बुधवार, 2 अगस्त 2017

"महामृत्युंजय मंत्र" में खरबूजे का उल्लेख !

दो दिन पहले यहीं भगवान् शिव के अति शक्तिशाली  "महामृत्युंजय मंत्र" का उल्लेख करने का साहस किया था। इस मंत्र में खरबूजे के फल को विशेष स्थान प्रदान किया गया है। जहां से इस पवित्र मंत्र के भावार्थ का ज्ञान हुआ, वहाँ इतने सारे फलों के होते खरबूजा ही क्यों, इस प्रश्न का समाधान नहीं हो पाया ! एक बार हिमाचल प्रवास के दौरान एक विद्वान पंडित जी से बात हुई तो उन्होंने इसका समाधान किया था .....

हमारे ग्रंथों में उल्लेखित मंत्रों में सबसे शक्तिशाली मंत्र शिवजी का "महामृत्युंजय मंत्र" है। आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है।    

"ओ3म् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।     
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात् ।।"

भावार्थ :- हम लोग, जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा, बल को बढाने वाला रुद्र्रूप जगदीश्वर है, उसी की स्तुति करें। उसकी कृपा से जैसे खरबूजा पकने के बाद लता बंधन से छूटकर अमृत तुल्य होता है, वैसे ही हम लोग भी प्राण और शरीर के वियोग से छूट जाएं। लेकिन अमृतरूपी मोक्ष सुख से कभी भी अलग ना होवें। हे प्रभो! उत्तम गंधयुक्त, रक्षक स्वामी, सबके अध्यक्ष हम आपका निरंतर ध्यान करें, ताकि लता के बंधन से छूटे पके अमृतस्वरूप खरबूजे के तुल्य इस शरीर से तो छूट जाएं, परंतु मोक्ष सुख, सत्य धर्म के फल से कभी ना छूटें।

सोचने की बात यह है कि इतने प्रकार के फलों के होने के बावजूद मंत्र में खरबूजे का ही चयन क्यों किया गया। इसके बारे में यजुर्वेद  में विस्तार से बताया गया है कि खरबूजे के विशिष्ट गुणों के कारण उसे यह सम्मान खरबूजा जब तक कच्चा रहता है तब तक बेल से अलग नहीं होता। जब वह पक जाता है तो उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है। उसकी मधुरता का जवाब नहीं होता। इसका चौथा गुण यह है कि वह दूसरे खरबूजे को देख रंग बदल लेता है। पक जाने पर जब वह बेल से अलग होता है तो बेल का कोई भी रेशा उसके साथ नहीं रहता। पक जाने पर वह अपने अंदर के बीजों को भी खुद से अलग कर देता है।
प्राप्त हुआ है।

ठीक उसी तरह भक्त परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे देव, मुझे अकाल मृत्यु से दूर रखना, मेरे गुणों की सुगंध भी दूर-दूर तक फैले, मुझमें भी सदा औरों के लिए मधुरता यानि प्रेम बना रहे, मेरे गुणों से और लोग भी गुणी बनें, मेरे अंदर कभी दुर्गुण घर ना करें और जब मैं इस संसार को छोड़ कर जाऊं तो इसका मोह मुझे ना व्यापे और हे प्रभू आप से विनती है कि अपने से मुझे कभी दूर ना करें या रखें।

संकलन में या लिखने में कोई त्रुटि रह गयी हो तो क्षमा चाहूंगा।
#हिन्दी_ब्लागिंग 

सोमवार, 31 जुलाई 2017

"महामृत्युंजय मंत्र"

जैसे देवों के देव् महादेव हैं वैसा ही मंत्रों में सबसे शक्तिशाली उनका मंत्र "महामृत्युंजय मंत्र" है। इसके जाप से भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं। मान्यता और आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है, मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की कृपा से जीवन पा लेता है.....

