जिस तरह चाय की अलग-अलग कीमतें निर्धारित की जाती हैं उसकी विशेषता व गुणवत्ता को लेकर, वैसे ही केसर का मुल्यांकन भी होता है। अलग-अलग जगहों पर उपजने वाले केसर की कीमतों में भी फर्क होता है। फिर उसके संस्करण के दौरान बहुत कुछ बाहर आता रहता है जैसे बची हुई फूल की पत्तियां, चूरा, डस्ट, छोटी या टूटी हुई कलियाँ इत्यादि, कहलाता तो वह सब भी केसर ही है। पर उन सब की कीमतों में जमीन-आसमान का फर्क होता है......!
#हिन्दी_ब्लागिंग
एक पुराना चुटकुला है, जीटी रोड के एक ढाबे के बाहर लिखा हुआ था, यहां कद्दू और अंगूर की सब्जी मिलती है। एक पर्यटक इसे पढ़ वहाँ खाने गया पर उसे सब्जी में कुछ विशेष नहीं लगा, तो उसने ढाबे वाले को बुलाया और पूछा कि क्या सचमुच यह अंगूर और कद्दू की सब्जी है ? तो ढाबे के मालिक ने कहा, हां जी। पर्यटक ने कहा, पर मुझे तो सिर्फ कद्दू का स्वाद ही आया है, कितने अंगूर डालते हो ? जी ! पचास प्रतिशत, बराबर-बराबर, एक कद्दू और एक अंगूर ! ढाबे वाले ने जवाब दिया।
यह इसलिए याद आया क्योंकि कई दिनों से घर में आ रहे पतंजलि के एलोवेरा जेल की ट्यूब पर उसमें मिश्रित सामग्री के रूप में केसर और चंदन के भी होने की बात लिखे होने से कौतुहल तो होता था कि केसर जैसी चीज जिसके कुछ ग्राम की कीमत ही हजारों रूपए है, उसका उपयोग व्यावसायिक दृष्टि से कैसे 70-80 रूपए के उत्पाद में किया जा सकता है ! पर जैसी की हमारे जैसे अधिकाँश लोगों की आदत है कि लिखी बात पर विश्वास कर लेते हैं, आँख मूँद कर ! सो मान लेते रहे कि 'बाबाजी' कह रहे हैं, तो होगा ही, और बात आई-गयी हो जाती थी। पर कल जब एक ट्यूब सामने दिखी तो रहा नहीं गया और छीछालेदर करने पर जो बात सामने आई..... वह यह रही !
#हिन्दी_ब्लागिंग
एक पुराना चुटकुला है, जीटी रोड के एक ढाबे के बाहर लिखा हुआ था, यहां कद्दू और अंगूर की सब्जी मिलती है। एक पर्यटक इसे पढ़ वहाँ खाने गया पर उसे सब्जी में कुछ विशेष नहीं लगा, तो उसने ढाबे वाले को बुलाया और पूछा कि क्या सचमुच यह अंगूर और कद्दू की सब्जी है ? तो ढाबे के मालिक ने कहा, हां जी। पर्यटक ने कहा, पर मुझे तो सिर्फ कद्दू का स्वाद ही आया है, कितने अंगूर डालते हो ? जी ! पचास प्रतिशत, बराबर-बराबर, एक कद्दू और एक अंगूर ! ढाबे वाले ने जवाब दिया।
यह इसलिए याद आया क्योंकि कई दिनों से घर में आ रहे पतंजलि के एलोवेरा जेल की ट्यूब पर उसमें मिश्रित सामग्री के रूप में केसर और चंदन के भी होने की बात लिखे होने से कौतुहल तो होता था कि केसर जैसी चीज जिसके कुछ ग्राम की कीमत ही हजारों रूपए है, उसका उपयोग व्यावसायिक दृष्टि से कैसे 70-80 रूपए के उत्पाद में किया जा सकता है ! पर जैसी की हमारे जैसे अधिकाँश लोगों की आदत है कि लिखी बात पर विश्वास कर लेते हैं, आँख मूँद कर ! सो मान लेते रहे कि 'बाबाजी' कह रहे हैं, तो होगा ही, और बात आई-गयी हो जाती थी। पर कल जब एक ट्यूब सामने दिखी तो रहा नहीं गया और छीछालेदर करने पर जो बात सामने आई..... वह यह रही !
इसकी 60 ml की ट्यूब के ऊपर लिखा हुआ है "सौंदर्य एलोवेरा जेल, केसर-चंदन" यानी एलोवेरा के साथ केसर और चंदन मिलाया हुआ है ! दुविधा यह थी कि केसर, जिसके कुछ ग्राम की कीमत ही हजारों रूपए में है उसका उपयोग व्यावसायिक दृष्टि से कैसे 70-80 रूपए के उत्पाद में किया जा सकता है ! फिर ट्यूब पर छपी मिश्रित सामग्री पर नजर डाली, जिसकी 'महीनताई' के कारण नंगी आँखों से पढ़ना, आँखों पर जुल्म ढाने के समान था, जो दिखा उससे वही कद्दू और अंगूर का अनुपात यहाँ भी मिला। वह भी भ्रामक और आधा-अधूरा ! यहाँ अंकित था, घृतकुमारी Aloe barbadensia 89%, केसर Crocus sativus 0.01%, सफ़ेद चंदन Santalum album 0.10% । कुल 89.11%। बाकि क्या है उसकी जानकारी नहीं दी गयी है। अब 60 ml में 0.01%,.....? मेरा तो ना मैथ, ना ही दिमाग समझ पा रहा इस प्रतिशत को ! कितने लोग देखते हैं अपने द्वारा खरीदे गए सामान पर छपी मिश्रित सामग्री यानी "ingredients" की सूचि और उसके प्रतिशत को ? आज इसे देख नाहीं यह समझ में आ रहा कि यह मेल क्या गजब ढाएगा उपभोक्ता के सौंदर्य को बढ़ाने में ! इसके साथ ही यह आकलन भी नहीं हो पा रहा कि केसर के नाम पर यह छल है या धोखा ?
एक और बात, जिस तरह चाय की अलग-अलग कीमतें निर्धारित की जाती हैं उसकी विशेषता व गुणवत्ता को लेकर, वैसे ही केसर का मुल्यांकन भी होता है। अलग-अलग जगहों पर उपजने वाले केसर की कीमतों में भी फर्क होता है। फिर उसके संस्करण के दौरान कई कुछ बाहर आता रहता है जैसे बची हुई फूल की पत्तियां, चूरा, डस्ट, छोटी या टूटी हुई कलियाँ इत्यादि, हालांकि कहलाता तो वह सब भी केसर ही है। पर उन सब की कीमतों में जमीन-आसमान का फर्क होता है ठीक चाय की पत्तियों की तरह। अब इन सब प्रसाधनों में क्या मिलाया जाता है यह तो भगवान ही जाने या ये मिलाने वाले ! यह तो अब सुंदर और सुंदर दिखने की चाह में कुछ भी खरीद लेने वालों के विवेक पर निर्भर करता है कि वे इस तरह के लोक-लुभावने इश्तिहारों से कैसे बच कर अपनी गाढ़ी कमाई की पूँजी को बचाते हैं !















