pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 16 जनवरी 2017

अमित जी, सिर्फ मसालों से ही भोजन स्वादिष्ट नहीं बन जाता

अमितजी, आपके स्तर, आपकी ख्याति के लायक बिल्कुल नहीं है यह विज्ञापन ! विज्ञापन ही सही माँ तो माँ होती है उसकी तौहीन करना वह भी बार-बार, किसी भी तरह, कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता !   

अभी कुछ दिनों से टी.वी. पर #एवरेस्टमसालों का एक विज्ञापन आ रहा है जिसमें अमिताभ बच्चन अपने दोस्त की माताजी के द्वारा बनाए गए खाने की आलोचना करते दिखाए गए हैं। बात ज़रा कचोटती है कि वह आदमी
जिसकी अदाकारी का सारा जहां कायल है, उससे भी ज्यादा उसके संस्कार, उसकी भाषा पर पकड़, उसकी नम्रता, उसकी तहजीब, उसकी अपने पिताजी और माताजी के प्रति आदर भावना ने लोगों को उसका मुरीद बना रखा हो, वह दूसरे की माँ का इस तरह से मख़ौल कैसे उड़ा सकता है ! कहा जा रहा है कि वे तो कलाकार हैं उन्हें जैसा कहा गया उन्होंने कर दिया ! गल्ती विज्ञापन बनाने वालों की है। ठीक है पर आज जिस ऊंचाई पर अमित जी हैं और जितना बड़ा उनका कद है, तो कोई भी जबरदस्ती उनसे कुछ नहीं करवा सकता। 

विज्ञापन दाताओं का मुख्य ध्येय रहता है उनको अनुबंधित करना, जहां ऐसा हो गया वे अपनी सफलता के प्रति निश्चिंत हो जाते हैं और समझते हैं कि कुछ भी अगड़म-बगड़म बना दो, पब्लिक हाथों-हाथ ले लेगी। ज्यादातर ऐसा ही होता है। इधर शायद अति व्यस्तता या संबंधों की मजबूरी के कारण या कभी-कभी जाने-अंजाने ऐसा हो जाता होगा जब कलाकार का  "कंटेंट" पर ध्यान ना जा पाता हो और कुछ ऐसा ही घटित हो जाता है जो उनकी छवि के अनुकूल नहीं होता।   

विज्ञापन में अमित जी अपने दोस्त के बुलावे पर उसके घर जा दोस्त की माँ द्वारा बनाए गए भोजन को करने के बाद वापस आकर खाने की आलोचना करते दिखाए गए हैं। चाहे यह विज्ञापन ही है पर माँ तो माँ होती है, उसके प्रति नुक्ताचीनी किसी के भी गले नहीं उतरती, वह भी बच्चन जैसी शख्शियत के द्वारा की गयी ! माँ चाहे जैसा भी खाना बनाए उसका स्वाद उसके बच्चों को सदा प्रिय होता है। यदि वह बेस्वाद होता तो क्या उनका दोस्त उन्हें खाने पर बुलाता ? चलिए मान लेते हैं बच्चे अपनी माँ द्वारा बनाए गए भोजन में कमियां नहीं निकाल पाते, पर जब एक बार उसका स्वाद पसंद नहीं आया तो वहां बार-बार क्यों जाते हैं ? क्या सिर्फ दोस्त की माँ को बार-बार अपने साथ, व्यवसायिक रूप से तैयार किए गए मसालों को ले जाकर शर्मिंदा करने ? पहली बार के बाद ही विनम्रता पूर्वक दोस्त को किसी बहाने से मना भी तो किया जा सकता था और दूसरी बात भोजन सिर्फ मसालों से ही तो स्वादिष्ट नहीं बन जाता !!

क्षमा कीजिएगा #अमितजी, आपके स्तर, आपकी ख्याति के लायक बिल्कुल नहीं है यह विज्ञापन ! बहुत जरूरी था तो माँ की जगह दोस्त की पत्नी का नाम लिया जा सकता था ! उसमें भी शिष्टता नहीं दिखती हो तो खानसामे को बलि का बकरा बनाया जा सकता था।  विज्ञापन ही सही माँ तो माँ होती है उसकी तौहीन करना वह भी बार-बार, किसी भी तरह, कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता !   

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

कर्म और आचरण में अक्सर फर्क होता है

वह पंद्रह-बीस जनों की प्रोफेशनल पार्टी थी, जो जगह-जगह जा वर्षों से भागवत की व्याख्या, उसके उपदेश व उस पर प्रवचन देती आ रही है।  उतनी रात को भी मेरे ज्ञान-चक्षु चैतन्य हो गए कि जरुरी नहीं कि हमारा आचरण हमारे कर्म के अनुकूल ही हो !!!    

