रविवार, 17 अप्रैल 2016

क्या पानी साफ़ करने की आर.ओ. तकनीकी पूर्णतया सुरक्षित है ?

कई ऐसी बातें हैं जो हेमा, सचिन या फरहान नहीं बताते, जैसे इसका पानी बैक्टेरिया से पूर्णतया मुक्त नहीं होता। उनके सिस्ट (Cysts) पर मशीन का जोर नहीं चलता। यह विधि शुद्ध जल के साथ ही करीब उतना ही अशुद्ध जल भी उपलब्ध करवाती है, जिसका निस्तारण अपने आप में एक समस्या है। दूषित पानी पर खर्च होने वाली बिजली की खपत अपनी जगह है !  
     
जैसे-जैसे देश में पानी की किल्लत बढती जा रही है वैसे-वैसे पीने के पानी की शुद्धता का स्तर घटता जा रहा है, जिसका फ़ायदा सीधे-सीधे पानी का कारोबार करने वाली कंपनियों के खाते में जुड़ रहा है। इसीलिए पहले जहां इक्का-दुक्का नाम इस तरह के पानी में हाथ धोते थे वहीं अब पचासों लोग इस व्यापार से जुड़ नहा-धो रहे हैं। इनके तरह-तरह के दावे हैं, कोई कीटाणु-जीवाणु मुक्त पानी पेश करता है तो कोई भारी पानी को पीने लायक बनाने का दावा कर अपनी मशीन बेचने की कोशिश में लगा है तो कोई उसमें अपनी तरफ से लवण-विटामिन
मिला आपकी सेहत की फ़िक्र जता, प्रसिद्ध हस्तियों से अपनी सिफारिश करवाता नज़र आता है।

इसी कड़ी में पहले साधारण फ़िल्टर आए  फिर प्यूरीफायर, फिरआयोनाइजर, फिर आर.ओ., यू. वी., इन्फ्रारेड और ना जाने क्या-क्या, आज बाजार में जल-जनित बीमारियों का डर दिखा-दिखा कर लोगों की जेबें ढीली करवा रहीं हैं। जब से क्रिकेट की नौटंकी ने मीडिया के पल-छिन पर अपना साया डाला है तबसे लोगों के सामने आर.ओ. पानी और उभर कर सामने आया है। आर.ओ. यानि रिवर्स ओसमोसिस विधि द्वारा शुद्ध किया गया पानी। ऐसी मशीने बनाने वाली कंपनियां फ़िल्मी और खेल जगत की दिग्गज हस्तियों से अपने द्वारा शुद्धतम जल की उपलब्धता का प्रचार करवा आम-जन को आकर्षित कर अपना उत्पाद बेचने में दिन-रात एक किए हुए हैं। साधारणतया आम इंसान को जल-शोधन की पूरी जानकारी नहीं होती, उसे चिंता होती है अपने परिवार की सेहत की इसीलिए वह बेचने वाले चेहरे पर विश्वास कर कोई भी मशीन घर उठा लाता है, बिना यह जांचे-परखे कि उसके घर आने वाले पानी को आर.ओ. मशीन की जरूरत है भी कि नहीं। ऐसे पानी की आदत पड जाने पर बाहर का कोई दूसरा पानी सेहत पर विपरीत असर भी डाल सकता है। 

दूसरी अहम बात है कि अब तो वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि आर.ओ. विधि का अनियंत्रित प्रयोग सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। क्योंकि इस विधि से पानी साफ़ करने पर उसका करीब 40 प्रतिशत पानी दूषित हो बेकार हो जाता है। जो अपने विषाक्त पदार्थों के साथ फिर वापस धरती में जा उसे प्रदूषित कर देता है। इसके साथ ही और भी कई वजहें हैं जो हेमा, सचिन या फरहान नहीं बताते, जैसे इसका पानी बैक्टेरिया से पूर्णतया मुक्त नहीं होता। उनके सिस्ट (Cysts) पर मशीन का जोर नहीं चलता। यह विधि शुद्ध जल के साथ ही करीब उतना ही अशुद्ध जल भी उपलब्ध करवाती है। जिसका निस्तारण अपने आप में एक समस्या है। दूषित पानी पर खर्च होने वाली बिजली की खपत अपनी जगह है। यदि बिना किसी परेशानी के साफ़ पानी उपलब्ध हो तो उस यंत्र की कीमत को नज़रंदाज किया जा सकता है पर इसकी कीमत अलग से जेब पर भारी पड़ती ही है। इन सब के बावजूद इसकी तकनीक में यदि कोई खराबी आ जाए तो वह उपभोक्ता को जल्द पता भी नहीं चलती। 

