सोमवार, 15 अगस्त 2016

मन जाना राष्ट्रीय पर्व का

वर्षों तक लोग स्वंय-स्फुर्त हो घरों से निकल आते थे, पूरे साल जैसे इस दिन का इंतजार रहता था। अब लोग इससे जुडे समारोहों में खुद नहीं आते उन्हें बरबस वहां लाया जाता है। दुःख होता है यह देख कर कि  अब इस पर्व को मनाया नहीं बस किसी तरह  निपटाया जाता है !!


तीन साल पहले की यह पोस्ट आज भी वैसी ही सामयिक है ! 

15 अगस्त, वह पावन दिवस, जिस दिन देशवासियों ने एकजुट हो आजादी पाई थी। कितनी खुशी, उत्साह और उमंग थी तब। वर्षों तक लोग स्वंय-स्फुर्त हो घरों से निकल आते थे, पूरे साल जैसे इस दिन का इंतजार रहता था। पर धीरे-धीरे आदर्श, चरित्र, देश प्रेम की भावना का छरण होने के साथ-साथ यह पर्व महज एक अवकाश दिवस के रूप मे परिवर्तित होने पर मजबूर हो गया। इस कारण और इसी के साथ आम जनता का अपने तथाकथित नेताओं से भी मोह भंग होता चला गया।

अब लोग इससे जुडे समारोहों में खुद नहीं आते उन्हें बरबस वहां लाया जाता है। अब इस पर्व को मनाया नहीं निपटाया जाता है। आज हाल यह है कि संस्थाओं में, दफ्तरों में और किसी दिन जाओ न जाओ आज जाना बहुत जरूरी होता है, अपने-आप को देश-भक्त सिद्ध करने के लिए। खासकर विद्यालयों, महाविद्यालयों में जा कर देखें, पाएंगे मन मार कर आए हुए लोगों का जमावड़ा, कागज का तिरंगा थामे बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह घेर-घार कर संभाल रही शिक्षिकाएं, साल में दो-तीन बार निकलती गांधीजी की तस्वीर, नियत समय के बाद आ अपनी अहमियत जताते खास लोग। फिर मशीनी तौर पर सब कुछ जैसा होता आ रहा है वैसा ही निपटता चला जाना। झंडोत्तोलन, वंदन, वितरण, फिर दो शब्दों के लिए चार वक्ता, जिनमे से तीन आँग्ल भाषा का उपयोग कर उपस्थित जन-समूह को धन्य करते हैं और लो हो गया सब का फ़र्ज पूरा। कमोबेश यही हाल सब जगह हैं। 

आजादी के शुरु के वर्षों में सारे भारतवासियों में एक जोश था, उमंग थी, जुनून था। प्रभात फ़ेरियां, जनसेवा के कार्य और देश-भक्ति की भावना लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई थी। चरित्रवान, ओजस्वी, देश के लिए कुछ कर गुजरने वाले नेताओं से लोगों को प्रेरणा मिलती थी।  यह परंपरा कुछ वर्षों तक तो चली फिर धीरे-धीरे सारी बातें गौण होती चली गयीं। अब वह भावना, वह उत्साह कहीं नही दिखता। लोग नौकरी के ड़र से या और किसी मजबूरी से, गलियाते हुए, खानापूर्ती के लिए इन समारोहों में सम्मिलित होते हैं। ऐसे दिन, वे चाहे गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस स्कूल के बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं या फिर हम पुराने रेकार्डों को धो-पौंछ कर, निशानी के तौर पर कुछ घंटों के लिए बजा अपने फ़र्ज की इतिश्री कर लेते हैं। क्या करें जब चारों ओर हताशा, निराशा, वैमनस्य, खून-खराबा, भ्रष्टाचार इस कदर हावी हों तो यह भी कहने में संकोच होता है कि आईए हम सब मिल कर बेहतर भारत के लिए कोई संकल्प लें। फिर भी प्रकृति के नियमानुसार कि जो आरंभ होता है वह खत्म भी होता है तो एक बेहतर समय की आस में सबको इस दिवस की ढेरों शुभकामनाएं। क्योंकि आखिर इस दिवस ने किसी का क्या बिगाड़ा है, इसने तो हमें भरपूर खुश होने का मौका ही दिया है।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

तिरोहित होती भावनाएं

हम सब चाहते हैं कि हमें हर तरह की सहूलियत मिले, हमें हर तरह की आजादी हासिल हो, हम पर किसी तरह की बंदिश न हो, हम पर किसी भी तरह की कड़ाई लागू न हो, हमारे हक़ को छीना ना जाए। पर  हम चाहते हैं कि हमारे लिए कोई और लड़े, ताकि मुसीबत आने पर हम पर कोई आंच ना आए। यानी स्वर्ग सभी जाना चाहते हैं पर मरना कोई नहीं चाहता ! मतलबपरस्ती के इस आलम में इरोम भी सोच रही होगी कि अपनी जिंदगी के बीसियों साल मैंने किनके लिए बर्बाद कर दिए !!   

