बुधवार, 10 अगस्त 2016

कोटा का दाढ़ देवी मंदिर

राजस्थान के कोटा शहर से करीब  20-22 की. मी. की दूरी पर हाडौती क्षेत्र के उम्मेदगंज नामक स्थान पर सुनसान सी जगह में स्थित है एक मंदिर, जिसमें माँ दुर्गा को दाढ़ देवी के नाम से पूजा जाता है ..

दाढ़ देवी ! है ना अजीब सा नाम ? पर  इंसान की आस्था, विश्वास और सोच की कोई सीमा नहीं होती। उसकी इसी फ़ितरत ने ना जाने कितने पूजा-स्थलों का निर्माण, कैसे-कैसे नामों से करवाया है। ऐसी ही एक आस्था का प्रतीक है, राजस्थान के कोटा शहर से करीब  20-22 की. मी. की दूरी पर हाडौती क्षेत्र के उम्मेदगंज नामक स्थान पर सुनसान सी जगह में स्थित एक मंदिर, जिसमें माँ दुर्गा को दाढ़ देवी के नाम से पूजा जाता है। इस मंदिर का निर्माण कैथून के तंवर राजपूतों ने अपनी कबीले की देवी की आराधना के लिए करवाया था। दस भुजाओं तथा त्रिनेत्र वाली माता सिंह पर आसीन हैं। हर हाथ में आयुध हैं। नागर
शैली में चूना-पत्थर से बने इस मंदिर को बारह कलात्मक खंभों का सहारा दिया गया है। मंदिर के सामने एक हौज है जिसमें जमीन के अंदर से पानी आता है। साल के दोनों नवरात्रों में यहां मेला लगता है जिसमे भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यहां शिव तथा काल भैरव के भी मंदिर हैं। 

दुर्गा जी के इस नाम के पीछे एक जनश्रुति चली आ रही है, कहते हैं एक बार कोटा के राजा उम्मेद सिंह की दाढ़ में भयंकर दर्द उठा। जमाने भर के इलाज करवाने पर भी उनका कष्ट कम नहीं हुआ तो उन्होंने इसी मंदिर में जा माँ दुर्गा देवी की पूजा-अर्चना की जिससे उनका रोग ख़त्म हो गया। तब उन्होंने एक और मंदिर का निर्माण करवा इस मंदिर की प्रतिमा को नए मंदिर में स्थापित करना चाहा पर उनकी लाख कोशिशों के बावजूद मूर्ति टस से मस नहीं हुई। इसे माँ की इच्छा समझ, उन्हें वहाँ से हटाने की कोशिश छोड़, वहीँ यथावत उनकी पूजा होती आ रही है। 

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

भागम-भाग में बीते दो महीने

इतनी व्यस्तता, उठा-पटक, भाग-दौड़ से शरीर का थोड़ा नासाज होना भी बनता है, हुआ भी है। पर उसे प्यार से समझाना पड़ा है कि अगले हफ्ते पड़ने वाले तीन अवकाशों में हमें सालासर के बालाजी महाराज के दर्शनों का संकल्प भी पूरा करना है, सो भाई हमारा साथ ना छोडना, ज़रा ठीक ही रहना !!    

बहुत दिनों के बाद आप सब से फिर रूबरू होने का मौका मिला है। पिछले एक-दो महीने में काफी कुछ घटित हुआ, बड़े बदलाव आए जिनके दौरान छोटा बेटा  परिणय-सुत्र में बंध गया, अपने जीवन की एक नई शुरुआत करने के लिए। घर में एक नए सदस्य का आगमन हुआ है। बिटिया को नए परिवेश, नए संबंध, नए लोगों से तालमेल बैठाना है। वैसे आजकल की पीढ़ी को उतना वक्त नहीं लगता इन सब बातों में जितना पहले लगा करता था। फिर भी एक-दूसरे के अनुसार ढलने में कुछ समय तो लग ही जाता है।  

घर में सदस्य बढे तो ज्यादा जगह की आवश्यकता भी महसूसी गयी, उसी के लिए फिर एक बड़े घर की तलाश ख़त्म की गयी। शायद मुझे प्रभु की देन है कि मैं बीती-बितायी पर ज्यादा ध्यान नहीं देता। जो आज है वही सच है। पर कभी-कभी पुरानी दबी-ढकी कोई कसक, टीस दे ही जाती है। यह रोज-रोज खानाबदोशों की तरह बोरिया-बिस्तर समेटते-बिछाते, राजौरी गार्डन के करीब चार सौ गज में बने घर की याद आ ही जाती है ! जिसे पता नहीं किस ग्रह-दशा में, बिना ज्यादा सोचे-समझे बेच-बाच कर दिल्ली छोड़ दी थी। समय चक्र घूमा, फिर उसने बीस-बाइस साल बाद वहीँ ला पहुंचाया। मेरी कोशिश रहती है कि भूली-बिसरी यादें ताजा ना ही हों, पर परिवार का क्या किया जाए, जो रोज-रोज की उठा-पटक और आसमान छूते मकान के किरायों की वजह से तंग आ कुरेद ही देता है पिछली घटनाओं को ! पर कहावत है ना कि कोई अक्लमंदी से कमाता नहीं और ना कोई बेवकूफी से गंवाता है। सब होनी के वश में है, जो होना होता है, वह हो कर ही रहता है।

