गुरुवार, 13 जून 2013

एक डिब्बा मातृत्व भरा

अपने यहाँ नवजात शिशुओं और गर्भवती महिलाओं की मृत्यु दर बहुत ज्यादा है. वर्षों से सरकारों द्वारा  इसकी रोक-थाम के लिए कदम उठाने के बावजूद कोइ बहुत ज्यादा सुधार नहीं हो पाया है. आज के माहौल में कारणों की छीछालेदर न ही की जाए तो बेहतर है. इसी के संदर्भ में हम जब फिनलैंड जैसे छोटे देश को देखते हैं तो अचंभित होना जरूरी हो जाता है.

1930 के दशक में फिनलैंड एक बहुत ही गरीब देश था और वहां पर बाल मृत्यु दर बहुत ज्यादा थी। 1000 में से हर 65 बच्चे की मौत हो जाया करती थी। बहुत सोचविचार के बाद करीब 75 साल पहले  वहाँ की सरकार ने गर्भवती महिलाओं को एक डिब्बा देना शुरू किया। तब से दिए जा रहे इस डिब्बे को, जिसमें बच्चों के कपड़े, चटाई, खिलौने, स्लीपिंग बैग तथा  नैपकिन इत्यादि भरे रहते हैं, का इस्तेमाल बच्चों के बिस्तर के तौर पर भी किया जा सकता है। ये मातृत्व पैकेज सरकार की ओर से एक उपहार है जो हर गर्भवती महिलाओं को दिया जाता है। बच्चा चाहे जिस पृष्ठभूमि से आता हो उसे ये डिब्बा दिया ही जाता है। इससे सभी बच्चों की जिंदगी  एक समान स्तर पर शुरु होती है। इस डिब्बे की निचली सतह पर एक चटाई बिछी होती है। ये डिब्बा ही हर बच्चे का पहला बिस्तर होता है। हर तरह की समाजिक पृष्ठभूमि के लड़के कार्ड-बोर्ड की चार दीवारों से घिरे इस डिब्बे में पहली झपकी लेते हैं।

पहले यह सुविधा सिर्फ गरीब तबके के लिए ही थी पर बाद में यह सबके लिए लागू कर दी गयी.  वैसे मां के पास विकल्प होता है कि वो चाहे तो मातृत्व का डिब्बा ले ले या फिर नकद पैसा। फिलहाल इस मामले में 140 यूरो नकद दिए जाते हैं। पर 95 फीसदी लोग डिब्बा ही चुनते हैं। इस डिब्बे में वो तमाम सामान मुहैया कराए जाते हैं जो बच्चे की देखभाल के लिए जरूरी होते हैं। 

आज 75 साल बीत जाने के बाद फिनलैंड में मातृत्व का डिब्बा एक रिवाज बन चुका है. इसकी सबसे अच्छी बात यह है की इसके अन्दर रखी गयी हर चीज बिना लिंग भेद के रखी गयी है. परिवार में लड़का हो या लड़की यह डिब्बा सबके लिए समान रूप से उपयोगी है.

शुरू में इसमें हाथ से बनाए कपड़े रखे जाते थे क्योंकि तब वहाँ रिवाज था की  मां तब बच्चों के कपड़े खुद बनाया करती थीं। पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इसमें कागज का  सामान रखा जाने लगा क्योंकि कपडे को सेना के उपयोग में लाना जरूरी हो गया था. पर युद्धोपरांत  रेडी मेड कपड़े का चलन बढ़ा तो 60 और 70 के दशक में नए कपड़ों का इस्तेमाल होने लगा। 1968 में इसमें स्लीपिंग बैग जोड़ा गया। इसके एक साल बाद इसमें नैपकिन शामिल कर ली गई। लेकिन बच्चों का अच्छा पालन पोषण हमेशा से मातृत्व के डिब्बे की नीति रही है। इसीलिए माँ के दूध को प्राथमिकता तथा प्रोत्साहन देने के लिए इस डिब्बे से दूध की  बोतल को  हटा दिया गया.   अब तो समय के साथ-साथ और भी चीजें जुड़ती जा रही हैं जैसे तस्वीरों वाली छोटी-छोटी पुस्तकें।    

वहाँ के लोगों का विश्वास है कि बच्चों की मृत्यु दर में कमी आना  इस डिब्बे के कारण ही संभव हुआ है. जो कहीं न कहीं समानता का भी प्रतीक है.  काश अपने यहाँ भी कम से कम जीवनोपयोगी कार्यक्रमों का पूरा फल   जरूरतमंदों तक पहुँच पा सके.




8 टिप्‍पणियां:

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

यह तो अनुकरणीय बात है, ना लिंग भेद, ना जातपांत, ना अमीर गरीब.

संभवत: यही एक समान पालन पोषण ही भविष्य के नागरिकों को प्राथमिक संस्कार देने में भी मददगार होता होगा.

रामराम.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बच्चों को और उसकी माँ को सभी सुविधायें निर्बाध मिलें।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (14-06-2013) के "मौसम आयेंगें.... मौसम जायेंगें...." (चर्चा मंचःअंक-1275) पर भी होगी!
सादर...!
रविकर जी अभी व्यस्त हैं, इसलिए मंगलवार की चर्चा मैंने ही लगाई है।
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Archana ने कहा…

मेरे लिए बिलकुल नई जानकारी ...आभार

बी एस पाबला ने कहा…

काश अपने यहाँ भी

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, आभार, आपसी स्नेह बना रहे।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

पाबला जी, अपने यहां मुफ्त के लैप-टाप, आटे, चावल, केरोसिन, नमक का हश्र तो दिख ही रहा है।
यदि ऐसा कुछ हुआ तो शायद खाली डिब्बा ही पहुंचेगा अपने गंतव्य तक।

अरुणा ने कहा…

हर कार्य जज्बे और ईमान से करना आवशयक है
अच्छा लेख