असहिष्णुता पर तो कई दिनों से देश में बहसबाजी जारी है। उस पर नाहीं कोई टिपण्णी करनी है और नाहीं उसके पक्ष-विपक्ष में जाना है। पर कड़वी सच्चाई तो यही है कि धीरे-धीरे समाज में असहिष्णुता के साथ-साथ संवेदनहीनता और खुदगर्जी तेजी से पनप रही है। किसी भी दिन का, किसी भी प्रदेश का, किसी भी भाषा का अखबार उठा कर देख लीजिए, नफ़रत का अजगर हर जगह जहर उगलता नजर आएगा। ज़रा-ज़रा सी बात पर तोड़-फोड़, मार-पीट, खून-खराबा आम बात हो गयी है। एक दस बोलता है तो दूसरा सौ सुनाता है। रिश्ते-नाते, पद-मर्यादा, छोटे-बड़े किसी का लिहाज नहीं बचा है। सड़क से लेकर उच्चतम सदनों तक एक जैसा हाल हो गया है। मतलबपरस्ती का आलम है। 

संवेदनहीनता का आलम यह है कि इंसान की कीमत मोबायल फोन से भी कम हो गयी है। एक-दो दिन पहले की ही तो बात है एक शख्स को धक्का मार कर टेंपो चालक फरार होता है, एक रिक्शावाला उस घायल इंसान को
नजरंदाज कर उसका मोबायल फोन उठा यूं चल पड़ता है जैसे उसीका गिरा हो, उधर पुलिस की गाडी पता नहीं अपनी कौन सी ड्युटी पूरी करने की जल्दी में उस आदमी को देख ही नहीं पाती या देखना नहीं चाहती। बाद में पता चलता है कि यह पुलिस की नहीं उस घायल आदमी की ही गलती थी जिसने गिरते वक्त यह ध्यान नहीं रखा कि उसे एक ही थानाक्षेत्र में गिरना है। फिर जो होता है, तड़फते हुए उस घायल बदनसीब इंसान ने सड़क पर ही दम तोड़ दिया। वैसे इस अमानवता के पीछे पुलिस की छीछालेदर से बचना भी एक कारण है जिसे आम आदमी झंझट मान बैठा है।  जबकी हादसे ना पूछ कर आते हैं नाहीं पहचान कर ! और यह इस तरह की अकेली घटना भी नहीं है, देश भर में महीने में ऐसे सैंकड़ों वाकये घटते रहते है जिनमें दर्जनों व्यक्ति संवेदनहीनता की वजह से अपनी जान गवां बैठते हैं।
 
कहने-सुनने में बुरा जरूर लगता है पर खुदगर्जी की भावना भी हम में कूट-कूट कर भरी हुई है। हम सब चाहते हैं कि हमें हर तरह की सहूलियत मिले, हमें हर तरह की आजादी हासिल हो, हम पर किसी तरह की बंदिश न हो, हम पर किसी भी तरह की कड़ाई लागू न हो, हमारे हक़ को छीना ना जाए। पर इन सब के लिए हम खुद लड़ना या आवाज बुलन्द करना या विरोध जताना नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि हमारे लिए कोई और लड़े, हमारी ओर से कोई और आवाज उठाए, हमारे लिए कोई और विरोध जताए ताकि मुसीबत आने पर हम पर कोई आंच ना आए। यानी स्वर्ग सभी जाना चाहते हैं पर मरना कोई नहीं चाहता !! 

इतिहास गवाह है, सदियों से ऐसा होता चला आया है। अपने लिए खड़े होने वाले को हम हीरो बना देते हैं, पर काम निकल जाने पर या अधूरा रह जाने पर उसे ज़ीरो बनाने या उसी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। फिर चाहे कोई गांधी हो या अन्ना हो। इसका ताजा उदाहरण मणिपुर की शर्मिला है, जो जब तक कष्ट, विरोध, ताड़ना सहती रही तब तक वह वहाँ के लोगों के लिए पूज्यनीय-आदरणीय, नायिका बनी रही, पर जैसे ही उसने अपने व्यक्तिगत निर्णय लिए उसे खलनायिका का रूप दे दिया गया। यहां तक कि वहाँ की महिलाएं भी उसे अपने मौहल्ले में रहने देने के खिलाफ हो गयीं। अब तक उसका नाम जपने वाले, उसके सहारे अपनी दुकान चलाने वाले रातों-रात ग़ायब हो गए। इरोम भी सोच रही होगी कि अपनी जिंदगी के बीसियों साल मैंने किनके लिए बर्बाद कर दिए !!   

सो हमें भी अपने मन की बात न होने या सुनाई देने से आक्रोशित होने के बजाय सोचना जरूर चाहिए कि जैसे हमारी अपनी एक सोच है तो जरूरी नहीं कि सामने वाले की भी वैसी ही हो। उसका अपना व्यक्तित्व है, अपनी मानसिकता है, अपने विचार हैं। जरूरी नहीं कि मेल खाएं ही !                     

