शनिवार, 22 अप्रैल 2017

सालासर बालाजी धाम जाएं तो तुलसीदेवी सेवासदन को जरूर आजमाएं

यदि किसी ख़ास दिन ही बालाजी के दर्शन की मानता ना मानी हो तो दिवाली के तुरंत बाद या इस समय, अप्रैल में, चाहे गर्मी भले ही हो, हनुमान जयंती के बाद जाना ही श्रेयस्कर है। भीड़-भाड़ कम हो जाने की वजह से प्रभु खुले दिल से निश्चिंतता से दर्शन देते हैं। कोई हड़बड़ी नहीं, कोई मारा-मारी नहीं, रहने को उचित जगह मिल जाती है। खान-पान साफ़-सुथरा..............

बालाजी महाराज 
साल शुरू होते ही नौकरीपेशा इंसान शायद सबसे पहले छुट्टियों की तारीखें ही ढूंढता है। होता तो सब प्रभू की इच्छा से है पर छुट्टियों के अनुसार कुछ कार्यक्रम निर्धारित कर ही लिए जाते हैं। ऐसा ही कुछ इस साल की शुरुआत में भी हो चुका था, जिसमें अप्रैल माह के दूसरे सप्ताहांत पर फिर सालासर बालाजी के दर्शनार्थ जाना तय कर लिया गया था। हालांकि पिछली बार वहाँ की भीड़ के कारण मेरा मन कुछ डांवाडोल था पर यह जान कर बहुत अच्छा लगा कि लाख "Modernity" के बावजूद मैं अपने बच्चों में प्रभू के प्रति आस्था व विश्वास का बीजारोपण करने में सफल   रहा हूँ। उनके आग्रह पर ही मेरे जाने का मन बन पाया।    

चमेलीदेवी अग्रवाल सेवासदन 
इस बार भी कोरम में पिछली यात्रा पर जाने वाले सारे सदस्य थे। आठ बड़े और दो बच्चे। हर बार झुंझनूं के रानीसती मंदिर से सालासर धाम फिर खाटू श्याम, इस त्रिकोणात्मक यात्रा को ही अंजाम देते आना हुआ है। जो करीब-करीब अफरा-तफरी में ही पूरी की जाती रही है, जिससे थकान का होना स्वाभाविक होता था। इसलिए इस बार सिर्फ सालासर बालाजी के दर्शनों का ही लक्ष्य रखा गया था। 13 अप्रैल को दोपहर एक बजे निकलना तय हुआ था। पर बैसाखी का त्यौहार होने के कारण ट्रैवेहलर को आने में तो देर हुई ही दिल्ली से निकलते-निकलते ही चार बज गए थे।  फिर वाहन-चालक के चालन में भी कुछ नौसिखियापन था, जिसके फलस्वरूप गंतव्य तक पहुंचते-पहुंचते घडी ने पौने एक बजा दिया था। हर बार की तरह चमेलीदेवी अग्रवाल सेवासदन  में तीन कमरों की बुकिंग थी, फिर भी सोते-सोते दो तो बज ही गए थे। रास्ते की थकान और देर के कारण सुबह आलस कुछ देर से टूटा। निश्चिंतता भी थी कि पूरा दिन अपना ही है। नहा-धो कर बाहर निकले तो ज्यादा चहल-पहल नहीं थी। इसके दो कारण थे पहला तो यह था कि यहां दो दिन पहले हनुमान जयंती के मेले का समापन हो चुका था, उसकी भीड़ भी अबतक घर जा चुकी थी। दूसरा गर्मी अपने पूरे शबाब पर थी। यही कारण था कि मुख्य द्वार का शटर खोल दिया गया था जिससे सीधे अंदर जा आराम और शाँति के साथ खुले दर्शन पाने का पांच साल पहले जैसा सौभाग्य प्राप्त हो सका। हालांकि लोग आ-जा रहे थे पर मंदिर के भीतर भी एक बार में    30-35 जनों से ज्यादा दर्शनार्थी नहीं थे। पंडित-पुजारी भी आराम से प्रसाद वगैरह का वितरण कर रहे थे। ना शोर-शराबा ना हीं धक्का-मुक्की। नहीं तो करीब एक-डेढ़ की. मी. का चक्कर zig-zag करते हुए लगाने और भीड़ संभालने में तीन-चार घंटे लगना तो मामूली बात होती है। इस तरह से दर्शन-लाभ मिलने से, तन थकान रहित और मन प्रसन्न व प्रफुल्लित रहता है।

