मंगलवार, 12 जनवरी 2016

धार्मिक स्थल और दर्शनार्थियों का पहनावा (ड्रेस कोड)

 मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, बौद्ध या जैन मंदिर या मठ  और ऐसे ही धार्मिक - स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र जरूर बन गए हैं पर इसके पहले वे पवित्र धार्मिक स्थल हैं। सीधा-साफ़ संदेश यही है कि ये जगहें तफ़रीह के लिए नहीं हैं। यहां व्यक्ति सर्वोच्च शक्ति के पास शीश नवाने आता है, उसके दर्शन करने आता है, उसके रहमो-करम पाने के लिए आता है या फिर घूमने ही आता हो, पर यह किसी का हक़ नहीं बनता कि वह वहां के कायदे-कानून पर सवाल उठाए या अमर्यादित व्यवहार करे। उस पवित्र स्थल की गरिमा या मर्यादा को भंग करने की किसी को भी इजाजत नहीं होनी चाहिए         


जब से तिरुवंतपुरम के पद्मनाभ मंदिर के न्यास ने मंदिर में प्रवेश करने वालों के लिए खास पहनावा निर्धारित किया है तब से ही एक अनावश्यक बहस छिड़ गयी है। विडंबना है कि बाहर से आने वाले विदेशियों को इससे कोई शिकायत नहीं है वे जैसे भी हो इस नियम का भरसक पालन करते हैं, क्योंकि उनके आचरण में, उनकी आदत में अनुशासन शामिल होता है, वे दूसरे की भावनाओं का आदर करते हैं। मिर्ची हमें ही लगती है। हमारी आदत हो चुकी है नियम तोडना, कानून का उल्ल्ंघन करना, मान्यताओं का मजाक उड़ाना। दुर्भाग्यवश इसे आधुनिकता का पर्याय मान लिया गया है और इसके लिए लिए आड़ ली जाती है व्यक्तिगत स्वतंत्रता की। 
         
एक दो दिन पहले राजधानी के एक अग्रणी समाचार पत्र में "Who says god likes topless men but not jeans "? शीर्षक के साथ एक लेख छपा था। उसमें विद्वान लेखक ने बताया था कि कैसे ढीले कपड़ों में लोग असुविधा महसूस करते हैं। कैसे दौड़ते-भागते पास की दुकानों से कपडे ख़रीदते हैं।  कैसे उनका ध्यान पूजा में नहीं अपने  कपड़ों को संभालने में लगा रहता है ! ऐसे लोगों को क्या उत्तर दिया जाए ? इनको तो मालुम ही होगा कि चर्च में भी घुटनों और कंधों को ढक कर ही अंदर जाया जाता है।  लोग खुद ही आदर की भावना के तहत इस बात का ध्यान रखते हैं कि बिना आस्तीन के, बहुत तंग, टी शर्ट, मिनी स्कर्ट, या अधोवस्त्र दिखें ऐसे कपडे पहन कर प्रार्थना करने ना जाया जाए। कई जगह तो भले ही घंटों कतार में खड़े होने के बाद अंदर जाने का नंबर आया हो, यदि आगंतुक ने ढंग के कपडे न पहने हों तो उसे बाहर कर दिया जाता है। वहां तो कभी भी कोई हो-हल्ला नहीं करता ! कभी कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता का डंडा घुमाता अंदर जाने की जिद नहीं करता। 

मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, बौद्ध या जैन मंदिर या मठ और ऐसे ही धार्मिक स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र जरूर बन गए हैं पर इसके पहले वे पवित्र धार्मिक स्थल हैं। क्या कभी किसी ने मस्जिद में चलताऊ वस्त्र पहने किसी को देखा है ? वहां का चलन है कि शरीर का जितना ज्यादा से ज्यादा भाग ढका जा सके, ढक कर ही सजदा किया जाए। क्या गुरुद्वारों में बिना सर और शरीर ढके कोई जाता है ? वहां भी यदि किसी के पास उचित वस्त्र नहीं हैं तो वे उपलब्ध करवाए जाते हैं। नियम सबको मानना ही है। सीधा-साफ़ संदेश यही है कि ये जगहें तफ़रीह के लिए नहीं हैं। यहां व्यक्ति सर्वोच्च शक्ति के पास शीश नवाने आता है, उसके दर्शन करने आता है, उसके रहमो-करम पाने के लिए आता है या फिर घूमने ही आता हो, पर यह किसी का हक़ नहीं बनता कि वह वहां के कायदे-कानून पर सवाल उठाए या अमर्यादित व्यवहार करे। उस पवित्र स्थल की गरिमा या मर्यादा को भंग करने की किसी को भी इजाजत नहीं होनी चाहिए।   

वैसे तो अधिकांश पर्यटक अपने गंतव्य की पूरी जानकारी ले कर ही घूमने निकलते हैं, उन्हें हर जगह के नियम-
कानूनों की जानकारी होती है। कभी-कभी किसी गाइड की लापरवाही से हो सकता है कि किसी परेशानी का सामना करना पड़ जाता हो। पर वे अपनी असुविधा को भी खेल भावना से ही लेते हैं। उनके उलट हम जैसे ज्यादातर स्थानीय घुमक्कड़ पैसा बचाने के लिए कभी गाइड का सहारा नहीं लेते, ना ही हम अपने देश में कहीं जाते हुए उस जगह की जानकारी लेने की आवश्यकता समझते हैं। हमारा ज्यादातर प्रवास लोगों की बातों और "देखा जाएगा" कि भावना पर आधारित होता है। इसीलिए कहीं जब कोई बात हमें अपने मन-मुताबिक नहीं मिलती तो हम आक्रोशित हो जाते हैं। अधकचरे ज्ञान, अपूर्ण जानकारी और विदेशी सभ्यता के अंधानुकरण से धीरे-धीरे जैसा माहौल बनता जा रहा है, या बनाया जा रहा है उसके चलते अपनी संस्कृति, अपने रस्मो-रिवाज, अपनी मान्यताओं का मजाक उड़ाना या विरोध करना आजकल आधुनिकता और फैशन का प्रतीक बन गया है। उदहारण स्वरूप जैसे शिंगणापुर के शनिदेव के चबूतरे पर महिलाओं के चढने पर प्रतिबंध की बात है, तो हो सकता है कि उस समय के महिलाओं के वस्त्रों को ध्यान में रखते हुए तेल के कारण रपटीली सतह पर उनकी सुरक्षा को ध्यान में रख कर ही वैसा नियम बनाया गया हो !  इसलिए जरुरत है कि पुराने तौर-तरीकों का सही और वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद ही उसकी आवश्यकता या अनुपयोगिता का निर्धारण किया जाए। न की जोश में किसी के दवाब में आ कोई भी फेर बदल कर दिया जाए। 

2 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

शुभ संध्या
पहनावा..
क्यों..
काया प्रदर्शन हेतु
या फिर
नज़रों से बचाव हेतु
बेहतर चुनाव आपको
सुरक्षित रखता है
कहीं भी..कभी भी
सादर

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - लोहड़ी की लख-लख बधाईयाँ में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।