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

पाना, त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शनलाभ का

अपनी हजार इच्छा हो, बिना प्रभु की मर्जी के किसी भी देवस्थान तक नहीं जाया जा सकता है और जब उनकी अनुमति होती है तो कोई भी बाधा वहाँ जा दर्शनों से नहीं रोक पाती। पर विडंबना है कि सैंकड़ों की.मी. की यात्रा की यादों को सँजोने के लिए आप उन पलों को, कैमरे को साथ रखने की मनाही के कारण, कैद नहीं कर सकते ! समय ही ऐसा चल रहा है..... 

इसे प्रभुएच्छा ही कहा जाएगा कि पिछले दो महीनों की भागम-भाग, व्यस्तता और थकान के बावजूद नासिक में संपन्न होने वाले एक विवाह में शामिल होने में कोई बाधा या अड़चन आड़े नहीं आई। कहते हैं ना कि अपनी हजार इच्छा हो, बिना प्रभु की मर्जी के किसी भी देवस्थान तक नहीं जाया जा सकता है और जब उनकी अनुमति होती है तो कोई भी बाधा वहाँ जा दर्शनों से नहीं रोक पाती। ऐसा मेरे साथ कई बार हो चुका है। जिसका ताजा अनुभव शिवजी की कृपा से त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के सौभाग्य का है, जो अभी पिछले दिनों ही प्राप्त हुआ। 

त्र्यम्बकेश्वर  ज्योर्तिलिंग मन्दिर, महाराष्ट्र के नासिक जिले में ब्रह्मगिरि नामक पर्वत की तलहटी में, गोदावरी नदी के उद्गम के पास स्थित है। जनश्रुति है कि गौतम ऋषि तथा गोदावरी रूपी माँ गंगा की प्रार्थना के कारण भगवान शिव ने इस स्थान में वास करने की कृपा की और त्र्यम्बकेश्वर नाम से विख्यात हुए। यह  मंदिर के अंदर एक छोटे से गङ्ढे में तीन छोटे-छोटे लिंग है, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं। यही इस ज्‍योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता है, जिसमें ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश तीनों का वास है। अन्‍य सभी ज्‍योतिर्लिंगों में केवल भगवान शिव ही विराजित हैं। 
ज्योर्तिलिंग के उद्भव की कथा के अनुसार प्राचीनकाल में इस त्र्यंबक स्थान पर गौतम ऋषि की तपोभूमि थी। एक बार किसी बात पर नाराज हो तपोवन में रहने वाले ब्राह्मणों ने गणेश जी की आराधना कर गौतम ऋषि को आश्रम से निकलवाने की प्रार्थना की। गणेश जी ने उन  समझाने की चेष्टा की पर अपने  भक्तों के हठ पर विवश हो उनकी बात माननी पड़ी। उनका मन रखने के लिए वे एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके ऋषि के खेत में जाकर चरने लगे। गाय को फसल चरते देखकर ऋषि ने नरमी के साथ हाथ में तृण लेकर उसे हाँकने की कोशिश की, पर  तृणों का स्पर्श होते ही वह गाय वहीं गिर कर मर गयी । इस पर सारे ब्राह्मण एकत्र हो गो-हत्यारा कहकर ऋषि गौतम की भर्त्सना करने लगे और कहा कि तुम्हें यह आश्रम छोड़कर अन्यत्र कहीं दूर चले जाना चाहिए। गो-हत्यारे के निकट रहने से हमें भी पाप लगेगा। विवश होकर ऋषि गौतम अपनी पत्नी अहिल्या के साथ वहाँ से एक कोस दूर जाकर रहने लगे। किंतु उन ब्राह्मणों ने वहाँ भी उनका रहना दूभर कर दिया। तब ऋषि गौतम के उनसे प्रार्थना कर प्रायश्चित और उद्धार का कोई उपाय पूछने पर उन्होंने कहा, तुम यहाँ गंगाजी को लाकर उनके जल से स्नान करके एक करोड़ पार्थिव शिवलिंगों से शिवजी की आराधना करो। इसके बाद पुनः गंगाजी में स्नान करके इस ब्रह्मगीरि की 11 बार परिक्रमा करो। फिर सौ घड़ों के पवित्र जल से पार्थिव शिवलिंगों को स्नान कराने से तुम्हारा उद्धार होगा।
ब्राह्मणों के कथनानुसार महर्षि गौतम  भगवान शिव की आराधना करने लगे। इससे प्रसन्न हो भगवान शिव ने प्रकट होकर उनसे वर माँगने को कहा। महर्षि गौतम ने उनसे कहा, प्रभू , आप मुझे गो-हत्या के पाप से मुक्ति दिलवाएं ! भगवान्‌ शिव ने कहा, गौतम ! तुम तो सर्वथा निष्पाप हो। तुम पर गो-हत्या का दोष लगाने वालों को मैं दण्ड देना चाहता हूँ। इस पर महर्षि गौतम ने कहा कि प्रभु, उन्हीं के कारण  तो मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए हैं, उन पर आप क्रोध न कर क्षमा कर दें और आप यहीं निवास करें। प्रभु ने उनकी बात मानकर वहाँ त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग के नाम से स्थित हो गए  कृपा से गंगाजी भी वहाँ पास में गोदावरी के  नाम से प्रवाहित होने लगीं। यह ज्योतिर्लिंग समस्त पुण्यों को प्रदान करने वाला है।