दुनिया में तरह-तर के लोग होते हैं। आम धारणा के अनुसार इंसान अपने कर्म से पहचाना जाता है। हिंसात्मक कर्म करने वाले को कठोर और कला से, पूजा-पाठ या आध्यात्म से जुड़े हुए लोगों को साधारणतया विनम्र समझा जाता है। होते भी हैं ऐसे लोग। पर अक्सर ऐसे उदाहरण भी सामने आ जाते हैं जिनके कर्म और आचरण में बहुत फर्क होता है। सीमा पर दुश्मन पर घातक हमला करने वाला जवान अपनी निजी जिंदगी में सरल और विनम्र पाया जाता है। रजत-पट पर दिल दहला देने वाली हरकतों को अंजाम देने वाला खूंखार खलनायक जरूरी नहीं कि वास्तविक जिंदगी में भी वह वैसा ही हो, वह एक नेक और रहम-दिल इंसान होता है। इसके विपरीत समाज के कल्याण का दावा करने वाले, सदा विनम्रता का मुख़ौटा लगाने वाले कुछ लोग देश तक का सौदा कर डालते हैं। चेहरे पर सदा मुस्कान लपेटे रखने वाले अपने हित पर आंच आते ही उग्रता की प्रतिमूर्ति बन जाते हैं।  ऐसे लोगों से अक्सर सामना हो ही जाता है। 

माँ के दिवंगत होने पर लगातार, अलग-अलग जगहों के सफर के दौरान मेरा तरह-तरह के लोगों से सामना हुआ। अभी पिछली पोस्ट में हरिद्वार स्टेशन पर रात अढ़ाई बजे एक सज्जन की आत्मश्लाघा के बारे में लिखा था। वैसा ही एक और वाकया रायपुर लौटते वक्त घटा था।

निजामुद्दीन से चली गोंडवाना जैसे ही मथुरा स्टेशन पर रुकी, डिब्बे के दरवाजे के सामने दो कुलियों की मदद से एक "ठेला" आ खड़ा हुआ जिस पर पच्चीसों ब ड़े- छोटे नग लदे हुए थे। गाडी कुछ ही देर वहां रुकती है ऊपर से अंदर का संकरा दरवाजा ! सो हमारे उस वातानुकूलित डिब्बे में तो जैसे भूचाल आ गया। बिना आगा-पीछा देखे सामान को अंदर फेंका जाने लगा। देखते-देखते मुख्य द्वार पर अंबार सा लग गया। अंतिम नग आते-आते गाडी ने रेंगना शुरू कर दिया था। वे लोग आठ सीटों के अधिकारी थे पर सामान पंद्रह जनों का था जिसे ठिकाने लगाने की कवायद शुरू हो चुकी थी। जहां भी ज़रा सी जगह दिखती वहीँ नगों को ठूसा जाने लगा, बिना अन्य यात्रियों की असुविधा और उनके सामान की फ़िक्र किए। इतना ही नहीं, उनके और साथी दूसरे डिब्बों में भी थे, अब इतने लोग, उतना सामान, इधर-उधर होना लाजिमी ही है। कुछ ही देर बाद उधर के योग अपना सामान इधर खोजने आने लगे ! अपना तो अपना पहले से बैठे लोगों के सामानों की भी जांच होने लगी जिससे जाहिर है डिब्बे में असंतोष फैलता जा रहा था। पर मथुरा से चढ़े यात्रियों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, विरोध ज्यादा बढ़ने पर उनकी दबंगई के साथ ही कठोर वचन भी प्रवचन के रूप में सामने आने लगे । गाडी के आगरा पहुंचने तक वैसी ही अफरा-तफरी मची रही। पर आना-जाना, शोर-गुल देर रात तक चलता रहा। उन लोगों के साथ दो-तीन सेवक रूपी सहायक भी थे पता नहीं उनके लिए क्या इंतजाम था क्योंकि देर रात तक मैंने उन्हें दरवाजे के पास ही खड़े और बतियाते पाया !!

उन्हीं से पता चला कि यह पंद्रह-बीस जनों की प्रोफेशनल पार्टी है जो जगह-जगह जा वर्षों से भागवत की व्याख्या, उसके उपदेश व उस पर प्रवचन देती आ रही है। उतनी रात को भी मेरे ज्ञान-चक्षु चैतन्य हो गए कि जरुरी नहीं कि हमारा आचरण हमारे कर्म के अनुकूल ही हो !   जय श्री कृष्ण  !! 

