pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 16 सितंबर 2019

बायोमिमीक्री ! यह क्या चीज है.?

मानव-हितार्थ आविष्कारों के दौरान बहुतेरी बार ऐसा हुआ कि इस तरह के उपक्रमों में कई-कई तरह की अड़चनें व बाधाएं भी आ खड़ी होने लगीं ! उनको दूर करने के प्रयासों में वैज्ञानिकों ने पाया कि उनकी समस्या का हल कुदरत ने उससे मिलती-जुलती कई चीजों के तत्व, अवयव या नमूनों में पहले से दे रखा है ! इसके अलावा वे मानव-निर्मित यंत्रों की तुलना में हलकी, लचीली और मज़बूत तो होती ही हैं, उनसे कहीं भी, किसी तरह का प्रदूषण भी नहीं होता ! उनको अमल में लाया गया और परिणाम यह रहा कि आज के बेहतरीन आविष्कारों में से बहुत-से ऐसे हैं जो कुदरत में पाए जानेवाले जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों की नकल करके ही बनाए जा सके हैं...................!

#हिन्दी_ब्लागिंग   
मिमिक्री,  जिसका सीधा-सरल अर्थ होता है किसी की नक़ल, स्वांग या अनुकरण करना। यानी नामी-गिरामी नेताओ, अभिनेताओं, गायकों, जीव-जंतुओं इत्यादि की आवाज, उनके हाव-भाव, चाल-ढाल की नक़ल ! शायद ही कोई होगा जिसने कभी किसी की, किसी के द्वारा मिमिक्री ना देखी सुनी हो ! कुछ लोग तो इसी विधा के चलते नामी ''कलाकार'' बन नाम और शोहरत बटोरते चले गए। पर आज यहां एक दूसरी तरह की मिमिक्री की चर्चा हो रही है और वह है बायोमिमीक्री ! जिसको हिंदीं में  ‘‘जैव अनुकृतिकरण’’ कहा जाता है। यानी कुदरत की रचनाओं की वह नक़ल जो मानव निर्मित यंत्रों को सुधारने-बनाने में उपयोगी सिद्ध होती है। इसको बायोमिमेटिक्स भी कहा जाता है।    


क्या होती है बायोमिमिक्री या बायोमिमेटिक्स ! वैसे तो यह एक लंबा-चौड़ा विषय है, मगर  संक्षेप में देखें तो जब समय के साथ-साथ मानव हित और उसके उपयोग के लिए तरह-तरह के आविष्कार जीवन के हर क्षेत्र में होने लगे, तब बहुतेरी बार ऐसा हुआ कि इस तरह के उपक्रमों में कई-कई तरह की अड़चनें व बाधाएं भी आ खड़ी होने लगीं ! उनको दूर करने के प्रयासों में वैज्ञानिकों ने पाया कि उनकी समस्या का हल कुदरत ने उससे मिलती-जुलती कई चीजों के तत्व, अवयव या नमूनों में पहले से दे रखा है ! इसके अलावा वे मानव-निर्मित यंत्रों की तुलना में हलकी, लचीली और मज़बूत तो होती ही हैं, उनसे कहीं भी, किसी तरह का प्रदूषण भी नहीं होता।उदाहरण के लिए एक हड्डी और उतने ही वज़न के स्टील की तुलना में हड्डी ज़्यादा मज़बूत होती है ! देखा जाए तो इस तरह की नक़ल की शुरुआत तब ही हो गयी थी जब लिओनार्दो दा विंची ने पक्षियों की उड़ान को देख उड़ने की कोशिश की थी ! हालांकि वह सफल नहीं हुआ पर उसकी कल्पना आगे चल कर जरूर साकार हो गयी। आज इस विज्ञान का मकसद प्रकृति में पाई जानेवाली चीज़ों की नकल करके अपने यंत्रों में सुधार के साथ-साथ नयी मशीनों का आविष्कार करना भी है। वैसे भी आज के बेहतरीन आविष्कारों में से बहुत-से ऐसे हैं जो कुदरत में पाए जानेवाले जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों की नकल करके किए गए हैं।
लिओनार्दो का सपना 
वेल्क्रो

