बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

दिल्ली-सालासर वाया रानीसती जी मंदिर, यात्रा भाग 3

दिल्ली से चले करीब आठ घंटे हो चुके थे पर बड़े तो बड़े छोटों तक में किसी थकान का नामो-निशान नहीं था. बस रानी सती जी के दर्शनों के बाद बाहर आने पर लोगों से पता चला था कि सालासर धाम में शरद पूर्णिमा के कारण मेला लगा हुआ है और रहने-ठहरने की जगह मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. उसी से मन में थोड़ी चिंता जागृत होगयी थी वह भी बच्चों के लिए. अंत में यही तय रहा कि सब ऊपर वाले पर छोड़ दिया जाए, जैसा वह चाहेगा वैसे ही रहेंगे। गाड़ी ने शहर के बाहर आ जब सालासर का रूख किया तो छह बज कर बीस मिनट हो रहे थे. गाड़ी और मन अपनी-अपनी रफ्तार से अपनी मंजिल की ओर अग्रसर थे. 
सालासर बालाजी धाम राजस्थान के चुरू जिले में एक छोटे से कस्बे सुजानगढ़ के पास सालासर गाँव मे नॅशनल हाई-वे 65 पर स्थित है.  
सालासर मंदिर के लिए जैसे ही गाड़ी मुड़ी, कुछ-कुछ समय के उपरांत  सड़क पर  दो-चार-दस-बीस लोगों के झुण्ड नजर आने लगे. कोई पैदल, कोई टैंपो जैसे वाहन में तो कोई छोटे ट्रक में जयकारा भरता दरबार की और मंथर गति से अग्रसर था. सबकी रफ्तार इसलिए कम थी क्योंकि इन सब के आगे एक या दो युवक हनुमान जी के निशान रूपी झंडे को उठाए, दौड़ते हुए चल रहे थे. जैसे-जैसे मंदिर नजदीक आता जा रहा था वैसे-वैसे भीड़ बढती जा रही थी. सालासर में बालाजी मंदिर के करीब एक किलो मीटर पहले हनुमान जी की माता अंजनी जी का मंदिर है. अमूमन यह जगह खाली ही रहती है. यहाँ से दो रास्ते अलग होते हैं. एक सीधा मंदिर की तरफ जाता है और दूसरा सुजानगढ़ की तरफ निकल जाता है.  इस बार मेले की वजह से मंदिर की तरफ वाला रास्ता गाड़ीयों के लिए बंद कर दिया गया था. उधर सुजानगढ़ वाला रास्ता भी लोगों और गाड़ियों से अटा पडा था. जगह की सचमुच किल्लत लग रही थी. पर कहते हैं ना की प्रभू कभी अपने बच्चों को मायूस नहीं करता. सो उसी दैवयोग से हमारी रेंगती और कोई आश्रय ढूँढ़ती गाड़ी एक जगमगाती सुन्दर सी इमारत के सामने जा रुकी. 
चमेली देवी अग्रवाल  सेवा सदन 


चमेली देवी सेवा सदन 



नज़र उठा के देखा तो ऊपर नाम लिखा हुआ था "चमेली देवी अग्रवाल सेवा सदन".  समय हुआ था करीब पौने नौ का। भीड़ वहाँ भी थी फिर भी अन्दर जा पता करने की सोची। स्वागत कक्ष में बैठे सज्जन ने पहले तो साफ मना ही कर दिया पर फिर पता नहीं बच्चों या हमारे हताश चेहरों को देख तीसरे तल्ले पर स्थित एक 'सूइट' जैसी बडी जगह का, जिसमें दो आपस में जुड़े हुए कमरे अपने-अपने प्रसाधन कक्ष के साथ थे, का आवंटन दूसरे दिन ग्यारह बजे तक के लिए कर दिया. किराया मात्र  1500/-.   हमें तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गयी हो. उस समय तो यदि होटल वाला पांच हजार भी मांग लेता तो हम आनाकानी नहीं करते. वहीं खाने की भी व्यवस्था थी 75 रुपये थाली के हिसाब से. खाना सचमुच स्वादिष्ट था सो निश्चिंत और शांत मन से उदर पूर्ती कर  कुछ देर सदन के बाहर का जायजा भी लिया गया.

फुरसत के क्षण 





बाहर दिन रात का जैसे कोइ फर्क ही नहीं था.  लोग खुले मे, तंबुओं में, शामियाने में, जहां जगह मिली पड़े थे. उस समय भी कोई नहा रहा था, कोई मस्ती में नाच-गा रहा था तो कोइ भूख मिटाने की फिराक में भोजन का प्रबंध करने में जुटा था. हमें तो सोच कर ही सिहरन हो रही थी की यदि जगह न मिलती तो कैसे क्या होता? भगवान को धन्यवाद दे हम लौटे, किसी-किसी के एक-एक कप चाय और कॉफी का रसपान वहीं प्रांगण में बनी दुकान से करने के बाद सबने कमरे में जा अपने-अपने बिस्तर संभाल लिए.
दूसरे दिन के लिए विचार विमर्श 

घड़ी बजा रही थी 10.35.      
दूसरे दिन दर्शन करने थे. जबकि लोग बता रहे थे कि लाइन में छह से सात घंटे लग रहे हैं।  अब जो भी हो दर्शन तो करने ही थे. प्रभू इच्छा पर सब लोग कब निद्रा की गोद में चले गए पता ही नहीं चला.  
      

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