शनिवार, 29 अगस्त 2009

पानी बरसाने का ऐसा जादू न कभी देखा न सुना

अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :-

काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है?  क्या वे लोग भी जादू-टोना जानते हैं ? क्या हमारे काले जादू से उनका सफेद जादू ज्यादा शक्तिशाली है ? ऐसी ही जिज्ञासाओं का उत्तर पाने के लिये सुदूर अफ़्रिका का एक ओझा इंगलैंड जा पहुंचा। उसके स्वदेश लौटने पर लोगों ने उसे घेर कर उसकी यात्रा का परिणाम जानना चाहा। उसने सबकी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिये सबको अपने घर बुलाया और अपनी दास्तान सुनानी शुरु की, वह बोला, निश्चित रूप से उनका सफेद जादू हमारे काले जादू से बेहतर है। यह मैने अपनी आंखों से देखा है। सारे लोगों की आँखें भी कान बन गयीं। सभी ने सिमट कर उसे घेर लिया।   

ओझा ने कहना शुरू किया, घूमते-घूमते मैं गोरों के देश इंग्लैण्ड जा पहुंचा। वहीँ एक दिन देखा कि लोग एक मैदान की ओर जा रहे हैं।  मैं भी उत्सुकतावश वहाँ चला गया, देखा कि मैदान के चारों ओर सैंकड़ों लोग गोल घेरा बना कर बैठे हुए थे। आकाश बिल्कुल साफ था, बादलों का नामोनिशान नहीं था। नीचे सुंदर हरी घास बिछी हुई थी। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इतने लोग किसका इंतजार कर रहे हैं। तभी कहीं से एक आदमी ने आकर मैदान के बीचो-बीच तीन लकड़ियां गाड़ दीं।  फिर उसने कुछ कदम नाप कर उन लकड़ियों के सामने तीन और लकड़ियां गाड़ दीं। इसके तुरंत बाद एक तरफ से दो आदमी जिन्होंने टोपी और सफ़ेद कोट पहन रखे थे, आये और झुक कर उन गड़ी हुई लकड़ियों पर दो-दो छोटे टुकड़े रख दिये। इसके बाद जिधर से कोट वाले आये
थे उधर से ही कुछ और लोग मैदान में आ जगह-जगह बिखर कर खड़े हो गये। मैने गिना वह ग्यारह की संख्या में थे। तभी उसी दिशा से दो और आदमी अजीब सी चीजों को शरीर पर धारण कर, एक-एक लकड़ी का चौड़ा सा डंडा हाथ में लिए आए और मैदान के बीचो-बीच पहले से दो जगह गड़े ड़ंड़ों के पास एक-एक कर खड़े हो गये।  फिर उन्होंने इधर-उधर, उपर-नीचे देखा और उनमें से एक हाथ की लकड़ी के सहारे झुक कर खड़ा हो गया। अब एक आदमी ने एक लाल गेंद निकाली और अपनी सफेद पैंट पर रगड़ने लगा। फिर उसने दौड़ते हुए आकाश की ओर हाथ उठा अजीबोगरीब तरीके से वह गेंद डंडा ले झुके हुए आदमी की ओर फेंक दी। लकड़ीवाले आदमी ने जोर से अपनी लकड़ी से गेंद को उपर आकाश में उछाल दिया और उसी समय ऐसा पानी बरसना शुरु हुआ जो घंटों बरसता रहा। पानी बरसाने का ऐसा जादू ना कभी मैने देखा था ना सुना था। इसीलिये कहता हूं कि हमारे काले जादू से उनका सफेद जादू ज्यादा बेहतर है। इसी की बदौलत वे संसार पर राज करते हैं। 