छिपकली के पंजों की खासियत 
मधुमक्खी की तकनीक 
ऐसे अनगिनत उदहारण हैं जो बताते हैं कि कैसे इस विधा की सहायता से अनगिनत बाधाएं दूर कर यंत्रों को सुगम और उपयोगी बनाया गया है ! आज की सबसे लोकप्रिय, सुलभ, छोटी सी पर बेहद जरुरी ''वेल्क्रो'' नामक तकनीक जो वस्त्रों, बैगों, सूटकेसों इत्यादि के दो हिस्सों को जोड़ने या बंद करने के काम आती है, ख़ास कर जिसका प्रयोग आजकल जूतों के फीतों की जगह बेहद आम है, उसका विचार प्रकृति के एक जंगली, कंटीले फल को देख कर ही आया ! शुरू में जब जापान की बुलेट ट्रेन किसी सुरंग से निकलती थी तो उसकी गति और वातावरण बदलने से एक जोर की धमाकेनुमा आवाज होती थी ! वैज्ञानिको ने खोज के दौरान पाया कि किंगफिशर पक्षी चाहे कितनी भी जोर से पानी में डुबकी क्यों ना लगाए पानी में ज़रा सी भी आवाज नहीं होती ! उन्होंने ट्रेन के इंजिन के अगले भाग को पक्षी के सर और चोंच की शक्ल में ढाला तो आवाज तो कम हुई ही ऊर्जा की भी बचत होने लगी। 
किंग फिशर और रेल इंजन 
गोग की तरह की चढ़ाई 
शार्क की चमड़ी 
रेगिस्तान में पानी का बचाव 
कठफोड़वे को प्रकृति के देन 
छिपकली या गोह के पंजों की संरचना आने वाले समय में इंसान को कांच की दिवार पर चढ़ने लायक बना देगी। दीमकों की बांबी जो एक अद्भुत संरचना है जिसके बाहर का तापमान कुछ भी हो भीतर एक सा ही रहता है, भविष्य में ऊर्जा और पर्यावरण की रक्षा का कारण  होगी। अफ्रिका के मरुस्थल के कीड़े से पानी की बचत सीखने की कोशिश हो रही है। दुनिया की बेहतरीन तैराक शार्क है। जिसका राज उसकी चमड़ी में हैं ! उसका अध्ययन पानी के जहाज़ों, पनडुब्बियों, नौकाओं की गति सुधारने के काम आएगा। कठफोड़वे को ही लें जिसके पेड़ों में छेद करने के एक सेकेण्ड में तक़रीबन 20-22 प्रहार भी उसकी गरदन में बने प्राकृतिक ''शॉक एब्जॉर्बर'' के कारण उसके शरीर को क्षति नहीं पहुँचने देते ! मक्खियों के पर, जुगनुओं की रौशनी, बया का घोंसला, अगर इंसान मकड़ी की तरह का जाल, जो मछली पकड़ने वाले जाल जितना बड़ा हो, बना सके तो उससे एक हवाई जहाज़ को भी आगे बढ़ने से रोका जा सकता है ! क्या-क्या गिना-गिनाया जाए ! कुदरत ऐसी हजारों अद्भुत की संरचनाओं से भरी पड़ी है। निकट भविष्य में वे सब किसी ना किसी रूप में इंसानों के काम आ सकती हैं।  