इसी सब में जो पिछले महीने से व्यस्तता शुरू हुई वह अभी भी पूर्णरूपेण ख़त्म नहीं हुई है। बेटे की शादी के बाद ईश्वर की अनुकंपा से प्रभू त्र्यम्बकेश्वर के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ। चारों मेट्रो शहरों में से बचे एक मुंबई की भी आंशिक यात्रा हो गयी। जिसके साथ-साथ नासिक और पुणे का भी भ्रमण हो गया। लौटते ही, पहले से तय, भतीजे अतुल, जिसे जब पिछली बार देखा था तब वह गोदी में हुआ करता था, की शादी में चंडीगढ़ के पास पंजाब के जिरकपुर का भी चक्कर लगाना हुआ।  समय कैसे फिसलता चला जाता है !! यह तो भला हो आधुनिक तकनीक का, जिससे दूर-दराज बैठे हुए भी एक-दूसरे के हाल-चाल की जानकारी मिलती रहती है। इसी भाग-दौड़ के बीच जो भी समय मिलता उस में नयी जगह में "शिफ्टिंग" भी बदस्तूर जारी रही, जहां अभी भी सामान का जमना-ज़माना चल ही ही रहा  है।

इतनी व्यस्तता, उठा-पटक, भाग-दौड़ से शरीर का थोड़ा नासाज होना भी बनता है, हुआ भी है। पर उसे प्यार से समझाना पड़ा है कि अगले हफ्ते पड़ने वाले तीन अवकाशों में हमें सालासर के बालाजी महाराज के दर्शनों का संकल्प भी पूरा करना है, सो भाई हमारा साथ ना छोडना, ज़रा ठीक ही रहना !!              

लगता तो है कि तन ने बात मान ली है, अब मन और धन भी सकारात्मक रहें इसलिए प्रभू की इच्छा, अनुकम्पा और वरदहस्त की आकांक्षा है।          

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

बुजुर्गों का ख्याल रखना सामाजिक कर्तव्य है

आज कुत्ते-बिल्लियों तक के लिए कानून बने हुए हैं पर मानव ही सबसे ज्यादा उपेक्षित है, खासकर बुजुर्ग, और यह तब है जबकि सभी को इस उम्र से गुजरना है। इसीलिए सरकार, स्वंयसेवी संस्थाओं और एन.जी.ओ. इत्यादि को इस समस्या के समाधान के लिए कुछ तो सार्थक कदम उठाने ही चाहिए। यह सब तो जब होगा तब होगा फौरी तौर पर तो हमें ही पहले ध्यान देना चाहिए कि हमारे अड़ोस-पड़ोस में या जान-पहचान में ऐसा कोई भी व्यक्ति या दंपति हो तो उसका हम ध्यान रखें और किसी भी अनहोनी पर उनकी सहायता के लिए तैयार रहें      

कल मैनपुरी से शिवम जी ने फोन कर, दिल्ली में मेरे नजदीक ही रह रहे, अपने भाई साहब के निवास के ऊपर अकेले निवासित एक निःसंतान वृद्ध दंपति के बारे में बताया कि किस तरह रात को अचानक तबियत बिगड़ने पर उन्हें कैसी-कैसी समस्याओं से जूझना पड़ा। आज बुजुर्गों का अकेलापन खुद अपने आप में एक समस्या है जो दिनों-दिन विकराल रूप लेती जा रही है। हादसे कभी बतला कर नहीं आते। चाहे-अनचाहे हजारों ऐसे वयोवृद्ध लोगों को अकेले रहने का दुःख तो भोगना ही पड़ता है, साथ-साथ  हारी-बिमारी की समस्या, रोजमर्रा के कामों में आने वाली तरह-तरह की परेशानियां और खतरे भी बने रहते हैं।          