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

स्वर्ग की आत्माओं के क्रैश कोर्स के लिए पृथ्वी का निर्माण हुआ

धीरे-धीरे स्वर्ग में रहनेवाले वहां के "मनटनस" जिंदगी और दिनचर्या से ऊबने लग गये थे। वही रोज की रुटीन, ना काम ना काज, ना थकान ना चुस्ती। समय पर इच्छा करते ही हर चीज उपलब्ध। बस सुबह-शाम भजन-कीर्तन, स्तुति गायन। फिर वही हुआ जो होना था। सुख का आंनद भी तभी महसूस होता है जब कोई दुख: से गुजर चुका होता है।
अब स्वर्ग में निवास करने वाली आत्माएं जो परब्रह्म में लीन रह कर उन्मुक्त विचरण करती रहती थीं, उन्हें क्या पता था कि बिमारी क्या है, दुख: क्या है, क्लेश क्या है, आंसू क्यों बहते हैं, बिछोह क्या होता है, वात्सल्य क्या चीज है ममता क्या है। भगवान भी वहां के वाशिंदों की मन:स्थिति से वाकिफ थे। वैसे भी वहां की बढती भीड़ ने उनके काम-काज में रुकावट डालनी शुरु कर दी थी। सो उन्होंने इन सब ऊबे हुओं को सबक सिखाने के लिये एक "क्रैश कोर्स" की रूपरेखा बनाई। इसके तहत सारी आत्माओं को स्वर्ग से बाहर जा कर तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे। इसके लिये एक रंगमंच की आवश्यकता थी सो पृथ्वी का निर्माण किया गया। वहां के वातावरण को रहने लायक तथा मन लगने लायक बनाने के लिये मेहनत की गयी। हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रख उसे अंतिम रूप दे दिया गया। पर आत्माओं पर तो कोई गति नहीं व्यापति इसलिये उन्हें संवेदनशील बनाने के लिये एक माध्यम की जरूरत महसूस हुई इस के लिये शरीर की रचना की गयी जिसमें स्वर्ग के एक क्षणांश की अवधि में रह कर हरेक को तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे।
अब हर आत्मा का अपना नाम था, अस्तित्व था, पहचान थी। उसके सामने ढेरों जिम्मेदारियां थीं। समय कम था काम ज्यादा था। पर यहां पहुंच कर भी बहुतों ने अपनी औकात नहीं भूली। वे पहले की तरह ही प्रभू को याद करती रहीं। कुछ इस नयी जगह पर बने पारिवारिक संबंधों में उलझ कर रह गयीं। पर कुछ ऐसी भी निकलीं जो यहां आ अपने आप को ही भगवान समझने लग गयीं।
अब इन सब के कर्मों के अनुसार भगवान ने फल देने थे। तो अपनी औकात ना भूला कर भग्वद भजन करने वालों को तो जन्म चक्र से छुटकारा मिल फिर से स्वर्ग की सीट मिल गयी। गृहस्थी के माया-जाल में फसी आत्माओं को चोला बदल-बदल कर बार-बार इस धरा धाम पर आने का हुक्म हो गया। और उन स्वयंभू भगवानों ने, जिन्होंने पृथ्वी पर तरह-तरह के आतंकों का निर्माण किया था, दूसरों का जीना मुहाल कर दिया था, उनके लिये एक अलग विभाग बनाया गया जिसे नरक का नाम दिया गया।
अब स्वर्ग में भीड़-भाड़ काफी कम हो गयी है। वहां के वाशिंदों को अपने-अपने अनुभव बता-बता कर अपना टाइम पास करने का जरिया मिल गया है।
प्रभू आराम से अपनी निर्माण क्रिया में व्यस्त हैं।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

एक महान संगीतकार की उपेक्षित समाधि

बैजू, जिसके संगीत में पत्थर को भी पिघला देने की क्षमता थी, जिसका गायन सुन लोग जड़वत खड़े रह जाते थे, जिसने अपने समय के महान संगीतकार तानसेन को भी पराजय का मुख देखने को विवश कर दिया था। (कुछ इतिहासकारों के अनुसार दोनों का समय अलग-अलग था) आज उसकी समाधि की खोज-खबर लेने वाला भी कोई नहीं है। उसी ग्वालियर शहर में जहां हर साल तानसेन समारोह बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है वहीं के घोरपोड़े बाड़े में स्थित एक हद तक गुमनाम सी बैजू की समाधि अपनी उपेक्षा का दर्द झेल रही है। यहां तक की बहुतेरे ग्वालियर वासियों को भी इस जगह का पता नहीं है। इस बाड़े में दो समाधियां हैं। आजकल यहां की देख-रेख करने वाले एक धोबी परिवार के अनुसार दूसरी समाधि बैजू की पत्नी की है। समाधि पर होने वाली चूने की पोताई के कारण उस पर लिखे आलेख को अपठनीय बना दिया है।

कहते हैं वर्षों पहले यहां काफी रौनक हुआ करती थी। हर नया गाना सीखने वाला यहां आकर अपनी सफलता की मन्नौति मांगता था। इन्हीं समाधियों के पास एक नीम का पेड़ हुआ करता था, जिसकी दो-तीन पत्तियां खाने से गाने के कारण बैठा हुआ गला बिल्कुल ठीक हो जाता था। पर रोज-रोज की बढती भीड़-भाड़ से तंग आ कर यहां के तत्कालीन मालिक घोरपोड़े ने उस पेड़ को जड़ से ही उखड़वा दिया था।