बुधवार, 11 सितंबर 2019

लखनऊ का आम्बेडकर मेमोरियल पार्क, एक हाथी पालना ही........यहां तो अनगिनत हैं

भव्यता के बावजूद इस जगह को ''पार्क या उद्यान'' कहना बिलकुल सही नहीं होगा क्योंकि 107 एकड़ के क्षेत्र में फैला यह लता-पादप विहीन एक पथरीला परिसर है, जो पूरी तरह से राजस्थान के लाल बलुआ पत्थरों द्वारा निर्मित है। इस मेमोरियल को वास्तुकला की सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि इसकी विशालता को देखने के लिए जाना चाहिए, जिसे सामने पाते ही दर्शक अचंभित नहीं स्तंभित हो रह जाता है ! उसके मन में एक ही बात आती है कि इसे मैं पूरी तरह देख भी पाऊंगा या नहीं ! फिर दिमाग में जमा-घटाव शुरू हो जाता है कि क्या देखा जाए और क्या छोड़ दिया जाए ..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग 
लखनऊ के गोमती नगर इलाके में स्थित आम्बेडकर मेमोरियल पार्क, जिसका पहले डॉ. भीमराव आम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन प्रतीक स्थल जैसा भारी-भरकम नाम था, को देखने के पश्चात ऐसा अहसास होता है कि यह जगह डॉ. आम्बेडकर को समर्पित होने और ज्योतिराव फूले, नारायण गुरु, बिरसा मुंडा, शाहू जी महाराज, कांशी राम जैसी हस्तियों के कार्यों से जन-जन को परिचित करवाने और उनकी यादों को सहेजने के बावजूद  पूरी तरह से सु.श्री. मायावती जी पर ही केंद्रित है, जिन्होंने अपने कार्यकाल में इसका निर्माण करवाया था। 







सबसे पहली बात तो यह कि इस जगह को ''पार्क या उद्यान'' कहना बिलकुल सही नहीं होगा क्योंकि 107 एकड़ के क्षेत्र में फैला यह लता-पादप विहीन एक पथरीला परिसर है, जो पूरी तरह से राजस्थान के लाल बलुआ पत्थरों द्वारा निर्मित है। इस पर तक़रीबन 700 करोड़ रुपयों का भारी-भरकम खर्च किया गया है। जिसमें साठ वृहदाकार और अनगिनत छोटे-बड़े आकार के हर जगह छाई हाथियों की संरचनाओं, बेशुमार स्तंभों, संग्रहालय, आम्बेडकर स्तूप, सामाजिक परिवर्तन गैलरी तथा कुछ अन्य संरचनाओं जैसे प्रतिबिम्ब व दृश्य स्थल के साथ-साथ कई विभूतियों की आदम कद मूर्तियां भी स्थापित हैं। पर सबसे बड़े आकर्षण के रूप में जिसको पेश किया या करवाया गया है वे हैं विशाल, हाथ में पर्स थामे मायावती की प्रतिमाएं।








यह बात सही है कि सारा परिसर बहुत ही भव्य है ! पर इस मेमोरियल को वास्तुकला की सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि इसकी विशालता को देखने के लिए जाना चाहिए, जहां हजारों श्रमिकों, कलाकारों, इंजीनियरों की दिन-रात की मेहनत का परिणाम साफ़ नज़र आता है। अंदर जाते ही दर्शक एक अलग तरह की ही दुनिया में खो जाता है ! वह अचंभित नहीं स्तंभित हो रह जाता है ! उसके मन में एक ही बात आती है कि इतना विशाल ! मैं पूरी तरह देख भी पाऊंगा या नहीं ! फिर दिमाग में जमा-घटाव शुरू हो जाता है कि क्या देखा जाए और क्या छोड़ दिया जाए ! 










उसके साथ ही जो एक और चीज उसे सबसे ज्यादा खटकती है, वह है हरियाली की अत्यधिक कमी ! दूर-दूर तक किसी वृक्ष का नामोनिशान तक नहीं ! जो थोड़ा-बहुत हरापन कुछ क्यारियों में है, वह भी नहीं के बराबर ! अवलोकन के दौरान यदि जरा सी भी गर्मी बढ़ जाए तो यहां आने वालों बुरा हाल हो जाता है। फिर इतने लम्बे-चौड़े परिसर को अच्छी तरह देखने-जानने के लिए काफी समय और श्रम की जरुरत है ! आधी जगहों को देखने-घूमने के बाद ही शरीर जवाब देने लगता है। यह अलग बात है कि परिसर का वातावरण बहुत शांत है  