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

बिल लेने को ही नहीं देने को भी कहा जाए, सार्वजनिक तौर पर

यह नोटबंदी की तंगी के दौरान की घटना है। डॉक्टर साहब की फीस हजार रुपये थी। परामर्श के बाद उनको कार्ड द्वारा भुगतान की पेशकश की गयी तो उन्होंने  साफ़ इनकार कर दिया और नगद भुगतान करने को कहा, जबकि उनके स्वागत-कक्ष के टेबल पर स्वाइप मशीन रखी हुई थी..क्या कृतज्ञ, सहमा हुआ सा मरीज बिल माँगने की हिम्मत कर सकता है  

पिछले कुछ हफ़्तों से देश में जो कोहराम मचा हुआ है उसके पक्ष-विपक्ष में हो रही लगातार बयानबाजी थमने का नाम नहीं ले रही। उसके अलावा रोज ही कहीं ना कहीं, कोई ना कोई, किसी ना किसी घोटाले के तहत छोटे-बड़े लोगों को पकड़े जाने की खबरें भी आती ही जा रही हैं। जाहिर है कुछ भी हो जाए, कितनी भी कड़ाई कर ली जाए, कैसा भी दंड निर्धारित कर दिया जाए कुछ लोग अपनी हरकतों से बाज नहीं आते।

अपने देश के मध्यम वर्ग का अधिकांश भाग परिस्थिति या मजबूरीवश सदा कमजोर तथा भीरु रहा है और इसी आबादी पर ही सरकारें अपना जोर भी दिखाती हैं। इन्हीं से सबसे ज्यादा ईमानदारी और देशभक्ति की अपेक्षा की जाती है। इन्हीं से सब्सिडी छोड़ने, बढ़ते किराए को झेलने, आने-जाने, रहने, खाने पर ज्यादा शुल्क चुकाने, सरकार के अमले और उसके खर्चों को निपटाने की आशा की जाती है वह भी बिना हील-हवाले, विपरीत परिस्थितियों में बिना किसी शिकायत के।  

अब जैसे सरकार लगातार लोगों से अपील कर रही है किसी भी सेवा या खरीद के बदले बिल लेने की। यह और बात है कि आम आदमी इसे अभी अपनी आदत नहीं बना पाया है और इसका फ़ायदा व्यापारी वर्ग पूरी तरह से उठा रहा है। इसको मद्दे नज़र रख क्या सरकार ने उस वर्ग पर भी जोर डाला है, जो सेवा देता है या सामान बेचता है, कि आप को भी कोई मांगे या ना मांगे, बिल जरूर दो या आपको देना पडेगा ? वैसे दो व्यवसाय ऐसे भी हैं जहां आम आदमी हिम्मत ही नहीं जुटा पाता पैसे को ले कर कुछ बोलने की ! वह हैं डॉक्टर और वकील का दरबार। जहां जब भी किसी को मजबूरीवश जाना पड़ता है तो वह सदा सहमा, आशंकित, कृतज्ञ सा और डरा हुआ ही जाता है। दोनों ही जगहें ऐसी हैं जहां उसकी जान पर बनी होती है और वह भूल कर भी पैसे को ले मोल-भाव नहीं करता, बिल मांगना तो दूर की बात है।

इसी संदर्भ में दो वाकये याद आ रहे हैं। मेरे "कानूनी भाई" के दाएं पैर के टखने में काफी दिनों से दर्द बना हुआ था। पहले इसे हल्के तौर पर लेते रहे, एक-दो जगह दिखाया पर कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। जब दर्द तकरीबन स्थाई हो गया और चलने में भी दिक्कत आने लगी तो हड्डी के विशेषज्ञ, अति व्यस्त चिकित्सक से समय ले उनका परामर्श लिया गया। चिकित्सा की अलग बात है। असल बात यह है कि यह नोटबंदी की तंगी के दौरान की घटना है। डॉक्टर साहब की फीस हजार रुपये थी। परामर्श के बाद उनको कार्ड द्वारा भुगतान की पेशकश की गयी तो उन्होंने  साफ़ इनकार कर दिया और नगद भुगतान करने को कहा, जबकि उनके स्वागत-कक्ष के टेबल पर स्वाइप मशीन रखी हुई थी।
ऐसे ही एक और वाकये का चश्मदीद गवाह बनने का मौका तब मिला जब मेरे मित्र ठाकुर जी के साथ मुझे एक वकील साहब का तमाशा देखने को मिला था। बात कुछ पुरानी है,  ठाकुर जी दुर्भाग्यवश एक केस में उलझ गए थे जिसको एक तेजतर्रार वकील की देख रेख में लड़ा जा रहा था। एक बार मुझे भी वे अपने साथ ले गए। जैसे ही वकील के दफ्तर  में हमने प्रवेश किया उसने ऐसा समा बांधा जैसे आज ठाकुर जी अंदर ही हो जाते यदि उसने बचाया ना होता। आतंकित से करने वाले माहौल में फ़टाफ़ट उसने इधर-उधर के दसियों कागजों पर उनसे दस्तखत करवाए और तीस हजार रुपये धरवा लिए। जाहिर है उपर्युक्त दोनों मौकों में घबड़ाहट ऐसी थी कि पैसे पर कोई ध्यान ही नहीं दे पा रहा था। सो ना देने वाले ने कुछ कहा और दूसरे पक्ष ने तो कहना ही क्या था !