अंजनी माता 
दर्शनोपरांत यहां से तीस-पैंतीस की.मी. दूर डूंगर बालाजी जाना भी सदा कार्यक्रम में शामिल रहता आया है। पर इस बार एक तो गर्मी के कारण निकलना देर से हुआ ऊपर से वहां जा कर पता चला कि दो-तीन महीने पहले हुए एक हादसे के कारण अब गाड़ियों के ऊपर मंदिर तक जाने पर रोक लगा दी गयी है। सात बज रहे थे, अंधेरा घिरना शुरू होने ही वाला था पर आए थे तो बिना दर्शन किए लौटना भी बनता नहीं था। चढ़ाई इतनी सीधी थी कि कहीं-कहीं बिना रेलिंग पकड़े सीधा खड़े होना भी मुश्किल लगता था। करीब साढ़े चार सौ सीढ़ियों के साथ ही कहीं-कहीं समतल कठिन चढ़ाई भी थी। वैसे जब से वाहन मार्ग बंद किया गया है तब से गर्मी से बचाने के लिए इस पूरे मार्ग को ढक दिया गया है, अंधेरे की वजह से फोटो नहीं ली जा सकी। पोस्ट में पुरानी फोटो ही है। जैसे-तैसे साढ़े सात बजे तक दरबार में पहुंचे, प्रभू का आशीर्वाद था, आरती हो रही थी, आना सफल रहा। हालांकि कदम जी नीचे ही रही थीं। सालासर लौटते-लौटते नौ बज गए थे। इस बार खाना वगैरह निपटा सब जने जल्दी से नींद का आह्वान करने चले गए। सुबह फिर प्रभू के दर्शन कर इजाजत ली गयी। माता अंजनी के दर्शन कर दोपहर का भोजन कर वापस दिल्ली घर पहुंचते-पहुंचते रात के दस तो बज ही गए थे। पर  बालाजी की कृपा के कारण इतनी गर्मी (सालासर में पारा 44* छू रहा था) के बावजूद सब जने स्वस्थ व प्रसन्न रहे, यह भी बहुत बड़ी बात थी।

डूंगर बालाजी 
सालासर में वैसे तो साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, मंगलवार और शनिवार तो मेले का दृश्य उत्पन्न कर देते हैं। हनुमान जयंती और कार्तिक पूर्णिमा के दिन तो पूरे इलाके में पैर रखने की जगह नहीं बचती। लोग-बाग़ खुले में, टिलों पर, सड़क के किनारे, गलियों में जहां जगह मिले ठौर बना लेते हैं। आधा-आधा दिन निकल जाता है दर्शन के लिए लाइन में लगे-लगे। इसलिए यदि किसी ख़ास दिन ही बालाजी के दर्शन की मानता ना मानी हो तो दिवाली के तुरंत बाद या इस समय, अप्रैल में, चाहे गर्मी भले ही हो, हनुमान जयंती के बाद जाना ही श्रेयस्कर है। भीड़-भाड़ कम हो जाने की वजह से प्रभु खुले दिल से निश्चिंतता से दर्शन देते हैं। कोई हड़बड़ी नहीं, कोई मारा-मारी नहीं, रहने को उचित जगह मिल जाती है। खान-पान साफ़-सुथरा। 

मेरा सपरिवार सालासर जाना कई बार हो चुका है। वहां सौ के ऊपर ही आवासीय स्थान होंगे। हर साल, दिन ब दिन, नए-नए सेवासदन-धर्मशालाएं बनती भी जा रही हैं। पर जहां तक मेरा अनुभव है, जिसके चलते अब मैं
डूंगर बालाजी पहुँच मार्ग, अब इसे पूर्णतया ढक दिया गया है 
पहली बार जाने वाले को सलाह दे सकता हूँ कि साफ़-सुथरे, आराम-दायक आवास, सफाई के साथ बनाए और परोसे जाने वाले शुद्ध भोजन, जो मनुहार के साथ खिलाया जाता हो और वह सब भी अत्यंत उचित या कहें सस्ते मूल्य में, पाने के लिए #चमेलीदेवी_अग्रवाल_सेवासदन को जरूर आजमाएं। रहने और खाने का इतना सुंदर इंतजाम शायद ही कहीं हो। पिछले पांच-छह सालों में इतनी प्रतिस्पर्द्धा के बावजूद इस संस्था ने रहने और ना ही भोजन की कीमतों में, बिना गुणवत्ता से समझौता किए, कोई बढ़ोत्तरी की है। यहां से मंदिर कुछ दूर जरूर है पर इतनी सुविधाओं के बदले उतना आराम से सहा जा सकता है। इसलिए जब भी सालासर धाम जाना हो इस जगह को जरूर आजमाएं।                

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

"चैरिटी" में हम अपने छोटे-छोटे, निर्धन पडोसी देशों से भी पीछे हैं

आज जो सक्षम हैं वे चतुर-चालाक हो गए हैं। अब वे खुद दान-दक्षिणा नहीं करते, दूसरों से करवाते हैं। जब भी किसी आपात अवस्था में  किसी सहायता की जरुरत होती है तो ये नेता-अभिनेता तुरंत  जनता के सामने झोली फैला कर पहुंच जाते हैं। देश के आम आदमी में लाख धोखों-चोटों के बावजूद अभी भी भावुकता, परोपकारिता, दयालुता बची हुई है इसी के चलते वह पहले से ही फटी अपनी जेब को और खाली करने में संकोच नहीं करता...

हमारे कथा-कहानी-किस्सों में दान की महिमा और दानियों की दरियादिली के अनगिनत किस्से दर्ज हैं। प्राचीन काल से ही देश-समाज और जनकल्याण के लिए राजाओं, ऋषि-मुनियों यहां तक की साधारण नागरिकों ने भी समय पड़ने पर जरूरतमंदों के लिए बिना हिचके अपना सर्वस्व दान कर दिया था। पर अब लगता है कि अतीत की यह बातें सिर्फ दिल खुश करने के लिए ही रह गयी हैं। पहले हम, हमारा देश, हमारा समाज हुआ करता था। पर अब हमें धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता और ना जाने  किस-किस चीज पर बांट दिया गया है ! दिलों में कलुषता और दिमाग में वैमनस्य भर दिया गया है। हमें एक-दूसरे पर शक करना सीखा दिया गया है। ऐसे में कौन किसकी सहायता करेगा ! 