इसकी सुंदरता-भव्यता-विशालता सब अपनी जगह ठीक हैं पर इसे ले कर ज्यादातर लोगों की राय अब भी यही है कि पूर्वाग्रहों, कुंठा और सत्ता के मद में चूर, पागलपन की हद पार कर अपने विरोधियों को सिर्फ अपनी हैसियत दिखाने के लिए स्वतंत्र भारत में अब तक का किसी भी राज्य में राज्य-प्रमुख द्वारा बहाया गया अपनी प्रकार का यह अकूत धन था ! इसके अलावा इसके निर्माण में हजारों-हजार पेड़ कटे, पर्यावरण को क्षति पहुंची, हरियाली का कोई ध्यान नहीं रखा गया। सिर्फ पत्थरों से ही परिसर को विकसित किए जाने से तापमान में जो बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी उसके हिसाब-किताब का तो एक अलग ही खाता है ! इन सब के इतर जो एक और ख़तरनाक, अनदेखी, भयोत्पादक आशंका उभरती है, वह है जाति-भेद का और गहराना !










इतने विशाल और विस्तृत परिसर के रख-रखाव, देख-रेख को संभालना भी अपने-आप में एक बेहद खर्चीला और श्रमसाध्य कार्य है। इसकी यथास्थिति को बनाए रखना हाथी पालने जैसा हो गया है ! कहां तो एक ही हाथी सारे जमा-खर्च बिगाड़ देता है यहां तो अनगिनत हैं ! धीरे-धीरे इसके रख-रखाव की कमी भी साफ़ झलकती सामने आने लगी है ! जगह-जगह टूट-फूट तो है ही शौचालय की ओर गंदगी भी पसरने लगी है ! अब इसे चाहे किसी ने, कैसे भी, किसीलिए भी बनाया हो, पैसा तो अवाम का ही लगा है ! निरपेक्ष रह कर देखें तो इससे तो इंकार नहीं किया जा सकता कि परिसर अपने आप में खूबसूरत और दर्शनीय तो है ही, जिसे देखने लोग आते भी हैं। वैसे भी वक्त, अरबों रुपये, इंसान की मेहनत को अब यूं ही जाया तो नहीं किया जा सकता। तो सार-संभार में चौकसी तो बरतनी ही जानी चाहिए। जिससे देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों पर विपरीत प्रभाव ना पड़े। 

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

मुस्कुराइये ? कि आप लखनऊ में हैं

लखनऊ की तहजीब, नफासत, पूरतकल्लुफ़, उसकी जुबान, उसकी भव्यता का जिक्र तो बचपन से ही सुनते आए हैं ! शानो-शौकत, सुंदरता से भरपूर, आदिगंगा के नाम से जानी जाने वाली गोमती नदी के किनारे बसे इस शहर की तुलना कश्मीर से की जाती थी। कहा जाता था कि जो सुकून यहां है वह कहीं और नहीं ! पर लखनऊ जंक्शन पर उतरते ही यह सारी बातें, सारी धारणाएं, सारे ख्यालात धराशाई होते नजर आए...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
पिछले दिनों ''परिकल्पना परिवार'' का सदस्य होने के नाते लखनऊ में आयोजित उसकी वार्षिक महासभा में सम्मिलित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। वैसे चौथाई सदी से कुछ ज्यादा और आधी सदी से कुछ कम समय पहले एक बार लखनऊ जाने का मौका जरूर मिला था,  पर उस यात्रा की कुछ ही यादें सपनों की मानिंद ही बच पायीं थीं। थोड़ी-थोड़ी भूलभुलैया, कुछ-कुछ गजिंग, ज़रा-ज़रा सी उस चिकन के गुलाबी कुर्ते की छवि जो वहां से लिया गया था। हाँ, एक बात जो कभी भी नहीं भूली वह थी भूलभुलैया के गाइड द्वारा बताई वहां से निकलने की राजदारी ! जिसका उपयोग कर इस बार के गाइड को चकित कर दिया !