आज जो धोबी परिवार इन समाधियों की सार-संभार कर रहा है, उसका गीत-संगीत से दूर-दूर का रिश्ता नहीं है पर पूरा परिवार बैजू को अपना कुलदेवता मानता है और जितना बन पड़ता है उतना रख-रखाव कर रहा है।

शनिवार, 22 अगस्त 2009

विवेकजी, बीडी पीना शायद उतना बुरा न भी हो (-:

विवेक जी ने बीडी पीने के लिये ब्रेक भी लिया और उसकी बुराईयां भी गिना दीं। पर उन दद्दाजी के दुखडे को भी जान लें जिन्होंने वर्षों पहले धूंआ पीना छोड़ दिया था। अपनी धर्म पत्नि के कहने पर।
एक दिन अचानक एक वृद्ध दंपति के जीवन का फुलस्टाप एक ही दिन एक ही समय आ गया। दोनो जने धर्मपरायण, सीधे-सच्चे, ईश्वर भक्त थे सो उन्हें सीधे स्वर्ग मे स्थान मिल गया। अब वहां मौजां ही मौजां। ना खाने-पीने की चिंता, ना हारी बिमारी का डर। चारों ओर शांति ही शांति, एक सा मनभावन मौसम। सकून भरी आराम दायक दिनचर्या।
पर दूसरे ही दिन वह भला आदमी, जिसने जीते-जी कभी अपनी पत्नि से एक शब्द भी जोर से नहीं कहा था, लड़ने लग गया। तुम्हारे कारण मेरी खुशियां छिन गयीं। तुम्हारी बेवकूफी से मैं आनंद से महरूम रहा, इत्यादि-इत्यादि।
बेचारी उसकी धर्मपत्नि भी हैरान-परेशान कि मैंने ऐसा क्या कर दिया। आसपास घूमते और लोग भी इकठ्ठा हो गये। तभी एक देवदूत ने उस भले आदमी से पूछा कि क्या हो गया? क्यों खफा हो रहे हो? तो वह भला आदमी बोला, अजी इस औरत ने बीस साल पहले मेरी बीड़ी-सिगरेट छुड़वा दी थी, नहीं तो मैं यहां पहले ना आ जाता।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

संसार की सबसे छोटी कहानियों में से एक

संसार की सबसे छोटी कहानी, 'ओ हेनरी' की इस कहानी में वह सब कुछ है जो एक उम्दा कहानी में होना चाहिये :-
ट्रेन के प्रथम दर्जे के डिब्बे में दो यात्री सफर कर रहे थे। एक अखबार पढ रहा था दूसरा खिड़की के बाहर के पीछे भागते दृष्यों को देख रहा था। तभी दूसरे ने अखबार वाले से पूछा, क्या आप भूतों में विश्वास करते हैं? नहीं। पहले ने जवाब दिया। अगले क्षण पहले ने अखबार हटा सामने देखा तो वहां कोई नहीं था।

'ओ हेनरी'

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

शम्मी कपूर, भारत के पहले इंटरनेट गुरु

शम्मी कपूर! जी हां, शम्मी कपूर। बहुत से लोगों को यह जान कर हैरत होगी कि शम्मीजी 1988 से कम्प्यूटर और इंटरनेट का लगातार इस्तेमाल करते आ रहे हैं। इस तरह भारत में इस टेक्नोलोजी का सबसे पहले उपयोग करने वाले इने-गिने लोगों में उनका स्थान है। आज यह 80 वर्षीय इंसान फ़िल्म जगत का सबसे अधिक पारंगत कम्प्यूटर यूजर है।
जब पहली बार वे कम्प्यूटर और प्रिंटर घर लाए थे तो दिन भर उस पर अपने प्रयोग करते रहते थे। एक बार उनके दामाद केतन देसाई के साथ अनिल अंबानी उनके घर आए तो सारा ताम-झाम देख कुछ समझ ना पाये और पूछ बैठे कि क्या शम्मी अंकल ने घर पर ही डेस्क-टाप पब्लिशिंग शुरू कर दी है। इतने बडे ओद्योगिक समूह रिलायंस के अनिल अंबानी द्वारा ऐसा सवाल यह दर्शाता है कि उस जमाने में पर्सनल कम्प्यूटर नाम की किसी चीज से लोग कितने अनभिज्ञ थे।
इसीसे यह तथ्य भी पुख्ता होता है कि शम्मीजी भारत में कम्प्यूटर और इंटरनेट के घरेलू उपयोग को बढ़ावा देने वाले रहे हैं। इसीलिए उन्हें भारत का पहला इंटरनेट गुरू या साइबरमैन कह कर पुकारा जाता है। इसी शौक से उन्हें अपने पचास साल पुराने दोस्त, जो विभाजन के पश्चात पाकिस्तान चले गये थे, से संपर्क साधने का मौका मिला और आज दोनो दोस्तों की फिर खूब छनती है इंटरनेट पर।
इस तकनीक को धन्यवाद जिसने इस दोस्ती को फिर जिंदा कर दिया। यही तकनीक आज बहुत से ऐसे लोगों को दुबारा मिलाने की जिम्मेदार है जो किन्हीं कारणों से एक दुसरे से बिछुड गये हैं।