ये तो महज दो उदाहरण हैं। इस तरह के सैंकड़ों लेन-देन इन जैसी दोनों जगहों के साथ-साथ अनेकों और भी जगहों  पर रोज होते हैं ! क्या इन पर कभी नकेल कसी जा सकेगी ? या जैसा एक-दो दिन पहले होटल के बिल पर सर्विस चार्ज के मामले में सरकार ने अस्पष्ट सा बयान जारी कर कि, आप को होटल की सर्विस पसंद ना आए तो सर्विस चार्ज ना दें,  अपना पल्ला झाड़ कलह की स्थिति बना दी है, वैसा ही यहां भी होता रहेगा ?     

रविवार, 1 जनवरी 2017

रात तीन बजे हरिद्वार स्टेशन पर एक "विद्वान" की आत्मश्लाघा

उन्होंने हमारे ज्ञान में वृद्धि की कि वे कोई ऐसी-वैसी हस्ती नहीं है वे वेदों के प्रकांड ज्ञाता हैं जिसके लिए उन्हें जबलपुर से हरिद्वार किसी यज्ञ को पूर्ण करने हेतु बुलाया गया है। वे अक्सर यहां आमंत्रित रहते हैं। यहां के लोगों में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा और मान है। यह और बात थी कि उन्हें लेने या उनके स्वागत हेतु वहाँ कोई भी उपस्थित नहीं था                

"वहाँ मत देखिए, हमारे साथ आइए", यह सुनते ही पलट कर देखा तो एक लंबे से मध्यम कद-काठी के इंसान को अपने से मुखातिब पाया। जगह थी, हरिद्वार का रेलवे स्टेशन, समय था पौने तीन रात का, दो-अढाई घँटे में दस दिसंबर की सुबह होने वाली थी। मैं, मामाजी और चेतन का, जो हमसे दिल्ली से जुड़े थे, यहां आना मेरी 
 माताजी के फूलों का गंगाजी में विसर्जन करने हेतु हुआ था। उन दिनों घने कोहरे के फलस्वरूप उत्तर दिशागामी हर गाडी के विलंब से चलने के कारण हमलोग शाम पांच बजे के बजाए आठ-नौ घँटे देर से पहुंचे थे।  गाडी से उतर कर बाहर आते समय वहीँ टँगे विश्राम-कक्षों की सूचि पर नज़र चली गयी तो ठिठक कर जैसे ही देखने लगा वैसे ही उपर्युक्त निर्देश मेरे कानों में पड़ा !हालांकि हमारे पंडित जी के ठिकाने का पता मेरे पास था पर इतनी रात को वहाँ जाना कुछ उचित न समझ हम किसी और विकल्प की तलाश में थे।


हमें लगा कि वे यहां के स्थानीय निवासी हैं। सो हम तीनो उन सज्जन की ओर इस आशा से मुड़े कि वे इतनी रात को सुनसान हो चुके इलाके में टिकने का सही ठौर बता देंगे। तीन जनों के उनके परिवार के साथ हमारे स्टेशन से बाहर आते-आते उन्होंने किसी ठौर की जानकारी के अलावा हर किस्म की अपने से संबंधित बात हमें बता दी। उनका मुख्य उद्देश्य हमारी सहायता करना न होकर अपनी महत्ता और विद्वता का प्रदर्शन करना था जिसके तहत उन्होंने हमारे ज्ञान में वृद्धि की कि वे कोई ऐसी-वैसी हस्ती नहीं है वे वेदों के प्रकांड ज्ञाता हैं जिसके लिए उन्हें जबलपुर से हरिद्वार किसी यज्ञ को पूर्ण करने हेतु बुलाया गया है। वे अक्सर यहां आमंत्रित रहते हैं। यहां के लोगों में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा और मान है। यह और बात थी कि उन्हें लेने या उनके स्वागत हेतु वहाँ कोई भी उपस्थित नहीं था और उनकी तंगाई हुई सी श्रीमती जी परेशान हो उन्हें किसी को फोन करने के लिए बार-बार कह रही थीं। 