जिस दंपति की बात कर रहा था, श्री और श्रीमति कोहली, दोनों की उम्र अस्सी साल के आस-पास है। दोनों अपने निवासस्थान पर अकेले रहते हैं। दो दिन पहले श्री कोहली रात को टॉयलेट जाने के लिए उठे तो अचानक ही उनकी तबियत बुरी तरह बिगड़ गयी। किसी तरह घिसटते हुए कमरे तक आ उन्होंने पत्नी को जगाया, जिन्होंने फोन कर अपने नीचे रहते विक्रम जी को सहायता के लिए बुलाया। रात का समय, नींद की खुमारी, जल्द कुछ समझ में भी तो नहीं आता, ऐसे में ही विक्रम जी नेअपने पहचान के डॉक्टर को फोन किया पर उसने घर आने से मना कर दिया। फिर समय की नाजुकता को देखते हुए विक्रम जी, कोहली जी को पास के एक नर्सिंग होम ले गए पर वहां उचित चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी, हाँ, उन्होंने इतनी सहायता जरूर की कि एम्बुलेंस को फोन कर दिया। पर करीब आधे घंटे तक भी गाडी के ना आने पर दूसरी जगह कोशिश की गयी तो वहां से ड्रायवर के ना होने की मजबूरी जता दी गयी। फिर 102 न. की हेल्प लाइन पर कोशिश की गयी तो वहां से मांगी गयी दसियों जानकारियां देने के पश्चात उन्होंने बताया कि वे सिर्फ सरकारी अस्पताल ही ले जा सकते हैं। यह सब जानकारियां रोगी को सुरक्षित पहुंचा कर भी तो ली जा सकती थीं। खैर इतने में पहले फोन वाली एम्बुलेंस आ गयी और कोहली जी को दूसरे अस्पताल ले जाया गया पर वहां सारे परीक्षणों की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। हड़बड़ाहट में  फिर तीसरी जगह पहुंचे तो वहां टेस्ट तो हो गए पर भर्ती करने की समस्या सामने आ खड़ी  हुई। समय सरकता जा रहा था, इलाज शुरू नहीं हो पा रहा था। साथ के लोगों की चिंता और रक्तचाप बढ़ते जा रहे थे। ऐसे में ही तीसरे अस्पताल से रिपोर्ट ले कर भागते हुए फिर पहले अस्पताल पहुंचे और वहां आई.सी.यु. में कोहली जी को दाखिल करवाया जा सका। भगवान का शुक्र है कि इतनी देर होने के बावजूद वे खतरे से बाहर हैं। पर इस तरह के बुजुर्ग दंपतियों पर इस तरह का खतरा तो बना ही रहता है। हर किसी को सहृदय विक्रम जी जैसा पड़ोसी तो मिलता नहीं। आज तो हालात यह हैं कि अधिकांश लोगों को अपने पडोसी का चेहरा तक देखे अर्सा बीत जाता है। यह तो दिल्ली का हाल है, छोटे शहरों की हालत की तो कल्पना ही की जा सकती है !

कुछ दुर्घटनाएं या बीमारियां ऐसी होती हैं जहां समय का बहुत महत्व होता है। जरा सी देर होने पर ही जान पर बन आती है। खासकर वयोवृद्ध अवस्था में। तो कुछ तो ऐसा होना चाहिए जिससे समाज को अपनी उम्र दे चुके, हमारी आबादी के करीब  8-9 प्रतिशत के इस वर्ग को जीवन के इस पड़ाव पर असुरक्षा महसूस न हो। चौबीसों घंटे उन्हें यह डर ना बना रहे कि हमारे साथ कुछ अघटित हो जाता है तो हम क्या करेंगे ! आज कुत्ते-बिल्लियों तक के लिए कानून बने हुए हैं पर मानव ही सबसे ज्यादा उपेक्षित है। और यह तब है जबकि सभी को इस उम्र से गुजरना है। इसीलिए सरकार, स्वंयसेवी संस्थाओं और एन.जी.ओ. इत्यादि को इस समस्या के समाधान के लिए कुछ तो सार्थक कदम उठाने ही चाहिए। खासकर उन बुजुर्गों के लिए जो बिलकुल ही अकेले रहते हों। जिस तरह बच्चियों और युवतियों के लिए "हेल्प लाइन" बनाई गयी हैं उसी तर्ज पर इनके लिए भी "हॉट लाइन" हो। छोटे-छोटे वार्ड बना कर उसमें रह रहे ऐसे लोगों के नाम एक जगह एकत्रित हों जिससे वहां फोन करते ही उचित सहायता उपलब्ध करवाई जा सके। सप्ताह में  दो-तीन बार उनकी खोज-खबर ले उनका ध्यान रखा जा सके। यह सब तो जब होगा तब होगा फौरी तौर पर तो हमें ही पहले ध्यान देना चाहिए कि हमारे अड़ोस-पड़ोस में या जान-पहचान में ऐसा कोई भी व्यक्ति या दंपति हो तो उसका हम ध्यान रखें और किसी भी अनहोनी पर उनकी सहायता के लिए तैयार रहें।

सच तो यह है कि जिस पर गुजरती है वही झेलता और संभालता है। हमारे यहां तो यह सब रोज का किस्सा बना हुआ है। दुर्घटना हो जाती है तो सहायता नहीं मिलती। सहायता मिल जाती है तो ढंग की जगह नहीं मिलती। जगह मिल जाती है तो समय पर उपचार नहीं मिल पाता। उपचार मिल जाता है तो पीड़ित को लाने वाले से ढेरों सवाल पूछे जाते हैं। विडंबना है कि कुछ भले लोग चाह कर भी, कानूनी और पुलिस के खमों-पेच से घबरा कर सहायता करने से गुरेज करते हैं।