 इसी से सम्बन्धित एक और कथा भी प्रचलित है। कहते हैं कि ब्रह्मगिरि पर्वत से गोदावरी नदी बार-बार लुप्त हो जाती थी। गोदावरी के पलायन को रोकने के लिए गौतम ऋषि ने एक कुशा की मदद लेकर गोदावरी को बंधन में बाँध दिया। उसके बाद से ही इस कुंड में हमेशा लबालब पानी रहता है। इस कुंड को ही कुशावर्त तीर्थ के नाम से जाना जाता है। 

गोदावरी नदी के किनारे स्थित यह कलात्मक त्र्यंबकेश्‍वर मंदिर काले पत्‍थरों से बना हुआ है। इस प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी अर्थात नाना साहब पेशवा ने करवाया था। इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1755 में शुरू हुआ था और 31 साल के लंबे समय के बाद 1786 में जाकर पूरा हुआ। यही वह ख़ास पूजा-स्थली है जहां यहाँ कालसर्प योग, त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबलि नामक खास पूजा-अर्चना की जाती है, जिसके कारण यहाँ साल भर भक्‍तजन अलग-अलग मुराद पूरी होने के लिए आते रहते हैं। शिवरात्रि और सावन सोमवार के दिन त्र्यंबकेश्वर मंदिर में भक्तों का ताँता लगा रहता है। 
मंदिर के अंदर गर्भगृह में शिवलिंग की केवल अर्घा दिखाई देती है, जिसके अंदर तीन छोटे-छोटे लिंग स्थापित हैं, जिन्हें त्रिदेव, ब्रह्मा-विष्णु और महेश का अवतार माना जाता है। जिनके दर्शन भाग्यशाली लोगों को ही मिल पाते हैं, क्योंकि हर बड़े और प्रसिद्ध पूजा स्थलों की तरह यहां भी भक्तों को कुछ पलों का ही समय मिलता है दर्शनों का, उसी में जो दिख गया सो दिख गया, फिर तो नसीब में धकियाना ही लिखा होता है।कोई करे भी तो क्या !  भीड़ ही इतनी होती है कि यदि सभी को इच्छानुसार समय  लगे तो हफ़्तों लग जाएं लोगों को इंतजार करते !  भोर के समय होने वाली पूजा के बाद इस अर्घा पर चाँदी का पंचमुखी मुकुट चढ़ा दिया जाता है। धार्मिक ग्रन्थों और शिवपुराण में भी त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन है। नजदीक के ब्रह्मगिरि  पर्वत पर जाने के लिए यहां सात सौ सीढियां हैं, जिनसे ऊपर जाने के मध्य मार्ग में रामकुण्ड और लक्ष्मणकुण्ड स्थित हैं। पर्वत की चोटी पर पहुंचने पर गोदावरी नदी के उद्गम स्थल के विहंगम दर्शन होते हैं। 
पर विडंबना है कि सैंकड़ों की.मी. की यात्रा की यादों को सँजोने के लिए आप उन पलों को, कैमरे को साथ रखने की मनाही के कारण, कैद नहीं कर सकते। समय ही ऐसा चल रहा है।  

बुधवार, 10 अगस्त 2016

कोटा का दाढ़ देवी मंदिर

राजस्थान के कोटा शहर से करीब  20-22 की. मी. की दूरी पर हाडौती क्षेत्र के उम्मेदगंज नामक स्थान पर सुनसान सी जगह में स्थित है एक मंदिर, जिसमें माँ दुर्गा को दाढ़ देवी के नाम से पूजा जाता है ..

दाढ़ देवी ! है ना अजीब सा नाम ? पर  इंसान की आस्था, विश्वास और सोच की कोई सीमा नहीं होती। उसकी इसी फ़ितरत ने ना जाने कितने पूजा-स्थलों का निर्माण, कैसे-कैसे नामों से करवाया है। ऐसी ही एक आस्था का प्रतीक है, राजस्थान के कोटा शहर से करीब  20-22 की. मी. की दूरी पर हाडौती क्षेत्र के उम्मेदगंज नामक स्थान पर सुनसान सी जगह में स्थित एक मंदिर, जिसमें माँ दुर्गा को दाढ़ देवी के नाम से पूजा जाता है। इस मंदिर का निर्माण कैथून के तंवर राजपूतों ने अपनी कबीले की देवी की आराधना के लिए करवाया था। दस भुजाओं तथा त्रिनेत्र वाली माता सिंह पर आसीन हैं। हर हाथ में आयुध हैं। नागर
शैली में चूना-पत्थर से बने इस मंदिर को बारह कलात्मक खंभों का सहारा दिया गया है। मंदिर के सामने एक हौज है जिसमें जमीन के अंदर से पानी आता है। साल के दोनों नवरात्रों में यहां मेला लगता है जिसमे भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यहां शिव तथा काल भैरव के भी मंदिर हैं। 