हम बाहर सड़क तक आ चुके थे। हमारे हाव-भाव देख उन्हें शायद अपनी बातों की निस्तत्वता का बोध हो आया और इतना तो कोई उनकी सहायता के बिना भी कर सकता था जैसे तथ्य को भूलते हुए, उन्होंने प्लेटफार्म से ही पीछे लगे एकमात्र रिक्शेवाले को हमें किसी धर्मशाला में ले जाने को कहा। जब तक रिक्शेवाला अपनी जानकारियों का बही-खाता खोलता, तब तक हम तीनों सामने दिख रहे एक होटल की ओर अग्रसर हो चुके थे।   

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

बिना किसी पूर्वाग्रह के, त्यौहार मनाएं



उत्सव प्रियामानवा। मानव स्वभाव से ही उत्सव प्रिय होता है। इसीलिए उसे जिस चीज से भी आनंद-ख़ुशी मिलती है वह उसे अपना लेता है और यह जो पश्चिम द्वारा आयोजित-प्रायोजित नव-वर्ष का उत्सव है वह तो अपने में मौज-मस्ती, हंसी-ख़ुशी, आनंद-उल्लास समेटे लाता ही है, इसीलिए दुनिया भर में उसका स्वागत किया जाता है, उसे हाथों-हाथ लिया जाता है

दुनिया के साथ ही हम सब हैं। जब सारे जने कह रहे हैं कि कल नया साल है तो जरूर होगा। सब एक दूजे को बधाईयां दे ले रहे हैं, अच्छी बात है। जिस किसी भी कारण से आपसी वैमनस्य दूर हो वह ठीक होता है। चाहे उसके लिये विदेशी अंकों का ही सहारा लेना पड़े। अब इस युग में अपनी ढपली अलग बजाने का कोई मतलब
नहीं रह जाता है। वे कहते हैं कि दूसरा दिन आधी रात को शुरु होता है तो चलो मान लेते हैं क्या जाता है। सदियों से सूर्य को साक्षात भगवान मान कर दिन की शुरुआत करते रहे तो भी कौन सा जग में सब से ज्यादा निरोग, शक्तिमान, ओजस्वी आदि-आदि रह पाये। कौन सी गरीबी घट गयी कौन सी दरिद्रता दूर हो गयी। हाँ यदि मन में कहीं अपनी संस्कृति से जुड़े रहने, विदेशी रिवाजों से आक्रांत न होने, अपने पर्वों-त्योहारों की गरिमा बचाए रखने, अपने आने वाली पीढ़ी को अपने संस्कार देने की सद्भावना बची हो तो आपको किसने रोका है या कौन रोक सकता है ऐसा करने को ! मनाइये अपने त्यौहार डंके की चोट पर।  हर धर्म-संस्कृति में, जगत की, मानव की भलाई के लिए अच्छी बातें होती हैं, उन्हें अंगीकार करने में कोई बुराई नहीं है, अच्छाई लीजिए, अच्छाई दीजिए, प्रेम लीजिए, प्रेम दीजिए, कटुता का त्याग कीजिए। अपनी अच्छाइयों को जोरदार तरीके से, पूर्ण विश्वास के साथ लोगों के सामने रखिए। पर पहले खुद तो उस पर पूरा भरोसा जमाएं। सिर्फ कुढ़न के कारण किसी को बुराई दे देना भी तो उचित नहीं है।   

उत्सव प्रियामानवा। मानव स्वभाव से ही उत्सव प्रिय होता है। इसीलिए उसे जिस चीज से भी आनंद-ख़ुशी मिलती है वह उसे अपना लेता है और यह जो पश्चिम द्वारा प्रायोजित नव-वर्ष का उत्सव है वह तो अपने में मौज-मस्ती, हंसी-ख़ुशी, आनंद-उल्लास समेटे लाता ही है, इसीलिए दुनिया भर में उसका स्वागत किया जाता है, उसे हाथों-हाथ लिया जाता है।  हर बार की तरह ही कल  फिर एक नयी सुबह आयेगी अपने साथ कुछ नये अंक धारण किये हुए। साल भर पहले भी ऐसा ही हुआ था, उसके पहले साल भी, उसके पहले भी, ऐसा ही चला आ रहा है, साल दर साल। आगे भी ऐसा ही होता रहेगा। 