इस समस्या के निवारण के लिए विज्ञ जनों के सुझाव आमंत्रित हैं।  

मंगलवार, 28 जून 2016

पानी की समस्या अगले साल तक के लिए गौण हो गयी है :-(

कभी-कभी तो मन में यह संशय भी सर उठाता है कि क्या पानी की यह कमी प्रायोजित तो नहीं है ?क्योंकि हम आकंठ भ्रष्टाचार में इस तरह लिप्त हैं कि हमें खुद के लाभ की बजाए और कुछ भी सुझाई नहीं देता है ! याद आते है, अस्सी के दशक की गर्मियों के वे दिन जब रेलवे स्टेशनों पर पानी की उपलब्धता जान-बूझ कर रोक दी जाती थी जिससे प्यासे यात्रियों को मजबूरी में ऐसे-वैसे बोतलबंद ठंडे पेय को अनाप-शनाप कीमत चुकता कर खरीदना पड़ता था     

हम लोग सकारात्मक सोच वाले, वर्तमान में जीने वाले लोग हैं। हम उन मनोवैज्ञानिकों के अनुयायी हैं जो कहते हैं जब तक समस्या सामने न हो उस के बारे में मत सोचो ! तो लो जी,  बरसात आ गयी तो सरकार ने भी राहत की सांस ले विगत पानी की समस्या को ठंडे बस्तों में डाल देना है। पानी पर गुल-गपाड़ा मचाने वाले मीडिया में अब दूसरे-तीसरे मुद्दे उछलने लगेंगे। लोग वैसे ही कारें धोते रहेंगे। संत्रीयों-मंत्रियों के लॉन हरियाए जाते रहेंगे, सार्वजनिक नलों से टोंटी ना होने की वजह से पानी, पानी की तरह बहता रहेगा। बरसात के पानी को अभी कोई संजोने की नहीं सोचेगा। नदियां उफनने लगेंगी, बाढ़ से तबाही मचेगी, पर अभी, सभी, आगामी गर्मियों तक इस बेशकीमती प्राकृतिक देन का मोल फिर नहीं समझेंगे।     

आज पूरे देश में नागरिकों को पानी एक निश्चित अवधी के लिए ही उपलब्ध करवाया जाता है। जिसमे कभी-कभी तकनीकी कारणों से नागा भी पड़ जाता है जिसकी आशंका से लोग जरुरत से ज्यादा पानी का भंडारण कर लेते हैं पर बहुत सारे घरों में देखा गया है कि जैसे ही सुबह का पानी उपलब्ध होता है, पिछले दिन के संचयित जल को फेंक कर उस "ताजे" पानी का भंडारण कर लिया जाता है। इसी तरह रोज पीने के पानी को बदलने की क्रिया में एक दिन पहले का पानी यूंही नाली में बहा देने से बेशुमार पानी बर्बाद कर दिया जाता है। सोचने की बात है यह है कि कोई नहीं सोचता कि जिस पानी को ताजा समझ कर इकट्ठा किया जा रहा है उसका निर्माण अभी नहीं हुआ है ! वह भी कहीं न कहीं कई दिनों से संजो कर ही रखा गया था।  पर नल में पानी आता देख पहले का पानी बासी लगने लगता है। घर में दो दिन पुराने दूध या दही को तो कोई नहीं फेंकता ! चलिए  मन का वहम दूर ना ही हो तो पिछले दिन के पानी को नाली में बहाने की बजाए घर के किसी भी दसियों कामों में उसका उपयोग किया जा सकता है। वैसे भी साफ़-सफाई से रखे गए पानी में कोई खराबी नहीं आती। इस तरह के पानी को और भी गुणवत्ता युक्त बनाने के लिए उसे यदि अच्छी तरह फेंट लिया जाए तो वातावरण की आक्सीजन उसमें घुल कर उसे और भी उपयोगी बना सकती है। 
     
आज हमारे देश में उपलब्ध जल की मात्रा की समस्या उतनी विकराल नहीं है, जितनी उसके प्रबंधन की कमी की है। जरुरत है नागरिकों को इसके बारे में जानकारी और जागरूकता उपलब्ध करवाने की। अतः जल संरक्षण के लिये जरूरी है कि हम सभी को जल के बारे में सही जानकारी हो, हम उसकी कीमत समझें, आसानी से उपलब्ध इस जीवनोपयोगी नियामत को संभाल कर खर्च करें और उसकी गुणवत्ता बनाए रखने की हर संभव कोशिश करें। 