ऐसा नहीं है कि इस तकनीक में सब बुरा ही बुरा है। इसके द्वारा  भारी पानी को पीने योग्य बनाया जा सकता है। यह लेड, पारा, क्लोरीन जैसी अशुद्धियों को दूर करने में सक्षम है। इसके साथ ही सूक्ष्म पैरासाइट को भी ख़त्म करने की क्षमता रखता है। इसलिए घर पर आने वाले पानी और अपनी जरूरतों को पूरी तरह समझ कर ही किसी जल-शोधक को अपनाना चाहिए।     

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

तोला-माशा-रत्ती की "रत्ती"

यह लता जैसे पौधे के सेम रूपी फल के बीज होते हैं। प्रकृति का चमत्कार है कि इसके सारे बीजों का आकार और वजन एक समान, करीब 0.12125 ग्राम, होता है। हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने इसकी खासियत को पहचाना और इसे तौल के माप के रूप में अपना लिया था...... 

आज सुबह-सुबह मेरी छोटी भतीजी, ख़ुशी को उसकी दादी से किसी बात पर मीठी फटकार पड़ गयी कि, तुझे रत्ती भर अक्ल नहीं है ! उसी समय ख़ुशी मेरे पास आई और पूछने लगी, बड़े पापा यह रत्ती क्या होता है ?  मैंने पूछा, तुमने कहां सुन लिया ? वह बोली, दादी से। मैंने कहा यह एक पेड़ का बीज होता है, कुछ सालों पहले तक जब मीट्रिक प्रणाली नहीं आई थी तब सोना-चांदी जैसी कीमती धातुओं को तौलने का सबसे छोटा माप हुआ मैंने ख़ुशी को अपने पास बैठाया और पूछा कि क्या तुम सचमुच रत्ती वगैरह के बारे में जानना चाहती हो ? उसके हाँ कहने पर मैंने उसे विस्तार से बताना शुरू किया। 
रत्ती के बीज 
आज की युवा पीढ़ी को इन सब के बारे में कोई जानकारी नहीं है। तोला तो फिर भी कभी-कभार सुनाई दे जाता है पर माशा और रत्ती के बारे में तो शायद ही इन्होंने सुना होगा। 
करता था। ख़ुशी की आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं, बोली बीजों से सोना तौलते थे ? उसकी बातें सुन मुझे एहसास हुआ कि 

रत्ती गहने आदि तौलने का हमारे देश में सबसे छोटा माप हुआ करता था। यह लता जैसे पौधे के सेम रूपी फल के बीज होते हैं। प्रकृति का चमत्कार है कि इसके सारे बीजों का आकार और वजन एक समान, करीब 0.12125 ग्राम, होता है। इनका आयुर्वेद में दवा के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने इसकी खासियत को पहचाना और इसे तौल के माप के रूप में अपना लिया था। उन्होंने आम आदमी की सहूलियत के लिए इन्हीं के सहारे तौल का एक ढांचा खड़ा किया था। जिसके अनुसार -                  

8 रत्ती = 1 माशा, 
12 माशा = 1 तोला, जो आज के 11.67 ग्राम के करीब होता है। 
80 तोले = 1 सेर और 
40 सेर का एक मन हुआ करता था। जो आज के 37. 3242 कीलो के बराबर का भार था। 
पर आजकल सोने के वजन के लिए अत्याधुनिक कंप्यूटरीकृत प्रणाली आ चुकी है और पुराने समय
रत्ती का पौधा 
के सभी माप-तौल बंद हो चुके हैं।
 यह समझ लो कि जैसे पहले दूध "सेर" के हिसाब से मिलता था और अब "लीटर" में, कपडे इत्यादि पहले "गज" से नापे जाते थे अब "मीटर" के हिसाब से मिलते हैं वैसे ही "पॉव और सेर" अब ग्राम और कीलो में बदल गए हैं। इससे गणना में थोड़ी सहूलियत भी हो गयी है। 
फिर ख़ुशी से पूछा, कुछ समझ आया ? तो उसने हां रुपी सर हिलाया और बोली कल स्कूल में अपनी फ्रेंड्स की क्लास लूंगी। मैंने कहा वह सब ठीक है, ज्यादा सर खपाने की जरुरत नहीं है पर सामान्य ज्ञान के नाते यह सब मालुम हो तो अच्छी बात है।       