पर कभी-कभी कुछ बातें खटक भी जाती हैं, जैसे यह भी दूसरे पर्वों की तरह अब दिखावे का माध्यम बन गया है। जो सक्षम हैं उन्हें एक और मौका मिल जाता है, अपने वैभव के प्रदर्शन का, अपनी जिंदगी की खुशियां बांटने, दिखाने का, पैसे को खर्च करने का। जो अक्षम हैं उनके लिये क्या नया और क्या पुराना। उन्हें तो रोज सूरज उगते ही फिर वही सनातन चिंता रहती है कि आज क्या होगा, काम मिलेगा कि नहीं, चुल्हा जल भी पायेगा कि नहीं, बच्चों का तन इस ठंड में भी ढक पाएगा कि नहीं ?  ऐसे लोगों को तो यह भी नहीं पता होता कि नववर्ष क्या होता है, उनके लिए तो उनके बच्चों का पेट भर जाए वही जश्न है। 

कुछेक की हर बार यही चिंता होती है कि इतने सारे पैसे को खर्च कैसे करें, हालांकि इस बार नोटबंदी ने उन्हें किसी और तरह की चिंता में डाल रखा होगा,  और कुछ की, कि इतने से पैसे को कैसे खर्च करें ?  चिंता की यह खाई दोनों वर्गों में सदियों से फैली हुई है जिसका निवारण होना तो दूर, उसके ओर-छोर पर ही काबू नहीं पाया जा सका है। वैसे देखें तो कल क्या बदल जाएगा ? कुछ लोग कैसे भी जोड़-तोड़ लगा, साम, दाम ,दंड़, भेद की नीति अपना, किसी को भी कैसी भी जगह बैठा अपनी पीढी को तारने का जुगाड़ बैठाते रहेंगे। कुछ लोग मानव रूपी भेड़ों की गिनती करवा खुद को खुदा बनवाते रहेंगे। कुछ सदा की तरह न्याय की आंखों पर बंधी पट्टी का फायदा उठाते-उठवाते रहेंगे, और कुछ सदा की तरह कुछ ना कर पा कर कुढते-कुढते खुद ही खर्च हो जायेंगे। पर वे अपनी जगह हम अपनी जगह। जब वे अपनी करनी से बाज नहीं आते तो हम भी अपने कर्म से क्यों चूकें ! इसीलिए अपनी तो यही कामना है कि साल का हर दिन अपने देश और देशवासियों के साथ-साथ इस धरा पर रहने वाले हर प्राणी के लिये खुशहाली, सुख, समृद्धि, सुरक्षा की भावना भी अपने साथ लाए। 
नव-वर्ष सभी  सभी भाई-बहनों के साथ-साथ "अनदेखे अपने" मित्रों के लिए मंगलमय हो, मुबारक हो, सुखमय हो। सभी सुखी, स्वस्थ, प्रसन्न और सुरक्षित रहें। नोटबंदी का किसी पर कोई असर बाकी न रहे। यही कामना है। 

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

माँ का जाना

4 दिसम्बर 2016, रविवार सुबह पौने बारह बजे के करीब माँ ने अंतिम सांस ली। पिछले दो-तीन महीने से उम्र का बोझ शरीर पर भारी पड़ता जा रहा था, जिसके चलते तन की सारी क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं शिथिल पड़ती जा रही थीं। रायपुर से फोन कम ही आता था, मैं ही समय-समय पर फोन कर हालात की जानकारी लिया करता था। इन दिनों वहाँ से फोन का आना दिल धड़का जाता था। इसीलिए उस सुबह भी जब पौने नौ के आसपास फोन की घँटी बजी तो मन आशंका से भर उठा था। पूनम का फ़ोन था, तबियत ज्यादा ही बिगड़ रही है, आ जाइये ! उसी समय निकल कर एयरपोर्ट पहुँचने पर पता चला कि पौने एक की उड़ान में जगह नहीं है, शाम साढ़े सात की उड़ान में जगह मिल सकती है। छोटे भाई को यही बताने फोन किया तो उसी समय फोन पर बातों के दौरान ही माँ के ना रहने की खबर मिल गयी । रात नौ बजे घर पहुँचने पर पार्थिव शरीर ही इंतजार कर रहा था। जिसका ध्यान सदा मेरी तरफ लगा रहता था, मेरे दुःख, परेशानी, कठिन समय में जो अपनी वृद्धावस्था को अनदेखा कर सशरीर, मन-धन से सदा मेरी सहाई होती थीं, आज मेरे अविरल बहते आसुओं, रुंधते गले, बंधती हिचकियों के बावजूद निश्चेष्ट पड़ी थीं। उस शरीर में जो मेरी तकलीफ की कल्पना कर ही काँप जाता था आज उसमें एक जुंबिश तक नहीं हो रही थी। एक अध्याय समाप्त हो चुका था, बची थीं सिर्फ यादें, बचपन से लेकर अब तक की !