दुर्गा जी के इस नाम के पीछे एक जनश्रुति चली आ रही है, कहते हैं एक बार कोटा के राजा उम्मेद सिंह की दाढ़ में भयंकर दर्द उठा। जमाने भर के इलाज करवाने पर भी उनका कष्ट कम नहीं हुआ तो उन्होंने इसी मंदिर में जा माँ दुर्गा देवी की पूजा-अर्चना की जिससे उनका रोग ख़त्म हो गया। तब उन्होंने एक और मंदिर का निर्माण करवा इस मंदिर की प्रतिमा को नए मंदिर में स्थापित करना चाहा पर उनकी लाख कोशिशों के बावजूद मूर्ति टस से मस नहीं हुई। इसे माँ की इच्छा समझ, उन्हें वहाँ से हटाने की कोशिश छोड़, वहीँ यथावत उनकी पूजा होती आ रही है। 

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

भागम-भाग में बीते दो महीने

इतनी व्यस्तता, उठा-पटक, भाग-दौड़ से शरीर का थोड़ा नासाज होना भी बनता है, हुआ भी है। पर उसे प्यार से समझाना पड़ा है कि अगले हफ्ते पड़ने वाले तीन अवकाशों में हमें सालासर के बालाजी महाराज के दर्शनों का संकल्प भी पूरा करना है, सो भाई हमारा साथ ना छोडना, ज़रा ठीक ही रहना !!    

बहुत दिनों के बाद आप सब से फिर रूबरू होने का मौका मिला है। पिछले एक-दो महीने में काफी कुछ घटित हुआ, बड़े बदलाव आए जिनके दौरान छोटा बेटा  परिणय-सुत्र में बंध गया, अपने जीवन की एक नई शुरुआत करने के लिए। घर में एक नए सदस्य का आगमन हुआ है। बिटिया को नए परिवेश, नए संबंध, नए लोगों से तालमेल बैठाना है। वैसे आजकल की पीढ़ी को उतना वक्त नहीं लगता इन सब बातों में जितना पहले लगा करता था। फिर भी एक-दूसरे के अनुसार ढलने में कुछ समय तो लग ही जाता है।  

घर में सदस्य बढे तो ज्यादा जगह की आवश्यकता भी महसूसी गयी, उसी के लिए फिर एक बड़े घर की तलाश ख़त्म की गयी। शायद मुझे प्रभु की देन है कि मैं बीती-बितायी पर ज्यादा ध्यान नहीं देता। जो आज है वही सच है। पर कभी-कभी पुरानी दबी-ढकी कोई कसक, टीस दे ही जाती है। यह रोज-रोज खानाबदोशों की तरह बोरिया-बिस्तर समेटते-बिछाते, राजौरी गार्डन के करीब चार सौ गज में बने घर की याद आ ही जाती है ! जिसे पता नहीं किस ग्रह-दशा में, बिना ज्यादा सोचे-समझे बेच-बाच कर दिल्ली छोड़ दी थी। समय चक्र घूमा, फिर उसने बीस-बाइस साल बाद वहीँ ला पहुंचाया। मेरी कोशिश रहती है कि भूली-बिसरी यादें ताजा ना ही हों, पर परिवार का क्या किया जाए, जो रोज-रोज की उठा-पटक और आसमान छूते मकान के किरायों की वजह से तंग आ कुरेद ही देता है पिछली घटनाओं को ! पर कहावत है ना कि कोई अक्लमंदी से कमाता नहीं और ना कोई बेवकूफी से गंवाता है। सब होनी के वश में है, जो होना होता है, वह हो कर ही रहता है।

इसी सब में जो पिछले महीने से व्यस्तता शुरू हुई वह अभी भी पूर्णरूपेण ख़त्म नहीं हुई है। बेटे की शादी के बाद ईश्वर की अनुकंपा से प्रभू त्र्यम्बकेश्वर के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ। चारों मेट्रो शहरों में से बचे एक मुंबई की भी आंशिक यात्रा हो गयी। जिसके साथ-साथ नासिक और पुणे का भी भ्रमण हो गया। लौटते ही, पहले से तय, भतीजे अतुल, जिसे जब पिछली बार देखा था तब वह गोदी में हुआ करता था, की शादी में चंडीगढ़ के पास पंजाब के जिरकपुर का भी चक्कर लगाना हुआ।  समय कैसे फिसलता चला जाता है !! यह तो भला हो आधुनिक तकनीक का, जिससे दूर-दराज बैठे हुए भी एक-दूसरे के हाल-चाल की जानकारी मिलती रहती है। इसी भाग-दौड़ के बीच जो भी समय मिलता उस में नयी जगह में "शिफ्टिंग" भी बदस्तूर जारी रही, जहां अभी भी सामान का जमना-ज़माना चल ही ही रहा  है।

