pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

वेलेंटाइन दिवस पर वह कहानी, जो प्रेम की पराकाष्ठा है

पहली बार बचपन में जब "उसने कहा था" कहानी को पढने और फिल्म देखने का मौका मिला तो ना कुछ महसूस हुआ नाहीं उसकी गहराई समझ में आई थी, सब सर के ऊपर से गुजर गया था। पढाई के दौरान इस कहानी के कोर्स में होने के कारण फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये........ 

आज वेलेंटाइन दिवस है। पश्चिम से आयातित इस त्यौहार को बाज़ार ने प्रेम दिवस के रूप में भी खूब प्रचारित किया है । जिसने भारतीय युवाओं को भी खूब लुभाया है। सब इसे अपने-अपने अर्थ लगा, अपनी-अपनी समझ के अनुसार, अपने-अपने तरीके से मनाने की होड़ या कोशिश करते हैं। पर कितनों में अपने प्रिय के प्रति सच्चे प्रेम या त्याग की भावना रहती है ?   

वर्षों पहले श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरीजी की अमर कहानी "उसने कहा था" उसी प्रेम की पवित्रता और गहराई के कारण खुद और अपने लेखक को अमर कर गयी है। पहली बार बचपन में जब "उसने कहा था" कहानी को पढा और फिर फिल्म भी देखी तो ना कुछ महसूस हुआ था नाहीं उसकी गहराई समझ में आई थी, सब सर के ऊपर से गुजर गया था। पढाई के दौरान इस कहानी के कोर्स में होने के कारण फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये। लगता नहीं कि आज के अधिकांश युवा इससे परीचित होंगे। पहले तो कोर्स वगैरह में भी यह होती थी। पर धीरे-धीरे सब कुछ बदल ही तो रहा है। इस अमर कहानी का सार देने की कोशिश करता हूं। जो बताती है कि "वेलेंटाइन" कैसा होना चाहिए ।   

अमृतसर में अपने मामा के घर आए दस-ग्यारह साल के लहनासिंह का बाज़ार में अक्सर एक सात-आठ साल की लडकी से सामना हो जाता है। ऐसे ही छेड़-छाड़ के चलते लहना उससे पूछता रहता है "तेरी कुड़माई (सगाई)हो गयी" और लड़की "धत्" कह कर भाग जाती है। पर एक दिन वह बालसुलभ खुशी से जवाब देती है "हां, हो गयी। देखता नहीं मेरा यह रेशमी सालू"।

वह तो चली जाती है, पर लहना पर निराशा छा जाती है। दुख और क्रोध एक साथ हावी हो, बहुतों से लड़वा, भिड़वा, गाली खिलवा कर ही उसे घर पहुंचवाते हैं। पच्चीस साल बीत जाते हैं। फौज में लहना सिंह जमादार हो जाता है। उसका अपनी बटालियन के सूबेदार हज़ारा सिंह के साथ अच्छा दोस्ताना है। एक ही तरफ के रहनेवाले हैं। हज़ारा सिंह का बेटा बोधा सिंह भी इनके साथ उसी मोर्चे पर तैनात है। कुछ दिनों पहले छुट्टियों में ये घर गये थे। तभी पहला विश्वयुद्ध शुरु हो जाता है। सबकी छुट्टियां रद्द हो जाती हैं। हज़ारा सिंह खबर भेजता है, लहना सिंह को
कि मेरे घर आ जाना, साथ ही चलेंगे। लहना वहां पहुंचता है तो सूबेदार कहता है कि सूबेदारनी से मिल ले, वह तुझे जानती है। लहना पहले कभी यहां आया नहीं था, चकित रह जाता है कि वह मुझे कैसे जानती होगी। दरवाजे पर जा मत्था टेकता है। आशीष मिलती है। फिर सूबेदारनी पूछती है "पहचाना नहीं?  मैं तो देखते ही पहचान गयी थी....तेरी कुड़माई हो गयी.......धत्.....अमृतसर"

सब याद आ जाता है लहना को। सूबेदारनी रोने लगती है। बताती है कि चार बच्चों में अकेला बोधा बचा है। अब दोनों लाम पर जा रहे हैं। जैसे तुमने एक बार मुझे तांगे के नीचे आने से बचाया था, वैसे ही इन दोनों की रक्षा करना। तुमसे विनती है।

मोर्चे पर बर्फबारी के बीच बोधा सिंह बिमार पड़ जाता है। खंदक में भी पानी भरने लगता है। लहना किसी तरह बोधे को सूखे में सुलाने की कोशिश करता रहता है। अपने गर्म कपड़े भी बहाने से उसे पहना खुद किसी तरह गुजारा करता है। इसी बीच जर्मन धोखे से हज़ारा सिंह को दूसरी जगह भेज खंदक पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं पर लहना सिंह की चतुराई से हज़ारा सिंह की जान और खंदक दोनों बच जाते हैं। पर वह खुद बुरी तरह घायल होने पर भी चिकित्सा के लिये बाप-बेटे को पहले भेज देता है, हज़ारा सिंह से यह कहते हुए कि घर चिठ्ठी लिखो तो सूबेदारनी से कह देना उसने जो कहा था मैने पूरा कर दिया है। उनके जाने के बाद वह अपने प्राण त्याग देता है।

यह तो कहानी का सार है। पर बिना इसे खुद पढे इसकी मार्मिकता नहीं समझी जा सकती।  गुलेरीजी के शब्दों मे ही, अमृतसर के तांगेवालों की चाकू से भी तेज धार की जबान, दोनों बच्चों की चुहल, खंदक की असलियत, लड़ाई की विभीषिका, सूबेदारनी की याचिका, लहना की तुरंत-बुद्धि और फिर धीरे-धीरे करीब आती मौत के साये में स्मृति के उभरते चित्र, वह सब बिना पढे महसूस करना मुश्किल है।