इस बात का तो खूब शोर मचाया जाता है कि फलानी जगह फलाने इंसान की भूख से मौत हो गयी। जो भी सत्ता के विपक्ष में होता है वह राशन-पानी लेकर कुर्सी-धारियों पर चढ़ बैठता है। पर कभी सुना गया है कि इन अरब-खरबपतियों ने, जो जमीन पर चलना अपनी हेठी समझते हैं, जिन्हें जनता के पैसे पर घर-वाहन-दफ्तर सब वातानुकूलित चाहिए, जिन्हें मंहगे खाद्य-पदार्थ भी तकरीबन मुफ्त में मिलते हैं, जिनकी संपत्ति दो-तीन साल में सैकड़ों गुना बढ़ जाती है, जो खुद तो राजा और उनके दूर-दराज के रिश्तेदार भी नवाब बन जाते हैं, कभी किसी बदहाल परिवार की एक पैसे की भी मदद की हो ? यही कारण है कि आज हम इस देने की प्रक्रिया में विश्व में दूर कहीं 133वें नंबर पर खड़े हैं। शर्म आती है यह देख कर कि हमारे छोटे-छोटे, निर्धन, पडोसी देश, नेपाल, श्री लंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान यहां तक की पाकिस्तान भी हमसे कहीं बेहतर साबित हुए हैं इस काम में ! जबकि विडंबना यह है कि, एक सर्वे के अनुसार, पिछले कई वर्षों से दुनिया के मुकाबले हमारे यहां करोड़ और अरबपतियों की सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है पर यह सब ज्यादातर छोटे दिल वाले ही साबित हुए हैं। 

आज जो सक्षम हैं वे चतुर-चालाक हो गए हैं। अब वे खुद दान-दक्षिणा नहीं करते, दूसरों से करवाते हैं। जब भी किसी आपात अवस्था में  किसी सहायता की जरुरत होती है तो ये नेता-अभिनेता तुरंत  जनता के सामने झोली फैला कर पहुंच जाते हैं। देश के आम आदमी में लाख धोखों-चोटों के बावजूद अभी भी भावुकता, परोपकारिता, दयालुता बची हुई है इसी के चलते वह पहले से ही फटी अपनी जेब को और खाली करने में संकोच नहीं करता। इसमें उस छवि का भी हाथ है जो आज के मीडिया ने नेताओं-अभिनेताओं को महिमामंडित कर गढ़ी है। उनके "औरे" से वह इतना चौन्धियाया रहता है कि वह कभी पूछने तो क्या सोचने की भी हिम्मत नहीं कर पाता कि आपने अपनी तरफ से क्या मदद की है ? उल्टा वह तो  उनमें से किसी के द्वारा अपने ही बेटे-बेटियों को अपना धन बांटने के बेशर्म खुलासे पर उसको महानता की श्रेणी में खड़ा कर उसकी वाह-वाही करने लगता है !! 

आज संसार में नवधनाढ्यों की सबसे बड़ी जमात भारत में है। धर्म के नाम पर या अनिश्चित भविष्य से आशंकित हो, भय के कारण हम भले ही धर्मस्थलों पर लाखों का चढ़ावा चढ़ा दें पर किसी जरूरतमंद को, किसी सर्वहारा को कुछ देने में सदा कंजूसी बरतते है। दान-पुण्य में हम बहुत पीछे हैं। यह सही है कि किसी से जबरदस्ती "चैरिटी" नहीं करवानी चाहिए यह तो दिल से होना चाहिए जिसकी हमें आदत नहीं है। हमें खुद को बदलने की सख्त जरुरत है यह जानते हुए कि विश्व भर के गरीबों की एक तिहाई संख्या हमारे ही देश में है।  

मंगलवार, 28 मार्च 2017

हनुमान जी का यह नाम शायद ही आपने सुना होगा

करीब साढ़े छः का समय था, एक आदमी मलिन से टी शर्ट-पैंट पहने, मुंह को कपडे से लपेटे वहां रखी मूर्तियों की आरती जैसा कुछ कर रहा था। काम ख़त्म होने पर मुझे नमस्ते की और मेरे कहने पर अपने चेहरे से कपड़ा हटाया। लगा कि वह नहाया हुआ भी नहीं है

अपने देश में या यूं कहिए कि विश्व भर में हिंदू धर्म के पांच प्रमुख देवों में हनुमान जी का भी नाम है। इन्हें सबसे शक्तिशाली, अमर, अजेय, आशुतोष, विनम्र व दयालु माना जाता है। इनकी लोकप्रियता का कोई  पारावार नहीं है। हिंदू तो हिंदू अन्य धर्मावलंबी भी इन्हें खूब जानते और मानते हैं। पर शायद इनकी विनम्रता और दयालुता का अर्थ कुछ लोगों ने अपनी तरह से परिभाषित कर, अपने लाभ के लिए, देश भर में, दक्षिणी भाग को छोड़ कर, जगह-जगह गली-नुक्कड़-पैदलपथ, पेड़ों के नीचे, दीवारों पर और न जाने कहां-कहां इनके चित्र या मूर्तियां लगा, धर्मभीरु आम जनता को बरगला कर, उनकी भावनाओं को उभाड़, अपनी रोटी सेकनी शुरू कर दी !! 

