शनिवार, 15 नवंबर 2014

बैंक लोन के साथ तनाव मुफ्त

पिछले शनिवार, 15 नवंबर को दैनिक भास्कर पत्र के "असंभव के विरुद्ध" कालम में श्री कल्पेश याग्निक जी का बैंक लोन पर लेख पढ़ कर ऐसा लगा जैसे किसी ने दुखती राग पर हाथ रख दिया हो। वे दिन याद आ गए जब बैंकों के लुभावने इश्तहार देख कर 2006 में छोटे बेटे की शिक्षा के लिए बैंक से लोन लेने की हिमाकत की थी। तब यह भी हकीकत सामने आई कि यह बैंक बने किनके लिए हैं। 

"किसी तरह" हफ़्तों की दौड़-धूप के बाद ऋण प्राप्त हो गया। उस समय बैंक के अधिकारी महोदय ने लोन पर लगने वाले ब्याज के दो रूप बताए, पहला जो सदा एक सा रहता है।  दूसरा जो आर्थिक नीतियों के साथ घटता-बढ़ता रहता है। उन्होंने ही पहले वाले रूप को अख्तियार करने की सलाह भी दी। बात हो गयी। ऋण मिल गया। किश्तों का भुगतान भी संख्या को 'पूर्ण' करने के लिए  निर्धारित रकम से 25-50 रुपये ज्यादा ही दिए जाते रहे। छ: - सात साल निकल गए, कभी भी किस्त चुकाने में कोई गफलत नहीं हुई पर अचानक 2013 में बैंक के वकील की तरफ से एक नोटिस मिला कि आपकी तरफ 250000/- की रकम पेंडिग है, जिसे तुरंत न चुकाने पर आप पर कानूनी कार्यवाही की जाएगी। साथ ही चल-अचल संपत्ति की नीलामी की धमकी भी दी गयी थी। यहां तक कि बिना पूरी जांच  किए  इस मनगढ़ंत कार्यवाही के खर्च के रूप में 2600/- के भुगतान को भी मेरे सर डाल दिया गया था। जबकि अभी भी लोन की बाक़ी रकम को लौटाने में करीब चार साल बचे हुए थे। इस नोटिस की एक प्रति लोन लेते समय मेरी 'ग्रांटर' बनी मेरी बहन को भी भेज दी गयी, जिससे उनका तनाव ग्रस्त होना स्वाभाविक था। पूरा परिवार पेशोपेश में पड़ गया था। कानूनी पत्र का उत्तर भी कानूनी टूर से दिया जाना ठीक समझ अपने वकील द्वारा सारी बात बता कैफियत माँगने पर बैंक के तथाकथित जिम्मेदार अफसरों ने बताया कि मेरे ऋण पर ब्याज दर तीन प्रतिशत बढ़ा दी गयी है। उसी के कारण मुझे नोटिस भेजा गया है। मेरे द्वारा पूछने पर कि इस बढ़ोत्तरी के बारे में मुझे सूचित क्यों नहीं किया गया, तो बैंक में किसी के पास इसका जवाब नहीं था। एक बार मन तो हुआ कि मान-हानि का दावा कर दिया जाए, पर फिर मध्यम वर्ग की मजबूरी और मानसिकता, जिसका फायदा अक्सर उठाया जाता रहा है, के चलते मामला ख़त्म कर दिया गया। 

मन में आक्रोश तो बना ही रहता है, कल्पेश जी के लेख ने उसे फिर ताजा कर दिया। 

गगन शर्मा 
gagansharma09@gmail.com                                                

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (17-11-2014) को "वक़्त की नफ़ासत" {चर्चामंच अंक-1800} पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

मानहानि का केस तो दायर करना ही चाहिए था ......