आप यदि पहली बार या वर्षों बाद कहीं जाते हैं तो दिमाग में उस जगह की एक छवि, उसके बारे  में सुनी हुई  बातों या पढ़ी गयी जानकारियों से मिल कर बनी होती है। अब लखनऊ की तहजीब, नफासत, पूरतकल्लुफ़, उसकी जुबान, उसकी भव्यता का जिक्र तो बचपन से ही सुनते आए हैं ! यह वह जगह थी जहां तू-तड़ाक की भाषा को पसंद नहीं किया जाता था। नवाबों के इस शहर की शाम को शाम-ए-अवध के नाम से दुनिया भर में मशहूरी मिली हुई थी। इसके लजीज पकवानों को किसी की भी जिव्हा को ललचाने में महारत हासिल थी। शानो-शौकत, सुंदरता से भरपूर, आदिगंगा के नाम से जानी जाने वाली गोमती नदी के किनारे बसे इस शहर की तुलना कश्मीर से की जाती थी। कहा जाता था कि जो सुकून यहां है वह कहीं और नहीं ! पर लखनऊ जंक्शन पर उतरते ही यह सारी बातें, सारी धारणाएं, सारे ख्यालात धराशाई होते नजर आए ! दूसरे बड़े शहरों की तरह ही यहां भी बाज़ार की व्यव्सायिकता, पैसे की महत्ता, जुबान की मिठास की कमी, अफरा-तफरी, अनियंत्रित ट्रैफिक के साथ ही स्वार्थी आधुनिक शैली की पदचाप साफ़ सुनायी देने लगी ! एक बात और पुख्ता हो गयी कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्रदेश चाहे कोई भी हो, शहर चाहे कहीं भी हो वहां के बस या रेल स्टेशनों पर मिलने वाले ऑटो-टैक्सी वालों की एक ही बिरादरी होती है, जिनका ध्येय सिर्फ नवागंतुक से ज्यादा ज्यादा वसूली कर लेना होता है। 

पता नहीं इस शहर को किसकी नज़र लग गयी है ! कभी बागों का शहर कहलाने वाला लखनऊ अब कंक्रीट का शहर बनता जा रहा है ! इसके लिए बहुत हद तक राजनीती का भी हाथ है ! नए बसाए जा रहे इलाकों की कुछ जगहों को छोड़ दिया जाए तो हर जगह बढ़ती आबादी के कारण बेतरतीबी, फैलती गंदगी, अनियंत्रित ट्रैफिक, पर्यावरण को खतरे में डालते हजारों धुआं उगलते वाहन, खस्ता हाल सड़कें, अफरा-तफरी, कम होती सामाजिक चेतना व जागरूकता, कर्तव्य विमुखता, बढ़ते पर्यटन के बावजूद शहर में हर जगह रख-रखाव की कमी बहुत खलती है। खासकर ऐतिहासिक इमारतों को सिर्फ उपार्जन का जरिया बना दिया गया है ! उनकी अनदेखी, बदहाली, बढती टूट-फूट, मरम्मत मांगती खस्ता हालत पर शायद कोई ध्यान ही नहीं देना चाहता ! शहर की 
आत्मा जैसे कहीं खो गयी है ! ऐसा लगता है कि ''मुस्कुराइये कि आप लखनऊ में हैं''  महज एक सरकारी स्लोगन भर बन कर रह गया है ! 

सबसे ज्यादा दुःख और अफ़सोस इस बात का है कि तमाम इलमो-अदब की गतिविधियों का केंद्र, नवाबों का यह शहर आज बदहाली की कगार पर खड़ा नजर आता है ! इसका एक ही हल हो सकता है जब इसको प्यार करने वाले यहां के वाशिंदे, बुद्धिजीवी, इतिहासकार, पर्यावरणप्रेमी तहा जागरूक नयी पीढ़ी सभी अपने व्यक्तिगत-राजनितिक मतभेद भुला, एकजुट हो इसके लिए आवाज और कदम उठाएं !  जिससे यह शहर फिर से अपना खोया हुआ गौरव, ख्याति, भव्यता और सम्मान प्राप्त कर सके ! 