किसी के देहावसान पर उस परिवार को सांत्वना देते समय अक्सर कहा-सुना जाता है कि सबको जाना है, किसके माँ-बाप सदा बैठे रहते हैं या इनका साथ यहीं तक था इत्यादि-इत्यादि, पर किसी अपने के बिछड़ने का गम वही समझता है जिसके घर से कोई विदा हुआ हो !  देस-विदेश में दूर बसे किसी सदस्य के बारे में एक निश्चिंतता तो उसके बने रहने की होती है पर दिवंगत हुए किसी अपने के बारे में यह सोच कर ही कि अब उससे कभी भी, कहीं भी, कैसे भी मिलना संभव नहीं हो सकेगा और तिस पर जब कि माँ बिछुड़ी हों, दिल काँप कर आँखों में पानी भर लाता है !  होगा समय बहुत बड़ा कारगर मल्हम, पर वह भी ऊपरी जख्म को ठीक करता है, अंदर की टीस को समय-समय पर सालने से तो वह भी नहीं रोक पाता।

दिवंगत इंसान के शोकग्रस्त परिवार को संबल देने, उबरने, समझाने के लिए तरह-तरह की बातें और रीति-रिवाज  बनाए गए हैं, इन्हीं के तहत कुछेक दिनों के लिए नाते-रिश्तेदार घर पर जुटते हैं, कुछ रस्में पूरी की जाती हैं जिसमें व्यस्त हो इंसान यादों को कुछ दूर रख सके, अपना गम भुला सके, दुःख भरा माहौल कुछ हल्का हो सके। पर मानव के साथ जिंदगी भर जुड़े रहने वाली ये नियामत इतनी कमजोर नहीं होती कि ऐसे उपायों से उन्हें भुलाया या दूर रखा जा सके। जैसे ही अकेलेपन के कोहरे का साथ उन्हें मिलता है वे फिर आ घेरती हैं, हर बार, बार-बार। अच्छा ही है उनके कारण माँ सदा बनी रहेंगी अपने वात्सल्य के साथ, मेरे आस-पास, मेरे इर्द-गिर्द मुझे संबल देते, ममता बरसाते, स्नेह लुटाते।                

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

अपानवायु, कुछ रोचक जानकारी

दीमक जैसा छोटा सा कीड़ा सबसे ज्यादा गैस उत्पादित करता है। फिर कतार में लगते हैं ऊंट, ज़ेबरा, भेड़, गाय, हाथी, कुत्ते तथा इंसान।  जान कर  आश्चर्य होगा कि चीन में   "Professional  Smeller"   द्वारा गंध सूंघ कर रोगों का निदान किया जाता रहा है। इनके काम की तरह ही इनको इस काम के एवज में मिलने वाली, करीब 50000 डॉलर की रकम भी हैरतंगेज है

अपानवायु, चिकित्सा जगत में भले ही इस पर काफी कुछ लिखा, बताया या शोध किया जा रहा हो, पर रोजमर्रा की जिंदगी में और आम बोल-चाल में यह काफी उपेक्षित सा विषय रहा है। आम धारणा में यह कुछ भदेस, असुसंस्कृत, बेशऊर, फूहड़ या कह सकते हैं कि कुछ हद तक अश्लीलता की श्रेणी में आता है। भले ही इस पर खुले-आम बात करने पर, असभ्यता माने जाने के कारण लोग कतराते हों, पर है यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की अभिन्न प्राकृतिक क्रिया। इसका नाता शरीर के साथ जन्म से लेकर मृत्यु तक बना रहता है। 

इधर इस को लेकर जगह-जगह, तरह-तरह ख़बरें, कुछ ज्यादा ही सामने आने लगी हैं। कुछ में इससे कुछ हद तक निजात पाने की बात रहती है, तो कुछ में इसकी दुर्गंध को रोकने पर हो रही शोध के बारे में बताया जाता है। यह तो हुई इस समस्या को लेकर उठाए गए गंभीर कदम, पर उधर कुछ फिल्मों और टी वी के तथाकथित हास्य सीरियलों में इसको लेकर फूहड़ हास्य पैदा करने की कोशिशें भी जारी हैं। जो कतई स्वागत योग्य नहीं हैं। शायद ऐसे लोगों को अपनी प्रतिभा पर विश्वास नहीं होता जो ऐसी हरकतों को दर्शाने में उतर आते हैं।   