सावन के पावन माह का सोमवार है। प्रभू शिव का दिवस। जैसे देवों के देव् महादेव हैं वैसा ही मंत्रों में सबसे शक्तिशाली उनका मंत्र "महामृत्युंजय मंत्र" है। इसके जाप से भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं। मान्यता और आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है,  मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की कृपा से जीवन पा लेता है। बीमारी, दुर्घटना, अनिष्ट ग्रहों के प्रभावों से दूर करने, मौत को टालने और आयु बढ़ाने के लिए महामृत्युंजय मंत्र जप करने का विधान है। महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है, लेकिन इस मंत्र के जप में कुछ सावधानियां बरतनी चाहिएं, जैसे - 
महाम़त्युंजय मंत्र का जाप करते समय उसके उच्चारण ठीक ढंग से यानि शुद्ध रूप से होना चाहिए । 
इस मंत्र का जाप एक निश्चित संख्या का  निर्धारण कर करना चाहिए। 
मंत्र का जाप करते मन में या धीमे स्वर में करना चाहिए।  
मंत्र पाठ के समय माहौल शुद्ध होना चाहिए।  
इस मंत्र का जाप रुद्राक्ष की  माला से करना अच्छा माना जाता है। 

खुद पर पूरा भरोसा ना हो तो किसी विद्वान पंडित से ही इसका जाप करवाया जाए तो लाभप्रद रहता है। कारण हमारे मंत्र और श्लोक इत्यादि अपने में गुढार्थ लिए होते हैं। इनका उपयोग करने की शर्त होती है कि इनका उच्चारण शुद्ध और साफ होना साहिए। बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो उन्हें पढने या जाप करने के साथ-साथ उसका अर्थ भी पूरी तरह जानते हों, नहीं तो मेरे जैसे, जैसा रटवा दिया गया या पढ-सीख लिया उसका वैसे ही परायण कर लेते हैं।              

रही बात "महामृत्युंजय मंत्र" की तो कादम्बिनी पत्रिका मे डा.एस.के.आर्य जी द्वारा इस मंत्र का भावार्थ पढ़ने को मिला था, सबके हित के लिए उसे यहां दे रहा हूं।


"ओ3म् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।                             
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात्।।"

भावार्थ :- हम लोग, जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा, बल को बढाने वाला रुद्र्रूप जगदीश्वर है, उसी की स्तुति करें। उसकी कृपा से जैसे खरबूजा पकने के बाद लता बंधन से छूटकर अमृत तुल्य होता है, वैसे ही हम लोग भी प्राण और शरीर के वियोग से छूट जाएं, लेकिन अमृतरुपी मोक्ष सुख से कभी भी अलग ना होवें। हे प्रभो! उत्तम गंधयुक्त, रक्षक स्वामी, सबके अध्यक्ष हम आपका निरंतर ध्यान करें, ताकि लता के बंधन से छूटे पके अमृतस्वरूप खरबूजे के तुल्य इस शरीर से तो छूट जाएं, परंतु मोक्ष सुख, सत्य धर्म के फल से कभी ना छूटें।

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बुधवार, 26 जुलाई 2017

रचना तो छपी, पर चेक बाउंस हो गया !

करीब एक महीने बाद डाक द्वारा एक चेक आया, जाहिर है अच्छा लगना ही  था, एक - दो दिन बाद उसे बैंक में डाल उसके कैश  होने का  इंतजार  कर ही रहा था  कि दो-तीन  दिन बाद  डाकिए ने फिर  आवाज लगाईं, अपन को लगा, ले भाई दूसरा मेहनताना भी आ गया। खोला तो चेक जरूर था पर पहले वाला ही, जो बैंक द्वारा "उछाल" कर वापस भेज दिया गया था.....................

आजकल हर समाचार पत्र समूह अपने को देश का नंबर एक,  सबसे विश्वसनीय, सबसे तेज आदि-आदि घोषित करता रहता है। तक़रीबन यह सबकी "टैग लाइन" में सम्मिलित  होता है।  जबकि असलियत   तो अब किसी से छिपी हुई भी नहीं है।  खैर पिछले  दिनों एक ऐसे ही  समूह की पत्रिका में मेरी भी  एक  रचना छप गयी।   बीसेक दिन बाद एक फोन आया कि मैं फलां-फलां से फलां-फलां बोल रहा हूँ, आपकी  एक रचना हमारी  पत्रिका में छपी थी उसी सिलसिले में आपकी और आपके एड्रेस की 'कन्फर्मेशन'  चाहिए थी! मैंने कहा हाँ भाई मैं ही वह  फलाना आदमी हूँ।        

फिर महीना भर बीत गया, कोई ऊँध-सूँध नहीं !  इसी बीच एक और  रचना   छप कर आ गयी।     मैंने भी सोचा छप गयी सो छप गयी। पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है ! पैसे - वैसे  के मामले  में ये लोग कुछ ज्यादा ही "विश्वसनीय" होते हैं ! बात आयी गयी हो गयी। 