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

राजस्थान का लोहार्गल धाम, जहां पांडवों के हथियार गले थे

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था, पर पांडव अपने भाई बंधुओं और अन्य स्वजनों की हत्या करने के पाप से अत्यंत व्यथित थे। उन्हें दुःखी तथा पश्चाताप की अग्नि में जलते देख श्री कृष्ण जी ने उन्हें पाप मुक्ति के लिए विभिन्न तीर्थ स्थलों के तीर्थाटन की सलाह दी तथा यह भी बतलाया कि जिस तीर्थ में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पांडव लोहार्गल आये तथा जैसे ही उन्होंने यहां के सूर्यकुंड़ में स्नान किया उनके सारे हथियार पानी में गल गये। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ-राज की उपाधी से विभूषित किया। फिर शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की

#हिन्दी_ब्लागिंग 

लोहार्गल राजस्थान में शेखावटी इलाके की नवलगढ़ तहसील में, झुंझुनू शहर से तकरीबन 70 कि.मी. और उदयपुरवाटी से करीब दस कि.मी. की दूरी पर आड़ावल पर्वत की घाटी में स्थित है। लोहार्गल का अर्थ है, वह स्थान जहां लोहा गल जाए। पुराणों में भी इस स्थान का जिक्र मिलता है। अरावली पर्वत शाखाओं की सबसे ऊँची 1050 मी. की चोटी की तलहटी में स्थित इस जगह को स्थानीय लोग ''लुहागरजी'' के नाम से भी पुकारते हैं। पहले यहां सिर्फ साधू-संत ही रहा करते थे, पर अब यहां कई परिवार बस गए हैं। जो मुख्यतः अचार के व्यवसाय से जुड़े हैं। मुख्य मार्ग से करीब पांच-छह कि.मी. की चढ़ाई नुमा दूरी पर कुंड के पास तरह-तरह के अचारों से सजी बीसीओं दुकानें स्थित हैं जिनकी अचारी खुशबू से सारा इलाका महकता रहता है। 
लोहार्गल से भगवान परशुराम का भी नाम जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि क्षत्रियों के संहार के पश्चात क्रोध शांत होने पर जब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ तो पश्चाताप स्वरुप उन्होंने यहां यज्ञ किया तथा नरसंहार के पाप से मुक्ति पाई थी। यहां एक विशाल बावड़ी भी है जिसका निर्माण महात्मा चेतनदास जी ने करवाया था। यह राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में से एक है। पास ही पहाड़ी पर एक प्राचीन सूर्य मंदिर बना हुआ है। इसके साथ ही वनखण्डी जी का मंदिर है। कुण्ड के पास ही प्राचीन शिव तथा हनुमान मंदिर तथा पांडव गुफा भी स्थित है। इनके अलावा चार सौ सीढ़ियां चढने पर मालकेतु जी के दर्शन भी किए जा सकते हैं। 

यहां के प्राचीन सूर्य मंदिर के पीछे भी एक अनोखी कथा प्रचलित है। प्राचीन काल में काशी में सूर्यभान नामक राजा हुए थे, जिन्हें वृद्धावस्था में अपंग लड़की के रूप में एक संतान हुई। राजा ने तमाम ज्योतिर्विदों से उसके बारे में जानकारी हासिल की तो पता चला कि पूर्व के जन्म में वह लड़की मर्कटी थी, जो शिकारी के हाथों मारी गई थी। शिकारी उस मृत बंदरिया को एक बरगद के पेड़ पर लटका कर चला गया था। अभक्ष्य होने के कारण उसका बाकी शरीर तो हवा और धूप से सूख कर लोहार्गल धाम के पवित्र जलकुंड में गिर गया पर उसका एक हाथ वहीं पेड़ पर अटका रह गया था। इसीलिए पुनर्जन्म में इसे ऐसे हस्त-विहीन शरीर की प्राप्ति हुई। इस व्याधि के परिमार्जन हेतु उन्होंने राजा को उपाय सुझाया कि यदि आप उस हाथ को भी ला कर कुंड के पवित्र जल में डाल दें तो इस बच्ची का अंपगत्व समाप्त हो जाएगा। राजा तुरंत लोहार्गल आए तथा उस बरगद की शाखा से बंदरिया के हाथ को जलकुंड में डाल दिया। जिससे उनकी पुत्री का हाथ स्वतः ही ठीक हो गया। इस चमत्कार से प्रभावित हो राजा ने यहां पर सूर्य मंदिर व सूर्यकुंड का निर्माण करवा कर इस तीर्थ को भव्य रूप दिया।
एक यह भी मान्यता है, भगवान विष्णु के चमत्कार से प्राचीन काल में पहाड़ों से एक जल धारा निकली थी जिसका पानी अनवरत बह कर सूर्यकुंड में जाता रहता है। इस प्राचीन, धार्मिक, ऐतिहासिक स्थल के प्रति लोगों में अटूट आस्था है। लोगों का यहां वर्ष भर आना-जाना लगा रहता है। माघ मास की सप्तमी को सूर्यसप्तमी महोत्सव मनाया जाता है। श्रावण मास में भक्तजन यहां के सूर्यकुंड से जल भर कर कांवड़ उठाते हैं। जिसमें सूर्य नारायण की शोभायात्रा के अलावा सत्संग प्रवचन के साथ विशाल भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।हज़ारों नर-नारी यहां आ कुंड में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।  