इतनी व्यस्तता, उठा-पटक, भाग-दौड़ से शरीर का थोड़ा नासाज होना भी बनता है, हुआ भी है। पर उसे प्यार से समझाना पड़ा है कि अगले हफ्ते पड़ने वाले तीन अवकाशों में हमें सालासर के बालाजी महाराज के दर्शनों का संकल्प भी पूरा करना है, सो भाई हमारा साथ ना छोडना, ज़रा ठीक ही रहना !!              

लगता तो है कि तन ने बात मान ली है, अब मन और धन भी सकारात्मक रहें इसलिए प्रभू की इच्छा, अनुकम्पा और वरदहस्त की आकांक्षा है।          

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

बुजुर्गों का ख्याल रखना सामाजिक कर्तव्य है

आज कुत्ते-बिल्लियों तक के लिए कानून बने हुए हैं पर मानव ही सबसे ज्यादा उपेक्षित है, खासकर बुजुर्ग, और यह तब है जबकि सभी को इस उम्र से गुजरना है। इसीलिए सरकार, स्वंयसेवी संस्थाओं और एन.जी.ओ. इत्यादि को इस समस्या के समाधान के लिए कुछ तो सार्थक कदम उठाने ही चाहिए। यह सब तो जब होगा तब होगा फौरी तौर पर तो हमें ही पहले ध्यान देना चाहिए कि हमारे अड़ोस-पड़ोस में या जान-पहचान में ऐसा कोई भी व्यक्ति या दंपति हो तो उसका हम ध्यान रखें और किसी भी अनहोनी पर उनकी सहायता के लिए तैयार रहें      

कल मैनपुरी से शिवम जी ने फोन कर, दिल्ली में मेरे नजदीक ही रह रहे, अपने भाई साहब के निवास के ऊपर अकेले निवासित एक निःसंतान वृद्ध दंपति के बारे में बताया कि किस तरह रात को अचानक तबियत बिगड़ने पर उन्हें कैसी-कैसी समस्याओं से जूझना पड़ा। आज बुजुर्गों का अकेलापन खुद अपने आप में एक समस्या है जो दिनों-दिन विकराल रूप लेती जा रही है। हादसे कभी बतला कर नहीं आते। चाहे-अनचाहे हजारों ऐसे वयोवृद्ध लोगों को अकेले रहने का दुःख तो भोगना ही पड़ता है, साथ-साथ  हारी-बिमारी की समस्या, रोजमर्रा के कामों में आने वाली तरह-तरह की परेशानियां और खतरे भी बने रहते हैं।          

जिस दंपति की बात कर रहा था, श्री और श्रीमति कोहली, दोनों की उम्र अस्सी साल के आस-पास है। दोनों अपने निवासस्थान पर अकेले रहते हैं। दो दिन पहले श्री कोहली रात को टॉयलेट जाने के लिए उठे तो अचानक ही उनकी तबियत बुरी तरह बिगड़ गयी। किसी तरह घिसटते हुए कमरे तक आ उन्होंने पत्नी को जगाया, जिन्होंने फोन कर अपने नीचे रहते विक्रम जी को सहायता के लिए बुलाया। रात का समय, नींद की खुमारी, जल्द कुछ समझ में भी तो नहीं आता, ऐसे में ही विक्रम जी नेअपने पहचान के डॉक्टर को फोन किया पर उसने घर आने से मना कर दिया। फिर समय की नाजुकता को देखते हुए विक्रम जी, कोहली जी को पास के एक नर्सिंग होम ले गए पर वहां उचित चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी, हाँ, उन्होंने इतनी सहायता जरूर की कि एम्बुलेंस को फोन कर दिया। पर करीब आधे घंटे तक भी गाडी के ना आने पर दूसरी जगह कोशिश की गयी तो वहां से ड्रायवर के ना होने की मजबूरी जता दी गयी। फिर 102 न. की हेल्प लाइन पर कोशिश की गयी तो वहां से मांगी गयी दसियों जानकारियां देने के पश्चात उन्होंने बताया कि वे सिर्फ सरकारी अस्पताल ही ले जा सकते हैं। यह सब जानकारियां रोगी को सुरक्षित पहुंचा कर भी तो ली जा सकती थीं। खैर इतने में पहले फोन वाली एम्बुलेंस आ गयी और कोहली जी को दूसरे अस्पताल ले जाया गया पर वहां सारे परीक्षणों की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। हड़बड़ाहट में  फिर तीसरी जगह पहुंचे तो वहां टेस्ट तो हो गए पर भर्ती करने की समस्या सामने आ खड़ी  हुई। समय सरकता जा रहा था, इलाज शुरू नहीं हो पा रहा था। साथ के लोगों की चिंता और रक्तचाप बढ़ते जा रहे थे। ऐसे में ही तीसरे अस्पताल से रिपोर्ट ले कर भागते हुए फिर पहले अस्पताल पहुंचे और वहां आई.सी.यु. में कोहली जी को दाखिल करवाया जा सका। भगवान का शुक्र है कि इतनी देर होने के बावजूद वे खतरे से बाहर हैं। पर इस तरह के बुजुर्ग दंपतियों पर इस तरह का खतरा तो बना ही रहता है। हर किसी को सहृदय विक्रम जी जैसा पड़ोसी तो मिलता नहीं। आज तो हालात यह हैं कि अधिकांश लोगों को अपने पडोसी का चेहरा तक देखे अर्सा बीत जाता है। यह तो दिल्ली का हाल है, छोटे शहरों की हालत की तो कल्पना ही की जा सकती है !

