गुरुवार, 12 जुलाई 2012

रोम की बांसुरी, फ्रांस का केक, भारत की आइसक्रीम


सुनते आ रहे हैं कि जब रोम जल रहा था तो सम्राट नीरो बांसुरी बजा रहा था और जब फ्रांस की जनता को रोटी के लाले पडे हुए थे तो वहां कि रानी ने उन्हें केक या पेस्ट्री खाने की सलाह दे डाली थी। ऐसी बातें सुन, ऐसे लोगों के प्रति वितृष्णा और साथ ही आश्चर्य भी होता था कि कोई इतना निर्मम और संवेदनहीन कैसे हो सकता है। पर मन में कहीं तसल्ली भी रहती थी कि शुक्र है अपने यहां ऐसे नेता नहीं हैं।

पर समय कहां एक जैसा रहता है, बदलाव आया, स्थितियां बदलीं, हालात बदले पुरानी पौध खत्म हो गयी। वही पहले जैसी राजशाही वाली मानसिकता वाले लोग येन-केन-प्रकारेण फिर सत्तानशीं हो गये। हालात पहले के फ्रांस और रोम से भी बदतर होते चले गये। अब तो देश के हर राज्य में एक नीरो बैठा है, जगह-जगह मेरीयों का राज्य है। इनमें ना तो अपनी प्रजा के प्रति सहानुभूति है नाहीं सवेदनशीलता है नाही उनके दुख-दर्द से कोई लेना-देना है। हर तरफ निरंकुशता का बोल-बाला है। अपने किसी कर्म-दुष्कर्म से किसी को कोई डर भय नहीं रह गया है। कुछ भी करते ना तो कोई डरता है नाहीं कुछ बोलने के पहले कोई कुछ सोचता है। झट से मुंह खोलते हैं और भक्क से कुछ भी उगल देते हैं।

ऐसा ही बयान देश के प्रमुख विभागों को संभालने वाले मंत्री महोदय की ओर से आया। उनका कहना है कि लोग 15 रुपये की आइसक्रीम तो खा लेते हैं पर चावल पर एक रुपये की बढोतरी बर्दास्त नहीं करते। देश को संभालने वाले ऐसे लोगों को क्या यह नहीं मालुम कि आइसक्रीम और चावल में से क्या ज्यादा जरूरी है और किसकी रोज जरूरत पडती है। क्या इन्हें नहीं मालुम कि करोंडों लोगों के लिए आइसक्रीम एक विलासता है।  क्या इन्हें नहीं मालुम कि रोज आधा पेट खाने वालों को आइसक्रीम नहीं सपने मे भी रोटी ही नजर आती है। दुखद किंतु सत्य है कि  ऐसे नेताओं के कुत्ते भी वातानुकूलित जगह में रहते हैं और बिना "पेडिग्री" खाए वे अपना दिन शुरु नहीं करते। ऐसे लोग आवाम के वो सेवक हैं जिन्हें सचमुच आटे-दाल के भाव का अंदाजा नहीं है। कोई इनसे पूछे कि इन्होंने रोजमर्रा की चीजें अपनी कमाई से कब खरीदीं तो शायद ही जवाब दे सकें। अभी इन्होंने अपनी गलती भांप माफी मांगी ही थी कि ऐसे ही एक सज्जन ने इनकी तरफदारी करते हुए कह डाला कि कारों की कीमत बढने पर कोई कुछ नहीं बोलता पर सब्जियों के दाम बढते ही सब चिल्लाने लगते हैं। कल कोई ऐसा ही और खडा हो जाएगा और उगल देगा कि सोने के भाव चढने पर सब मौन रहते हैं पर दूध के दाम बढते ही सब बेचैन हो उठते हैं। उस पर तुर्रा यह है कि ऐसे सभी लोग अपने को गरीबों का सबसे बडा हितैषी दर्शाते हैं। 

सरकार की नाकामी, जिसे अब देश नहीं दुनिया इंगित करने लगी है, उसका निराकरण तो दूर, अब अपना दोष भी जनता के मत्थे मढना शुरु कर दिया है। हालांकी अभी-अभी सामने आए मदांधों के हश्र से भी कोई सबक लेना नहीं चाहता। इन्हें देश की 60-70 करोड भूखी-नंगी जनता का कोई दुख-दर्द नहीं सालता।

विडंबना है हमारी और हमारे देश की कि मतिहीन, गतिहीन, संवेदनहीन, सत्ता-पिपासू, धनलोलूप लोगों के हाथ बागडोर है जो आमजन को "कैटल" या गुलामों से ज्यादा न तो समझते हैं नाहीं महत्व देते हैं। पर इन्हें याद रखना चाहिए कि यदि जनता चुप है तो वह आने वाले तूफान का संकेत भी हो सकता है।

4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह...
बहुत बढ़िया!

संगीता पुरी ने कहा…

यदि जनता चुप है तो वह आने वाले तूफान का संकेत भी हो सकता है।
सही लिखा है !!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

यह 'खास' 'आम' लोगो की 'आम' बातें भला क्या जाने ... इन को तो बस कुछ भी बोलने से मतलब है !


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प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

क्या करे जनता, क्या पहले से ही कष्ट कम हैं।