बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

विवादित होते पद्म पुरस्कार

अब समय आ गया है कि इन पुरस्कारों की हालत भी टी.वी. पर हर पखवाडे दिखने वाले पुरस्कारों जैसी हो जाए, इसके चयन का तरीका तुरंत बदल देना चाहिए और यदि तुष्टीकरण जैसी मनोदशा के कारण ऐसा संभव ना हो तो इस प्रथा को खत्म ही कर देना श्रेयस्कर होगा।

पद्म पुरस्कार। देश का सर्वाधिक सम्मानित सम्मान।अपने को इसके लायक बनाने के लिए अथक परिश्रम किया जाता रहा है। जिसे पा कर वर्षों से अपने-अपने फन में सिद्धहस्त लोग गौरवान्वित होते रहे हैं। कुछ ऎसी भी हस्तियाँ होती हैं जिनके पास पहुँच कर ये सम्मान भी  कृतार्थ होते हैं, पर इसके साथ ही अब   ऎसी झोली में भी ये जा पड़ते हैं जहां इनका सम्मान ही कम हो जाता है। इसीलिए अब साल दर साल इनकी घोषणा होते ही विवाद खडे होने लगे हैं। किसी को पुरस्कार न मिलने की हताशा है, कुछ अपनी उपलब्धियों को पद्म सम्मानों में न बदलते देख दुखी हो जाते हैं। तो किसी को पुरस्कार अपनी उपलब्धि के मुकाबले कमतर लगता है। कई ऐसे भी हैं जो अपने से कमतर या सिफारिशी लोगों को यह सम्मान पाते देख इसे ना लेने का मन बना लेते हैं।

ये तो वे लोग हैं जिनका परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इन सम्मानों से सम्बंध बनता है। पर अब तो आम जन की उंगली भी इनके चयन पर उठने लगी है जब वह देखता है कि जहां अनेक उपलब्धियां बिना पहचान और सम्मान पाए रह जाती हैं वहीं कुछ ऐसे लोग इस पुरस्कार को हथिया लेते हैं जो इसकी गरिमा, इसकी मर्यादा को ताक पर रख, सार्वजनिक स्थानों पर भी मीडिया में चर्चित होने के लिए अपनी हरकतों से बाज नहीं आते।  इसके महत्व को समझने की बात तो दूर रही। उन्हें अपना कद इन पुरस्कारों से ज्यादा बडा लगता है। ऐसा हो भी क्यूं ना जब ये पुरस्कार सत्ता से नजदीकी रखने वाले ऐसे लोगों को को दे दिए जाएं, जिन्होंने अपने क्षेत्र में ही कोई खास मुकाम हासिल ना किया हो। जो इन सम्मानों का ही असम्मान है। इसीलिए हर साल चयन पर उठते विवाद इस ओर भी इशारा करते हैं कि अब पद्म पुरस्कार सचमुच अपनी चमक खो चुके हैं। पर फिर भी चयन का तरीका ना बदलने से यही इशारा मिलता है कि अंधा बांटे रेवडी, मुड-मुड खुद को दे। तो जब तक हैसियत है, रसूख है, कोई भी अपनों को लाभान्वित करने का मौका छोडना नहीं चाहता। चाहे पाने वाला अपात्र ही क्यों ना हो। और जो सचमुच हकदार हैं उन्हें इस तरह सम्मानित किया जाता है जैसे पुरस्कार देकर उन पर एहसान किया जा रहा हो। इसीलिए कई वरिष्ठ, बुजुर्ग या वयोवृद्ध फनकार, जिन्होंने अपने फन से अपना और देश का भी नाम ऊंचा किया हो वे अब पद्म पुरस्कारों से दूरी बनाए रखना ही ठीक समझते हैं।

अब समय आ गया है कि इन पुरस्कारों की हालत भी टी.वी. पर हर पखवाडे दिखने वाले पुरस्कारों जैसी हो जाए, इसके चयन का तरीका तुरंत बदल देना चाहिए और यदि तुष्टीकरण जैसी मनोदशा के कारण ऐसा संभव ना हो तो इस प्रथा को खत्म ही कर देना श्रेयस्कर होगा।

7 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सही कहा आपने!
राजनीति हावी है सब जगह!

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

जानिए मच्छर मारने का सबसे आसान तरीका - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सबको गर्व हो तब है महत्ता पुरस्कार की।

Tushar Raj Rastogi ने कहा…

आजकल तो हर पुरस्कार या ट्राफी को खरीदने का रिवाज़ है साब | अब इससे ज्यादा और क्या कहें |

Tamasha-E-Zindagi
Tamashaezindagi FB Page

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

अवश्य बदलाव होना चाहिये.

P.N. Subramanian ने कहा…

आपसे सहमत. वैसे आजकल के भ्रष्ट तंत्र से बहुत उम्मीद नहीं है.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

पता नहीं कब तक इन सम्मानों की दुर्गति देखना बदा है :-(