बुधवार, 19 अगस्त 2009

पहले स्वतन्त्रता दिवस पर गांधीजी कहाँ थे ?

15 अगस्त 1947, सारी धरती, सारा आकाश, स्त्री-पुरुष, अबाल-वृद्ध सब जने ड़ूबे हुए थे आनन्दसागर मे, हर देशवासी सैंकडों सालों से प्रतिक्षित आजादी को अपने सामने पा खुशी के मारे बावरा बन गया था। देश का बच्चा-बच्चा जिस दिन खुशी से पागल हो उठा था, उस दिन इस जश्न का पैरोकार, इस उत्सव का सुत्रधार, इस स्वप्न को मूर्तरूप देने वाला शिल्पी, देश के एक कोने मे स्थित कलकत्ता मे, अमन चैन की रक्षा हेतु उपवास और प्रार्थना कर रहा था।

महात्मा गांधी ने आजादी की खुशी मे मनाए जा रहे किसी भी समारोह मे भाग नहीं लिया। उनके लिये यह 15 अगस्त भी आम दिनों की तरह ही रहा। रमजान का महीना था। लोग बापू के प्रति आदर व्यक्त कर अपना रोजा खोलना चाहते थे। सो बापू अन्य दिनों की अपेक्षा और जल्दी सो कर उठ गये थे। सुबह आने वालों मे हिंदू भी थे। गांधीजी सबसे मिले। फिर गीता का पाठ करने लगे। इसके बाद सदा की तरह प्रात: भ्रमण के लिए निकल पडे। सडकों पर उनके दर्शन के लिए भीड एकत्रित थी। करीब आठ बजे बापू लौटे और एकत्रित जनों से कहा कि आज हमें आजादी मिली है परन्तु इसके साथ ही हमारी जिम्मेदारी भी बढ गयी है। जिस चरखे ने हमें आजादी दिलाई है उसे हमे नहीं भूलना है। उपवास से हमारा शरीर शुद्ध होता है। इस प्रकार हमें शुद्ध होकर प्रभू से प्रार्थना करनी है कि वे हमें आजादी के काबिल बनाएं। यह हमारी परीक्षा की घड़ी है।

गांधीजी का एक अलग ही सपना था, आजादी को लेकर, वे चाहते थे कि सारे भारतवासी अपने आप को आजादी के काबिल बनाएं। उनका कहना था कि हमें प्रभू को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने हम गरीब भारतवासियों के बलिदान का फ़ल दिया है। आजादी का दिन हमारी परीक्षा का दिन है। इस दिन सब उपवास रखें। चरखा चलाएं। किसी तरह की गडबडी ना हो। आजादी के लिए रोशनी के द्वारा समारोह करना उचित नहीं है। जबकि देश की जनता के पास प्रयाप्त अनाज, तेल और कपडा नहीं है। बापू नहीं चाहते थे कि 1946 की पुनरावृती हो। फिर भी कलकत्ता अशांत हो गया था और उन्हें आजादी का पहला दिन वहीं बिताना पडा था। अमन-चैन की बहाली के वास्ते। बापू प्रार्थना मे मुश्किल से ध्यान लगा पा रहे थे क्योंकि हजारों लोग उनसे मिलने और यह कहने आ रहे थे कि उन्हीं के कारण देश यह दिन देख सका है। इस कारण वे कुछ नाराज से हो गये और उन्होंने भवन का मुख्य द्वार बंद करवा दिया। बाद मे बंगाल सरकार के मंत्रीगण उनसे मिलने आए तो बापू ने स्पष्ट शब्दों मे उनसे कहा कि आज आपने अपने सर पर कांटों का ताज पहना है। सत्ता बेहद बुरी चीज है। आपको गद्दी पर बैठ कर सदा चौकस रहना होगा। आपको सत्यवादी, अहिंसक, विनम्र तथा सहनशील होना होगा। धन-दौलत-सत्ता के लालच मे नहीं फंसना है। आप गरीबों की सेवा के लिए हैं। अंग्रेजों के शासन की परीक्षा तो खत्म हो गयी है अब हमारी परीक्षा का कोई अंत नही ईश्वर आपकी मदद करे। लाख बुलाने पर भी गांधीजी किसी समारोह मे नहीं गये।