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

फिर एक बार सालासर बालाजी यात्रा

माँ अंजनी 
कुछ पर्यटन स्थल या धार्मिक स्थल ऐसे होते हैं जहां बार-बार जाने  के बाद भी वहां फिर से जाने की इच्छा बनी ही रहती है। ऐसा ही एक स्थान है राजस्थान के चुरू जिले के सुजानगढ़ कस्बे से करीब 26-27 की. मी. की दूरी पर स्थित सुप्रसिद्ध सालासर बालाजी धाम, जो नेशनल हाईवे 65 पर पड़ता है। यहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है। चैत्र और आश्विन पूर्णिमा के समय यहां मेला भरता है जब लाखों लोग अपनी आस्था और भक्ति के साथ यहां आकर हनुमान जी के दर्शन का पुण्य लाभ उठाते हैं। यहां जाने पर एक अलौकिक शांति का अनुभव निश्चित तौर पर होता है। 

सालासर धाम की यात्रा के दौरान दो और धार्मिक स्थलों के दर्शन का सुयोग मिलता है, वह हैं झुंझनू में स्थित रानी सती मंदिर और दूसरा सीकर जिले के खाटू कस्बे में स्थित खाटू श्याम धाम। इसे त्रिकोणी धाम यात्रा भी कहा जाता है। यात्रा के आयोजक या खुद पर्यटक अपना कार्यक्रम इन तीनों जगहों को ध्यान  में रख कर ही बनाते हैं। पर कहते हैं ना कि 'तेरे मन कुछ और है, कर्ता के कुछ और', तो होता वही है जो प्रभू की इच्छा होती है। इस बार हम पांचों के सहयात्री सपत्नीक राजीव जी अपने दोनों बच्चों के साथ थे।पर चाह कर भी समय की पाबंदी के कारण शुक्रवार संध्या चार बजे के पहले निकलना संभव नहीं हो पाया। गाडी ZYLO और चालक संतोष, दो साल पहले की यात्रा वाले सहायक ही थे। पुराने अनुभवों के आधार पर रोहतक-भिवानी-लोहारू-झुंझनु वाला मार्ग ही अपनाया गया। ठहरने के लिए, मंदिर से कुछ दूर होने के बावजूद,  उसी चमेली देवी धर्मशाला को चुना गया
बालाजी महाराज 
जिसने पिछली यात्रा पर बहुत ज्यादा भीड़-भाड़ के बावजूद हमारे रहने  इंतजाम कर दिया था। वैसे भी साफ़-सफाई, भोजन का स्तर और अन्य सुविधाओं को मद्दे नजर रख उसे ही पड़ाव के लिए फिर चुना गया।  वैसे भी जगह जानी-पहचानी थी कहीं और भटकने का मतलब भी नहीं था। रास्ते में ज्यादा न रुकने  के बावजूद 'चेक इन' रात 11.40
 पर ही संभव हो पाया। वहां रात दस बजे तक ही भोजन की व्यवस्था रहती है इसीलिए उदर-पूर्ती का  थोड़ा-बहुत इंतजाम कर रखा गया था। फिर भी बिस्तर पर जाते-जाते 12.30 बज ही गए थे।
सुबह मुझे, अभय, अलका जी और दोनों बच्चों को छोड़ सारे जनों ने सुबह छह बजे की आरती का पुण्यलाभ लिया। दोबारा सब जने फिर 10.30 बजे दर्शन हेतु मंदिर जा डेढ़-दो घंटे में वापस आ गए थे। अप्रैल शुरू होते ही इस बार गर्मी ने भी दस्तक दे दी है। इसलिए फिर कहीं जाने की हिम्मत नहीं पड़ी। कमरे की ठंडक में तीन-चार घंटे गुजारने के बाद अपरान्ह साढ़े चार के करीब सुजान गढ़ के करीब डूंगर बालाजी के दर्शन हेतु बाहर निकले, जिसकी सालासर से दूरी करीब चालीस की. मी. की है। लौटते हुए माँ अंजनी देवी के दर्शन कर करीब साढ़े आठ बजे वापस पड़ाव पर आ गए आ गए। भोजनोपरांत जिन्होंने 
सुबह की आरती में भाग नहीं लिया था उन्होंने रात दस बजे की आरती में दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और प्रभु से फिर सकुटुंब आने की हिम्मत और अवसर उपलब्ध करवाने की याचना कर वापसी की अनुमति प्राप्त की।

वापसी में खाटू श्याम जी के दर्शन हेतु जब करीब बारह बजे खाटू पहुंचे तो वहां हज़ारों लोगों को दर्शन हेतु पहले से खड़ा पाया। रविवार का दिन था सो भीड़ पुण्यलाभ के लिए उमड़ी पड़ी थी। दर्शन के लिए कम से कम तीन चार घंटे का समय मामूली बात लग रही थी सो प्रभु से आज्ञा ले वापस दिल्ली की तरफ गाडी का रुख कर दिया और साढ़े सात बजे शाम को शाम घर का दरवाजा खुल चुका था। या सालासर महाराज के दर्शन हेतु मेरी चौथी यात्रा थी।

