शनिवार, 7 नवंबर 2015

वैसे लोगों को आजकल बेवकूफ समझा जाता है - 1

होश संभालने से लेकर किशोरावस्था का समय दिलो-दिमाग के परिपक्व होने का होता है। इस काल के दौरान घटी घटनाऐं या बातें ताउम्र के लिए अपनी छाप छोड़ जाती हैं। मेरे यादों के गलियारे की दीवारों पर टंगे फ्रेमों में लगीं कुछ तस्वीरें ऐसी हैं जो मुझे कभी नहीं भूलतीं। मैं उनके पदचिन्हों पर हूबहू ना भी चल पाया होऊं पर उनकी नैतिकता, उनके आदर्श, उनकी सच्चाई, उनका भोलापन, उनका ममत्व, उनकी निस्पृहता कभी भी मेरे मानस-पटल से ओझल नहीं हो पाते। 

इनमें सबसे ऊपर हैं मेरी दादीजी, लक्ष्मी देवी शर्मा।  एक आर्यसमाजी, सच्ची देश भक्त। कई बार जेल गयीं।उस समय हमारा परिवार कलकत्ता में रहा करता था। दादी जी के अक्सर जेल-प्रवास के दौरान बच्चों को तथा अपने कारोबार को संभालने की दोहरी जिम्मेदारी दादा जी बिना किसी शिकवे-शिकायत के संभाला करते थे। ऐसे ही एक दिन, जिसकी खासियत तो अब मुझे याद नहीं, बंगाली नेत्री 'आभा मायती' के साथ अलीपुर जेल में झंडोतोलन के समय सरकारी प्रतारणा के कारण आँखों पर लगी चोट ने धीरे-धीरे दादी जी की नेत्र-ज्योति भी छीन ली थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आभा जी तो देश की मंत्री भी बनीं। पर इनको कई बार लोगों के कहने-समझाने पर भी इन्होंने पेंशन या सरकारी आवास या ऐसी ही कोई सरकारी सहायता या किसी तरह का लाभ लेने की कोई कोशिश नहीं की। जैसा भी था, दुक्खम-सुक्खम अपनी जिंदगी काट ली। उनका एक ही कहना था कि हमने जो भी किया वह सिर्फ देश के लिए किया किसी लालच या सपने को ध्यान में रख नहीं किया। उनके इन आदर्शों का उनके बच्चों पर भी असर रहा। दादीजी के ममत्व का ही असर है कि आर्यसमाज में खण्डेलवाल परिवार की एक सदस्य उनकी मुंह बोली बहन बनीं।  कहाँ कलकत्ते का एक मारवाड़ी परिवार और कहाँ देश के दूसरे हिस्से के राज्य पंजाब का परिवार पर वह रिश्ता आज भी चार पीढ़ियों से निभता चला आ रहा है। 

ऐसे ही एक सज्जन जो मुझे कभी नहीं भूलते वे थे डागा जी। इसी नाम से उन्हें हर छोटा-बड़ा संबोधित करता था। मेरे बाबूजी कलकत्ते से रेल मार्ग से 35 की.मी. दूर जिस जूट मील में कार्यरत थे, वहीँ के वे चीफ एक्जिक्यूटिव थे। साठ के आस-पास की उम्र, प्रभावशाली व्यक्तित्व,  शांत-सौम्य स्वभाव पर रुआब ऐसा कि बिना उनकी आज्ञा के पत्ता भी इधर से उधर ना हो। मालिक, जो कलकत्ता में रहा करते थे वे भी उनसे पूछे बगैर कोई कदम नहीं उठाते थे। मील हालांकि जूट के उत्पाद बनाती थी पर उसकी कार्यक्षमता इतनी विशाल थी कि जरुरत का हर सामान वहाँ बनाया जा सकता था। वहाँ के 10-12 बड़े अफसरों को परिसर के अंदर ही निवास स्थान उपलब्ध होता था और ये सारे लोग एक परिवार की तरह ही रहते थे, कोई भेद-भाव नहीं था। उन फ्लैटों में अलग-अलग तरह का सुंदर, कलात्मक टीक की लकड़ी का कीमती फर्नीचर हुआ करता था। एक दिन डागा जी की पुत्र-वधु को हमारे यहां का कप-बोर्ड बहुत पसंद आया और उन्होंने अपने ससुर जी यानी डागा जी को पूछ लिया कि क्या वैसा ही कप-बोर्ड बनवा लें ? डागा जी ने उसी समय ड्रायवर को बुलाया उसको पैसे दे कलकत्ता भेज कर वैसी ही चीज खरीद कर लाने का हुक्म जारी कर दिया। चाहते तो वैसे दसियों कप-बोर्ड वे मील से ही मुफ्त में बनवा सकते थे।जबकी ऐसा करने का उनको हक़ और छूट दोनों थे बिना किसी जवाबदारी के। पर इसका उन्होंने कभी   अनुचित लाभ नहीं उठाया। 