शाम को प्रार्थना सभा मे जबरदस्त भीड़ थी। प्रार्थना के बाद उन्होंने फिर जनता को संबोधित कर कहा कि आज आजादी का पहला दिन है। राजाजी गवर्नर हो गए हैं। लोगों ने सोचा कि अब आजादी मिल गयी है, सो उन्होंने राजाजी के घर पर कब्जा जमा लिया। यह अच्छी बात है कि लोग जान गये हैं कि सबको समानता का अधिकार है, पर यह दुख की बात है कि वे सोचने लगे हैं कि उन्हें मनचाहा काम करने, चीजों को तोडने-फ़ोडने और नष्ट करने की भी आजादी मिल गयी है। जनता ऐसा काम ना कर, खिलाफ़त आंदोलन के समय जैसी एकता दर्शाई थी वैसी ही भावनाएं बनाए रखे। उस शाम गांधीजी के साथ सुहरावर्दी भी थे, उन्होने भी बापू के बाद सभा को संबोधित करते हुए हिन्दु-मुसलिम एकता की दुहाई दी, सबने मिल कर जय-हिंद का नारा बुलंद किया। गांधीजी के चेहरे पर उस दिन पहली बार मुस्कान की आभा दिप्त हुई। फिर बहुत अनुरोध करने पर बापू शहर मे की गयी रोशनी देखने निकले। लोगों का सैलाब उनकी ओर उमड पडा। छोटे-छोटे बच्चे बेहद आतुरता से उनके हाथ थामने को लपकते रहे। भीड उन पर गुलाब की पंखुडियों की बौछार करती रही। करीब दस बजे बेहद थक कर गांधीजी लौटे और बिना किसी से बात किए सोने चले गये।

स्वतंत्र भारत की नियती से स्वतंत्रता संग्राम के महानायक की यह पहली मुठभेड थी।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

दीपिका पादुकोण को देख मन कुढ़ता है

कभी-कभी आपने देखा होगा कि क्रिकेट में बुरी तरह हार जाने के बावजूद एक ऐसा विज्ञापन आता रहता था, जिसमें इरफान की बाल आग उगल रही होती है, विरेन्द्र सहवाग के बैट से छू कर बाल मैदान के बाहर जा रही होती है और धोनी असंभव सा कैच लेने में सफल होता है और आप भारत की हार, जिसने टीम को प्रतियोगिता से बाहर करवा दिया था, को याद कर कुढते रहते हैं।
ऐसा ही कुछ पिछले एक पखवाड़े से मेरे साथ हो रहा था, दीपिका पादुकोंण को खम खा कर BSNL का प्रचार करते देख। उसके अनुसार BSNL पूरे "इंडिया" को लाइटिनिंग युग में ले जायेगा। हर चीज विद्युत की तेजी से सम्पन्न हो जाया करेगी। अब बताईये जिसका फोन पिछले 14 दिनों से कोमा में पड़ा हो, जिसका चोंगा घर का हर सदस्य दिन में दर्जनों बार धड़कन वापस आने की उम्मीद से उठाता हो, जिसकी मधुर ध्वनी सुनने के लिये सब के कान चौबीसों घंटे उसकी ओर लगे हों उनके दिल पर क्या बीतती होगी यह सब देख-सुन कर। जी हां पूरे चौदह दिनों से मेरा फोन कोमा में है। इसके डाक्टरों को पूछ-पूछ कर हार गया कि ऐसा कौन सा फ्लू इसे हो गया है जो इसकी बोलती बंद है। पर आज तक किसी डाक्टर ने सही जवाब दिया है जो यह बताते। रोज कल-कल करते कितने कल निकल गये यह सच साबित करते हुए कि क्या कभी कल भी आया है।
इधर यह हालत है कि मैं आप लोगों से ना मिल पाने की वजह से गम खाये जा रहा हूं। यह जानते हुए भी कि मेरे वहां ना जाने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, पर वहां ना होने की वजह से मुझे जो फर्क पड़ा उसे कैसे बताऊं। सोचता हूं कि क्यूं एक छोटे से इलाके के कुछ सौ फोनों को सुधारने में सैकड़ों घंटे लग जाते हैं सरकारी मशीनरी को। जब की ना इस बार इतना पानी ही बरसा कि जल-थल हो जाये। दूसरी ओर निजी कंपनियों के कर्मचारी दिन-रात एक कर देते हैं एक-एक फोन को काम करवाते रखने के लिये। उत्तर भी मिल जाता है इस कहानी से -
एक बार एक शेर एक खरगोश को अपना शिकार बनाने के लिये उस पर झपटा। काफी दौड़ने के बाद भी वह शेर के हाथ नहीं आया। उसके लौटने पर शेरनी ने पूछा कि तुम एक अदने से खरगोश को क्यों नहीं पकड़ पाये? शेर ने जवाब दिया , मैडम वह अपनी जिंदगी बचाने के लिये दौड़ रहा था, जबकि मैं उसे खाने के लिये।