गुरुवार, 31 मार्च 2016

होली और सिन्थॉल साबुन

 तभी मैंने एक धमाका सा कर दिया यह कह कर कि मेरे चाचाजी एक ऐसा साबुन लाए हैं मेरे लिए, जो कितना भी गहरा रंग हो उसे मिनटों में छुड़वा सकता है, इतना कह मैंने सिन्थॉल की एक टिकिया उनके सामने रख दी। सब उसे उठा, देख, सूंघ कर ऐसे हैरत में पड़े थे जैसे वह साबुन न हो कोई जादू की टिकिया हो पर खुश भी हो रहे थे उन सब को पता था कि उस सारे साजो-सामान का मैं अकेला नहीं, वे सब भी भरपूर उपयोग करने वाले थे ...... 



कई बार बेहद पुरानी यादें भी ताजा होकर दिलो-दिमाग को गुदगुदा जाती हैं। जिससे बरबस चेहरे पर मुस्कान खिंच जाती है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब नहाने के वक्त साबुन की नई बट्टी के "रैपर" को खोला, वर्षों पहले की एक घटना जीवंत हो उठी। वह भी शायद इस कारण कि अभी-अभी होली हो कर गुजरी है। वैसे तो नहाने के साबुन पर मेरे यहां प्रयोग चलते रहते हैं। नए-पुराने, देश-विदेश के उत्पादों उनके दावों, खासियतों को परखा जाता रहता है। पर घूम-फिर कर गोदरेज कंपनी के "सिन्थॉल" पर ही हम आ टिकते हैं।       वह भी सबसे
तब 
पहले वाले हरे रंग और लाल कवर वाले उत्पाद पर। जिस पर आजकल "original" लिखा रहता है। 

बात तब की है जब मेरे लिए नन्हें-मुन्ने का संबोधन एक साथ न होकर अलग-अलग होने लगा था। हमलोग तबके कलकत्ता के नजदीक कोन्नगर में रहा करते थे।  होली के एक-दो दिन पहले मेरे चाचा जी तरह-तरह के तोहफों के साथ वहीँ आ गए थे। उन दिनों सारे परिवार में मैं ही अकेला बच्चा था, सो अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। तो मैं उनकी गोद में बैठा सब कुछ खोल-खोल के देख रहा था। तभी एक पैकेट से छह सिन्थॉल साबुन की बट्टियां भी निकलीं। उस समय तो इतना पता नहीं था पर बाद में जाना था कि गोदरेज ने जो अपना नया साबुन निकाला था ये वही था। पर अपन को इस सब की जानकारी से क्या लेना-देना था ! हमें तो यही लग रहा था कि होली है, उसके लिए ख़ास साबुन होगा रंग उतारने वाला। यही सोच हमने तो अपना सामान उठाया जिसमें वह साबुन भी था और चल दिए दोस्तों में रुआब गांठने। मित्र-मंडली मेरी पिचकारी, तरह-तरह के गीले-सूखे रंग, गुलाल इत्यादि देख-परख कर खुश हो रही थी।
अब 
क्योंकि उन सब को पता था कि उस सारे साजो-सामान का मैं अकेला नहीं, वे सब भी भरपूर उपयोग करने वाले थे। उन दिनों जब तक आपस में कुछ अनबन ना हो जाए सब कुछ सबका साझा ही रहता था और अनबन होती भी कितने समय के लिए थी !  तभी हमने एक धमाका कर दिया यह कह कर कि मेरे चाचाजी एक ऐसा साबुन लाए हैं मेरे लिए, जो कितना भी गहरा रंग हो उसे मिनटों में छुड़वा सकता है, इतना कह मैंने सिन्थॉल की एक टिकिया उनके सामने रख दी। सब उसे उठा, देख, सूंघ कर ऐसे हैरत में पड़े थे जैसे वह साबुन न हो कोई जादू की टिकिया हो। सच कहूं तो अपन भी उस समय यही समझ रहे थे कि होली पर ऐसे साबुन के लाने का एक ही मतलब हो सकता है जो हम समझ और समझा रहे थे। 

आज भी जब वह वाकया याद आता है तो अपनी समझ और दोस्तों के भोलेपन को याद कर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। कैसे निश्छल मन हुआ करते थे। कैसा अपनत्व हुआ करता था। दोस्त-मित्र भाइयों की तरह होते थे, कुछ तेरा-मेरा नहीं हुआ करता था।  पर मन उदास भी हो जाता है आज और उस समय की तुलना कर !   