यदि कभी भी मौका मिले तो इसी नाम पर बनी पुरानी फिल्म "उसने कहा था" देखने से ना चूकें।  जिसमें स्व. सुनील दत्त और नंदा जी ने काम किया था।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

तकनीक को सेवक बना कर ही रखें

इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिक फोन के अनगिनत लाभ, ढेरों अच्छाइयां, विशेषताएं तथा उपयोग हैं पर साथ ही कुछ बुराइयां भी हैं। सही मायने में यह फोन की भी बुराइयां नहीं हैं हमारी ही गलतियां हैं, जो हम बिना सोचे-समझे उसका अनियंत्रित तरीके से प्रयोग करते रहते हैं। अति तो किसी भी चीज की बुरी होती है फिर चाहे वह अमृत ही क्यों न हो !

आजके युग में जितनी क्रांति, जितनी खोज, संचार-माध्यम में हुई है उतना शायद और किसी भी क्षेत्र में नहीं हो पाया है। यहां तो अभी भी तूफान चल  रहा है। नयी-नयी ईजादें, नयी-नयी तकनीकें, नए-नए उपकरण दुनिया भर के बाज़ारों में तहलका मचा  रहे हैं। उपकरणों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय आज स्मार्ट फोन है जिसका उपयोग
बाल, वृद्ध, नौजवान सभी धड्डले से कर रहे हैं पर जिसका सबसे बड़ा ग्राहक आजका युवा वर्ग है। जो बुरी तरह इसको अपनी लत बना चुका है, दिन-दोपहर-शाम-रात जब देखो, जहां देखो फोन से चिपका नज़र आता है, जाने-अनजाने, बिना इसकी फ़िक्र किए कि यह आदत सेहत और शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक है। अब तो डॉक्टरों ने भी यह प्रमाणित कर दिया है कि जहां मोबायल फोन का अनियंत्रित उपयोग कान, गर्दन, हाथो, उँगलियों, कलाइयों और उनके जोड़ों में तरह-तरह की समस्याएं उत्पन्न कर गठिया रोग तक का कारण बन जाता है, वहीँ यह आँखों की रौशनी के लिए भी अत्यंत खतरनाक सिद्ध हो चुका है।  

आजकल देखा गया है कि घरों में बाकी सदस्यों के सो जाने के बाद बच्चे और युवा अंधेरे में भी अपने स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते रहते हैं जिससे शरीर के सबसे नाजुक अंग आँख पर बहुत जोर पड़ता है। लगातार ऐसा होने से वह अपनी देखने की क्षमता खो बैठती है। अभी "जर्नल ऑफ मेडिसिन" पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दो महिलाओं में ट्रांजिएट स्मार्टफोन ब्लाइंडनेस पाया गया। इस बिमारी में किसी के अंधेरे में लगातार स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने पर एक आंख की रौशनी कुछ मिनटों के लिए चली जाती है। यदि आदत ना बदली जाए तो आँख स्थाई तौर पर देखने की शक्ति गंवा देती है।

हमारी आँख का रेटिना बहुत ही संवेदनशील तथा नाजुक अवयव होता है। उजाले से अँधेरे में जाने या फिर अँधेरे से तुरंत प्रकाश में आने पर इसे स्थिति से सामंजस्य बैठाने में कुछ समय लगता है। इसीलिए जब हम
रौशनी से अँधेरे में जाते हैं तो पहले कुछ भी दिखाई नहीं देता पर धीरे-धीरे वातावरण से आँखें अभ्यस्त हो जाती हैं वैसे ही अँधेरे से उजाले में जाने पर आँखें चौधिया जाती हैं जिसके अनुकूलन में समय लगता है। बहुत से लोगों की आदत है कि सुबह उठाते ही वे फोन की ओर लपकते हैं जबकि आँखें अभी प्रकाश की अभ्यस्त नहीं हुई होतीं इससे रेटिना पर जबरदस्त जोर पड़ता है जो आँखों के लिए नुक्सान-दायक होता है। दूसरी ओर पाया गया है कि अधिकतर लोग सोते समय रात के अँधेरे में फोन पर एक ही आँख से नज़र गड़ा उसका प्रयोग करते हैं जिससे एक आँख फोन की तीव्र सफ़ेद रौशनी में तथा दूसरी अँधेरे में होने की वजह से आपस में तारतम्य नहीं बैठा पातीं और क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। 

इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिक फोन के अनगिनत लाभ, ढेरों अच्छाइयां, विशेषताएं तथा उपयोग हैं पर साथ ही कुछ बुराइयां भी हैं। सही मायने में यह फोन की भी बुराइयां नहीं हैं हमारी ही गलतियां हैं, जो हम बिना सोचे-समझे उसका अनियंत्रित तरीके से प्रयोग करते रहते हैं। अति तो किसी भी चीज की बुरी होती है फिर चाहे वह अमृत ही क्यों न हो ! इसीलिए जहां तक हो सके इसका संभल कर उपयोग करना चाहिए वहीँ दूसरों को खासकर बच्चों को इसके गुण-दोषों से अवगत कराते रहना चाहिए। वैसे तो इसका जहां तक हो सके काम उपयोग करना चाहिए जो की संभव नजर नहीं आता फिर भी सोने के पहले इस पर अपने काम बीसेक मिनट पहले निपटा लें, सोते समय इसे अपने शरीर से करीब चार फिट दूर रखें, रात को बहुत जरुरी हो तो इसका स्क्रीन "डार्क" कर इसका उपयोग करें और सुबह उठाने के बाद करीब पन्द्रह मिनट बाद ही इसे प्रयोग में लाएं। सदा ध्यान रखें शरीर ही है जिससे दुनिया का उपभोग है यही साथ नहीं देगा तो दुनिया किस काम की !