इसके करीब एक महीने बाद डाक द्वारा एक चेक आया, जाहिर है अच्छा लगना ही  था, एक - दो दिन बाद उसे बैंक में डाल उसके कैश  होने का  इंतजार  कर ही रहा था  कि दो-तीन  दिन बाद  डाकिए ने फिर  आवाज लगाईं, अपन को लगा, ले भाई दूसरा मेहनताना भी आ गया। खोला तो चेक जरूर था पर पहले वाला ही, जो बैंक द्वारा "उछाल" कर वापस भेज दिया गया था........ कारण, उन महानुभावों के दस्तखत जो चेक पर थे  उनका मिलान नहीं हो पाना था ! अब.....!     पहले कभी ऐसे  "हादसे"  से पाला नहीं पड़ा था, सो सौजन्यवश पहले  इस सब से संबंधित  भले  लोगों को   खबर करने के लिए   उनका पता ढूंढना शुरू   किया।    आजकल हर बड़ा पत्र खुद को "राष्ट्रीय" दिखलाने के चक्कर में हर बड़े शहर से अपना पर्चा निकालने लगा है, भले ही वहाँ वह रैपर के काम में ही ज्यादा आता हो ! 
इसी चक्कर में पहले   उसके मुख्यालय    से फोन   जोड़ा  तो वहाँ उपस्थित महिला ने बिना पूरी बात सुने सिर्फ पत्रिका का नाम सुन, फोन कहीं और  ट्रांसफर कर दिया, वहाँ    अपना  दुखड़ा बताने पर वहाँ से बताया गया कि पत्रिका जरूर यहां से छपती है पर भुगतान मुख्यालय से किया जाता है, मैंने कहा वहीँ से मुझे इधर धकेला गया है ! जवाब मिला आपको वहीँ फिर बात करनी होगी ! दोबारा पहली जगह   फोन लगते ही मैंने उस भली महिला से कहा कि बिना पूरी बात सुने आप बटन क्यों दबा देती हैं ?  पता नहीं घर से लड़ कर आई थी या आदत ही ऐसी थी बावली बूच की, कहने लगी, सबेरे  से इतने फोन आते हैं,  किस-किस की   पूरी बात सुनूं ?    मैंने कहा कि यह क्या बात हुई, बिना पूरी बात सुने आप कैसे कहीं भी फोन ट्रांसफर कर सकती हैं ?   मेरा चेक बाउंस हुआ है, मुझे उसकी खबर देनी है ! जवाब क्या दिया महिला  ने, मैंने थोड़े ही आपका चेक बाउंस किया है ? भेजा सटक तो रहा था, लग रहा था मैंने ही गुनाह किया है। फिर भी कहा एकाउंट  डिपार्टमेंट से बात करवाइये।   वहाँ भी कुछ हलके तरीके से ही बात ली जा रही थी कि चेक वापस भेज दीजिए दूसरा भिजवा   दिया जाएगा।   मैंने फोन रख दिया।  
कहाँ मैं सोच रहा था कि बेकार में ही किसी को नुक्सान न हो इसलिए पहले संबंधित व्यक्ति को ही खबर करनी चाहिए पर यहाँ तो जैसे ये रोजमर्रा की आदत थी ! अब मैंने सीधे संचालक को ही पत्र लिखने के लिए उसका इ-मेल तलाशा, पर उसकी बायोग्राफी, उसकी पारिवारिक गाथा जरूर मिली पर वह नहीं मिला जो मैं खोज रहा था। दिमाग की सटकन बढ़ती जा रही थी, कुछ कर ही डालने का मन होता जा रहा था। तभी दूसरे दिन एक फोन आया, जिसमें अपनी गलती मानते हुए बार-बार क्षमा मांगी जा रही थी। अपन कौन से किसी से लड़ने के लिए ही बैठे रहते हैं। सो सुलह-सफाई हो गयी। चेक वापस भेज दिया। जब आना हो आ जाएगा। 

यह सब तो हो गया पर एक बात समझ में नहीं आई ! गलती करे कोई, भरे कोई !!  बैंक तो ताड़ में बैठे ही रहते हैं कि मुर्गा कोई गलती करे और उसका गला काटें, तो उसने मुझे जो रजिस्ट्रर्ड खत भेजा और मैंने जो चेक कुरियर से वापस किया, इन सब का जुर्माना तो मुझे ही चुकाना होगा ! क्यों ? ..................      
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सोमवार, 24 जुलाई 2017

