ा था। कंट्रोल-कक्ष हर क्षण एक-दूसरे से अलग हुए लोगों के बारे में जानकारी प्रसारित करता जा रहा था। लोगों की नदी नहीं सागर मंडरा रहा था चारों ओर। हर तरफ लोग ही लोग, खाने के ठीहों पर लोग, स्टालों पर लोग, सेल्फ़ी प्वाइंट्स पर लोग, बैठे लोग, सुस्ताते लोग, खड़े लोग, चलते लोग, बैठने की जगह ढूंढते लोग, एक-दूसरे को खोजते लोग और तो और प्रकृति की पुकार से ग्रसित महिलाओं और पुरुषों के टॉयलेट के सामने लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े कसमसाते लोग। दूसरे दिन अखबार से पता लगा कि रविवार को 90 से 95 हजार लोगों ने मेले में शिरकत की थी।       


पिछले साल की थीम पर स्थापित गेट 

दिल्ली-हरियाणा-राजस्थान से गुजरने वाली अरावली पर्वत श्रेणी के साये में, हरियाणा के फरीदाबाद शहर के पास बहरपुर और लक्करपुर गांवों के बीच सूरजकुंड एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। इसे दसवीं सदी में तोमर राज, सूरज पाल ने पानी की बर्बादी को रोकने और उसे  जनहित में लाने के वास्ते बनाया था। अपने
सूरजकुंड, इसी के पास और नाम से मेला लगता है  
नामानुसार सरोवर की आकृति
 उगते सूरज की तरह अर्द्ध वृताकार है, जो आस-पास की चट्टानों में काटी गई सीढियों से घिरा हुआ है। वैसे अब तो यह कुंड सूखा ही रहता है पर बरसातों में इसकी छटा देखने लायक होती है। इसी से कुछ दूरी पर अरावली श्रृंखला के पास अनगपुर डैम है। जिसमे पहाड़ियों से आ कर पानी जमा होता रहता था। उसी के एक जलस्रोत से इस सरोवर की जलापूर्ति होती थी। पर दक्षिणी दिल्ली से महज आठ की.मी. दूर होने पर भी यहां लोगों की आवाजाही बहुत कम थी आज इसकी प्रसिद्धि का सारा श्रेय #हरियाणा सरकार को जाता है, जिसने इसके पास खाली पड़े भूभाग पर 1987 में हस्त-शिल्प और बुनकरों की भलाई को मद्दे-नज़र रख एक मेले की शुरुआत की। जिसने धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय  ख्याति प्राप्त कर ली और उसके साथ ही 'सूरजकुंड' भी दुनिया में मशहूर हो गया।  


मेले के आकर्षण 
हरियाणा सरकार द्वारा जब शिल्पकारों और बुनकरों की मदद और उनके शिल्प को प्रोत्साहित करने के लिए रूप-रेखा तैयार हुई तो वहाँ के पर्यटन विभाग को इस जगह की ऐतिहासिकता और इसके दिल्ली के करीब होने के कारण इसे मेले के लिए चुनने में दो बार सोचना नहीं पड़ा। सबसे पहले 1987 में यहां मेले का आयोजन किया गया था। लोगों को वह इतना पसंद आया कि सूरजकुंड का मेला अपने-आप में एक अनोखा उत्सव बन गया।  तब से हर साल इन्ही दिनों 1 से 15 फरवरी तक यह आयोजित किया जाता है। हर साल देश के किसी एक राज्य की "थीम" पर यहां मेले का आयोजन होता है। इस साल  "तेलंगाना"  का नंबर था। पिछली बार यह 



गौरव छत्तीसगढ़ राज्य को प्राप्त हुआ था।  यहां भारत के सभी राज्यों के उत्कृष्ट शिल्प उत्पादों को एक ही स्थान पर देखा और ख़रीदा जा सकता है। इस शिल्प मेले में सबसे अच्छे हथकरघा और देश के सभी हस्तशिल्प को तो पाया ही जा सकता है साथ ही विदेशों के कारीगरों की अनूठी कृतियों और शिल्पों को देखने और खरीदने का सुयोग भी प्राप्त हो जाता है। मेला मैदान में ग्रामीण परिवेश की अद्भुत झलक और भारतीय पकवानों का आकर्षण आगंतुकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करता तो है ही साथ ही महोत्सव के दौरान पर्यटक यहाँ कलाकारों और शिल्पकारों द्वारा प्रदर्शित विभिन्न कलाकृतियों के अलावा 

ग्रामीण भारत के रंगो और परिवेश के अहसास को यहां प्रस्तुत लोकनृत्य, संगीत, हवाई करतब और जादू के शो के द्वारा भी प्राप्त कर सकते हैं। जैसे-जैसे इस मेले की ख्याति बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे दुनिया भर से पर्यटक  बड़ी संख्याऔर प्रतिभागी  इस मेले में आने लगे हैं, जिनकी संख्या लाखों तक पहुँचने लगी है। छुट्टी के दिनों में तो दर्शकों की संख्या लाख के आंकड़े को भी पार कर जाती है।

लोगों के मनोरंजन के अलावा यह मेला सरकार की आमदनी में अच्छा-खासा इजाफा करने वाला सिद्ध हो रहा है। भले ही हरियाणा सरकार मनोरंजन कर से छूट देती हो पर उसके बाद भी 120 रुपये का प्रवेश शुल्क और गाडी पार्किंग के 70 रुपये आम जनता को भारी पड़ते हैं। बच्चों के लिए लगे मंहगे झूलों के अलावा आमदनी का एक और रास्ता, हेलीकाप्टर के रूप में खोज लिया गया है, जिसकी पाँचेक मिनट की उड़ान का शुल्क 2500/- वसूला जाता है। बेहिसाब आमदनी को नज़र में रख बारह साल के बच्चों और गाड़ियों की पार्किंग पर
थकान 
से शुल्क हटाया जा सकता है। एक बात और भी सालती है कि सूरजकुंड को प्रसिद्धि तो बहुत मिली, सरकारों के खजाने में बेहिसाब-बेतहाशा मुद्रा की आवक भी बढ़ी पर कुंड के रख-रखाव और उसकी भलाई के बारे में उतना किसी ने नहीं सोचा जितने का वह हकदार था। उसके जलाभरण के लिए या उसे और खूबसूरती प्रदान करने के लिए अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है।  हालंकि यहां भी पांच रुपये का प्रवेश शुल्क उगाहा जाता है।

दुनिया में  कुछ चीजें या जगहें ऐसी होती हैं, जिनके बारे में कितने भी मालूमात इकट्ठे कर लिए जाएं पर उनका आनंद उनको साक्षात देख कर ही लिया जा सकता है। यह भी एक ऐसी ही जगह है। जगह थोड़ी अलग हट कर और शहर के बाहर जरूर है पर कुछ समय निकाल कर वहाँ जाना बनता है। 

2 टिप्‍पणियां:

जसवंत लोधी ने कहा…

मेला घुमाने हेतु ' शुक्रिया ।
Seetamni. blogspot. in

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

Jaswant ji, swagat hai