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

पहले प्रावधान हो फिर विधान हो

सत्तर के दशक में कलकत्ता शहर के लिए एक कानून पारित किया गया था, जिसके तहत यदि कोई मूत्रालय के अलावा कहीं और मूत्र-विसर्जन करते पकड़ा जाता था तो उसे जुर्माना भरना पड़ता था ! शहर को साफ़-सुथरा रखने के लिए उठाया गया था यह कदम, सोच अच्छी थी, पर नियम लागू करते समय किसी ने शहर की आबादी के अनुपात में, ना के बराबर मूत्रालयों की संख्या पर नाहीं सोचा था, नाहीं ध्यान दिया था ! परिणाम, संघर्ष, अराजकता, असंतोष, टकराव !

कई बार लगता है कि जोश में, भावनाओं के अतिरेक में, कुछ कर गुजरने की चाह में, बिना मौजूदा स्थिति का आकलन किए ऐसे नियम पारित कर दिए जाते हैं जिनका तत्काल लागू होना लगभग नामुमकिन होता है। फिर बिना सोचे-समझे "टारगेट" पूरा करने के चक्कर में आम आदमी की पीसाईं शुरू हो जाती है ! इसी संदर्भ में याद आता है, सत्तर के दशक के कलकत्ता शहर के लिए पारित किया गया एक कानून, जिसके तहत यदि कोई मूत्रालय के अलावा कहीं और मूत्र-विसर्जन  करते पकड़ा गया तो उसे जुर्माना भरना पड़ता था ! शहर को साफ़-सुथरा रखने के लिए उठाया गया था यह कदम। सोच अच्छी थी, पर नियम लागू करते समय किसी ने शहर की करीब एक करोड़ की आबादी के अनुपात में नहीं के बराबर मूत्रालयों की संख्या पर नाहीं सोचा था, नाहीं ध्यान दिया था ! यदि उचित व्यवस्था के बाद किसी को दोषी पाया जाता तो बात समझ में आती थी पर यहां तो सिर्फ मनाही लागू कर दी गयी थी ! अंजाम; संघर्ष, अराजकता, असंतोष, टकराव !

आज तकरीबन चालीस वर्षों के ऊपर गुजरने के बावजूद सरकारी ढर्रा वैसा ही है। स्वच्छता अभियान का जोरों शोरों से प्रचार हो रहा है, अच्छा है, साफ़-सफाई के बिना जीवन दूभर हो जाता है; पर क्या सिर्फ बोलने, भाषणों-नारों से ही स्वच्छता तारी हो जाएगी ? एक-दो दिन दस-बीस लोगों के झाड़ू के साथ कैमरे के सामने घूमने से ही जागरूकता आ जाएगी ? क्या हर घर में शौचालय कहने से ही बन जाएगा ?  जिनके घर ही नहीं हैं उनका क्या होगा ? किसी के पास क्या सही आंकड़ा है कि भारत में कितने लोग छत-विहीन हैं और वे जीवन भर गर्मी-बरसात-सर्दी हर मौसम में कहां और कैसे सोते हैं ? उन लोगों के लिए प्रकृति की पुकार का शमन करने के लिए कहां जाने का प्रावधान है ?  सुलभ शौचालय बने जरूर हैं पर एक तो उनकी संख्या पर्याप्त नहीं है दूसरे उसमें जाने का "जुर्माना" वे लोग कैसे देंगे जिनकी रोज की आमदनी ही इतनी नगण्य है कि वह यही सोचता रह जाए कि वह खाने पर खर्च करे या "जाने" पर ! अपनी जिंदगी को देखे कि देश की स्वच्छता को ? और ऐसों की गिनती लाखों में है !  तो बिना इनकी मजबूरी दूर किए कैसे स्वच्छता के सपने को पूरा करने का सोचा भी जा सकता है ?

इसी कड़ी में, आज जो कार्य-व्यवसाय को नगद-विहीन करने की कवायद जोरों-शोरों से लागू करने का अभियान चलाया जा रहा है। उसके लिए बहुत ही मजबूत इंटरनेट व्यवस्था की जरुरत है। पर खेद  की बात है कि वह चाहे B.S.N.L. हो या  #M.T.N.L. दोनों ही अपनी कसौटी पर बूरी तरह नाकाम रहे हैं। चाहे वह नेट की "स्पीड" हो या उसकी उपलब्धता। लोगों की अनगिनत शिकायतों के बावजूद कोई भी सुधार होता नजर नहीं आता। जब वे अभी तक का बोझ नहीं उठा पा रहे तो कैसे कोई यकीन कर ले कि आने वाले दिनों में होने वाली व्यवस्था में ये कंपनियां सुचारू रूप से काम कर पाएंगी। लोगों के दिलों में तो अब यह बात घर करने लग गयी है कि यह अक्षमता दूसरी प्रायवेट कंपनियों के लाभ के लिए आयोजित की जाती है। नहीं तो क्या बात है कि हर तरह की सुविधा और सक्षमता के बावजूद इनका नेटवर्क सबसे गया-बीता है। कड़वा सच तो यही है कि कुछेक कर्मचारियों की लापरवाही या अपने तुच्छ लाभ के लिए उनके द्वारा की गयी अनुचित कार्यवाही के चलते बदनामी तत्कालीन सरकार को ही मिलती है ! क्या इस ओर माननीय #संचारमंत्रीजी ध्यान देंगे !

यह बात सही है कि जनहित में लिए गए निर्णयों को जल्द से जल्द लागू हो जाना चाहिए पर हमारे देश की अंग्रेजों के समय से चली आ रही लाल-फीताशाही में अभी भी बदलाव नहीं आया है। जिसके चलते योजनाओं को लागू होने में वर्षों लग जाते हैं। पर साथ ही यह भी ध्यान रखना लाजिमी होता है कि जो योजना बनाई जा रही है उसके लिए उचित व्यवस्था व संसाधन उपलब्ध हैं भी कि नहीं !! 