इस तरह के मंदिरों के तरह-तरह के लोक-लुभावन नाम रखे जाते हैं, जैसे दक्षिण मुखी, सर्व कामना, प्राचीन, बालाजी इत्यादि। आपने भी हनुमान जी के मंदिरों के अलग-अलग नाम सुने होंगे पर मेरा दावा है, मैं जो बताने जा रहा हूँ, वह नाम आपने शायद ही कभी सुना होगा ! नई दिल्ली के जनकपुरी इलाके के सुपर स्पेसियालिटी अस्पताल से दशहरा पार्क होते हुए डिस्ट्रिक सेंटर जाने वाली सड़क के पासंगीपुर मोड़ के कुछ आगे फुटपाथ पर अतिक्रमण कर उस जगह को नाम दिया गया है "श्री ग्रेजुएट बालाजी धाम", जी हाँ, यह नाम है उस जगह का जिसे कुछ वक्त पहले पैदल चलने वालों की कठनाइयों-परेशानियों को दरकिनार कर, पैदल-पथ को अजीबोगरीब तरीके से घेर कर, सिर्फ धनोपार्जन के लिए बनाया गया है। जो इसके रख-रखाव से साफ़ जाहिर होता है। 8 x 3 की तंग सी अंधेरी जगह में एक थड़े के ऊपर करीब दो फुट की हनुमान जी की
मूर्ति स्थापित कर उसकी अर्चना जैसा कुछ करना शुरू कर दिया गया है।


वहां जा कर बात करने की इच्छा होते हुए भी जाना नहीं हो पाता था पर कल शाम को वहां पहुँच ही गया। करीब साढ़े छः का समय था, एक आदमी मलिन से टी-शर्ट, पैंट पहने, मुंह को गंदे से कपडे से लपेटे वहां रखी मूर्तियों की आरती जैसा कुछ कर रहा था। काम ख़त्म होने पर मुझे नमस्ते की और मेरे कहने पर अपने चेहरे से कपड़ा हटाया। लगा कि वह नहाया हुआ भी नहीं है। मैंने सीधा प्रश्न यही किया कि जगह का इस तरह का नाम रखने की कैसे सूझी ? वह कुछ हडबडाया, पर मेरे कहने पर कि मैं विरोध नहीं कर रहा हूँ सिर्फ औचित्य जानना चाहता हूँ, बोला कि मैं तो सिर्फ देख-रेख करता हूँ असल वाले बाबा जी गांव गए हुए हैं। मेरे यह पूछने पर कि आपके इस मंदिर को बनाते समय और नामकरण के समय तो कई लोग होंगे जिन्होंने ऐसे नाम का सुझाव दिया होगा या फिर आपके बाबाजी ग्रेजुएट हैं जिन्होंने कहीं काम ना मिलने पर हनुमान जी की शरण ली है ? पर उस बंदे के पास कोई जवाब नहीं था। मैंने उसे दिलासा दी कि मैं किसी अखबार वगैरह से नहीं हूँ सिर्फ जिज्ञासावश यहां चला आया हूँ, तो चलो यही बताओ कि इस जगह ऐसा


करने की कैसे सूझी ? अब तक वह थोड़ा खुल चुका था, बताया कि यहां वर्षों से रह रहा है। आस-पास की कालोनियों में जो काम मिलता है कर लेता है। साथ की दिवार पर पता नहीं कब-कौन एक दो मूर्तियां रख गया था। जब आने-जाने वाले राहगीरों को यहां रुक कर उन्हें प्रणाम करते देखा तो यहां छत डालने का विचार आया। मेरे पूछने पर कि किसी ने रोका नहीं, तो दृढ़ता से जवाब दिया, सालों से यहां रह रहे हैं, आते हैं 'पैलिटी' वाले, 'पोलिस' वाले, पर हम हटेंगे नहीं ! मैंने पूछा कि लोग आते हैं, चढ़ावा चढ़ता है ? जवाब मिला, मंगल-शनि भीड़  होती है, लोग जुटते हैं, चढ़ावा भी चढ़ता है।  मेरे लिए इतना ही काफी था !

भले आदमी का नाम मालुम है, पर यहां उजागर करने से क्या हासिल ? देश भर में हजारों-लाखों ऐसे मिल जाएंगे जो भगवान को घर मय्यसर करवा रहे हैं !! उन पर वह मेहरबान है तो......... 