कुछ दुर्घटनाएं या बीमारियां ऐसी होती हैं जहां समय का बहुत महत्व होता है। जरा सी देर होने पर ही जान पर बन आती है। खासकर वयोवृद्ध अवस्था में। तो कुछ तो ऐसा होना चाहिए जिससे समाज को अपनी उम्र दे चुके, हमारी आबादी के करीब  8-9 प्रतिशत के इस वर्ग को जीवन के इस पड़ाव पर असुरक्षा महसूस न हो। चौबीसों घंटे उन्हें यह डर ना बना रहे कि हमारे साथ कुछ अघटित हो जाता है तो हम क्या करेंगे ! आज कुत्ते-बिल्लियों तक के लिए कानून बने हुए हैं पर मानव ही सबसे ज्यादा उपेक्षित है। और यह तब है जबकि सभी को इस उम्र से गुजरना है। इसीलिए सरकार, स्वंयसेवी संस्थाओं और एन.जी.ओ. इत्यादि को इस समस्या के समाधान के लिए कुछ तो सार्थक कदम उठाने ही चाहिए। खासकर उन बुजुर्गों के लिए जो बिलकुल ही अकेले रहते हों। जिस तरह बच्चियों और युवतियों के लिए "हेल्प लाइन" बनाई गयी हैं उसी तर्ज पर इनके लिए भी "हॉट लाइन" हो। छोटे-छोटे वार्ड बना कर उसमें रह रहे ऐसे लोगों के नाम एक जगह एकत्रित हों जिससे वहां फोन करते ही उचित सहायता उपलब्ध करवाई जा सके। सप्ताह में  दो-तीन बार उनकी खोज-खबर ले उनका ध्यान रखा जा सके। यह सब तो जब होगा तब होगा फौरी तौर पर तो हमें ही पहले ध्यान देना चाहिए कि हमारे अड़ोस-पड़ोस में या जान-पहचान में ऐसा कोई भी व्यक्ति या दंपति हो तो उसका हम ध्यान रखें और किसी भी अनहोनी पर उनकी सहायता के लिए तैयार रहें।

सच तो यह है कि जिस पर गुजरती है वही झेलता और संभालता है। हमारे यहां तो यह सब रोज का किस्सा बना हुआ है। दुर्घटना हो जाती है तो सहायता नहीं मिलती। सहायता मिल जाती है तो ढंग की जगह नहीं मिलती। जगह मिल जाती है तो समय पर उपचार नहीं मिल पाता। उपचार मिल जाता है तो पीड़ित को लाने वाले से ढेरों सवाल पूछे जाते हैं। विडंबना है कि कुछ भले लोग चाह कर भी, कानूनी और पुलिस के खमों-पेच से घबरा कर सहायता करने से गुरेज करते हैं।

इस समस्या के निवारण के लिए विज्ञ जनों के सुझाव आमंत्रित हैं।  

मंगलवार, 28 जून 2016

पानी की समस्या अगले साल तक के लिए गौण हो गयी है :-(

कभी-कभी तो मन में यह संशय भी सर उठाता है कि क्या पानी की यह कमी प्रायोजित तो नहीं है ?क्योंकि हम आकंठ भ्रष्टाचार में इस तरह लिप्त हैं कि हमें खुद के लाभ की बजाए और कुछ भी सुझाई नहीं देता है ! याद आते है, अस्सी के दशक की गर्मियों के वे दिन जब रेलवे स्टेशनों पर पानी की उपलब्धता जान-बूझ कर रोक दी जाती थी जिससे प्यासे यात्रियों को मजबूरी में ऐसे-वैसे बोतलबंद ठंडे पेय को अनाप-शनाप कीमत चुकता कर खरीदना पड़ता था     

