सोमवार, 16 जुलाई 2012

क्या कहिए एइसन लोगन को !!!


ऐसा क्यूं होता है कि समाज के निचले तबके से उठ कर उपर पहुंचने वाला भी यहां आकर अपने खास हो जाने के एहसास में ऐसा जकड जाता है कि फिर उसे किसी आम से कोई लगाव ही नहीं रह जाता। 


अभी एक खबर पढने को मिली कि अपने को गरीबों की सबसे बडी मसीहा मानने और मनवाने वाली ममता दीदी ने अपने परिवार के साथ भोजन करते समय ऐसे ही अपनी भाभी से सब्जियों की कीमत पूछ ली और जब उनके आसमान छूते दामों को सुना तो उनका माथा  ठनका उन्होंने तत्काल कार्यवाई करते हुए दलालों इत्यादि पर शिकंजा कसा और देखते ही देखते कोलकाता में सब्जियों के भाव कम हो गये। यह खबर का एक पहलू है जिसे दीदी के पक्ष में रखा गया था। 

दूसरा पहलू जो साथ ही उभर कर आता है वह यह है की अपने को घास के समान जमीन से जुडा दिखलाने, समझने, कहलाने वाली पार्टी प्रमुख को क्या अभी तक यह पता ही नहीं था कि बाजार में सब्जियां आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं?   गजब है !!!

मुहावरे में नहीं, लगता है सचमुच में भी उन्हें आटे-दाल का भाव मालुम नहीं होगा। होगा भी कैसे सत्तानशीं होने के बाद कभी इन सब को जानने की जरूरत कहां रह जाती है। पर फिर सवाल उठता है कि फिर ऐसे लोग हाथ उठा, आंखें चमका किस मंहगाई को लेकर सडकों पर उतरते हैं। कैसे लोग हैं ये? किस गरीब की बात करते हैं ये सब? किस देश में रहते हैं? कौन हैं इनके सलाहकार? क्या है इनका उद्देश्य? क्या मंहगाई के लिए इनका मुद्दा सिर्फ पेट्रोल-डीजल और गैस है? वह भी सिर्फ अपने हित को साधने और अपना लक्ष्य कोई मलाईदार विभाग या प्र.मं. की कुर्सी हथियाने के लिए?  क्या  बाकि जींस, वस्तुएं, रोजमर्रा की आवश्यक चीजें  बेमानी हैं? 
तभी तो कोई आइसक्रीम का उदाहरण दे देता है और कोई सीधे कार की सब्जियों से तुलना कर आम जनता के जले पर नमक छिडकने का दुस्साहस कर देता है। ऐसा क्यूं होता है कि समाज के निचले तबके से उठ कर उपर पहुंचने वाला भी यहां आकर अपने खास हो जाने के एहसास में ऐसा जकड जाता है कि फिर उसे किसी आम से कोई लगाव ही नहीं रह जाता।

सोचने की बात है कि मनुष्य की सबसे बडी जरूरतों में से एक खाद्य की जिंसों के बारे में ही जब इन्हें जानकारी नहीं है तो किस मंहगाई के विरुद्ध जनता को दिखाने के लिए हो-हल्ला मचाते हैं? इनको मालुम होना चाहिए कि सिर्फ अपनी राजनीति को मांजने के लिए भाडे के लोगों की रैलियां निकाल, देश-प्रदेश को एक-दो दिन के लिए बंद करवा, जिससे भी गरीब के पेट पर ही लात पडती है, इनके अपने फर्ज की इतिश्री समझ लेने से ही गरीब का पेट नहीं भरता।

5 टिप्‍पणियां:

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

सत्ता पाने के बाद कुर्सी की सुरक्षा वे अपने कुशल अभिनय से करते हैं.

गरीबी, भूख और लाचारी पर वे आसानी से आँसू निकाल सकते हैं, महंगाई और बेरोजगारी पर वे अपने ही (सत्ता के) खिलाफ चिल्ला सकते हैं.

लगता बेशक अजीब है... लेकिन सत्ता पाने के बाद कुछ हद तक नेता कपटी हो जाता है... ममता को देखकर भी इसका अनुमान लगाया जा सकता है.

मौकापरस्तों की सूची में ... मायावती के बाद... मुलायम, नीतीश और अब ममता शामिल हो गये हैं.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (17-07-2012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

सुशील ने कहा…

ऎसे लोगों से जब कोई कुछ नहीं कहा जाता हे
इसी लिये पाँच साल बाद उतार दिया जाता है।

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

आपसे सहमत, हरेली अमावस की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई

शSSSSSSSSSS
कोई है

P.N. Subramanian ने कहा…

हमें सोचना होगा कि क्या इसी प्रकार की लोकशाही से भारत का उद्धार होगा या कोई परिवर्तन की आवश्यकता है.