शनिवार, 25 मार्च 2017

पेड़ों के नीचे "पवित्र कूड़े" का ढेर

देश के चाहे किसी भी हिस्से में निकल जाइए, शहर हो या क़स्बा, आपको किसी न किसी पेड़ के नीचे हमारे भगवानों की भग्न, बदरंग या पुरानी मुर्तिया, टूटे कांच या फ्रेम में जड़ी देवी-देवताओं की कटी-फटी तस्वीरें, 
पूजा,  हवन इत्यादि से संबंधित वस्तुएं जरूर दिख जाएंगी। कभी बड़े सम्मान के साथ घर ला कर इनकी पूजा-
अर्चना की गयी होगी। इनमें अपने प्रभू या इष्ट की कल्पना की गयी होगी। पर आज गंदगी के माहौल में जानवरों-कीड़े-मकौड़ों के रहमो-करम पर लावारिस पड़ी, धूल फांक रही हैं। क्यों ऐसा होता है या किया जाता है ? धार्मिक प्रवित्ति के होते हुए भी हम क्यों ऐसा करते हैं ? तो इसका एक ही उत्तर दिखता है कि इस बारे में आम इंसान को सही विधि मालुम नहीं है, जब कि धार्मिक पुस्तकों में इसके लिए दिशा-निर्देश उपलब्ध हैं।ऐसी मान्यता है कि भग्न, बेरंग, कटी-फटी  या कुरूप प्रतिमा की घर में पूजा नहीं करनी चाहिए। ऐसा निर्देश है कि खंडित प्रतिमा को बहते जल में या फिर बड़े तालाब में छोड़ देना चाहिए। पर जहां जल ना हो ? वहां किसी पवित्र जगह में उन्हें जमीन में दबा देना चाहिए। अब पवित्र जगह को लेकर असमंजस हो सकता है इसलिए पीपल के वृक्ष के पास की भूमि इस कार्य के लिए उपयुक्त बताई गयी है। पर लोग कष्ट ना कर पीपल के तने के पास ही मूर्तियां रख अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं। यह सोचे बिना कि समय के साथ मूर्तियों का और उसके साथ-साथ, आस-पास के पर्यावरण का क्या होगा ! यही हाल फ्रेम में जड़ी तस्वीरों का होता है जिसमें लगा कांच और भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है। इसके लिए चाहिए कि पहले लकड़ी और कांच को अलग कर लिया जाए और कागज को जला दिया जाए। जलाना पढ़ कर कुछ अजीब और गलत सा लगता है पर वैसे ही छोड़ दिए जाने की बेकद्री से तो बेहतर ही है। वैसे हिन्दू धर्म के अनुसार अग्नि एक पवित्र तत्व है, इसलिए ऐसी पवित्र वस्तुओं को अग्नि तत्व में मिला देना चाहिए और फिर भस्म होने के बाद बची हुई राख को पीपल की जड़ के आस-पास दबा दें।  

घर में टूटी-फूटी प्रतिमा नहीं रखनी चाहिए उससे अनिष्ट हो सकता है, यह तो हम सोच लेते हैं और डर कर उन्हें बाहर कर देते हैं। यहां दो बातें हैं, आध्यात्मिक र्रूप से पहली यह कि हम बड़ी श्रद्धा-भक्ति से धार्मिक
वस्तुओं में प्रभू की छवि या मौजूदगी का अहसास कर उन्हें घर में स्थापित करते हैं पर खंडित होने पर शंकाग्रस्त हो उन्हें लावारिस रूप में कहीं बाहर रख देते हैं, ऐसा करते हुए हमारी निष्ठा, भक्ति, आस्था सब गायब हो जाती हैं ! घर लाते समय जिसमें हमें भगवान् नज़र आते हैं खण्डित होते ही वह सिर्फ एक मिटटी या धातु का टुकड़ा मात्र रह जाता है ! यदि अनिष्ट का इतना ही डर है तो भी यह तो सुनिश्चित करना बनता ही है ना कि ऐसी वस्तुओं का अनादर ना हो !    

दूसरी बात, धार्मिक पक्ष को छोड़ दें तो भी ऐसी चीजों को बाहर करते समय हम इसका ध्यान नहीं रखते कि जाने-अनजाने कूड़ा-कर्कट बढ़ा कर हम पर्यावरण की क्षति का कारण बन जाते हैं। जिस वृक्ष के नीचे हम ऐसी चीजों का ढेर लगाते हैं धर्मभीरुता के कारण किसी की चाह के बावजूद वहां सफाई नहीं हो पाती। फिर फूल वगैरह की वजह से वहां कीड़े-मकौड़ों-जानवरों की आवक बढ़ जाती है, अच्छी-भली जगह कूड़ा घर में तब्दील हो जाती है जो उस पादप के लिए समय के साथ बहुत ही हानिकारक और खतरनाक साबित होता है।  

इसीलिए अब जब भी कोई ऐसी स्थिति सामने आए तो हमें  इन कुछ जरुरी बातों का ध्यान तो रखना ही चाहिए साथ ही अपने आस-पास के माहौल को भी बिना झिझक, बिना अनदेखा किए जागरूक करने में योगदान करना चाहिए। 

सोमवार, 20 मार्च 2017

पतंजलि, बढ़ता मुनाफा, घटता सेवाभाव

आपकी फ्रेंचाइजी वाले दुकानदार तो आपकी वस्तुओं पर पांच से दस प्रतिशत की छूट दे देते हैं पर आप अपने "मेगा-स्टोर" पर पांच रुपये भी नहीं छोड़ते, ऊपर से थैले के पैसे और धरवा लेते हो यह कैसा स्वदेशी प्रेम है ? अरे भाई ! यदि कोई आपके यहां से सात-आठ सौ, जो आपके यहां से खरीदारी की मामूली रकम है, का सामान लेता है तो आप उसे एक  15-20 रुपये का थैला भी नहीं दे सकते ?   गजब है !!    