कल अगली क़िस्त          

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

जो दिखता है, वही टिकता है

नाम और दाम पाने के लिए सर्वोच्च स्थान पर टिके रहना आवश्यक हो गया है और उसके लिए जरुरी है दिखते रहना यानी लोगों के जेहन में बने रहना। इसीलिए तो खुद ही लोग पहुँच जाते हैं, स्वरचित नाटक को दिखाने, जनता के सामने। इन्हें अच्छी तरह मालुम होता है कि मेरे ऐसा करने से क्या प्रतिक्रिया होने वाली है और उससे मुझे कितना फ़ायदा होने वाला है.............................. 

बाज़ार का मानना था कि आदमी की यादाश्त कमजोर होती है। इसके चलते उसने अपनी रणनीति में एक ब्रह्म-वाक्य जोड़ लिया कि जो दिखता है वही बिकता है। उसका आकलन सही भी था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 'निरमा' और 'मैगी' हैं जिन्होंने गुणवत्ता में अपने से कहीं ऊपर हिंदुस्तान लीवर के उत्पादों की बिक्री में सेंध लगा दी थी।  फिर टी. वी. के आने के बाद तो इस विधा में क्रांतिकारी परिवर्तन आ गया। बाजार ने चौबीसों घंटे आँख और कान के पास अपने ढोल बजा कर इंसान की बुद्धि ऐसी कुंद कर दी कि वह मंत्रमुग्ध सा उधर ही चल पड़ा जिधर बाज़ार के आका चाहते थे। 

