कई ऐसी बातें हैं जो हेमा, सचिन या फरहान नहीं बताते, जैसे इसका पानी बैक्टेरिया से पूर्णतया मुक्त नहीं होता। उनके सिस्ट (Cysts) पर मशीन का जोर नहीं चलता। यह विधि शुद्ध जल के साथ ही करीब उतना ही अशुद्ध जल भी उपलब्ध करवाती है, जिसका निस्तारण अपने आप में एक समस्या है। दूषित पानी पर खर्च होने वाली बिजली की खपत अपनी जगह है !
जैसे-जैसे देश में पानी की किल्लत बढती जा रही है वैसे-वैसे पीने के पानी की शुद्धता का स्तर घटता जा रहा है, जिसका फ़ायदा सीधे-सीधे पानी का कारोबार करने वाली कंपनियों के खाते में जुड़ रहा है। इसीलिए पहले जहां इक्का-दुक्का नाम इस तरह के पानी में हाथ धोते थे वहीं अब पचासों लोग इस व्यापार से जुड़ नहा-धो रहे हैं। इनके तरह-तरह के दावे हैं, कोई कीटाणु-जीवाणु मुक्त पानी पेश करता है तो कोई भारी पानी को पीने लायक बनाने का दावा कर अपनी मशीन बेचने की कोशिश में लगा है तो कोई उसमें अपनी तरफ से लवण-विटामिन
मिला आपकी सेहत की फ़िक्र जता, प्रसिद्ध हस्तियों से अपनी सिफारिश करवाता नज़र आता है।
इसी कड़ी में पहले साधारण फ़िल्टर आए फिर प्यूरीफायर, फिरआयोनाइजर, फिर आर.ओ., यू. वी., इन्फ्रारेड और ना जाने क्या-क्या, आज बाजार में जल-जनित बीमारियों का डर दिखा-दिखा कर लोगों की जेबें ढीली करवा रहीं हैं। जब से क्रिकेट की नौटंकी ने मीडिया के पल-छिन पर अपना साया डाला है तबसे लोगों के सामने आर.ओ. पानी और उभर कर सामने आया है। आर.ओ. यानि रिवर्स ओसमोसिस विधि द्वारा शुद्ध किया गया पानी। ऐसी मशीने बनाने वाली कंपनियां फ़िल्मी और खेल जगत की दिग्गज हस्तियों से अपने द्वारा शुद्धतम जल की उपलब्धता का प्रचार करवा आम-जन को आकर्षित कर अपना उत्पाद बेचने में दिन-रात एक किए हुए हैं। साधारणतया आम इंसान को जल-शोधन की पूरी जानकारी नहीं होती, उसे चिंता होती है अपने परिवार की सेहत की इसीलिए वह बेचने वाले चेहरे पर विश्वास कर कोई भी मशीन घर उठा लाता है, बिना यह जांचे-परखे कि उसके घर आने वाले पानी को आर.ओ. मशीन की जरूरत है भी कि नहीं। ऐसे पानी की आदत पड जाने पर बाहर का कोई दूसरा पानी सेहत पर विपरीत असर भी डाल सकता है।
दूसरी अहम बात है कि अब तो वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि आर.ओ. विधि का अनियंत्रित प्रयोग सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। क्योंकि इस विधि से पानी साफ़ करने पर उसका करीब 40 प्रतिशत पानी दूषित हो बेकार हो जाता है। जो अपने विषाक्त पदार्थों के साथ फिर वापस धरती में जा उसे प्रदूषित कर देता है। इसके साथ ही और भी कई वजहें हैं जो हेमा, सचिन या फरहान नहीं बताते, जैसे इसका पानी बैक्टेरिया से पूर्णतया मुक्त नहीं होता। उनके सिस्ट (Cysts) पर मशीन का जोर नहीं चलता। यह विधि शुद्ध जल के साथ ही करीब उतना ही अशुद्ध जल भी उपलब्ध करवाती है। जिसका निस्तारण अपने आप में एक समस्या है। दूषित पानी पर खर्च होने वाली बिजली की खपत अपनी जगह है। यदि बिना किसी परेशानी के साफ़ पानी उपलब्ध हो तो उस यंत्र की कीमत को नज़रंदाज किया जा सकता है पर इसकी कीमत अलग से जेब पर भारी पड़ती ही है। इन सब के बावजूद इसकी तकनीक में यदि कोई खराबी आ जाए तो वह उपभोक्ता को जल्द पता भी नहीं चलती।
ऐसा नहीं है कि इस तकनीक में सब बुरा ही बुरा है। इसके द्वारा भारी पानी को पीने योग्य बनाया जा सकता है। यह लेड, पारा, क्लोरीन जैसी अशुद्धियों को दूर करने में सक्षम है। इसके साथ ही सूक्ष्म पैरासाइट को भी ख़त्म करने की क्षमता रखता है। इसलिए घर पर आने वाले पानी और अपनी जरूरतों को पूरी तरह समझ कर ही किसी जल-शोधक को अपनाना चाहिए।