सिर्फ प्रवेश ना करने देने से ही शिवजी ने बालक का वध नहीं किया होगा

शिवजी पर गहरी आस्था होने के कारण श्री गणेश जन्म की इस कथा पर सदा मन में एक  उहा-पोह मची रहती थी, पता नहीं क्यों लगता रहता था कि सिर्फ गृह-प्रवेश से रोकने पर ही प्रभू ने उस  बालक का वध  नहीं किया होगा, उसका कोई न कोई और ठोस कारण जरूर होगा ! पांचेक साल पहले मन को मथती इसी सोच को एक पोस्ट का रुप दिया था। मेरा ध्येय किसी की आस्था या धारणा को ठेस पहुँचाना नहीं है इसलिए इसे अन्यथा ना लें। सावन माह है, सोमवार भी है। एक बार फिर उसी रचना को पोस्ट किया है। दोस्त-मित्रों से उनकी राय का इंतजार करते हुए  ..... 


शिवजी मेरे इष्ट हैं, उनमें मेरी गहरी और अटूट आस्था है। उनकी कृपा मेरे पर सदा रही है, जो एकाधिक घटनाओं में फलीभूत होती महसूस भी हुई है। दुनिया जानती और मानती है कि वे देवों के देव हैं, महादेव हैं। भूत-वर्तमान-भविष्य सब उनकी मर्जी से घटित होता है। वे त्रिकालदर्शी हैं। भोले-भंडारी हैं। योगी हैं।  दया के सागर हैं। वैद्यनाथ हैं। आशुतोष हैं।  
असुरों, मनुष्यों यहां तक कि बड़े-बड़े पापियों को भी उन्होंने क्षमा-दान दिया है। बिना किसी भेद-भाव के सदा सुपात्र को वरदान प्रदान किया है। उनके हर कार्य में, इच्छा में, परमार्थ ही रहता है। इसीलिए लगता नहीं है कि सिर्फ प्रवेश ना करने देने की हठधर्मिता के कारण उन्होंने एक बालक का वध कर दिया होगा। जरूर कोई ठोस वजह इस घटना का कारण रही होगी। उन्होँने जो भी किया होगा, वह सब सोच-समझ कर जगत की भलाई के लिए ही किया होगा। 


घटना श्री गणेशजी के जन्म से संबंधित है, तथा कमोबेश अधिकाँश लोगों  को मालुम भी है कि
कैसे अपने स्नान के वक्त माता पार्वती ने अपने उबटन से एक बालक की आकृति बना उसमें जीवन का संचार कर अपने द्वार की रक्षा करने हेतु कहा था और शिवजी ने गृह-प्रवेश ना करने देने के कारण उसका मस्तक काट दिया था। क्योंकि उन्हें
 उस छोटे से बालक के "यंत्रवत व्यवहार" में इतना गुस्सा, दुराग्रह और हठधर्मिता देखी थी, जिसकी वजह से उन्हें उसके भविष्य के स्वरूप को ले चिंता हो गयी थी। उन्हें लग रहा था कि ऐसा बालक बड़ा हो कर देवलोक और पृथ्वी लोक के लिए मुश्किलें ना खड़ी कर दे ! 


भगवान शिव तो वैद्यनाथ हैं। उन्होंने बालक के मस्तक यानि दिमाग में ही आमूल-चूल परिवर्तन कर ड़ाला। एक उग्र, यंत्रवत, विवेकहीन मस्तिष्क की जगह  एक धैर्यवान,  विवेकशील, शांत,
विचारशील, तीव्रबुद्धी, न्यायप्रिय, प्रत्युत्पन्न, ज्ञानवान, बुद्धिमान, संयमित मेधा का प्रत्यारोपण कर उस बालक को एक अलग पहचान दे दी।
 उन्होंने उस बालक के पूरे व्यक्तित्व को ही बदल देने का निर्णय लिया था। 