प्रकृति ने हमें दिल खोल कर पचासों नदियों की सौगात बक्शी है, भरपूर जल मुहैय्या करवाया है, पर हम उसकी कीमत ना समझ 'माले मुफ्त दिल बेरहम' की तर्ज पर उसको बर्बाद करते रहे हैं। हमने कभी भी उसके उचित प्रबंधन पर ध्यान ही नहीं दिया। यह मान बैठे कि यह चीज तो कभी ख़त्म ही नहीं होगी। हमारी इसी अदूरदर्शिता से आज इसकी कमी महसूस होने लगी है। पर कभी-कभी तो मन में यह संशय भी सर उठाता है कि क्या यह कमी प्रायोजित तो नहीं है, क्योंकि हम आकंठ भ्रष्टाचार में इस तरह लिप्त हैं कि हमें खुद के लाभ की बजाए और कुछ भी सुझाई नहीं देता। क्या ऐसा तो नहीं कि शहरों में टैंकर माफिया के दवाब में, या पानी को तथाकथित शुद्ध करने वाले यंत्रों के निर्माता बड़े व्यवसायिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए, या विरोधी दलों के द्वारा सत्तारूढ़ दाल की विफलता को दर्शाने के लिए दुष्प्रचार किया जाता हो ? क्योंकि हमारे यहां कुछ भी असंभव नहीं है। याद आते है, अस्सी के दशक की गर्मियों के वे  दिन जब रेलवे स्टेशनों पर पानी की उपलब्धता जान-बूझ कर रोक दी जाती थी, जिससे प्यासे यात्रियों को मजबूरी में ऐसे-वैसे बोतलबंद ठंडे पेय को अनाप-शनाप कीमत चुकता कर खरीदना पड़ता था !!! 

शुक्रवार, 24 जून 2016

इंसान सदा से ही उत्सव प्रिय रहा है

कुछ लोग अति उत्साहित हो जिम का रूख कर लेते हैं, कुछ सुबह-शाम सैर के लिए निकल पड़ते हैं तो कुछ घर में ही छोटा सा जिम बनाने के लिए तरह-तरह के उपकरण खरीद कर ला धरते हैं। पर  दस-पंद्रह दिनों में ही 90-95 प्रतिशत लोगों का उत्साह ठंडा पड जाता है, जिम और सैर के प्रोग्राम तो धरे के धरे रह ही जाते हैं घर पर लाया गया सामान भी धूल चाटने लग जाता है

अभी-अभी योग दिवस बीता है, उसके दूसरे ही दिन अखबार में एक खबर पढ़ने को मिली, कि योग दिवस के पहले योग के लिए प्रयुक्त होने वाली मैट या दरी की इतनी मांग होती है कि उसे पूरा करना मुश्किल हो जाता है। पर एक-दो दिन बाद ही लोग उसे वापस लौटने के लिए तिकड़में भिड़ाने लगते हैं।  किसी को उसका रंग नहीं भाता तो किसी को डिजायन। अधिकांश के लिए रात गयी, बात गयी वाला वाकया हो जाता है। उनके अनुसार वह अब उनके किसी भी काम की चीज नहीं होती। इनमें सबसे आगे होते हैं बड़े-बड़े संस्थान जो सरकार को दिखाने या उसके डर से ऐसे दिनों का आयोजन खूब धूम-धाम से करते हैं पर दूसरे दिन ही दरी वगैरह को वापस करने के लिए तरह-तरह के बहाने गढ कर सामान को दुकानदार को वापस करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

सिर्फ मैट की ही बात नहीं है। सेहत को लेकर टी.वी., अखबारों में तरह-तरह आख्यानों-व्याख्यानों से  प्रभावित हो कुछ लोग अति उत्साहित हो जिम का रूख कर लेते हैं, कुछ सुबह-शाम सैर के लिए निकल पड़ते हैं तो कुछ घर में ही छोटा सा जिम बनाने के लिए तरह-तरह के उपकरण खरीद कर ला धरते हैं। पर यह जोश दूध के उफान की तरह ही का होता है, दस-पंद्रह दिनों में ही 90-95 प्रतिशत लोगों का उत्साह ठंडा हो जाता है और जिम और सैर के प्रोग्राम तो धरे के धरे रह ही जाते हैं। घर पर लाया गया सामान भी धूल चाटने लग जाता है। सबसे बुरी हालत होती है "ट्रेडमिल" की, कोई तरह-तरह के बहानों से उसे वापस करना चाहता है तो किसी के
 यहां ऐसे ही किसी कोने में धूल फांकती पड़ी रहती है तो कहीं बाल्कनी में उस पर कपडे सूखते मिलते हैं।

तो किसी खास दिवस पर भीड़ उमड़ती दिखे तो आयोजकों को उसके सफल  होने का गुमान नहीं पाल लेना चाहिए। क्योंकि उस हुजूम का मतलब यह नहीं होता कि सभी लोग उस ख़ास आयोजन से प्रभावित हैं। वहां कुछ मजबूरी से आते हैं तो कुछ शौक से तो कुछ खबरों में बने रहने के मौके को ताड़ कर, कुछ फैशन के कारण तो कुछ मौज-मस्ती के लिए, क्योंकि मानव सदा से उत्सव प्रिय रहा है।    