बाबा रामदेव, एक ऐसा नाम जिसने भारतीय जन-मानस की नब्ज समझ अपने #पतंजलि ब्रांड के व्यापार को ऐसी ऊचाइयों की ओर अग्रसर कर दिया जो नित नए मानक बनाते हुए आसमान की बुलंदियों से आँखें चार करने को तत्पर है। स्वामी जी ने बहुत नपे-तुले अंदाज से धीरे-धीरे लोगों के दिलो-दिमाग में पैठ बनाई। उनको
मालुम था कि आम भारतीय बाहर से चाहे कितना भी आधुनिक हो जाए, मन में कहीं ना कहीं वह अभी भी देशज जरूर है। साथ ही ये आकलन भी हो चुका था कि आजकल लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर बहुत जागरूक रहने लगे हैं, बहुतों का अंग्रेजी दवाओं से मोहभंग हो चुका है, लोग स्वदेशी के नाम को प्रमुखता देने लगे हैं।  इसी से उन्होंने अपने व्यापार के भविष्य का सही अंदाजा लगा लिया। बहुत सोच-समझ कर रण-नीति तैयार की गयी। प्रतिस्पर्द्धा में वर्षों से जड़ें जमाए सिर्फ विदेशी ही नहीं कई स्वदेशी कंपनियां भी मजबूती से सामने खड़ी थीं। लोगों के मन से उनके उत्पादनों से मोहभंग करना और योग गुरु द्वारा बनाई वस्तुओं के प्रति आकर्षण उपजाना बहुत कठिन काम था, पर नामुमकिन नहीं। सबसे पहले टी. वी. पर, फिर चुने हुए शहरों में, फिर देश भर में कक्षाएं लगा कर स्वस्थ रहने के नुस्खे सुझाए गए, योग की महत्ता समझाई गयी, स्वदेशी को अपनाने का आह्वान किया गया। इसके साथ ही रोजमर्रा की कुछ गिनी-चुनी आवश्यक वस्तुओं को बाजार में प्रयोग के तौर पर प्रस्तुत भी कर दिया गया। लोगों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया, इससे जाहिर है हौसला अफजाई तो होनी ही थी। सो अब व्यापक रूप से लोगों को विदेशी चीजों द्वारा होने वाले देश और जनता के नुक्सान को मुद्दा बनाने के साथ-साथ बाजार में #पतंजलि उत्पादों की बाढ़ ला दी गयी। फ्रेंचाइजी की जगह अपनी दुकानें खुलने
लगीं फिर उनको स्टोर और फिर मेगा-स्टोर में बदलने का काम शुरू हो गया। कमाई ने सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए, स्थापित ब्रांडों की ऐसी-की-तैसी होने लगी। पढने-दिखने-सुनने वाले हर मीडिया पर बाबा रामदेव के सहारे पतंजलि छा गया। हम जैसे लोगों को अच्छा लगाने लगा कि अब विदेशी कंपनियों को नानी याद आएगी और नहीं तो कम से कम उचित मूल्य में सही सामान  मिलेगा !

मेरे जैसे बहुत से लोग विदेशी पर स्वदेशी को हावी होने देने की चाह में इस संस्थान से इसके शैशवास्था से ही जुड़े हुए थे। शुरू-शुरू में जब लोग इनकी वस्तुओं पर संशय जाहिर करते थे तो उन्हें अपना उदाहरण दे इन चीजों का प्रयोग करने को उत्साहित करते थे। पता नहीं कितने विदेशी मुरीदों को इस संस्था से जोड़ने के लिए क्या-क्या कहा, किया गया। पर अब आहिस्ता-आहिस्ता यह बात हम सब के दिलों में घर करने लगी है कि कहीं आँख मूँद कर स्वामी जी का अनुसरण कर बेवकूफी तो नहीं कर रहे। इनके प्राकृतिक, शुद्ध, स्वदेशी के चक्कर में भावनात्मक रूप से लुट तो नहीं रहे। इसका कारण भी सामने है। इनके बहुत सारे उत्पाद आर्डर दे कर दूसरी जगह तैयार किए जाते हैं, उनकी प्रमाणिकता का आकलन सही ढंग से होता भी है कि नहीं ? जितनी भारी संख्या में प्राकृतिक जड़ी-बूटियां बाज़ार में उपलब्ध हैं उतनी खुद प्रकृति भी
उपजा पाती है या नहीं ? सबसे बड़ी और अहम बात यदि संस्था को भारत और उसकी जनता से इतना ही लगाव है तो हर चीज इतनी मंहगी क्यों, कि उसे एक गरीब आदमी छू भी ना सके ? क्या बाबाजी या उनके सहयोगियों ने कभी सर्वे किया है कि उनकी औषधियां कितने सर्वहारा तक पहुँच पाती हैं ? क्या फर्क है इनकी स्वदेशी और दूसरों की विदेशी में जबकी दोनों का उद्देश्य तो एक ही रहा........सिर्फ उपार्जन !!!