मंगलवार, 22 मार्च 2016

हुड़दंगी हम, जब पुते पेंट से........ बचपन की होली की यादें

अब अपन राम, लिपे -पुते, पिचकारी घसीटते हुए पंचम सुर में गला फाड़ते  घर की ओर जो उन्मुख हुए तो उस सौ गजी फासले में जो भी हमें देखता हंसे बिना नहीं रह पाता। इससे हमारा दुःख और भी कई गुना बढ़ जाता था। मेरे क्रंदन की आवाज सुनते ही शिव, जो घर में काम करता था, दौड़ा हुआ आया और कुछ समझते ना समझते मुझे माँ के हवाले कर दिया........  
     
इंसान की बढती उम्र के साथ उसके दिमाग के बैंक के खाते में उसकी यादों रूपी धन की सदा बढ़ोत्तरी होती रहती है। जिस तरह जमा धन वक्त-बेवक्त काम आता है वैसे ही यादों की पूंजी मौका ए वक्त पर कभी-कभी दिल को सकून दे जाती है। कुछ यादों की तासीर आंवले की तरह होती है, जो उस समय तो कड़वी लगती है पर बाद में उसी में मिठास मिलने लगती है। जब भी कोई त्यौहार वगैरह आता है तो यही संचित यादें इंसान को वर्षों पीछे साथ ले जाती हैं। अब होली ने जैसे ही द्वार खटखटाया, यादों ने भी दिलो-दिमाग की खिड़कियां खोल दीं अतीत में झांकने के लिए।    
                    
वैसे तो होली के रंगों से परहेज किए क्यों, कैसे और कितने वर्ष बीत गए, याद नहीं पड़ता। पर उसकी बचपन की 
यादें अभी भी चेहरे पर मुस्कराहट लाने से बाज नहीं आतीं। ख़ास कर दो घटनाएं, जिन्हें घटे कम से कम आधी सदी बीत चुकी होगी पर फिर भी वे कल ही की घटी लगती हैं। उन दिनों कलकत्ते के पास कोननगर की लक्ष्मी नारायण जूट मील में बाबूजी कार्यरत थे। ऊंचा पद और रुतबा था। घर में एकलौता बालक, मैं। वैसे भी मील के स्टाफ में पांच-सात बच्चे ही थे। सभी की नज़र-ए-इनायत मुझ पर रहती थी। हुड़दंगी होना तो बनता ही था। सब का चहेता, जिसकी फूँक सिर्फ बाबूजी के सामने सरकती थी। 

उन दिनों दिवाली से ज्यादा होली के त्यौहार का बेसब्री से इंतजार  रहता था। मुझे अभी भी अपनी बड़ी वाली पीतल की पिचकारी की याद है जो जिद कर के ली थी। हालांकि भरने और चलाने में बहुत जोर लगाना   
पड़ता था। कभी-कभी तो मूँठ को जमीन पर टिका नली को दोनों हाथों से पकड़, शरीर का पूरा वजन डालना पड़ जाता था। होली के दो तीन दिन पहले से ही बाल्टी, पानी और पिचकारी मेरे दिन भर के साथी बन जाते थे। बंगले और मील को जाने वाले रास्ते  के बीच एक छड़ों वाला भारी-भरकम गेट था। उसी के एक तरफ मेरा मोर्चा जमा करता था। मील की पारी बदलने के वक्त उधर से गुजरने वाले मजदूरों के जत्थे ही मेरी पिचकारी का निशाना बनते थे। अधिकांश हँसते, बचते, भाग लेते थे। पानी होता ही कितना था ! पर कोई-कोई प्यार से ही समझाने की कोशिश कर कहता था, बाबा (बच्चे के लिए संबोधन) हम लोग नहीं खेलता। हम पर  रंग मत डालो। उस समय कहां जाति-धर्म का ज्ञान था, कहां इतनी समझ थी कि कोई क्यों होली नहीं खेलता ? लगता था कि पानी से बचने का बहाना कर रहा है। पर एक दो बार ध्यान आया कि जिनके लम्बी सी दाढ़ी होती है वही मना करते हैं। हालांकि  उनकी मनाही में भी गुस्सा या आक्रोश नहीं होता था। पर क्यों करते हैं यह समझ के परे ही रहता था। आज के माहौल में तो कोई वैसा सोच भी सकता है क्या ?      