वैसे भी बाज़ार के कमाई के तरीकों से अब लोग भी अंजान नहीं रह गए हैं। उसके नित नए गढ़े जाने वाले तरीकों का लोग भी मजा लेने लग गए हैं। पश्चिम से आयातित बाज़ार-संस्कृति के दवाब में विभिन्न प्रकार के दिन अपना नाम रखवाने लग गए हैं तो लोग भी उन दिनों को मौज-मस्ती और फैशन के रूप में मनाने लगे हैं। बाज़ार यदि ग्राहकों को लुभाने के लिए साम-दण्ड-भेद अपना कर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं तो ग्राहक भी अब कम चतुर नहीं रह गया है। अपना हानि-लाभ देख कर ही वह किसी की बातों के जंजाल में कदम रखता है और जहां अपना मतलब पूरा होता दिखता है वह अपना दामन बचा निकल लेता है। जिसमें घर बैठे सेवा और सामान देने वाले रिवाज से उसे फायदा ही हुआ है।          

शनिवार, 18 जून 2016

डाकघर से एक पोस्ट-कार्ड खरीदना नामुमकिन नहीं पर मुश्किल जरूर है

विडंबना देखिए कि सात-सात रुपये का घाटा एक #पोस्टकार्ड पर सह कर जिस गरीब मानुष के लिए इस सेवा की कीमत नहीं बढ़ाई जा रही, वही यदि एक पोस्ट कार्ड लेने जाएगा तो क्या डाकघर वाले उसे उपलब्ध करवाएंगे ? कहाँ से लाएगा वह या डाक-खाने वाले पचास पैसे का सिक्का ?

अपने देश में शायद ही ऐसा कोई इंसान होगा जिसका साबका डाकघर यानि पोस्ट-आफिस से ना पड़ा हो। अठाहरवीं शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा रेल की तरह अपने कार्यों को सुचारु रूप से चलाने के लिए डाक सेवा की शुरुआत की गयी थी। आज से कुछ वर्षों पहले तक यह एकमात्र सस्ता व सुलभ जरिया था, लोगों को आपस में जोड़े रखने, दूर-दराज बैठे सगे-संबंधियों की कुशलक्षेम पाने, जानने का, उन्हें आर्थिक मदद पहुंचाने, पाने का। सबसे अच्छी बात यह थी कि नागरिकों का इस सरकारी संस्थान के कर्मचारियों की कर्मठता और ईमानदारी पर अटूट विश्वास था। होना भी चाहिए था क्योंकि लोग देखते जो थे कि, चाहे आंधी हो, बरसात हो, झुलसा देने वाली गर्मी हो, उनके पत्र, जरुरी कागजात, मनी-आर्डर, राखी, बधाई संदेश, निमंत्रण पत्र इत्यादि को बड़ी साज-संभार से डाकिया उनके हाथों तक पहुंचा कर जाता था। गांव-देहात के अनपढ़ पुरुष-महिलाओं के लिए डाक-बाबू द्वारा पत्र बांचना और लिखना आम बात होती थी। ऐसी जगहों में डाक्टर के बाद डाकिया ही ज्यादा सम्मान पाता था।

हालांकि डाक सेव शुरू होने तक, टेलीफोन का परिचय देश के लोगों से हो चुका था, पर वह सेवा बहुत ही कम सरकारी, धनाढ्य और सभ्रांत लोगों तक सिमित थी इसलिए डाक सेवा पर उसका कोई असर नहीं पड़ा था। फिर समय बदला संचार व्यवस्था में अभूतपूर्व क्रान्ति आ गयी। जिसने शहर तो शहर दूर-दराज के गांव-देहात में भी पांव पसार लिए। धीरे-धीरे बच्चे-बच्चे के हाथ में मोबाइल आ गया। लोगों की खतो-किताबत बंद हो गयी। कुछ धक्का बैंकों की सेवाओं ने दिया, रही-सही कसर दूसरे सरकारी विभागों की तरह यहां भी लापरवाही, वयवसायिकता के अभाव, काम के प्रति सुस्ती जैसी बीमारियों के पनपने से पूरी हो गयी। जिसका फ़ायदा निजी कंपनियों ने कुरियर सेवाएं शुरू कर उठाना आरंभ कर दिया और हर निजी संस्थान की तरह इस सरकारी विभाग को मीलों पीछे छोड़ दिया। पर यहां किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी। उसी 1898 के एक्ट के तहत काम किया जाता रहा, फलस्वरूप काम धंधा आधे से भी ज्यादा कम हो गया, कई-कई डाकघरों को बंद करने की नौबत आ गयी। तनख्वाह निकलना मुश्किल हो गया। दुर्दशा सुधारने के लिए कोशिशें जरूर हुईं पर पूरी तरह कारगर कोई न हो सकी। लोगों की आस्था व विश्वास पूरी तरह फिर नहीं पाया जा सका।