लोहार्गल एक प्राचीन, धार्मिक व ऐतिहासिक स्थल जरूर है, लोगों की इसके प्रति अटूट आस्था भी है, भक्तों का यहां आना-जाना भी लगा रहता है, फिर भी इस क्षेत्र की हालत अत्यंत सोचनीय है। सरकार की ओर से पूर्णतया उपेक्षित इस जगह पर प्राथमिक सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। चारों ओर गंदगी का आलम है। पशु-मवेशी खुले आम घूमते रहते हैं। सड़कों की हालत दयनीय है। नियमित बस सेवा भी उपलब्ध नहीं है। रहने खाने का भी कोई माकूल इंतजाम नहीं है। यदि इस ओर थोड़ा सा भी ध्यान पर्यटन विभाग दे तो यहां देशी-विदेशी पर्यटकों का आना शुरु हो सकता है।

सोमवार, 12 अगस्त 2019

शिव मंदिर, जटोली का

हिमाचल के सोलन जिले के जटोली इलाके में स्थित है,भगवान शिव का एक अनूठा मंदिर ! यह मान्यता  चली आ रही है कि पौराणिक समय में भगवान शिव यहां आए थे और कुछ समय यहां रह कर उन्होंने विश्राम किया था। उस समय उन्होंने अपनी जटाएं भी खोल रखी थीं जो उन्मुक्त हो लहराती रहती थीं। इसीलिए उन जटाओं पर इस जगह का नाम जटोली के रूप में विख्यात हुआ .............! 
सावन के पावन समय पर विशेष !

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हिमालय को सदा देवभूमि माना जाता रहा है। ऐसा अटूट विश्वास है कि यहां कण-कण में भोले भंडारी का वास है। इसीलिए इस क्षेत्र में विश्व विख्यात शिव धाम तो हैं ही उनके साथ-साथ और भी, लोगों की आस्था के प्रतीक, हजारों शिव मंदिर विद्यमान हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने आप में विशेष होते हुए भी अभी देश के दूसरे हिस्सों में उतना प्रख्यात नहीं हो पाए हैं ! ऐसा ही एक मंदिर है, हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित जटोली का दक्षिण-द्रविड़ शैली में निर्मित शिव मंदिर। इसके 111 फीट ऊँचे गुंबद पर अभी हाल ही में 11 फुट लंबा स्वर्ण कलश चढ़ाया गया है। इससे मंदिर की ऊंचाई करीब 122 फुट तक हो गयी है। इसी कारण इसे एशिया का सबसे ऊंचा मंदिर माना जाता है। शिल्प-कला के इस बेजोड़ भवन को बनाने में करीब 39 साल का समय लगा है। अभी भी कुछ ना कुछ निर्माण चल ही रहा है। जल्द ही यहां17 लाख रुपए की लागत के स्फटिक शिवलिंग की स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा की जाने की योजना है।