दूसरी घटना जब भी याद आती है तो बेसाख्ता हंसी छूट जाती है। होली के ही दिन थे। शिकार तो मील की पारी बदलने पर ही मिलते थे। बाकी समय उनको तलाशना पड़ता था। सो एक दिन इसी तलाश में मील के औजार घर पहुँच गया, अपनी पिचकारी ले कर। एक बार, दो बार, तीन बार, प्यार से, बाबूजी का डर दिखा, सामान खराब होने की बात समझा, जब किसी भी बात का असर नहीं हुआ इस आफत की पोटली पर, तो कुछ तो सबक सिखाना ही था सो दो जनों ने मुझे पकड़ा और एक ने सफ़ेद ऑयल पेंट से मेरी बाहें और लातों को पोत दिया और चेहरे पर भी तिलक सा लगा छोड़ दिया। अब अपन राम, लिपे-पुते, पिचकारी घसीटते हुए पंचम सुर में गला फाड़ते  घर की ओर जो उन्मुख हुए तो उस सौ गजी फासले में जो भी हमें देखता हंसे बिना नहीं रह पाता। इससे हमारा दुःख और भी कई गुना बढ़ जाता था। मेरे क्रंदन की            
आवाज सुनते ही शिव, जो घर में काम करता था, दौड़ा हुआ आया और कुछ समझते ना समझते मुझे माँ के हवाले कर दिया। फिर जो धुलाई शुरू हुई, शायद घंटे से ऊपर ही कार्यक्रम चला होगा, तो होती ही चली गयी। माँ को यह चिंता थी कि बाबूजी के घर आने के पहले हालत काबू में आ जाए नहीं तो आज छितरैल पक्की है। जैसे-तैसे मुझे दुरुस्त किया गया।  पर मजाल है, माँ ने किसी को कुछ कहा हो या किसी की शिकायत की हो ! सब छोटे-बड़े अपने ही तो हुआ करते थे। कुछ भी होता था तो पहले अपने बच्चे या खुद की गलती देखी जाती थी। आज कोई बाहर वाला छोड़िए, घर का रिश्तेदार ही किसी के बच्चे को कुछ कहने की हिम्मत नहीं रखता।  

सोमवार, 21 मार्च 2016

होली, वैसी हुआ करती थी !

डफ वादक और मंडली फाग गाते हुए, घर-घर जा यथायोग्य अभिवादन कर, रंग लगा, लगवा कर एक दो-तल वाली इमारत के दालान में इकट्ठा हो, अपने पूरे रंग में आ जाते थे। वहां इमारत के ऊपर के दोनों तल भरे रहते थे, बच्चों और महिलाओं से, जो अपने-अपने हथियारों के साथ लैस हो अनवरत उन पर रंगों की बरसात बदस्तूर जारी किए रहते थे। आज आश्चर्य होता है कैसे कलाकार थे वे, जो पानी की बेढब और तीखी बौछारों के बीच भी गायन का न सुर टूटने देते थे नाहीं ताल। डफ को पानी से बचाना एक अलग कलाकारी होती थी क्योंकि ज़रा सा पानी पड़ते ही उस पर मढा चमड़ा अपनी रंगत खो बेसुरा हो बैठता था....... 

प्रकृति जब अपने पूरे तरुणाई के साथ पृथ्वी पर छा जाती है तभी बसंत का आगमन होता है जो अपने चरम पर
हमें देता है होली का तोहफा। अपने यहां त्यौहार ढेरों हैं। सबकी अपनी खासियत भी है। पर इसकी खुमारी ही कुछ अलग है। ऐसी मस्ती, ऐसा बिंदासपन, ऐसी हुल्लड़ता, ऐसा बिल्लौसपन और किसी भी उत्सव में नहीं पाया जाता, जिसमें समाज की तरफ से भी रोक-टोक में ढील दे दी जाती हो। यही एक ऐसा त्यौहार है जिसमें नए कपड़ों, नए जूतों या अन्य किसी नवीन चीज की जरुरत हौसला पस्त नहीं करती। होने वाला खर्च डराता नहीं है। उल्टे पुराने कपड़ों-चप्पलों की बन आती है। हर बंदा-बंदी डम्प कर दिए गए, नकार दिए गए पुराने  कपड़ों में से इस दिन
 पहना जा सकने वाला वस्त्र खोजने लगता है। यही एक ऐसा उत्सव है जिसमें सच्चा समाजवाद झलकता है। ना कोई बड़ा ना कोई छोटा, ना कोई अमीर ना कोई गरीब, ना कोई खरा ना कोई खोटा, सब बराबर।