डाकघर की कुछ सेवाएं ऐसी हैं जो सदा घाटे में रही हैं। जिसमें पहला नंबर है पोस्टकार्ड का ! इस विभाग के अनुसार इन्हें एक कार्ड पर सात रुपये से ऊपर का नुक्सान होता है। तो आज के परिवेश में उसे बंद ही क्यों नहीं कर दिया जाता या फिर उसकी कीमत क्यों नहीं बढ़ाई जाती ? कहने को उसे गरीब तबके के लिए जारी रखा गया है ! सवाल है किस गरीब के लिए ? उसके लिए जिसे आटा या चावल खरीदना मजबूरी बन गया हो, दाल,सब्जियां जिसके लिए देखने की चीजें हो गईं हों, नमक तक पहुँच के बाहर होता जा रहा हो, एक समय की चाय तक पीना जिसके लिए मुहाल हो गया हो उसके लिए एक #पोस्टकार्ड की कीमत ना बढ़ा कर क्या एहसान किया जा रहा है ? विडंबना देखिए कि वही गरीब मानुष, जिसके लिए इस सेवा की कीमत नहीं बढ़ा रहे, यदि एक पोस्ट कार्ड लेने जाएगा तो क्या डाकघर वाले उसे उपलब्ध करवाएंगे ? कहाँ से लाएगा वह या डाक-खाने वाले पचास पैसे का सिक्का ? आज तो इसका अत्यंत उपाय है कि प्रार्थी से लिखा हुआ मैटर लेकर, उसे स्कैन कर संबंधित जगह भिजवा दें, इससे खर्चा और समय दोनों की बचत हो जाएगी।
ऐसी ही एक सेवा है "बुक-पोस्ट" की, जिसे अंग्रेजों ने पुस्तकों, छपी हुई सामग्री, जिसमें अखबारें शामिल नहीं थीं, को सस्ती दर पर भिजवाने के लिए शुरू किया था। इसमें शर्त यह होती थी कि सामग्री यदि लिफ़ाफ़े में है तो लिफाफा खुला होना चाहिए, बंद या सील किए हुए लिफाफे को बुक-पोस्ट के तहत नहीं भेजा जा सकता था। आजादी के बाद इसका खूब दुरुपयोग हुआ, लोगों ने सामग्री को अंदर चिपका कर लिफाफा खुला भेजना शुरू कर दिया। पर आज तक इस विभाग के किसी कर्मचारी ने इस पर शायद ही ध्यान दिया हो, क्योंकि सरकारी काम में कोई दर्द नहीं पालता। आज भी यदि आप एक डेढ़ सौ ग्राम का पत्र भेजना चाहेंगे तो खुले लिफ़ाफ़े के लिए दस रुपये, बंद के लिए चालीस रुपये और स्पीड-पोस्ट के लिए पैंतालीस रुपये के करीब चुकाने पड़ेंगे ! तो कोई क्यों साधारण डाक का इस्तेमाल करेगा ? जिसमें पत्र के सही-सलामत पहुँचाने की गारंटी भी नहीं है। तो इस घाटे की सेवा को ख़त्म कर साधारण डाक के बराबर कर देना चाहिए।

रही बात अखबारों की तो आज अधिकतर पेपर वाले अपना भार उठाने में सक्षम हैं, सब्सिडी पर कागज, जमीन तथा दूसरी सुविधाओं का चुपचाप उपयोग करते जा रहे हैं तो कम से कम वर्षों से चली आ रही पोस्टल छूट तो बंद कर ही देनी चाहिए। समय आ गया है रोना छोड़, ठोस उपाय अपनाने का चाहे वह पोस्ट लिए हो, अंतरदेशीय पत्र के लिए हो या अखबारों के लिए हो।

आज जब हर जगह प्रतिस्पर्द्धा गहराती जा रही है तो कोई तुक नहीं है कि हम जबरदस्ती घाटे को अपने ऊपर थोपवाते रहें। क्योंकि वह घाटा तो हमारी ही जेब से बिना हमें बताए पूरा किया जाता है !

सोमवार, 13 जून 2016

हमाम गायिकी यानि बाथरूम सिंगिंग के लिए भी एक अदद घराना होना चाहिए था

"पति-पत्नी और वो" में संजीव कुमार द्वारा अभिनीत पात्र को सामने कर "बाथरूम सिंगिंग" यानि हमाम गायिकी के विषय को छुआ गया था, पर  उनका बाल्टी-लोटे से नहाना उस गाने को वह ऊंचाइयां नहीं छूने देता जिसकी वहां आवश्यकता थी। हर साधना के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना ही पड़ता है। बाल्टी-मग्गे से नहाते समय ध्यान बाल्टी के कम होते पानी और लोटे  को साधने में ही अटका रहता है और सुर भटकने का खतरा बन जाता है। दूसरी तरफ पानी जरूर कुछ ज्यादा लगता है पर बात शॉवर से छलकती अनवरत जल-राशि से ही बनती है  !