अब लोग तरह-तरह के सवाल भी उठाने लगे हैं। किसी भी दूसरी दूकान में आप जाएं, सौदा-सुल्फ लेने के बाद वह दुकानदार कोई झोला-थैली आपको जरूर उपलब्ध करवाता है। जिससे आपको अपना  में आसानी रहे। कहीं-कहीं तो ज्यादा सामान को घर तक पहुंचाने की व्यवस्था भी है। पर #पतंजलि मेगा स्टोर में यदि आप थैला लेंगें तो उसके 25/- अलग से लिए जाते हैं। अब कोई पूछे कि आपकी फ्रेंचाइजी वाले दुकानदार तो आपकी वस्तुओं पर पांच से दस प्रतिशत की छूट दे देते हैं पर आप अपने मेगा-स्टोर पर पांच रुपये भी नहीं छोड़ते, ऊपर से थैले के पैसे और धरवा लेते हो यह कैसा स्वदेशी प्रेम है ? अरे भाई ! यदि कोई आपके यहां से सात-आठ सौ, जो आपके यहां से खरीदारी की मामूली रकम है, का सामान लेता है तो आप उसे एक  20-25 रुपये का थैला भी नहीं दे सकते ?  तो अब क्या धारणा बने लोगों की ?

मंगलवार, 14 मार्च 2017

कुछ वाकये सहसा पुरानी कहानिया याद दिला देते है, जैसे हंस और कौवा

सपनों को पूरा करने में कोई बुराई नहीं है। पर उसके लिए अपनी तैयारी, अपनी क्षमता, अपनी औकात का एहसास होना बहुत जरुरी है। सिर्फ किसी को नीचा दिखाने के लिए ईर्ष्या या द्वेष की भावना से उठाया गया कदम कहीं का भी नहीं छोड़ता...... 

बचपन मे सुनी-पढ़ी कहानियां सदा ही सीख से भरी होती थीं। वे कभी भी अप्रसांगिक नहीं हुईँ । कारण भी है उन्हें यूं ही नहीं गढ़ दिया गया था।  उनमें अनुभवों का निचोड़ होता था। ऐसी ही एक कहानी है हंस और कौवे की।

एक बार कुछ हंसों का दल कहीं से उड़ता हुआ आया और अपने गंतव्य पर जाने के पहले एक वृक्ष पर अपनी थकान मिटाने के लिए उतर गया। वहीँ पर एक कौवा भी बैठा उनको आते हुए देख रहा था।  उसने बिना यह जाने कि वे कितनी दूर से आ रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं, उनका मजाक उड़ाते हुए कहा कि तुम लोग एक ही तरह से धीमे-धीमे पंख हिला कर उड़ते हो, फिर भी बड़ी जल्दी थक जाते हो ! मुझे देखो मैं पचीसों तरह की कलाबाजियों के साथ तेज उड़ान भरने के बावजूद तरोताजा रहता हूँ। कभी निढाल नहीं होता।  हंसों के सरदार ने उसे समझाया कि तुम एक सिमित दायरे में रहने वाले पक्षी हो तुम्हें ज्यादा उड़ना नहीं पड़ता और अपनी हैसियत से ज्यादा कोशिश करनी भी नहीं चाहिए। पर हमें दूर-दूर तक उड़ान भरनी होती है, इसीलिए प्रकृति ने हमें उसी के अनुसार क्षमता व् पंख दिए हैं, यदि हम भी करतब दिखाने लगें तो अपने गंतव्य तक कभी भी नहीं पहुँच पाएंगे। पर नासमझ, घमंडी कौवा हंसों को नीचा दिखाने और अपने को श्रेष्ठ साबित करने पर तुला रहा। हंसों ने उसका जवाब ना देते हुए कुछ समय बाद फिर अपनी यात्रा शुरू कर दी। उनको जाते देख कौवा भी उनकी उड़ान का मजाक बनाते हुए और अपने कौशल के प्रदर्शन की नादानी दिखाते हुए उनके पीछे  लग गया। कुछ ही समय बाद वे लोग उड़ते हुए जमीनी हद को छोड़ समुद्र के ऊपर पहुँच गए। कौवा ना कभी लगातार इतना उड़ा था ना ही इतनी दूर आया था, परिणामस्वरूप उस पर इतनी थकान हावी हो गयी कि उसे लगने लगा कि वह कभी भी नीचे पानी में गिर कर अपनी जान गंवा सकता था। मौत को सामने देख उसकी सारी हेकड़ी गायब हो गयी,  उसने हंसों से अपने प्राण बचाने की गुहार लगाईं। उसकी दशा देख हंसों को उस पर दया आ गयी और उन सब ने मिल कर किसी तरह उसको वापस उसके क्षेत्र में पहुंचा दिया।  

सपनों को पूरा करने में कोई बुराई नहीं है। पर उसके लिए अपनी तैयारी, अपनी क्षमता, अपनी औकात का एहसास होना बहुत जरुरी है। सिर्फ किसी को नीचा दिखाने के लिए ईर्ष्या या द्वेष की भावना से उठाया गया कदम कहीं का भी नहीं छोड़ता।   