रविवार, 9 अगस्त 2009

"उज्जैन" के ब्लॉगर बंधु

अगले हफ्ते मेरा उज्जैन जाना हो सकता है। मेरी हार्दिक इच्छा है की मैं वहाँ के ब्लॉगर बंधुओं से मिलूँ। सो वहाँ रहने वाले सारे ब्लॉगर भाई-बहन अपना पता मुझे भेजने की कृपा करें।
मेरी आप सब भाई बहनों से भी प्रार्थना है कि आप वहाँ रहने वाले, जिनका भी नाम और पता जानते हों उनका परिचय मुझसे करवाने का कष्ट करें। अच्छा लगेगा इस तरह सबसे परिचय करके, अपने दोस्त-मित्रों का दायरा बढ़ा कर, अनदेखे अपनों को सामने पाकर।
आशा है आपका सहयोग मिल पायेगा।

हंसी न भी आयी तो मुस्कराहट तो जरूर आयेगी.

संता, बंता तथा कंता पुलिस में भर्ती होने गये। उनको अपराधियों की शिनाख्त करने के लिये एक फोटो दिखाई गयी जिसमें एक आदमी का बगल से खिंचा गया चित्र था। पहले कंता से पूछा गया कि इस आदमी की क्या खासियत है? इसे कैसे पहचानोगे? कंता बोला, अरे यह तो बहुत आसान है। इस आदमी का एक ही कान है। इसे तुरंत पहचान लूंगा। सामने वाले ने अपना सिर पीट लिया। इसके बाद बंता को बुला कर उससे भी वही सवाल पूछा गया, उसने भी झट से जवाब दिया कि एक आंख वाले को पकड़ने और पहचानने में कोई दिक्कत नहीं है। साक्षात्कार लेने वाला झल्ला कर बोला, कैसे बेवकूफ हो तुम्हें इतना भी नहीं पता कि यह साइड पोज है। चलो भागो यहां से। चले आते हैं पुलिस में काम पाने। अब संता की बारी थी। उसको बुला कर भी वही सवाल पूछा गया, कि इस आदमी को कैसे पहचानोगे? संता ने गौर से फोटो देखी और बोला, मैं इसे पहचान लूंगा, क्योंकि इसने कान्टेक्ट लेंस लगाया हुआ है। साक्षात्कार लेने वाला हैरान। यह बात तो उसे भी मालुम नहीं थी। तुरंत फाइलें खंगाली गयीं तो पाया गया कि संता का कहना सही है। सबने उसकी सूझ-बूझ की बड़ी प्रशंसा की। फिर ऐसे ही उससे पूछ लिया गया कि उसे यह बात कैसे पता चली। संता बोला, जी यह तो कामन सेंस की बात है। एक आंख वालों की नज़र कमजोर होती है और इस बेचारे का कान भी एक ही है तो यह चश्मा तो पहन नहीं सकता। जाहिर है यह कांटेक्ट लेंस ही लगाता होगा।
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एक बार संता पर भगवान की कृपा हो गयी। भगवान ने कहा कि तुम्हें दो चीजों में से कोई एक चीज मिल सकती है, या तो तुम सारे जमाने की अक्ल ले लो या फिर दस करोड़ रुपये। संता ने अक्ल मांग ली। प्रभू ने उसकी इच्छा पूरी कर दी। दूसरे दिन वह उदास बैठा था। उसकी बीवी ने जब उसकी उदासी का कारण पूछा तो वह बोला, 'भागवान मुझे रुपये लेने चाहिये थे'।
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एक बार पागलखाने के डाक्टरों को लगा कि उनके तीन मरीज ठीक हो गये हैं। फिर भी उन्हें घर भेजने के पहले एक टेस्ट कर लेना उचित समझा गया। तीनों को एक खाली स्विंमींग पूल पर ले जाकर डाक्टर ने कहा, पूल में छलांग लगाओ। यह सुनते ही दो पागल कूद पड़े और चोट खा बैठे। डाक्टर ने तीसरे की तरफ देख कहा कि तुम बिल्कुल ठीक हो गये हो लगता है पर यह बताओ कि तुम क्यूं नहीं कूदे?
मुझे तैरना कहां आता है। तीसरे ने मासूमियत के साथ जवाब दिया।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