बहुत दिनों से एक सोच आ-आ कर टक्करें मार रही थी कि गायकी का एक घराना और होना चाहिए था। सिर्फ गायिकी के घरानों की बात करें तो देश में ऐसे पच्चीस-तीस घराने ही तो होंगे, जहां अत्यंत उच्च कोटि का गायन सिद्धहस्त गुरुओं और उस्तादों द्वारा मनोयोग से सिखाया जाता रहा है। वहां प्रवेश मिलना तो दूर उसके लिए
ऐसे में सुर कैसे सधे 
सोचने की भी ख़ास योग्यता की जरुरत होती है। गुरु और शिष्य तन, मन और पूरी निष्ठा से सुरों को साधने में वर्षों लगा देते हैं। इसीलिए वहां से हीरे ही निकलते भी हैं। पर कितने ! पांच हज़ार, दस हज़ार, बीस हज़ार  !!  पर मुद्दा यह है कि दुनिया को सिर्फ डॉक्टर ही थोड़े चाहिए होते हैं ! सहायक, नर्सें, वार्ड-ब्वाय भी तो लगते हैं। इसीलिए यह सोच बार-बार जोर मार रही थी कि एक अदद ऐसा घराना होना चाहिए था, जो काश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से आसाम तक पाए जाने वाले उन लाखों-लाख 'सुरतालयों' को, जिन्होंने अपनी संगीत साधना से गली-मौहल्ले तक को सराबोर कर रखा हो, एक जगह इकट्ठा कर उन्हें अपना नाम दे उनकी पहचान बनवा सकने में सहायक होता। 

ये सुरताले वे कलाकार हैं जो देश के हर हिस्से में पाए जाते हैं। इनमें गायन की जन्मजात प्रतिभा होती है। इनका
पंचम सुर में आलाप 
पहला क्रंदन भी सुर से भटका नहीं होता, जिसकी गवाह उस समय इनके पास खड़ी दाई या नर्स हो सकती है।ऐसे स्वयंभू गायकों में भाषा भी कोई बाधा नहीं होती। इनके अनुसार गायन की हर विधा और भाषा पर ये पकड़ रखते हैं। पर इनके साथ विडंबना यह होती है कि जैसे-जैसे इनकी उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे इनकी प्रतिभा तो फैलती जाती है यानि उस समय का हर दिग्गज गायक इनकी नक़ल के सामने बौना होता जाता है पर इनका खुद का भौतिक दायरा छोटा होता जाता है और ये घर के एक कमरे में, जिसे स्नानागार कहते हैं, सिमट कर रह जाते हैं। जी हाँ, उन्हीं हजारों - लाखों 'बाथ रूम सिंगर' की बात हो रही है जिन्हे देश कभी पहचान नहीं पाया।

एकाध बार इन्हें पहचान दिलाने की अधकचरी कोशिश हुई भी, जैसे फिल्म "पति-पत्नी और वो" में संजीव कुमार जी द्वारा अभिनीत पात्र को सामने कर 'बाथरूम सिंगिंग' यानि  'हमाम गायिकी' के विषय को छुआ गया था, पर वह मूल मुद्दे से भटक एक हास्य दृश्य बन कर रह गया। उनका बाल्टी-लोटे से नहाना उस गाने को वह ऊंचाइयां नहीं छूने देता जिसकी वहां आवश्यकता थी।  हर साधना के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना ही पड़ता है। बाल्टी-लोटे या मग्गे से नहाते समय ध्यान बाल्टी के कम होते पानी और लोटे-मग्गे को साधने में ही अटका रहता है और सुर भटकने का खतरा बन जाता है। दूसरी तरफ पानी जरूर कुछ ज्यादा लगता है पर बात शॉवर से छलकती
जल-राशि से ही बनती है। गाने और पानी का सदियों से नाता रहा है या यूं कहिए पानी की कलकल ध्वनि ने गायन की विधा को ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान दिया है। अब सागर, नदियां, सरोवर तो वैसे रहे नहीं कि उनके किनारे सुर साधे जा सकें ! ले-दे कर स्नानगृह ही ऐसी जगह बची है जहां कुछ-कुछ पानी भी है, कुछ-कुछ तन्हाई भी और कुछ-कुछ फुर्सत भी जिसे दिल ढूँढ़ता रहता है। इसीलिए इसी कुछ-कुछ में बहुत कुछ ढूंढते इन अंजान कलाकारों को कोई तो ठीहा मिलना ही चाहिए ! तो लगता नहीं कि इन बहुआयामी कलाकारों को भी हक़ है अपनी पहचान बनाने का, अपनी कला को निखारने का, अपनी निश्छल सेवा भावना के बदले समाज से कुछ पाने का, अपना घराना बनवाने का !!  क्योंकि ये वे कलाकार हैं जो अपनी कला से प्यार करते हैं पर उस कला की मेहरबानी इन पर नहीं होती।         

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