अपने बचपन के समय की होली की बहुत याद आती है। कलकत्ता के पास कोननगर में स्थित थी, लक्ष्मीनारायण जूट मील, जहां बाबूजी कार्यरत थे। स्टाफ में मारवाड़ी समाज की बहुलता थी, तो होली भी राजस्थानी रंग-ढंग से ही मनाई जाती थी। हफ्ते भर पहले से तैयारियां शुरू हो जाती थीं होली के स्वागत की। नयी चंग या डफ लायी जाती थी उसका तरह-तरह से परिक्षण कर तैयार किया जाता था। इतने सारे परिवारों के लिए ठंडाई, गुझिया, मिठाई, नमकीन इत्यादि का पर्याप्त मात्रा में इंतजाम किया जाता था। रंग तो फैक्ट्री में उपलब्ध होते थे पर व्यक्तिगत पिचकारियों की खरीद उनका रख-रखाव एक अलग काम हुआ करता था। उन दिनों प्लास्टिक का चलन नहीं था। पिचकारियां, पिचकारियों की तरह होती थीं। लोहे या पीतल की, तीन आकारों में छोटी,
मध्यम और बड़ी। उनमें दो तरह के "अड्जस्टमेंट" हुआ करते थे। एक फौव्वारे की तरह रंग फेंकता था, जिसकी दूरी के हिसाब से क्षमता कम होती थी। दूसरा एक धार वाला, जो कम से कम दस-बारह फुट तक पानी फेंक किसी को भिगो सकता था।

मील तो चौबीसों घंटे चलती थी। छुट्टी भी सिर्फ होली वाले दिन ही होती थी। इसलिए ड्यूटी के हिसाब से सारे कामों को अंजाम दिया जाता था। हफ्ते-दस दिन पहले से रात को डफ पर थपकियां पड़नी शुरू हो जाती थीं। "सर्रा-रा-रा"  की गूंज देर रात तक मस्ती बरसाती रहती थी। वैसे असली फाग गायन हम बच्चों के सो जाने के बाद ही शुरू होता था। होली वाले दिन स्टाफ के युवा टोली बना मील-परिसर में चक्कर लगाना शुरू करते थे। आगे-आगे डफ वादक अपनी मीठी तान में फाग गाते हुए चला करता था, पीछे पूरी टोली सुर में सुर मिलाती  चलती थी। घर-घर जा यथायोग्य अभिवादन कर, रंग लगा, लगवा कर एक दो-तल वाली इमारत के दालान में इकट्ठा हो, सब अपने पूरे रंग में आ जाते थे। ना कीचड़ या ग्रीस, ना कपड़ा फाडू
हुड़दंग। एक शालीनता तारी रहती थी पूरे माहौल में। वहां इमारत के ऊपर के दोनों तल भरे रहते थे, बच्चों और महिलाओं से, जो अपने-अपने हथियारों के साथ लैस हो अनवरत उन पर रंगों की बरसात बदस्तूर जारी किए
रहते थे। आज आश्चर्य होता है कैसे कलाकार थे वे, जो पानी की बेढब और तीखी बौछारों के बीच भी गायन का न सुर टूटने देते थे नाहीं ताल। डफ को पानी से बचाना एक अलग कलाकारी होती थी क्योंकि ज़रा सा पानी पड़ते ही उस पर मढा चमड़ा अपनी रंगत खो बेसुरा हो बैठता था।

घंटों चलने वाले इन सब कार्यक्रमों के बाद संध्या समय होता था प्रीतिभोज का। खाना-पीना मौज -मस्ती, गाना-बजाना या फिर मैदान में पर्दा लगा प्रोजेक्टर के माध्यम से किसी फिल्म का शो। पर उस शाम का मुख्य आकर्षण होती थी ठंडाई जो वहीँ तैयार की जाती थी। जिसका स्वाद आज तक नहीं भुलाया जा सका है।  उसके भी दो वर्ग हुआ करते थे, बच्चों और महिलाओं के लिए सादी और पुरुषों के लिए "बूटी" वाली। वहां का सारा
स्टाफ एक परिवार की तरह था। बड़े-छोटे का लिहाज, बड़ों के प्रति आदर-सम्मान तथा अनुशासन इतना कि मजाल है किसी बच्चे ने कभी आँख उठा कर भांग वाले पेय को देखा भी हो उधर युवा भी अपने से बड़ों का लिहाज कर ही उसका सेवन करते थे। जिस पर शिव जी की कृपा कुछ ज्यादा होने लगती वह चुपचाप वहां से खिसक लेता था। ना कभी हुड़दंग देखा सुना गया न ही कभी किसी गलत हरकत उभरने दिया गया।

कैसे थे वे दिन और कैसे थे वे लोग !!!             

शनिवार, 19 मार्च 2016

विद्या ददाति विनयम ???

आज शिक्षण एक व्यवसाय है जहां ज्ञान नहीं, "सूचनाओं" की जानकारी दे बच्चों को मशीनों की तरह परीक्षाओं के लिए तैयार कर उन्हें एक चलता फिरता सूचना संग्रहालय बनाया जाने लगा है। जाहिर है ऐसी उपाधियां नौकरी तो दिला सकती हैं ज्ञान नहीं ! इसीलिए ऐसी शिक्षा में विवेक का अभाव रहता है जिससे विनय के स्थान पर अहंकार की उत्पत्ति होती है। ऐसे तथाकथित विद्वानों में विनय की आशा करना ही बेमानी है।  इनकी तुलना उन पेड़ों से की जा सकती है जिनमें फल नहीं लगते और पेड़ वही झुकता है जिसमें फल लगते हैं .......  