इसका दवाब किसी को भी, कभी भी और कहीं भी हो सकता है। पर भीड़-भाड़ में यह एक शर्मनाक समस्या बन जाता है। पार्टी इत्यादि में सभी के सामने वायु-त्याग करना खुद ही अपमानित होने जैसा लगता है। पर इसके वेग को रोकना भी सेहत के लिए ठीक नहीं होता। ऐसा करने से सिरदर्द, सीने में दर्द, बेचैनी या पेट में दर्द या सूजन भी हो सकती है।  इसलिए हमें स्वस्थ खान-पान की आदत डालनी चाहिए जो कुछ हद तक इसका निवारण कर सकती है घर के बाहर का या कुछ भी, जो मिला पेट में डाल लेना, समय-असमय खाना,  विपरीत गुणों वाले खाद्य-पदार्थों को एक साथ लेना, इसके प्रमुख कारक हैं। मद्य व अत्यधिक धूम्र-पान जैसी आदतों को छोडने या कम करने से इसका प्रकोप भी काफी हद तक  नियंत्रित किया जा सकता है। बाजार में इससे निजात दिलाने वाली दवाएं भी उपलब्ध हैं। वैसे, जैसा कि प्रयोगों द्वारा साबित हुआ है, रोज एक केला खाने से बड़ी हद तक इसे काबू में किया जा सकता है। यह सब बातें तो आम हैं पर इसके बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य भी खोज निकाले गए हैं जो सर्वविदित नहीं हैं।   

यह जान कर आश्चर्य होता है कि मनुष्य शरीर के वायु-प्रकोप को, जिसे हेय दृष्टि से देखा जाता है वह कुछ लोगों का परिवार चलाने का जरिया है। कहते हैं चीन में  "Professional Fart Smeller" गंध सूंघ कर रोगों का निदान करते हैं। इनके काम की तरह ही इनको इस काम के एवज में मिलने वाली, करीब 50000 डॉलर की रकम भी हैरतंगेज है। आम आदमी 10 फिट/सेकंड या 9.5 की.मी/ की गति से 'औसतन' रोज 14 बार वायु निष्काषित करता है, यह क्रिया ज्यादातर रात में सोते वक्त होती है। इसकी मात्रा इतनी होती है जिससे एक मध्यम साइज का गुब्बारा फुलाया जा सकता है। पर इस क्रिया का अधिकतम ऊचांई या पानी की गहराई में होना कुछ मुश्किल होता है। अब तो विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि आज इसकी आवाज और आयतन दोनों को नापना संभव हो गया है। गजब तो यह है कि अब खाने वाली ऐसी गोलियां भी मिलने लगी हैं जिनके सेवन से इसकी दुर्गन्ध, गुलाब या चॉकलेट जैसी चीजों की सुगंध में बदल जाती है। वैसे अधोवस्त्र बनाने वाले, वस्त्रों के कई निर्माता ऐसे कपडे को बाजार में लाने का उपक्रम कर रहे हैं जिससे निष्काषित वायु की दुर्गंध को रोका जा सके। इसमें सफलता भी मिलने लगी है। 
   
अपान वायु पेट में पाचन के दौरान वहां स्थित बैक्टेरिया के कारण बनी कई तरह की गैसों का मिश्रण है। यदि भोजन में सल्फर की मात्रा ज्यादा हो तो दुर्गन्ध भी उतनी ही बढ़ जाती है। इस श्रेणी में पत्तेदार सब्जियां, अंडे, रेड मीट, डेयरी के उत्पादन, प्याज, लहसुन इत्यादि आते हैं। यह मनुष्यों को ही नहीं संपूर्ण प्राणी जगत को प्रभावित करती है। यहां तक कि कीड़े-मकोड़े भी इससे अछूते नहीं हैं। जान कर  आश्चर्य होगा कि दीमक जैसा छोटा सा कीड़ा सबसे ज्यादा गैस उत्पादित करता है। फिर कतार में लगते हैं ऊंट, ज़ेबरा, भेड़, गाय, हाथी, कुत्ते तथा इंसान।  कितनी अजीब बात है कि मनुष्य को अपनी अपान वायु की दुर्गंध सदा दूसरों से कम बुरी लगती है। 

दुनिया भर में इस को चाहे कितना फूहड़, हेय या भदेस माना जाता हो, पर कुछ संस्कृतियां ऐसी भी हैं जहां इसे अन्य आम क्रियाओं की तरह मान्यता प्राप्त है, जैसे दक्षिणी अमेरिका की एक जन-जाति, यानोमामी, जो इसे अभिवादन के रूप में लेती है। चाहे जो हो वायु के इस प्रकार का हमारे शरीर पर बहुत गहरा असर रहता है। कोशिश यही रहनी चाहिए कि हम, जहां तक संभव हो, कफ और पित्त के साथ इसका संतुलन बनाए रखें। 
-संदर्भ अंतरजाल 

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