बुधवार, 30 जून 2010

कुतुबमीनार को नीचा दिखाने की कोशिश भी हुई थी.

दिल्ली की कुतुबमीनार तो खैर दिल्ली की पहचान ही बन गयी है। परन्तु इसको भी पीछे छोड़ने की कोशिश की गयी थी बीते जमाने मे।
जहां कुतुबमीनार खड़ी हो आकाश से बातें कर रही है उसी प्रांगण मे और भी बहुत से बने-अधबने अवशेष बिखरे पड़े हैं। वहीं है कुव्वतुल-इस्लाम मस्जिद। अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद को अपने मूल आकार से दोगुना बड़ा बनवा दिया था, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग नमाज अता कर सकें। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि इस मस्जिद की मीनार को भी वह कुतुब से दोगुनी बड़ी बनवा दे। उसने बनवाना प्रारम्भ भी कर दिया था पर इसी बीच उसकी मृत्यु हो जाने से उसका सपना पूरा नहीं हो पाया।
कुतुब के पास ही उसकी उत्तरी दिशा मे यह अधूरी बनी मीनार खड़ी है। जिसकी ऊंचाई करीब २४.५ फिट है। यह मुश्किल से पहली मंजिल ही बन पाई थी कि अलाउद्दीन को ऊपर से बुलावा आ गया था।

इसे अलाई मीनार के नाम से जाना जाता है।

7 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

चलिये उस का काम निपटा वरना है एक ओर मीनर देखनी पडती....

Udan Tashtari ने कहा…

आभार, इस जानकारी का..

ललित शर्मा ने कहा…

हा हा हा
राज जी से सहमत

ललित शर्मा ने कहा…

आपके ब्लाग की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

हमारे लिये एक नई जानकारी, आभार!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

नयी जानकारी के लिए आभार

राजकुमार सोनी ने कहा…

सचमुच यह अनोखी जानकारी है कम से कम मेरे लिए। आपका आभार.