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

बसंत भी उद्विग्न है !

बसंत के चेहरे पर स्मित हास्य था, बोला मैं तो हर साल आता हूँ। आदिकाल से ही जब-जब शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट होती है, मैं पहुँचता रहा हूँ। सशरीर ना सही पर अपने आने का सदा प्रमाण देता रहा हूँ । आपने भी जरूर महसूस किया ही होगा कि मेरे आगमन से सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक अंगडाई ले, आलस्य त्याग जागने लगती है। जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता है..... 

अभी पौ फटी नहीं थी कि दरवाजे पर कुछ आहट सी सुनाई पड़ी। रात में देर से सोने के कारण अभी भी अर्द्ध-सुप्तावस्था की हालत हो रही थी, इसीलिए सच और भ्रम का पता ही नहीं चल पा रहा था। पर कुछ देर बाद फिर लगा बाहर कोई है। इस बार उठ कर द्वार खोला तो एक गौर-वर्ण अजनबी व्यक्ति को खड़े पाया। आजकल के परिवेश से पहनावा कुछ अलग था। धानी धोती पर पीत अंगवस्त्र, कंधे तक झूलते गहरे काले बाल, कानों में कुण्डल, गले में तुलसी की माला, सौम्य-तेजस्वी चेहरा, होठों पर आकर्षित कर लेने वाली मुस्कान। इसके साथ ही जो एक चीज महसूस हुई वह थी एक बेहद हल्की सुवास, हो सकता है वह मेरे प्रांगण में लगे फूलों से ही आ रही हो !      
मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ?  वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत !
बसंत ! कौन बसंत ? मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा था !
मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ !
अरे भाई, वही बसंत देव, जिसके आगमन की ख़ुशी में आप सब पंचमी मनाते हैं !
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था ! क्या कह रहा है सामने बैठा इंसान !! यह कैसे हो सकता है ?
घबराहट साफ़ मेरे चेहरे पर झलक आई होगी, जिसे देख वह बोला, घबड़ाइये नहीं, मैं जो कह रहा हूँ वह पूर्णतया सत्य है।

मेरे मुंह में तो जैसे जबान ही नहीं थी। लौकिक-परालौकिक, अला-बला जैसी चीजों पर मेरा विश्वास नहीं था। पर जो सामने था उसे नकार भी नहीं पा रहा था। सच तो यह था कि मेरी रीढ़ में एक सर्द लहर सी उठने लगी थी। आश्चर्य यह भी था कि ज़रा सी आहट पर उठ बैठने वाली श्रीमती जी को भी कोई आभास नहीं हुआ था, मेरे उठ कर बाहर आने का। परिस्थिति से उबरने के लिए मैंने आगंतुक को कहा, ठंड है, मैं आपके लिए चाय का इंतजाम करता हूँ, सोचा था इसी बहाने श्रीमती जी को उठाऊंगा, एक से भले दो। पर अगले ने साफ़ मना कर दिया कि मैं कोई भी पेय पदार्थ नहीं लूँगा, आप बैठिए। मेरे पास कोई चारा नहीं था। फिर भी कुछ सामान्य सा दिखने की कोशिश करते हुए मैंने पूछा, कैसे आना हुआ ?

बसंत के चेहरे पर स्मित हास्य था, बोला मैं तो हर साल आता हूँ। आदिकाल से ही जब-जब शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट होती है, मैं पहुँचता रहा हूँ। सशरीर ना सही पर अपने आने का सदा प्रमाण देता रहा हूँ । आपने भी जरूर महसूस किया ही होगा कि मेरे आगमन से सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक अंगडाई ले, आलस्य त्याग जागने लगती है। जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता है। सर्वत्र माधुर्य और सौंदर्य का बोलबाला हो जाता है। वृक्ष नये पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते हैं। सारी प्रकृति ही मस्ती में डूब जाती है। जीव-जंतु, जड़-चेतन सब में एक नयी चेतना आ जाती है। हर कोई एक नये जोश से अपने काम में जुटा नज़र आता है। मौसम की अनुकूलता से मानव जीवन में भी निरोगता छा जाती है, मन प्रफुल्लित हो जाता है, जिससे चारों ओर प्रेम-प्यार, हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता है। इस मधुमास या मधुऋतु का, जिसे आपलोग फागुन का महीना कहते हो, कवि आकंठ श्रृंगार रस में डूब कर अपनी रचनाओं में चिरकाल से वर्णन करते आए हैं। इतना कह वह चुप हो गया। जैसे कुछ कहना चाह कर भी कह ना पा रहा हो। 
मैं भी चुपचाप उसका मुंह देख रहा था। उसके मेरे पास आने की वजह अभी भी अज्ञात थी।