पर अपनी रचना का ऐसा हश्र देख अत्यंत क्रोधित माता गौरी इतने से ही संतुष्ट नहीं हुईं, उन्होंने उस बालक को देव लोक में उचित सम्मान दिलवाने की मांग रख दी। शिवजी पेशोपेश में पड़ गये पर पार्वतीजी का अनुरोध भी वे टाल नहीं पा रहे थे, सो उन्होंने और उनके साथ-साथ अन्य देवताओं ने भी अपनी-अपनी शक्तियां उस बालक को प्रदान कीं। जिससे हर विधा विवेक, संयम आदि गुणों ने उसे इतना सक्षम बना दिया कि महऋषि वेद व्यास को भी अपने महान, वृहद तथा अत्यंत जटिल महाकाव्य महाभारत की रचना के वक्त उसी बालक की सहायता लेनी पड़ी।


सरल ह्रदय, तुरंत प्रसन्न हो जाने, सदा अपने भक्तों के साथ रह उनके विघ्नों का नाश करने के गुणों के कारण ही आज श्री गणेश अबाल-वृद्ध, अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सब के दिलों में समान रूप से विराजते हैं। वे गणों के  ईश हैं, ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी हैं, इतने रहम दिल हैं कि मूषक जैसे तुच्छ प्राणी को भी जग में प्रतिष्ठा  दिलवाई है। आज देश के पहले पांच लोकप्रिय देवों में उनका स्थान है।  इतनी लोकप्रियता किसी और देवता को शायद ही  प्राप्त हुई हो। इतनी उपलब्धि क्या उस बालक को मिल पाती ? क्या ऐसा ही हुआ होगा ?
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मंगलवार, 18 जुलाई 2017

ललिता का बेटा

बिना किसी अपेक्षा के, अपनी अंतरात्मा की आवाज पर, निस्वार्थ भाव से किसी के लिए किया गया कोई भी कर्म जिंदगी भर संतोष प्रदान करता रहता है।  यह रचना काल्पनिक नहीं बल्कि सत्य पर आधारित है। श्रीमती जी शिक्षिका रह चुकी हैं। उनका एक अनुभव उन्हीं के शब्दों में  ....

काफी पुरानी बात है, उस समय कुकुरमुत्तों की तरह गली-गली स्कूली दुकानें नहीं खुली थीं। हमारा विद्यालय भी एक संस्था द्वारा संचालित था जहां योग्यता के अनुसार दाखिला किया जाता था। यहां की सबसे अच्छी बात थी कि स्कूल में समाज के हर दर्जे के परिवार के बच्चे बिना किसी भेद-भाव के शिक्षा पाते थे। उनमें कार से आने वाले बच्चे पर भी उतना ही ध्यान दिया जाता था जितना मेहनत-मजदूरी करने वाले घर से आने वाले बच्चे पर। किसी भी तरह का अतिरिक्त आर्थिक भार किसी पर नहीं डाला जाता था। फीस से ही सारे खर्चे पूरे करने की कोशिश की जाती थी। इसीलिए स्टाफ की तनख्वाह कुछ कम ही थी पर माहौल का अपनापन और शांति यहां बने रहने के लिए काफी थी। हालांकि करीब तीस साल की लम्बी अवधि में विभिन्न जगहों से कई नियुक्ति प्रस्ताव आए पर इस अपने परिवार जैसे माहौल को छोड़ कर जाने की कभी भी इच्छा नहीं हुई। स्कूल में कार्य करने के दौरान तरह-तरह के अनुभवों और लोगों से दो-चार होने का मौका मिलता रहता था।  इसीलिए इतना लंबा समय कब गुजर गया पता ही नहीं चला।
                        
पर इतने लम्बे कार्यकाल में सैकड़ों बच्चों को अपने सामने बड़े होते और जिंदगी में सफल होते देख खुशी और तसल्ली जरूर मिलती है। ऐसा कई बार हो चुका है कि किसी यात्रा के दौरान या बिलकुल अनजानी जगह पर अचानक कोई युवक आकर मेरे पैर छूता है और अपनी पत्नी को मेरे बारे में बतलाता है तो आँखों में ख़ुशी के आंसू आए बिना नहीं रहते। गर्व भी होता है कि मेरे पढ़ाए हुए बच्चे आज देश के साथ विदेशों में भी सफलता पूर्वक अपना जीवन यापन कर रहे हैं। ख़ासकर उन बच्चों की सफलता को देख कर ख़ुशी चौगुनी हो जाती है जिन्होंने गरीबी में जन्म ले, अभावग्रस्त होते हुए भी अपने बल-बूते पर अपने जीवन को सफल बनाया। 

