सोमवार, 8 जून 2015

दशकों के बाद भी वह सरदार दंपति भूलते नहीं

वर्षों पहले घटी वह घटना भूलती नहीं  है। अजीब माहौल था। रात का समय, अनजानी जगह, सुनसान अंधेरे से घिरी पहाड़ी पर एक शांत सा खाली बंगला।  बंगले के मालिक, सरदार दंपति दस-बीस मिनट की पहचान पर घर का एक हिस्सा मुझे सौंप खुद कहीं चले जाते हैं । मुझे यह भी नहीं पता कि वे इस घर के मालिक हैं भी कि नहीं !! शक का कीड़ा बुरी तरह कुलबुलाता है.…

काफी समय गुजर चुका है इस बात को, पर भूलते नहीं हैं वे दिन। अति व्यस्तता के कारण शादी के बाद एक लंबे अरसे तक छुट्टियों पर जाने का का मौका नहीं मिल पाया था। नौकरी के चलते उस समय कलकत्ते में रहना हो रहा था। आखिर  दुर्गा-पूजा के वक्त वह समय भी मिल ही गया।  वहां से दिल्ली आए और एक-दो दिन बाद चंडीगढ़ में कदम जी के मामाजी के पास एक दिन रहने के बाद कुल्लू-मनाली का कार्यक्रम तय पाया गया। कुल्लू का दशहरा सारे संसार में विख्यात है, उसे देखने का भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे हम सब। कुल्लू में भी परिचित का निवास होने के कारण उन दिनों वहां की भीड़-भाड़ की भी चिंता नहीं थी।
     
उन दिनों बसों में उतनी "वैरायटी" नहीं होती थी। ज्यादातर दो तरह की बसें चला करती थीं लम्बे रूट पर।  एक साधारण सब जगह रुकती-थमती और दूसरी कुछ ज्यादा आरामदेह और कम जगह रुकने वाली। उन्हें डीलक्स बस कहा जाता था। ऐसी ही एक बस में सीट बुक करवा ली गयी थी। दोपहर को दिल्ली से चल शाम को चंडीगढ़ पहुँच गए। इनके मामाजी करीब-करीब मेरे हम-उम्र हैं सो काफी पटती रही है। अच्छा समय कट रहा था। पर आदमी सोचता कुछ है होता कुछ और ही है।  वहाँ से दूसरे दिन आगे की यात्रा शुरू होने के पहले खबर आई कि कुल्लू वाले हमारे पारिवारिक दोस्त को किसी बहुत जरूरी काम से दिल्ली जाना पड गया था। मामला थोड़ा पेचीदा हो गया था क्योंकि नयी जगह और मेले-त्यौहार का समय, रहने की चिंता होनी ही थी। पर कार्यक्रम को स्थगित करने के पक्ष में नाहीं मैं था नाहीं श्रीमती जी। सो यह तय हुआ कि समयानुसार कुछ कर लिया जाएगा, कुल्लू में भीड़ होगी तो आगे मनाली में कुछ इंतजाम कर लेंगे।

सुबह-सुबह यात्रा शुरू हुई, सफर के दौरान पास बैठे एक बुजुर्ग सिख पति-पत्नी ने मेल-मिलाप के दौरान हमारी हालत जान हमें अपने घर पर ठहरने का प्रस्ताव दे दिया। बात आई-गयी हो गयी।  मैं कलकत्ते जैसे  शहर का रहने वाला, अनजान जगह में अनजान इंसान द्वारा  दिए गए प्रस्ताव को उसमें उनका कोई मतलब समझ स्वीकार नहीं कर पा मनाली जाने के अपने इरादे पर डटा रहा। यह बात मैंने कदम जी को भी बतला दी थी कि हम इसी बस से सीधे मनाली ही जाएंगे। इसके बाद सरदार दंपति से और कोई बात भी नहीं हुई। रात करीब आठ बजे के आस-पास बस कुल्लू में ढालपुर के अस्थाई बस अड्डे पर पहुंची।  मैं निश्चित बैठा था कि मुझे तो आगे जाना है पर तभी सरदार जी ने आवाज लगाईं, आओ भाई उतरो, कुल्लू आ गया। इतना ही नहीं उन्होंने मेरा सामान भी उतरवा लिया। असमंजस के बावजूद अब उतरना ही था सो उतर कर उनके साथ हो लिए। मैदान, सड़क पार कर यह काफिला एक ऊंचाई की ओर जाती पगडंडी पर चलते-चलते एक बंगले के सामने रुका। सरदार जी ने एक हॉल नुमा कमरा उसकी चाबी समेत हमें सौंप दिया और सुबह मिलने का कह घर के दूसरे हिस्से की ओर चले गए।  कुछ देर बाद उधर के दरवाजे इत्यादि के बंद होने की आवाज के साथ-साथ ऐसा लगा कि वे लोग फिर नीचे की ओर जा रहे हैं।