गुरुवार, 9 मार्च 2017

हांडी में पकते चावल के एक दाने से अंदाज

लोगों का कहना है कि ये राजनीती वाले बहुत सक्षम और चतुर होते हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने हश्र का अंदाज कुछ ही दिनों में लग गया था इसीलिए कोई भी बड़ा नेता प्रचार में नहीं आया एक-दो जगह प्रियंका को भेज उसे भी वापस बुला  लिया गया क्योंकि नतीजों से ख्याति पर असर पड़ता है। राहुल के बारे में आम ख्याल है कि उनको बलि का बकरा बना देती है पार्टी

पिछले दिनों दो बार दिल्ली से लगे उत्तर प्रदेश के दो अलग-अलग इलाकों में जाने का मौका मिला था। चुनावों का समय था तो लगे हाथ कुछ लोगों से उसके परिणाम की जानकारी कुतुहल-वश लेने से खुद को रोका नहीं जा सका। इसे किसी भविष्यवाणी के लिए तो करना नहीं था फिर भी इतना ध्यान जरूर रखा था कि लोग अलग-अलग तबके, उम्र और परिवेश से हों। इस सारे क्रिया-कलाप को ऐसे ही छोड़ दिया था पर जब रोज टी.वी. के चैनलों पर लुटे-पिटे दलों द्वारा भी बढ़-चढ़ कर दावे पेश होते देखे तो सोचा अपनी मेहनत को भी ब्लॉग पर उजागर करते बनता है। भले ही कम ही लोगों से बात-चीत हुई पर कहते हैं ना कि हांडी में पकते चावलों के एक ही दाने से आभास मिल जाता है, पर इसके साथ ही यह भी सच है कि ठेठ यू. पी. और इधर गाजियाबाद, शालीमार गार्डन या नोयडा में जमीन-आसमान का फर्क है फिर भी यहां जो जवाब मिले वे बहुत रोचक थे।

अधिकतर का कहना था कि स्पष्ट बहुमत मुश्किल है। बहुतों का यह मानना था कि भाजपा का बर्चस्व बढ़ेगा और आश्चर्य  नहीं होगा यदि उसकी सरकार बन जाए। भाजपा का प्लस-प्वाइंट मोदी जी हैं। करीब पच्चीस साल बाद केंद्र में उनके बहुमत की सरकार आई जिसने कुछ तो आशा जगाई ही है।   उनकी कार्य-शैली, उनकी मेहनत, उनके खुद को खतरे में डाल कर लिए गए निर्णयों से लोग प्रभावित हैं और उन्हें राज्य की बदहाली को दूर करने में सहायक मानते हैं। जनता में इस बात का भी आक्रोश है कि बाकी के दलों के नेता देश-समाज की
भलाई या विकास की बात न कर बात-बेबात सिर्फ मोदी के पीछे पड़े हुए हैं। सपा की "नौटँकी" और उसका कांग्रेस को साथ लेना भाजपा के लिए फायदेमंद होगा। लोगों का कहना कि मौका पाते ही कांग्रेस धत्ता बता जाएगी।  ऐसे लोगों ने जिन्हें अपने इलाके से बाहर जाने की जरुरत नहीं पड़ती, जैसे चायवाला, सब्जीवाला, जूते गांठने वाला आदि उनसे जब विकास के रूप में यमुना हाइवे के बारे में पूछा तो बोले, साहब हमें उससे क्या लेना-देना, वह तो गाडी-घोड़े वालों के लिए है, हमें तो यहां की सडकों से साबका पड़ता है जिस पर ध्यान से ना चलें तो मुंह के बल गिरें.  सायकिल चालकों की सुविधा के लिए बने मार्ग को चुनाव प्रपंच बताया गया क्योंकि इसके पूरा होने क्र पहले ही उसमें टूट-फूट शुरू हो गयी है। सपा के विपरीत जा रही बातों में उनकी आपसी कलह, कुर्सी की चाहत में कांग्रेस से हाथ मिलाना और  नेताजी की बेरुखी रही। फिर भी बहुत से लोगों को अखिलेश भाते हैं। उनका युवा होना, बाहुबलियों-कट्टरपंथियों से दूरी बनाने की कोशिश आम लोगों को हौसला देती है। बसपा को लोग मौका-परस्त पार्टी मानते हैं। उसके वादों पर भी लोगों को भरोसा नहीं रह गया है पर उसका अपना वोट बैंक भी है यह भी मान्यता है। इसलिए उसे छुपा रुस्तम मानते हैं लोग। ये खबरें भी चौंका गयीं थीं कि यू. पी. के बाबूओं ने अचानक बसपा की सरकार में बनी मूर्तियों को साफ कर चमकाना शुरू कर दिया था।  सबसे बुरी हालात कांग्रेस की है। लोगों का कहना है कि ये राजनीती वाले बहुत सक्षम और चतुर होते हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने हश्र का अंदाज कुछ ही दिनों में लग गया था इसीलिए कोई भी बड़ा नेता प्रचार में नहीं आया एक-दो जगह प्रियंका को भेज उसे भी वापस बुला  लिया गया क्योंकि नतीजों से ख्याति पर असर पड़ता है। राहुल के बारे में आम ख्याल है की उनको बलि का बकरा बना देती है पार्टी।

तो लब्बो-लुआब यही रहा कि जनता भी कंफ्यूज है पर यदि चावल के एक दाने पर विश्वास करें तो भाजपा की राह प्रशस्त दिख रही है।  

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