हम लोग सकारात्मक सोच वाले, वर्तमान में जीने वाले लोग हैं। हम उन मनोवैज्ञानिकों के अनुयायी हैं जो कहते हैं जब तक समस्या सामने न हो उस के बारे में मत सोचो ! तो लो जी,  बरसात आ गयी तो सरकार ने भी राहत की सांस ले विगत पानी की समस्या को ठंडे बस्तों में डाल देना है। पानी पर गुल-गपाड़ा मचाने वाले मीडिया में अब दूसरे-तीसरे मुद्दे उछलने लगेंगे। लोग वैसे ही कारें धोते रहेंगे। संत्रीयों-मंत्रियों के लॉन हरियाए जाते रहेंगे, सार्वजनिक नलों से टोंटी ना होने की वजह से पानी, पानी की तरह बहता रहेगा। बरसात के पानी को अभी कोई संजोने की नहीं सोचेगा। नदियां उफनने लगेंगी, बाढ़ से तबाही मचेगी, पर अभी, सभी, आगामी गर्मियों तक इस बेशकीमती प्राकृतिक देन का मोल फिर नहीं समझेंगे।     

आज पूरे देश में नागरिकों को पानी एक निश्चित अवधी के लिए ही उपलब्ध करवाया जाता है। जिसमे कभी-कभी तकनीकी कारणों से नागा भी पड़ जाता है जिसकी आशंका से लोग जरुरत से ज्यादा पानी का भंडारण कर लेते हैं पर बहुत सारे घरों में देखा गया है कि जैसे ही सुबह का पानी उपलब्ध होता है, पिछले दिन के संचयित जल को फेंक कर उस "ताजे" पानी का भंडारण कर लिया जाता है। इसी तरह रोज पीने के पानी को बदलने की क्रिया में एक दिन पहले का पानी यूंही नाली में बहा देने से बेशुमार पानी बर्बाद कर दिया जाता है। सोचने की बात है यह है कि कोई नहीं सोचता कि जिस पानी को ताजा समझ कर इकट्ठा किया जा रहा है उसका निर्माण अभी नहीं हुआ है ! वह भी कहीं न कहीं कई दिनों से संजो कर ही रखा गया था।  पर नल में पानी आता देख पहले का पानी बासी लगने लगता है। घर में दो दिन पुराने दूध या दही को तो कोई नहीं फेंकता ! चलिए  मन का वहम दूर ना ही हो तो पिछले दिन के पानी को नाली में बहाने की बजाए घर के किसी भी दसियों कामों में उसका उपयोग किया जा सकता है। वैसे भी साफ़-सफाई से रखे गए पानी में कोई खराबी नहीं आती। इस तरह के पानी को और भी गुणवत्ता युक्त बनाने के लिए उसे यदि अच्छी तरह फेंट लिया जाए तो वातावरण की आक्सीजन उसमें घुल कर उसे और भी उपयोगी बना सकती है। 
     
आज हमारे देश में उपलब्ध जल की मात्रा की समस्या उतनी विकराल नहीं है, जितनी उसके प्रबंधन की कमी की है। जरुरत है नागरिकों को इसके बारे में जानकारी और जागरूकता उपलब्ध करवाने की। अतः जल संरक्षण के लिये जरूरी है कि हम सभी को जल के बारे में सही जानकारी हो, हम उसकी कीमत समझें, आसानी से उपलब्ध इस जीवनोपयोगी नियामत को संभाल कर खर्च करें और उसकी गुणवत्ता बनाए रखने की हर संभव कोशिश करें। 

प्रकृति ने हमें दिल खोल कर पचासों नदियों की सौगात बक्शी है, भरपूर जल मुहैय्या करवाया है, पर हम उसकी कीमत ना समझ 'माले मुफ्त दिल बेरहम' की तर्ज पर उसको बर्बाद करते रहे हैं। हमने कभी भी उसके उचित प्रबंधन पर ध्यान ही नहीं दिया। यह मान बैठे कि यह चीज तो कभी ख़त्म ही नहीं होगी। हमारी इसी अदूरदर्शिता से आज इसकी कमी महसूस होने लगी है। पर कभी-कभी तो मन में यह संशय भी सर उठाता है कि क्या यह कमी प्रायोजित तो नहीं है, क्योंकि हम आकंठ भ्रष्टाचार में इस तरह लिप्त हैं कि हमें खुद के लाभ की बजाए और कुछ भी सुझाई नहीं देता। क्या ऐसा तो नहीं कि शहरों में टैंकर माफिया के दवाब में, या पानी को तथाकथित शुद्ध करने वाले यंत्रों के निर्माता बड़े व्यवसायिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए, या विरोधी दलों के द्वारा सत्तारूढ़ दाल की विफलता को दर्शाने के लिए दुष्प्रचार किया जाता हो ? क्योंकि हमारे यहां कुछ भी असंभव नहीं है। याद आते है, अस्सी के दशक की गर्मियों के वे  दिन जब रेलवे स्टेशनों पर पानी की उपलब्धता जान-बूझ कर रोक दी जाती थी, जिससे प्यासे यात्रियों को मजबूरी में ऐसे-वैसे बोतलबंद ठंडे पेय को अनाप-शनाप कीमत चुकता कर खरीदना पड़ता था !!! 

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