अजीब माहौल था। रात का समय, अनजानी जगह, सुनसान अंधेरे से घिरी पहाड़ी पर एक शांत सा खाली बंगला, बंगले का मालिक दस-बीस मिनट की पहचान पर घर का एक हिस्सा मुझे सौंप खुद कहीं चला जाता है। मुझे यह भी नहीं पता कि वह इस घर का मालिक है भी कि नहीं !! शक का कीड़ा बुरी तरह कुलबुला रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। फिर जो होगा देखा जाएगा की तर्ज पर कुछ तरो-ताजा हो हम दोनों भी नीचे आबादी की तरफ निकल लिए। समय था साढ़े नौ-पौने दस का। सोचा था दो-एक घंटें में तो ये लोग भी लौट आएंगे।  मेले के कारण दुकानें वगैरह खुली हुई थीं। वहीं से सबसे पहला जानकारी हासिल करने का किया जिससे पता चला कि सरदार जी अवकाश प्राप्त "मैजिस्ट्रेट' हैं। रहते चंडीगढ़ में हैं पर यहां भी आते-जाते रहते हैं ख़ास कर इन दिनों। ऊपर का बंगला भी उन्हीं का है। यह सब जान कर कुछ तसल्ली तो मिली पर, "व्योमकेश बक्शी" के बंगाल का निवासी, मैं अपने आप को यह नहीं समझा पा रहा था कि आज के जमाने में क्यों कोई अपने घर को बिना जान-पहचान के किसी अजनबी के लिए खोल देगा। खैर रात ग्यारह बजे हम दोनों मियां-बीवी यह मनाते ऊपर आए कि शायद वे दोनों भी अब तक आ चुके होंगे। पर कहां !! वहां तो वैसा ही सन्नाटा पसरा पड़ा था। फिर तो वही किया जो अपने हाथ में था, दरवाजा-खिड़की अंदर से बंद कर बिस्तर पर पसर गए। थके थे, परेशानी व तनाव के बावजूद निद्रा ने अपने आगोश में समेट लिया। ऐसा लगा कि आधी रात के बाद दूसरे हिस्से में कोई हलचल हुई है पर जिज्ञासा पर नींद ज्यादा भारी रही।

अभी सबेरा हुआ- हुआ ही था कि भीतर के हिस्से को जोड़ने वाले कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। कदम जी ने दरवाजा खोला तो पाया कि सरदारनी आंटी हैं। दुआ-सलाम, खैरियत पूछने के बाद बोलीं, लै पुत्तर किचन दी चाबी, जो इच्छा करे बना लेंइं। सानू बी दे देंयीं। एक-दूसरे का मुंह देखते हुए हम सोच रहे थे कि क्या अभी भी दुनिया में ऐसे लोग हैं ?
खैर! रसोई खुली !! रसोई क्या थी, पूरा भरा-पुरा स्टोर था। हर चीज का अंबार, आलू-प्याज के साथ-साथ सेव, आड़ू, अखरोट "तुन्ने" पड़े थे। नाश्ता बनाया गया, ग्रहण किया गया। अभी भी अपने दिल को तसल्ली न दे पाने की मनःस्थिति के वश बातों ही बातों में मैंने पूछ ही लिया कि यहां रहने की अवधि का जो भी बन  रहा हो वे मुझे बता दें। सरदार जी ने पहले तो पूछा कि आपने रहना कितने दिन है ? तो मैंने बताया कि कल निकलने का विचार है। यह सुन वे बोले, पुत्तर यह इसलिए मैंने पूछा क्योंकि परसों मैं किसी और लोगों से भी यहां ठहरने को कह चुका हूँ।  प्रभु का दिया सब कुछ है, उसकी मेहर है, मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए।  बस आप जैसे लोग खुश रहें। सुनते आ रहे थे कि पहाड़ों के निवासी सीधे, सरल, निष्कपट होते हैं, आज प्रमाण भी पा लिया था।

कलकत्ता लौटने पर कुछ दिनों तक खतो-किताबत हुई पर फिर  समय की धुंध में सब खो गया। वर्षों बाद, करीब तीस साल के अंतराल के बाद फिर कई बार आना-जाना हुआ पर तब तक कुल्लू इतना बदल चुका था, व्यास में इतना पानी बह चुका था, कि कुछ भी खोजना पता लगाना संभव नहीं हो पाया। पर उनकी छवि, धुंधली सी ही सही, अभी भी यादों में विद्यमान है।                                                  

5 टिप्‍पणियां:

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

बढिया संस्मरण। "आप दोनो" थे इसलिए सरदार जी ने रहने के लिए घर दे दिया। अकेले या दो छोकरे होते तो दूर से ही नमस्ते कर लेते। :)

अन्तर सोहिल ने कहा…

खूबसूरत संस्मरण
ऐसे लोग बहुत कम ही हैं संसार में
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ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मंदी की मार, हुआ बंद व्यापार - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ललित जी,
चाहे जो हो इस तरह के इंसान कहां मिलते हैं (अब तो शायद वैसी नस्ल ही नहीं बची होगी), हम ही नहीं हमारे बाद भी कुछ लोगों के लिए उन्होंने द्वार खुले रखे थे।

dj ने कहा…

वाकई जीवन के इस कठिन थपेड़ों में ऐसे लोग ही तो स्नेह की थपकी से सहला जाते है
बढ़िया संस्मरण। और उन सरदार दंपत्ति को प्रणाम।