वह मेरी ओर देखने लगा। अचानक उसकी आँखों में एक वेदना सी झलकने लगी थी। एक निराशा सी तारी होने लगी थी। उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब सब धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। ऋतुएँ अपनी विशेषताएं खोती जा रही हैं, उनका तारतम्य बिगड़ता जा रहा है। इसी से मनुष्य तो मनुष्य, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं को भी गफलत होने लगी है। सबकी जैविक घड़ियों में अनचाहे, अनजाने बदलावों के कारण लोगों को लगने लगा है कि अब बसंत का आगमन शहरों में नहीं होता। गलती उन की भी नहीं है। बढ़ते प्रदूषण, बिगड़ते पर्यावरण, मनुष्य की प्रकृति से लगातार बढती दूरी की वजह से मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता। जब कि मैं तो अबाध रूप से सारे जग में संचरण करता हूँ। यह दूसरी बात है कि मेरी आहट प्रकृति-विहीन माहौल और संगदिलों को सुनाई नहीं पडती। दुनिया में यही देश मुझे सबसे प्यारा इसलिए है क्योंकि इसके हर तीज-त्यौहार को आध्यात्मिकता के साथ प्रेम और भाई-चारे की भावना से जोड़ कर मनाने की परंपरा रही है। पर आज उस सात्विक उन्मुक्त वातावरण और व्यवहार का स्थान व्यभिचार, यौनाचर और कुठाएं लेती जा रही हैं। भाईचारे, प्रेम की जगह नफरत और बैर ने ले ली है। मदनोत्सव तो काम-कुंठाओं से मुक्ति पाने का प्राचीन उत्सव रहा है इसे मर्यादित रह कर शालीनता के साथ बिना किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए, बिना किसी को कष्ट या दुख दिए मनाने में ही इसकी सार्थकता रही है। पर आज सब कुछ उल्टा-पुल्टा, गड्ड-मड्ड होता दिखाई पड़ रहा है। प्रेम की जगह अश्लीलता, कुत्सित चेष्टाओं ने ले ली है। लोग मौका खोजने लगे हैं इन तीज-त्योहारों की आड़ लेकर अपनी दमित इच्छाओं, अपने पूर्वाग्रहों को स्थापित करने की। 

आज मेरा आपके पास आने का यही मकसद था कि वक्त आ गया है गहन चिंतन का, लोगों को  अपने त्योहारों, उनकी विशेषताओं,  उनकी उपयोगिताओं,  को बताने का, समझाने का।    जिससे इन उत्सवों की गरिमा वापस लौट सके। ये फकत एक   औपचारिकता ना रह  जाएं बल्कि   मानव जीवन को सुधारने  का उद्देश्य   भी पूरा कर सकें।
कमरे में पूरी तरह निस्तबधता छा गयी। विषय की गंभीरता के कारण  मेरी आँखें पता नहीं कब  स्वतः  ही बंद हो गयीं। पता नहीं इसमें कितना वक्त लग गया !  तभी श्रीमती जी की आवाज सुनाई दी कि रात सोने के पहले तो अपना सामान संभाल लिया करो।   कंप्यूटर अभी भी चल रहा है। कागज बिखरे पड़े हैं। फिर कुछ इधर-उधर होता है तो मेरे पर चिल्लाते हो।    हड़बड़ा कर उठा तो देखा आठ बज रहे थे,   सूर्य निकलने के बावजूद धुंध, धुएं, कोहरे के कारण पूरी तरह रौशनी नहीं हो पा रही थी।

मैंने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, कमरे में मेरे सिवा और कोई नहीं था।   ऐसे बहुत वाकये और कहानियां पढ़ी हुई थीं जिनमें किसी अस्वभाविक अंत  को सपने से जोड़ दिया जाता है, पर जो भी घटित हुआ वह सब मुझे अच्छी तरह याद था। मन यह मानने को कतई   राजी नहीं था    कि मैंने जो देखा,    महसूस किया,   बातें कीं, वह सब रात के आर्टिकल की       तैयारी और थके   दिमाग के  परिणाम का नतीजा था।     कमरे में फैली वह  सुबह वाली हल्की सी सुवास मुझे अभी भी किसी की उपस्थिति महसूस जो करवा रही थी !!

शनिवार, 28 जनवरी 2017

फ़िल्में बनें मासांत के लिए, सप्ताहांत के लिए नहीं

पहले बड़े-बड़े निर्माताओं, कलाकारों, निर्देशकों की फिल्मों का लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता था। क्रिकेट के टेस्ट मैचों की तरह साल-दो साल में उनकी फ़िल्में परदे तक पहुंचा करती थीं। हर निर्माता, निर्देशक, कलाकार की और उनके हुनर की अपनी अलग पहचान हुआ करती थी। आज की तरह-तरह उन्हें अपनी फिल्म के प्रचार के लिए नाहीं अलग से धन की जरुरत होती थी नाहीं प्रमोशन के लिए दर-दर भटकना पड़ता था। उनका नाम ही काफी होता था....... 