ऐसा ही एक छात्र था, राजेन्द्र, उसकी माँ ललिता हमारे स्कूल में ही आया का काम करती थी। एक दिन वह अपने चार-पांच साल के बच्चे का पहली कक्षा में दाखिला करवा उसे मेरे पास ले कर आई और एक तरह से उसे मुझे सौंप दिया। वक्त गुजरता गया। मेरे सामने वह बच्चा, बालक और फिर युवा हो बारहवीं पास कर महाविद्यालय में दाखिल हो गया। इसी बीच ललिता को तपेदिक की बीमारी ने घेर लिया। पर उसने लाख मुसीबतों के बाद भी राजेन्द्र की पढ़ाई में रुकावट नहीं आने दी। उसकी मेहनत रंग लाई, राजेन्द्र द्वितीय श्रेणी में सनातक की परीक्षा पास कर एक जगह काम भी करने लग गया। वह लड़का कुछ कहता नहीं था, मन की बात जाहिर नहीं होने देता था, पर उसकी सदा यही इच्छा रहती थी कि जिस तरह भी हो वह अपने माँ-बाप को सदा खुश रख सके। अच्छे चरित्र के उस लडके ने अपने अभिभावकों की सेवा में कोई कसर नहीं रख छोड़ी। उससे जितना बन पड़ता था अपने माँ-बाप को हर सुख-सुविधा देने की कोशिश करता रहता था। माँ के लाख कहने पर भी अपना परिवार बनाने को वह टालता रहता था। उसका एक ही ध्येय था, माँ-बाप की ख़ुशी। ऐसा पुत्र पा वे दोनों भी धन्य हो गए थे।  इस तरह इस परिवार ने कुछ समय ही ज़रा सा सुख देखा था कि एक दिन ललिता के पति का तपेदिक से देहांत हो गया। इस विपदा के बाद तो बेटा माँ के प्रति पूरी तरह समर्पित हो गया। पर भगवान को कुछ और ही मंजूर था, ललिता अपने पति का बिछोह और अपनी बिमारी का बोझ ज्यादा दिन नहीं झेल पाई और पति की मौत के साल भर के भीतर ही वह भी उसके पास चली गयी। राजेन्द्र बिल्कुल टूट सा गया। मेरे पास अक्सर आ बैठा रहता था। जितना भी और जैसे भी हो सकता था मैं उसे समझाने और उसका दुःख दूर करने की चेष्टा करती थी। समय और हम सब के समझाने पर धीरे-धीरे वह नॉर्मल हुआ। काम में मन लगाने लगा। सम्मलित प्रयास से उसकी शादी भी करवा दी गयी। 

आज राजेन्द्र अपने परिवार के साथ रह रहा है। पर जब कभी भी मुझसे मिलता है तो उसकी विनम्रता, विनयशीलता मुझे अंदर तक छू जाती है और मेरे सामने वही पांच साल का पहली कक्षा का मासूम सा बच्चा आ खड़ा होता है। ऊपर से उसके माँ-बाप उसे देखते होंगे तो उनकी आत्मा भी उसे ढेरों आशीषों से नवाजती होगी। 
#हिन्दी_ब्लागिंग 

बुधवार, 12 जुलाई 2017

मेरी ब्लॉग यात्रा

ब्लागिंग करते हुए यह सच्चाई भी सामने आई कि ज्यादातर लोग बहस से बचना चाहते हैं, एक दूसरे की बुराई कम ही करते हैं, लेख इत्यादि पर आलोचना नहीं के बराबर होती है, तारीफ़ की भरमार है। जो कहीं न कहीं खटकता है..................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
आज उन तमाम ब्लॉगर भाई-बहनों, दोस्त-मित्रों, भाई-बंधुओं को दिल की गहराइयों से धन्यवाद देना चाहता हूँ जो रोज "कुछ अलग सा" पर आ कर मेरा हौसला बढ़ाते हैं और मेरे मनोबल को बने रहने में सहयोग प्रदान करते हैं। मेरे इस ब्लॉग का अस्तित्व या थोड़ी-बहुत जो भी पहचान बनी है, वह आप सब के प्रेम और स्नेह के कारण ही संभव  हो सका है। ऐसा ही स्नेह व अपनत्व सदा बना रहे यही कामना है।
                                             