एक बहुत लोकप्रिय सूक्ति है -
"विद्या ददाति विनयम - विनयाद याति पात्रताम | पात्रत्वाद धनमाप्नोती - धनाद धर्मस्तत: सुखं" 
यानी विद्या से विनम्रता, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन और धन से धर्म और सुख की प्राप्ति होती है।


इस सूक्ति को आजकल कई विद्यालयों-महाविद्यालयों ने अपना आदर्श वाक्य बना दिवालों पर चस्पा तो कर रखा है पर उसपर आचरण कम, दिखावा ज्यादा होता है। क्योंकि जब इस सूक्ति का आभिर्भाव हुआ था, तब और आज की विद्या में आमूलचूल यानी जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। तब गुरु को भगवान से भी ऊँचा स्थान प्राप्त था। वह पूजनीय शख्शियत हुआ करता था तथा अपने शिष्यों और समाज के प्रति पूरी तरह समर्पित हो निष्काम भाव से अपना पूरा ज्ञान सौंप दिया करता था। उनका मुख्य ध्येय ही होता था शिक्षित, ज्ञानवान पीढ़ी का निर्माण। उस समय विद्या और शिक्षा का तकरीबन एक ही मतलब होता था। आज स्थिति पूर्णतया बदल चुकी है। शिक्षा और विद्या पर भी, "जैसा बोओगे वैसा काटोगे, बोया बीज बबूल का तो आम कहां से होय", जैसी कहावतें चरितार्थ होने लगी हैं।   


आज शिष्यों का मूल उद्देश्य केवल पढ़ लेना, या यूं कहिए कि रट लेना, परीक्षा देना और पास होना ही रह गया है। डिग्री-धारी का ठप्पा लग जाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाने लगा है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी या आजीविका का अर्जन हो कर रह गया है जबकि विद्या से मनुष्य को ज्ञान मिलता है। आज के शिक्षक भी यह समझते हैं। इसीलिए विद्यालय दुकानें बन गए हैं और शिक्षण एक व्यवसाय और वह भी ऐसा-वैसा व्यवसाय नहीं बल्कि जिसने अब देश के कई राज्यों की अर्थ-व्यवस्था को अपने ऊपर निर्भर करवा लिया है, जहां जिसे ज्ञान कह कर बेचा जा रहा है, वह केवल सूचना है | मशीनों की तरह बच्चों को परीक्षाओं के लिए तैयार कर उन्हें एक चलता फिरता सूचना संग्रहालय बनाया जाने लगा है। इस अंधी प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ में अभिभावक भी पैसा फेंकते जाओ और तरह-तरह की उपाधियां हासिल करते जाओ, जैसी होड़ में मजबूरन शामिल हैं। जाहिर है ऐसी उपाधियां नौकरी तो दिला सकती हैं, ज्ञान नहीं ! इसीलिए ऐसी शिक्षा में विवेक का अभाव रहता है, जिससे विनय के स्थान पर अहंकार की उत्पत्ति होती है। साथ ही यह भी सच है कि ऐसे लोगों को धन तो प्राप्त हो जाता है पर ये लोग सदा अहंकार से ग्रसित रहते हैं। उनमें विनम्रता का सदा अभाव रहता है। इनकी तुलना उन पेड़ों से की जा सकती है जिनमें फल नहीं लगते और पेड़ वही झुकता है जिसमें फल लगते हैं। उसी तरह ऐसे तथाकथित विद्वानों में विनय की आशा करना ही बेमानी है। ऐसी विद्या विनय नहीं अहम को जन्म देती है। 

समाज के हर तबके में ऐसे लोगों की भरमार हो चली है। जिसका उदाहरण रोज ही देखने को मिल जाता है। एक बात जरूर है ऐसे लोग "समदर्शी" हो जाते हैं। अपने अहम के चश्मे के पीछे से इन्हें हर इंसान, जीव-जंतु, कीड़े-मकौड़े से नज़र आने लगते हैं। अपने लिए उठा ज़रा सा विरोध का स्वर इन्हें जहर लगने लगता है। हर प्राणी जो इनके रास्ते में आए या खिलाफत करे वह दुश्मन नज़र आने लगता है। सोचने की बात है कि, क्या हमारी शिक्षा प्रणाली में ही तो कोई ऐसी खामी नहीं पैठ गयी है, जिससे  संस्कारी, विचारवान, विवेकशील, सहनशील, परोपकारी, गुणवान, मानवतावादी इंसानों की खेप आनी ही बंद हो गयी है ?      

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