आज कल हर बड़ा निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्म के प्रदर्शन के लिए स्पर्द्धा रहित खुला मैदान चाहता है। पर दुनिया में सबसे ज्यादा फ़िल्में बनाने वाले देश में ऐसा होना संभव नहीं हो सकता। इसीलिए बार-बार बड़ी
फिल्मों का आपसी टकराव होता रहता है। पिछले कुछ सालों से ख़ास-ख़ास अवकाशों और त्योहारों पर बड़े कलाकारों और निर्माताओं की फिल्मों के प्रदर्शन का रिवाज चल पड़ा है। कुछ ने तो कुछ ख़ास मौकों को अपनी धरोहर बना रख छोड़ा है। वैसे भी हर निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्म के लिए साल के ख़ास मौके पर तीन चार छुट्टियों वाले सप्ताहांत पर अपनी फिल्म प्रदर्शित कर ज्यादा से ज्यादा पैसे बटोरने की फिराक में रहता है। आधुनिक व उत्कृष्ट तकनीक के कारण अब फ़िल्में जल्दी और व्यवस्थित रूप से बनने लग गयी हैं, जिससे उनके प्रदर्शन की तारीख तय करना भी संभव हो गया है। इसी कारण कुछ सक्षम फिल्मकार साल की छुट्टियों को ध्यान में रख अपनी फिल्मों को उसी हिसाब से पूरी करने में जुट जाते हैं।
बात बहुत ज्यादा पुरानी नहीं है, तकरीबन नब्बे के दशक के मध्य तक, जब तक देश में मल्टीप्लेक्सों की बाढ़ नहीं आई थी, बड़े-बड़े निर्माताओं, कलाकारों, निर्देशकों की फिल्मों का लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता था। क्रिकेट के टेस्ट मैचों की तरह साल-दो साल में उनकी फ़िल्में परदे तक पहुंचा करती थीं। अपनी गुणवत्ता, कथानक, अभिनय और निर्देशन के बल पर, साथ-साथ रिलीज हो कर, मनोरंजन के साथ-साथ अच्छा-खासा व्यवसाय भी किया करती थीं। हर निर्माता, निर्देशक, कलाकार की और उनके हुनर की अपनी अलग पहचान थी। आज की तरह-तरह उन्हें अपनी फिल्म के प्रचार के लिए नाहीं अलग से धन की जरुरत होती थी ना हीं प्रमोशन के लिए दर-दर भटकना पड़ता था। उनका नाम ही काफी होता था। अपने और अपने काम पर पूरा विश्वास और पकड़ होने के कारण वे लोग कभी लंबे अवकाश वाले सप्ताहंत या किसी ख़ास दिन-त्यौहार का विशेष इंतजार नहीं करते थे। फिल्म के पूरा होते ही उसे सिनेमा हॉल तक दर्शकों के लिए पहुंचा दिया जाता था। उन दिनों फिल्मों की सफलता उनके सिनेमा हॉल में टिके रहने के दिनों पर आंकी जाती थी। आज शायद विश्वास ही ना हो कि एक ही हॉल में, जिनकी  क्षमता 400-500 से लेकर 1200-1300 तक होती थी। दर्शक एक ही फिल्म को, उसकी कहानी, संगीत, गुणवत्ता और अपने चहेते कलाकारों को देखने के लिए बार-बार जाता था। इसीलिए लगातार तीन शो में पच्चीस हफ्ते चलने पर किसी फिल्म को सिल्वर जुबली, पचास हफ्ते चलने पर गोल्डन जुबली और पचहत्तर हफ़्तों तक लगातार चलने पर डायमंड जुबली मनाने वाली फिल्म का खिताब दिया जाता था। पर आजकल हफ्ते के अंतिम तीन दिन ही फिल्म को सफल-असफल मानने-बनाने का
मापदंड बन गए हैं, लागत वसूलने के लिए तरह-तरह के स्रोत और सही-गलत तरीके भी अपनाए जाने लगे हैं। जिनमें खुद और अपनी फिल्म को विवादित करवाना भी एक हथकंडा है। इधर फिल्म वालों में यह धारणा घर कर गयी है कि दर्शक हफ्ते में एक ही फिल्म देखेगा ! क्या उन्हें भारतीय लोगों का फिल्मों के प्रति जनून मालुम नहीं है ? अरे तुम काम तो अच्छा करो उसे सराहने वाले उसे पाताल में भी जा ढूंढ निकालेंगे।

सच्चाई तो यही लगती है कि अब कुछ गिने-चुने लोगों को छोड़ इस क्षेत्र में इस विधा के प्रति समर्पण की भावना तिरोहित हो चुकी है। मुख्य मुद्दा पैसे बनाना है। कहीं की ईंट कहीं के रोड़े को ले इमारत खड़ी करने की कोशिश की जाती है। कुछेक मुख्य कलाकारों के चहरे को ही सफलता का मापदंड मान लिया गया है, जिनके चारों ओर चापलूसी, अहम्, अतिविश्वास की दीवारें चिन दी गयी हैं। मौलिकता करीब-करीब ख़त्म हो चुकी है। ऐसे में हफ्ते के तीन दिन और लोगों की छुट्टियों का ही भरोसा है, अपने काम पर नहीं। क्योंकि मन ही मन उन्हें अपने काम की उत्कृष्टता पर खुद ही विश्वास नहीं होता। आज कोई भी छाती ठोंक के नहीं कह सकता, रजनीकांत का नाम अपवाद हो सकता है पर सिर्फ दक्षिण भारत में, कि मैं कभी भी कहीं भी अपनी फिल्म प्रदर्शित कर उसे सफल करवा सकता हूँ। इसका फ़ायदा भी है फिल्म अपनी गुणवत्ताविहीन होने के कारण पिट भी जाती है तो उसकी असफलता का ठीकरा एक ही दिन प्रदर्शित हुई दो फिल्मों पर मढ़ दिया जाता है। इसलिए फिल्मों से जुड़े लोग पूरी तरह समर्पित हो यदि सप्ताहांत नहीं मासांत के लिए फिल्म बनाएंगे तो उन्हें किसी छुट्टी, किसी त्यौहार या किसी तारीख की जरुरत नहीं पड़ेगी।  

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

आम आदमी और सरकारी अफसर

किसी ख़ास दिन रेलवे स्टेशन पर जरुरत से ज्यादा ही गहमा-गहमी नजर आती है। कर्मचारी चुस्त-दुरुस्त व मुस्तैद, नाहीं कहीं गंदगी ना दाग-धब्बे, करीने से सजे सैंकड़ों गमले जिनमें बड़े-बड़े सुंदर फूल-पौधे अपनी छटा बिखेरते शोभा पा रहे होते हैं। प्लेटफार्म इतने साफ़ और चमकदार कि उस पर रख भोजन भी किया जा सके !  हर चीज करीनेवार अपनी जगह पर स्थित होती है !वह दिन होता है किसी जी. एम. या और किसी बड़े अधिकारी के आने-जाने या उसके निरक्षण का....... 

कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रेलवे के बिलासपुर जोन के जी. एम. के विदाई समारोह में रेलवे के कुछ अफसरों ने उनके सम्मान में दी गयी पार्टी में एक महिला कर्मी द्वारा अपने बॉस के साथ मंच पर एक से ज्यादा युगल गीत ना गाने के कारण अनुशासनहीनता के आरोप में उसे चार्ज-शीट तो थमाई ही उसका तबादला भी कर दिया। चार्ज-शीट में साफ़ लिखा था कि विदाई पार्टी में जी. एम. के साथ युगल गीत गाने से इंकार करना उस महिला कर्मी का अव्यावहारिक बर्ताव है इसलिए उस पर अनुशासत्मक कार्यवाही की जा रही है। एक ओर तो सरकार महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिए जाने की वकालत करते नहीं थकती दूसरी ओर उन्हीं के अफसर बेजा हरकतों से बाज नहीं आते।

सवाल यह उठता है कि क्या ऐसी किसी पार्टी में किसी पर भी जबरदस्ती गाने या कला प्रदर्शन का जोर डाला जा सकता है, जबकि यह उसकी ड्यूटी का हिस्सा नहीं होता ? उस पर भी जब वह कोई महिला कर्मी हो ! किसी भी महिला का, जो प्रोफेशनल गायिका ना हो, ऐसे वक्त पर संकोच करना कोई गुनाह नहीं है। फिर हो सकता है उस दिन वहां का माहौल कुछ इस तरह का हो गया हो जिससे उस महिला कर्मी ने गाने से इंकार कर दिया हो। यह तो उन जी. एम. साहब को भी सोचना और देखना चाहिए था कि उनका विदाई समारोह गरिमा-पूर्ण ही रहे !! हालांकि चहुर्दिक हुए विरोध के कारण उस महिला को दिया गया आदेश वापस ले लिया गया था। पर मानसिक प्रतारणा तो उसे सहनी ही पड़ी थी, उसका क्या  !!

आदमी की फ़ितरत में है कि वह अपनी चापलूसी करवाना पसंद करता है। इसीलिए समाज के हर विभाग में अर्श पर बैठे हुए लोग अपने स्तुति गायकों से घिरे रहते हैं। बात रेलवे की हो रही है। हम में से अधिकतर ने कभी न कभी जरूर देखा होगा कि किसी ख़ास दिन रेलवे स्टेशन पर जरुरत से ज्यादा ही गहमा-गहमी नजर आती है। कर्मचारी चुस्त-दुरुस्त व मुस्तैद, नाहीं कहीं गंदगी ना दाग-धब्बे, करीने से सजे सैंकड़ों गमले जिनमें बड़े-बड़े सुंदर फूल-पौधे अपनी छटा बिखेरते शोभा पा रहे होते हैं। प्लेटफार्म इतने साफ़ और चमकदार कि उस पर रख भोजन भी किया जा सके !  हर चीज करीनेवार अपनी जगह पर स्थित होती है !! वह दिन होता है ऐसे ही किसी जी. एम. या और किसी बड़े अधिकारी के आने-जाने या उसके निरक्षण का। क्या इन आला अफसरों से उस स्टेशन के या उस जैसे और स्टेशनों के हाल छिपे  रहते हैं ? क्या उनको स्टेशनों की दुर्दशा के हालात पता नहीं होते ? क्या उनकी पोस्टिंग सीधे उच्च पद पर हो गयी होती है जिससे उन्हें देश के रेलवे स्टेशनों की हालात के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती ? जबकि सच्चाई यह है कि वे भी समय के साथ पदोन्नति पा कर ही उस उच्च पद पर पहुंचे होते हैं और ऐसी खुशामदी भरी हरकतें खुद भी कर चुके होते हैं। इसीलिए जब खुद का समय आता है तो उसका आंनद लेने में कोताही नहीं करते। इन्हीं के लिए अलग से डिब्बे जोड़े जाते हैं, इन्हीं के लिए ट्रेन को इंतजार करते भी पाया गया है। इन्हीं के दोस्त-मित्र, नाते-रिश्तेदार, घर-परिवार वाले मुफ्त में ट्रेनों की शाही यात्रा का मजा भी लेते हैं। उधर पैसे चुकाने के बाद भी, कभी-कभी अतिरिक्त भी, आम आदमी धक्के खाता अपने सफर को "सफर" करता येन-केन-प्रकारेण पूरा करता है !

अब तो समय आ गया है कि रेल विभाग अंग्रेजों के वक्त से चली आ रही, आम यात्रियों के जले पर नमक छिडकने वाली, ऐसी क्रियाओं को बंद कर उन कर-दाताओं को अधिकतम सुविधाऐं प्रदान करने पर ध्यान दे, जो रोज अपनी मेहनत से कमाई पूंजी को खर्च कर रेल यात्रा करने के बावजूद सकून प्राप्त नहीं कर पाते।           

रविवार, 22 जनवरी 2017

जल्लीकट्टू , एक विवादित पारंपरिक खेल

आशा है इस पारंपरिक खेल को वैर भावना से मुक्त कर इंसान और पशु दोनों की सुरक्षा का भी ख्याल रखते हुए  खेल भावना  के तहत ही खेला जाएगा, जिससे फिर कभी इस पर कोई विवाद खड़ा न हो...