भेडिए की दादागिरी

एक बहुत पुरानी कहानी है, पर यह पूरी तरह आज अमेरिका के चरित्र को उजागर करती है :-
एक मेमना एक झरने से पानी पी रहा था। तभी उससे काफी उंचाई पर एक भेडिया कहीं से घूमता-घामता आ पहुंचा। मेमने को देखते ही उसके मुंह में पानी आ गया और वह उसे मारने का बहाना बनाते हुए मेमने को डांटते हुए बोला, अरे बेवकूफ तू मेरे पीनेवाले पानी को जूठा क्यों कर रहा है? बेचारे मेमने की हालत तो भेड़िये को देख ऐसे ही खराब हो गयी थी, फिर भी उसने साहस कर कहा, कि पानी तो ऊपर से नीचे की ओर आ रहा है, मैं उसे जूठा कैसे कर सकता हूं। यह सुन भेड़िया एकबार तो सकपका गया पर उसे तो मेमने को अपना शिकार बनाना था। झुंझला कर भेड़िये ने कहा, चलो ठीक है पर यह तो बता कि पिछले साल तूने मुझे गाली क्यूं दी थी। मेमना कुछ संभल गया था। उसने जवाब दिया, मैं पिछले साल आपको गाली कैसे दे सकता था, मैं तो अभी आठ महीने का ही हूं। अपना वार खाली जाते देख भेड़िया बुरी तरह गुस्से में आ गया और बोला, साले तूने नहीं तो तेरे बाप ने मुझे गाली दी होगी। इतना कह भेड़िये ने झपट कर मेमने को दबोच लिया और उसका काम तमाम कर दिया।
आज दुनिया में अमेरिका का रवैया भी उस भेड़िये से मिलता-जुलता है। जो भी उसके खिलाफ खड़ा होने या उसकी बात ना मानने की जुर्रत करता है, उसका हश्र कुछ-कुछ उस गरीब मेमने सा ही हो जाता है।

सोमवार, 3 अगस्त 2009

एक "बोगस" शब्द का जन्म

आजकल हमारे यहां नकली नोटों ने अफरातफरी मचा रखी है। पर इन्हीं नकली नोटों ने वर्षों पहले अंग्रेजी डिक्शनरी को एक नया शब्द दिया था। "BOGUS"
बात 1827 की है। अमेरिकी सरकार भी नकली नोटों के चलन से परेशान थी। रोज कहीं ना कहीं छापे पड़ते थे, लोग पकड़े जाते थे। ऐसे ही पुलिस ने एक जगह छापा मार कर नकली नोट छापने वालों को तो पकड़ा ही उनका सारा सामान भी तहस-नहस कर दिया। उनकी नोट छापने वाली मशीन को भी सड़क पर फेंक दिया। जिसे देखने के लिये भीड़ एकत्रित हो गयी। मशीन की बनावट कुछ अजीब सी थी जिसे देख कर भीड़ में से किसी ने कह दिया कि क्या 'ओगस-बोगस' सी मशीन है। दूसरे दिन जब अखबार में खबर छपी तो उसने मशीन का नाम ही बोगस प्रेस लिख दिया। तब ही से यह शब्द अस्तित्व में आया और आज इसका व्यापक रूप मे इस्तेमाल हो रहा है।

पोस्ट बोगस तो नहीं है ? (-:

शनिवार, 1 अगस्त 2009

माँ की खिल्ली उडाता एक विज्ञापन

सीन, एक :- एक लड़की घर से निकल रही है। पीछे से आवाज आती है, बाहर बाल खुले मत छोड़ना। तभी वह बाला अपने सारे बालों को लहरवा देती है।
सीन, दो :- वही कन्या आफिस में प्रवेश करती है। पीछे से हिदायत भरी आवाज सुनाई देती है, आफिस में बाल खुले मत रखना। सुनते ही सर को झटका दे वह अपने सारे बालों को आजाद कर देती है।
सीन, तीन :- मां अपने सामने बैठी अपनी लाड़ली के बालों को निहारते हुए फूली नहीं समाती, अपनी सलाहों पर। उधर लड़की मुस्कुराती है, माँ के भोलेपन और अपनी चतुराई पर।
यह एक शैंपू का विज्ञापन है। पता नहीं आज अपना सामान बेचने के लिये, अपना उत्पाद घर-घर पहुंचाने के लिये ज्यादातर कंपनियां मां-बाप को अज्ञानी, समय से पिछड़ा हुआ दिखाने पर क्यों तुली रहती हैं। ये कैसी सोच है? ऐसा भी तो हो सकता था कि मां कहती, बेटा हम फलाना शैंपू प्रयोग में लाते आ रहे हैं, इससे ना कभी मुझे बालोँ की चिंता करनी पड़ी ना तुम्हें पड़ेगी। पर विज्ञापन बनाने वाले अधकचरे दिमागों में यह बात गहराई तक पैठ गयी है कि अवहेलना, उद्दंड़ता, लापरवाही ही आज सफलता का मापदंड़ हो गयी है।
पर कौन और कैसे कोई समझाये किसी को कि यदि क्रीमों से ही इंसान सुंदर और गोरा-चिट्टा होने लग जाता तो आज अफ़्रीका में कोई काले रंग का ना बचा होता। (-:

बरसात में सजीव हो उठता है मांडू

मुगल सेनापति बाज बहादुर और रूपमति की प्रेम गाथाओं को अपने दामन में समेटे, मध्यप्रदेश के धार जिले में विंध्य पर्वत की गोद में स्थित 22किमी के क्षेत्र में बसा मांडव या मांडवगढ या मांडू आज भी ऐसी-ऐसी इमारतों और प्राकृतिक दृष्यों को सहेजे खड़ा है, जो वास्तुकला और प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम मिसाल हैं। 1405-1434 में होशंग शाह के राज्य में यह अपने चर्मोत्कर्ष पर था। उसने ही स्वतंत्र मांडव राज्य की स्थापना की थी। परंतु मुगलों के आगमन से ही इसका पराभव शुरु हो गया था। परंतु आज भी इसका वैभव देख इसकी सुंदरता का अंदाज आसानी से लग जाता है। बरसात के दिनों में तो यहां स्वर्ग उतर आता है। यहां की वादियां, घाटियां, चारों ओर फैली हरियाली मानो जिवंत हो पर्यटकों को एक जादुई दुनियां में ले जाती है।
यहां का सबसे बड़ा आकर्षण, झीलों के बीच बना जहाज महल, सुंदरता का बेजोड़ नमूना है। इस पर बने रानी रूपमती के झरोखे से, जहां पर्वत श्रृंखला खत्म हो जाती है और सामने खुला मैदान नजर आता है। दूर नर्मदा नदी एक लकीर की तरह नजर आती है। कहते हैं कि बिना नर्मदा के दर्शन किये रूपमती जल ग्रहण नहीं करती थी। इसीलिये बाज बहादुर ने यहां नर्मदा के दर्शन हेतु यह झरोखा बनवाया था।
मांडू अपने महलों के लिये विख्यात है यहां देखने लायक बहुत सी इमारतें हैं। जिनमें बाज बहादुर महल, हिंडोला महल, मुंज महल, हाथी महल , जामा मस्जिद, अशर्फी महल, चम्पा बावड़ी, रेवा कुंड इत्यादि किसी को भी अपने मोहपाश में बांधने में सक्षम हैं। इनके अलावा यहां का सनसेट पांइट और ईको पांइट भी महसूस करने लायक स्थान हैं। यहां के नीलकंठ महादेव और जैन मंदिर का अपना अलग ही आकर्षण है।
मांडू घूमने में समय की समस्या भी आड़े नहीं आती। दो दिनों में यहां आराम से घूम, बिना जेब पर ज्यादा बोझ डाले भी पूरी जगहें देखी जा सकती हैं। इंदौर से सड़क के रास्ते इसकी दूरी 100किमी है। यहां से हर तरह के वाहन उपलब्ध हैं। अभी मौसम है, हो सके तो मौका मत चूकीये।