कभी-कभार कुछ-कुछ लिखते रहने के शौक को ब्लॉग-लेखन में बदलने का सारा श्रेय हिन्दुस्तान टाइम्स की मासिक पत्रिका #कादम्बिनी को जाता है। अपने जन्म से ही यह हमारे घर की सदस्य रही है सो वर्षों से नियमित रूप से हमारे यहां आती थी। बात 2007 के इसके अक्टूबर अंक की है। उसमें #बालेन्दु_दाधीच_जी का ब्लागिंग पर एक विस्तृत लेख "ब्लॉग हो तो बात बने" छपा था। लेख की प्रेरणा, बालेन्दु जी के मार्गदर्शन और छोटे बेटे अभय की सहायता से मैंने भी अपना एक ब्लॉग बना ही लिया जिसे नाम दिया "कुछ अलग सा"। जो पूरी तरह स्वांत: सुखाय था। नई-नई विधा थी, शौक भी था तो कुछ ना कुछ रोज ही उस पर दर्ज हो जाता था। अचानक एक दिन #उड़न_तश्तरी के नाम से पहली बार एक टिपण्णी मिली। एक दो दिन बाद ही #राज_ भाटिया_जी ने अपना कमेंट भेजा, तब ब्लॉग की विशालता, उसकी ताकत और पहुँच का असली अंदाजा हुआ। इसी बीच #दैनिक_भास्कर, रायपुर और फिर #पंजाब_केसरी, जालंधर में रचना और लेख छपने से झिझक मिटी और हौसला भी बढ़ा। तभी एक दिन आस्ट्रेलिया से #अनुज_जी ने वहां हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए निकलने वाली पत्रिका #हिंदी_गौरव के लिए मेरे लेखों को छापने की अनुमति चाही, हिंदी का सवाल था, ना की गुंजाईश ही कहां थी ! इसी ब्लॉग के कारण नाम ज़रा पहचाना जाने लगा तो एक स्थानीय अखबार में भी स्तंभ लेखन का आमंत्रण मिला, अच्छा तो लगता ही है जब आपके काम को सराहना मिले। ऐसे ही सफर चलता चला जा रहा था; जब लखनऊ से #रविंद्र_प्रभात_जी के प्रयास से भूटान यात्रा का सुयोग बना। जिंदगी का बेहतरीन अनुभव। जिसके दौरान कई नए मित्र भी बने, पहचान भी बढ़ी।         

धीरे-धीरे कारवां आगे बढ़ता रहा। समय के साथ-साथ विद्वानों, गुणीजनों का साथ मिला। उत्कृष्ट रचनाओं को पढ़ने का सुयोग प्राप्त हुआ। लेखन की हर विधा से साक्षात्कार हुआ। अद्भुत फोटोग्राफी, दुर्गम स्थानों की यात्रा तफ़सील, दूर-दराज के क्षेत्रों की जानकारी, जटिल विषयों का समाधान, हल्के-फुल्के मनोरंजन, सामयिक विषयों पर वार्तालाप के साथ-साथ राजनितिक कटुता, विचार वैमनस्य की कटुता का भी स्वाद चखा। पर यह सच्चाई भी सामने आई कि ज्यादातर लोग बहस से बचना चाहते हैं, एक दूसरे की बुराई कम ही करते हैं, लेख इत्यादि पर आलोचना नहीं के बराबर होती है, तारीफ़ की भरमार है। जो कहीं न कहीं खटकता है।

अपने दही को कोई खट्टा नहीं कहता, उसी तरह हर इंसान को अपनी बुद्धि, अपनी सोच, अपने विचार, अपनी कृति, अपना लेखन, सर्वोपरि लगता है, पर उसे असलियत जरूर बतानी चाहिए। जिससे वह अपनी कमियों, गलतियों को दूर कर सके। 

कृपया इसे आत्म-प्रशंसा ना समझें। पर आज जैसे कुछ अलग सा पर रोज सैंकड़ों आवक दर्ज हो रही हैं तो मन में इच्छा तो बहुत होती है कि सबसे मिला जाए, कौन हैं ! उनसे बात-चीत की जाए, पर ऐसा हो नहीं पाता, खुद आगे आ कर बात करने में एक झिझक सी सदा बनी रहती आई है ! पता नहीं प्रभु ने स्वभाव ही ऐसा बना कर भेजा है ! इसी कारण अभी तक छह-सात लोगों के अलावा किसी से मिलने का सुयोग नहीं हो पाया है। फिर भी सारे इष्ट-मित्र, साथी अपने लगते हैं। आप सभी "अनदेखे अपनो" का मैं सदा आभारी हूँ, आप का प्यार, स्नेह, अपनत्व, मार्गदर्शन सदा मिलता रहे यही कामना है।
जय हिन्द !