कहावत है , उतसव प्रिया: मानवा। पर आज कल देश में घटित हो रहे वाकयों को देख कर लगने लगा है कि कहावत होनी चाहिए, कलह प्रिया: मानवा !  
रोज ही कुछ ना कुछ बखेड़ा, कोई ना कोई विवाद, कोई ना कोई मतभेद उभर कर सामने आता ही रहता है। इससे और कुछ हो ना हो पर राजनितिक दलों को अपनी राजनीती चमकाने का मौका जरूर मिल जाता है। लोग सडकों पर उतर आते हैं। मामला कोर्ट तक जा पहुंचता है। जिसके फैसले पर भी, हालांकि लोग खुल कर नहीं बोलते, आजकल उंगलियां उठाने लग गयीं हैं। जो आने वाले समय के लिए कोई अच्छा इशारा नहीं है ! ताजा मसाला देश के दक्षिण भाग में फसल कटने पर होने वाले त्यौहार पोंगल के अवसर पर खेले जाने वाले मशहूर प्राचीन पारंपरिक खेल  जल्लीकट्टू का है। जिसे इंसान सांड या बैलों के साथ खेलता है।

वर्ष 2011 में बैल प्रजाति को भी संरक्षित श्रेणी में स्थान दे दिए जाने पर  जल्लीकट्टू पर भी विवाद शुरू हो गया था जिसकी परिणीति पर मई 2014 में भारत के "एनीमल वेलफेयर बोर्ड" और "पेटा" के आवेदन पर कोर्ट ने इसे हिंसक करार देते हुए इस पर रोक लगाने के आदेश दे दिए थे। हर साल पक्ष-विपक्ष में झड़पें होती रहीं। लोग खेल के पक्ष में थे उनके अनुसार यह एक प्राचीन, लोकप्रिय, सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन था जो लोगों के दिलों से गहराई से जुड़ा हुआ था। पर कोर्ट इसे पशुओं पर अत्याचार के रूप में लेता रहा है। कुछ दिन पहले ही मोदी सरकार ने मुख्यमंत्री जयललिता की मांग पर खेल को हरी झंडी दी थी पर सुप्रीम कोर्ट ने अब फिर उस पर पाबंदी लगा दी है न्यायालय ने स्पष्ट किया कि  जल्लीकट्टू को सिर्फ इसलिए न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता कि यह वर्षों से होता आ रहा है। इसी फैसले को लेकर पूरा प्रदेश आंदोलन पर उतर आया है जिसमे नामी-गिरामी लोग भी शामिल हो गए हैं।  

जल्लीकट्टू, तमिलनाडु के ग्रामीण इलाक़ों का एक परंपरागत खेल है जो फसलों की कटाई के अवसर पर पोंगल के त्यौहार पर आयोजित कराया जाता है और जिसमे बैलों से इंसानों की लड़ाई कराई जाती है. इसे तमिलनाडु के गौरव तथा संस्कृति का प्रतीक कहा जाता है, जो उनकी संस्कृति से जुड़ा है।
जल्लीकट्टू का इतिहास करीब 400 साल पुराना बताया जाता है। जो  पोंगल के समय आयोजित किया जाता है। तमिलनाडु में यह सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि बहुत पुरानी परंपरा है। मदुरै में जल्लीकट्टू खेल का सबसे बड़ा मेला लगता है। इससे पुरुषों और बैलों दोनों के दम-ख़म की परीक्षा होती थी।लड़कियों के लिए सही वर ढ़ूंढने के लिए स्वयंबर के रूप में जल्लीकट्टू का सहारा लिया जाता था, जो युवक सांड़ पर काबू पा लेता था शादी उसी से होती थी। दूसरे गायों की अच्छी नस्ल के लिए उत्तम कोटि के सांड का भी चुनाव इसी के द्वारा किया जाता था। 

यह खेल स्पेन की "बुल फाइट" से मिलता जुलता है। पर वहां की तरह इसमें बैलों को मारा नहीं जाता और ना ही बैल को काबू करने वाले युवक किसी तरह के हथियार का इस्तेमाल करते हैं। यहां पशु को घायल भी नहीं किया जाता। पिछले समय में बैल या सांड के सींगों में सोने के सिक्के बांधे जाते थे जिनका स्थान अब नोटों ने ले लिया है, खेल में भाग लेने वालों को पशु को काबू कर इन्हें ही निकालना  होता है। इसको पहले सल्लीकासू कहा जाता था, सल्ली याने सिक्का और कासू का मतलब सीगों से बन्ध हुआ, समय के साथ सल्लीकासू बदल कर जल्लीकट्टू हो गया।  यह खेल जितना इंसानों के लिए जानलेवा है उतना ही जानवरों के लिए खतरनाक भी है। खेल के शुरु होते ही पहले एक-एक करके तीन बैलों को छोड़ा जाता है। ये गांव के सबसे बूढ़े बैल होते हैं। इन बैलों को कोई नहीं पकड़ता, ये बैल गांव की शान होते हैं और उसके बाद शुरु होता है  जल्लीकट्टू का असली खेल। खेल के दौरान भारी पुलिस फोर्स, एक मेडिकल टीम और कलेक्टर खुद भी वहां मौजूद रहते हैं। 

इस खेल के लिए सांड और बैलों के पालक अपने पालतू पशुओं की खूब देख-भाल करते हैं तथा उनको इस खेल के लिए प्रशिक्षित भी करते हैं। पर समय के साथ-साथ इस खेल में नई पीढ़ी के पदार्पण के साथ ही बढ़ती प्रतिस्पर्धा व जीत की लालसा ने कुछ गलत तरीकों को भी अपना लिया है। जिसके अंतर्गत सांड़ों को भड़काने के लिए उन्हें शराब पिलाने से लेकर उनकी आंखों में मिर्च तक डाल दी जाती है इसके साथ ही उनका शारीरिक उत्पीडन भी किया जाता है ताकि वे और तेज दौड़ सकें। इसी हिंसक बर्ताव को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने  इस खेल को बैन कर दिया था। 

ताजा समाचारों के अनुसार इसकी लोकप्रियता और इसके पक्ष में विराट जन-आंदोलन को देखते हुए एक अध्यादेश पारित कर, सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद, अब फिर इसको आयोजित करने की अनुमति मिल गयी है। आशा है इस पारंपरिक खेल को वैर भावना से मुक्त कर इंसान और पशु दोनों की सुरक्षा का भी ख्याल रखते हुए  खेल भावना  के तहत ही खेला जाएगा, जिससे फिर कभी इस पर कोई विवाद खड़ा न हो। 

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