सोलन-राजगढ़ मार्ग पर सोलन शहर से 7 किलोमीटर की दूरी पर एक स्थान पड़ता है, जटोली ! वहीं से मंदिर तक छोटे वाहनों के आवागमन के लिए सड़क बनी हुई है, जो तक़रीबन समुद्रतल से 1320 मीटर की ऊंचाई पर बने इस शिव मंदिर तक पहुंचाती है। वहां से सौ सीढ़ियां चढ़, मंदिर के मंडप से मुख्यद्वार तक जा, भीतर गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग के दर्शन किये जाते हैं। भीतर स्फटिक मणि शिवलिंग के साथ शिव और पार्वती जी की मूर्तियाँ भी स्थापित की गई है | मंदिर के शिखर पर चार किलो सोने का 11 फुट लम्बा कलश मंदिर के सौदर्य में चार चाँद लगाता  हुआ दिखता है। मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपर गणेश जी तथा शेष नाग की प्रतिमाएं बनी हुई हैं, जिन्हें पीले और हरे रंग के कलशों से सुशोभित किया गया है। मंदिर के प्राँगण में जगह-जगह अन्य देवी-देवताओं की कलात्मक प्रतिमाओं के साथ-साथ कई त्रिशूल भी लगे मिलते हैं। मंदिर के पीछे का भाग अन्य भागों से ऊँचा है। मंदिर के उतरी छोर पर प्राकृतिक जलस्त्रोत है जिसके जल को औषधीय तत्वों से पूर्ण अति निर्मल और पवित्र माना जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि बहुत पहले कहीं से घूमते-घामते एक साधू महाराज यहां आ कर गुफा में रहने लगे। स्थानीय लोग एक बार उनकी परीक्षा लेने के लिए  लिए गुफा के आसपास छिप गये लेकिन थोड़ी देर बाद उन्हें गुफा से एक अजगर कि हुंकार सुनाई दी जिसके कारण वे डर गये और अपनी रक्षा हेतु उनसे अपनी  भूल के लिए क्षमा याचना की।  उस साधू ने कई सालो तक यहाँ तप किया। उस समय जटोली में पानी की बहुत तंगी थी ! कहते हैं उसी साधू ने अपने चिमटे को धरती पर मारकर पानी की यही निर्मल धारा निकाली थी जो कभी सूखती नहीं है। 

 यह मान्यता चली आ रही है कि पौराणिक समय में भगवान शिव यहां आए थे और कुछ समय यहां रह कर उन्होंने विश्राम किया था। उस समय उन्होंने अपनी जटाएं भी खोल रखी थीं जो उन्मुक्त हो लहराती रहती थी। इसीलिए उन जटाओं पर इस जगह का नाम जटोली के रूप में विख्यात हुआ। इस मंदिर के निर्माण और परिकल्पना के पीछे स्वामी कृष्णानंद परमहंस जी का उद्यम है। उनके मार्गदर्शन और दिशा-निर्देश पर ही जटोली शिव मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। जिन्होंने इसका शिलान्यास वर्ष 1974 में किया था, पर जिसका निर्माण कार्य वर्ष 1983 में जाकर आरम्भ हो पाया। जो 39 वर्षो कि लम्बी अवधि के पश्चात 24  जनवरी, 2013 को स्फटिक शिवलिंग स्थापित होने पर पूर्ण हुआ।  मन्दिर निर्माण पर करोडो रूपए व्यय हुए जिनका इंतजाम प्रभु भगतों और आस्थावानों के सहयोग से ही संभव हो सका। मंदिर में, 1983 में ब्रह्मलीन हुए स्वामी कृष्णानंद की गुफा भी स्थित है, जहां बैठ कर वे शिव आराधना किया करते थे।
महाशिव रात्रि के पावन पर्व पर यहां मंदिर कमिटी की ओर से भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है, जो सारी-सारी रात चलता है। इसके साथ ही विशाल भंडारा भी होता है। दूर-दूर से श्रद्धालुगण यहां आ पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामना की पूर्ती की प्रार्थना करते हैं। देश के किसी भी कोने से यहां दिल्ली या चंडीगढ़ होते हुए आराम से पहुंचा जा सकता है। 

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