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

"हाइफा" के वीरों की तीन मूर्तियां

जोधपुर व मैसूर के सैनिकों ने हाइफा में सिर्फ तलवारों और भालों से दुश्मन की मशीनगनों का सामना करते हुए अप्रतिम वीरता के साथ शहर की रक्षा तो की ही साथ ही दुश्मन के एक हजार से ऊपर सैनिकों को बंदी भी बना लिया। दिल्ली में भी उनकी याद में तीन मूर्ति भवन के सामने के चौराहे पर कांसे की आदमकद, सावधान की मुद्रा में हाथ में झंडा थामे तीन सैनिकोँ की खडी मूर्तियों का स्मारक बनाया गया है...

इस बार जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  इजरायल के दौरे पर गए, जो देश के किसी भी प्रधान मंत्री का वहां का पहला
दौरा था, तो उन्होंने ने वहां के शहर हाइफा जा कर भारतीय सैनिकों को भी श्रद्धांजलि प्रदान की। इस दौरे की मीडिया में काफी चर्चा रही थी। पहले विश्व युद्ध में मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद के सैनिकों को अंग्रेजों की ओर
से युद्ध के लिए तुर्की भेजा गया था। जिसमे जोधपुर व मैसूर के सैनिकों ने इसी जगह सिर्फ तलवारों और भालों से दुश्मन की मशीनगनों का सामना करते हुए अप्रतिम वीरता दिखाते हुए शहर की रक्षा तो की ही साथ ही दुश्मन के एक हजार से ऊपर सैनिकों को बंदी भी बना लिया। हाइफा में लड़े गए युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में वहाँ तो यादगार स्थल बना ही है, अपने यहां दिल्ली में भी उनकी याद में तीन मूर्ति भवन के सामने के चौराहे पर तीन सैनिकोँ की    

खडी मूर्तियों का स्मारक बनाया गया है। ये कांसे की आदमकद, सावधान की मुद्रा में हाथ में झंडा थामे तीन मूर्तियां आज भी खडी हैं। यहाँ से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, बाहर से दिल्ली दर्शन को आने वाले पर्यटक भी इस भवन को देखने आते हैं पर इन मूर्तियों के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है। हालांकि इन मूर्तियों का परिचय उनके नीचे लगे शिला लेख में अंकित है, फिर भी अधिकाँश लोगों ने मूर्तियों को भवन का एक अंग समझ कभी उनके बारे में  जानकारी लेने की जहमत नहीं उठाई। वर्षों पहले इस जगह बीहड़ जंगल हुआ करता था. शाम ढलते ही किसी की इधर आने की हिम्मत नहीं पड़ती थी। पूरा वन-प्रदेश जंगली जानवरों से भरा पडा था। करीब छह सौ साल पहले जब दिल्ली पर मुहम्मद तुगलक का राज्य था तब यह जगह उसकी प्रिय शिकार गाह हुआ करती थी। शिकार के लिए उसने पक्के मचानों का भी निर्माण करवाया था जिनके टूटे-फूटे अवशेष अभी भी वहाँ दिख जाते हैं। समय ने पलटा खाया। देश पर अंग्रजों ने हुकूमत हासिल
कर ली. 1922 में इस तीन मूर्ति स्मारक की स्थापना हुई।  उसके सात साल बाद 1930 में राष्ट्रपति भवन के दक्षिणी हिस्से की तरफ उसी जगह राबर्ट रसल द्वारा एक भव्य भवन का निर्माण, ब्रिटिश "कमांडर इन चीफ" के लिए किया गया. उस समय इसे "फ्लैग-स्टाफ़-हाउस" के नाम से जाना जाता था। जिसे  आजादी के बाद  सर्व-सम्मति से भारत के प्रधान मंत्री का  निवास  बनने का गौरव प्राप्त हुआ और उसका नया नाम बाहर बनी तीन मूर्तियों को ध्यान में रख तीन मूर्ति भवन रख दिया गया। दिल्ली का तीन मूर्ति भवन. देश के स्वतंत्र होने के बाद भारत के प्रधान मंत्री का सरकारी निवास स्थान था, पर प्रधान मंत्री का घोषित निवास स्थान होने के बावजूद इसमें देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ही रहे, उनके निधन के बाद इसे नेहरू स्मारक तथा संग्रहालय बना दिया गया।  
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