इस करामात को देख समाज के कुछ चंट, चालाक, धूर्त, मौकापरस्त लोगों ने इस दिखने की ताकत को पहचान, उसे अपने फायदे के लिए अपनाने में देर नहीं की। उन्हें समझ आ गया कि यदि अपने क्षेत्र में बने रहना है, लोगों में अपनी पहचान बनाए रखनी है तो किसी भी तरह खबरों में बने रहना होगा। इस श्रेणी में हर वर्ग, हर क्षेत्र, हर तबके, हर दल के लोग शामिल हो गए और इसी के साथ ही शुरू हो गया बेहयाई का नंगा नाच। सारी तहजीब, सारी नैतिकता, लज्जा, संकोच, आदर-सम्मान सब को दरकिनार कर दिया गया। पद, मर्यादा, छोटे-बड़े किसी चीज का लिहाज नहीं बचा। बची तो सिर्फ अपनी मतलबपरस्ती। तभी तो ऐसे-ऐसे महानुभाव जिन्हें देश तो क्या उनके प्रदेश के लोग भी पूरी तरह नहीं जानते थे, जिनके लेखन को सिर्फ घरवाले ही जानते थे, जिनकी तथाकथित कला को उनके "फ्रेंड सर्कल" से बाहर शायद ही कोई भाव देता था,  वे भी आजकल छोटे पर्दे पर घंटों बैठे दिखने लग गए हैं। ऐसे लोग जहां भी ज़रा सी भी गुंजाइश पाते हैं, कवरेज पाने की तो मौका हाथ से जाने नहीं देते। इसके लिए अपशब्दों के प्रयोग में,  दूसरे की बखिया उधेडने में,  किसी की लानत-मलानत करने में, किसी के इतिहास-भूगोल खंगाल कर उसकी बदनामी करने में, अपनी खुद की ही ऐसी की तैसी करवा कर उसको मुद्दा बनाने में कोई गुरेज नहीं किया जाता। जाहिर है इनका एक ही मूल मंत्र है, बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ !! ऐसे "स्मार्ट" लोग जानते हैं कि करोड़ों की आबादी वाले इस देश में कुछ भी करो समर्थन मिल ही जाएगा। सौ-पचास लोग तो ऐसे ही पक्ष में आ खड़े होंगे। ऊपर से यदि किसी राजनैतिक दल से जुड़े होने का सौभाग्य प्राप्त है फिर तो इन्हें कुछ भी ऊल-जलूल बोलने और करने की स्वतंत्रता वैसे भी हासिल हो चुकी होती है। इन्हें रातों-रात शोहरत पाने के लिए सोची-समझी रणनीति के तहत सिर्फ विवादास्पद बयान जारी करना होता है।  उधर उनकी पार्टी और खबरचियों को एक लाइन लिखवानी पड़ती है कि ये श्रीमान अमुक के निजी विचार हैं।  मान लीजिए कुछ ज्यादा ही बखेड़ा खड़ा हो भी जाता है तो बड़े भोलेपन से दूसरे दिन यह भी कहा जा सकता है कि मेरे कथन को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है, मेरे कहने का मतलब कुछ और था।        

नाम और दाम ने अच्छाई और बुराई के अर्थ बदल दिए हैं। इन्हें पाने के लिए सर्वोच्च स्थान पर टिके रहना आवश्यक हो गया है और उसके लिए जरुरी है दिखते रहना यानी लोगों के जेहन में बने रहना। इसीलिए तो खुद ही लोग कीचड़ में लथ-पथ हो पहुँच जाते हैं और कई बार पहुंचवा दिए जाते हैं, स्वरचित नाटक को दिखाने, जनता के सामने। ऐसा नहीं है कि इन्हें अपनी करनी का इल्म नहीं होता या उसके अंजाम से ये लोग अनजान होते हैं। इन्हें अच्छी तरह मालुम होता है कि मेरे ऐसा करने से क्या प्रतिक्रिया होने वाली है और उससे मुझे कितना फ़ायदा होने वाला है और इस मौके को कब, कैसे और कहाँ भुनाना है। 

रविवार, 1 नवंबर 2015

मैं छत्तीसगढ हूं, मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर..............................

मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर प्रेम से भरे मेरे मन की यही इच्छा है कि मैं सारे देश में एक ऐसे आदर्श प्रदेश के रूप में जाना जाऊं,  जहां किसी के साथ भेद-भाव नहीं बरता जाता हो, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती हो, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का सदस्य समझें।  जहां कोई भूखा न सोता हो, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत सब को मुहैय्या हो। मेरा यह सपना दुर्लभ भी नहीं है। यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूंही उन्हें "छत्तीसगढिया सबले बढिया" का खिताब हासिल नहीं हुआ है .....................................

छत्तीस गढ़ 
मैं #छत्तीसगढ हूं। आज एक नवम्बर है, मेरी जन्मतिथि । आज सुबह से ही आपकी शुभकामनाएं, प्रेम भरे संदेश और भावनाओं से पगी बधाईयां पा कर अभिभूत हूं। मुझे याद रहे ना रहे पर आप सब को मेरा जन्म-दिन याद रहता है यह मेरा सौभाग्य है। किसी देश या राज्य के लिए पंद्रह साल समय का बहुत बड़ा काल-खंड नहीं होता। पर मुझे संवारने-संभालने, मेरे रख-रखाव, मुझे दिशा देने वालों ने इतने कम समय में ही मेरी पहचान देश ही नहीं विदेशों में भी बना कर एक मिसाल कायम कर दी है।

वन-संपदा, खनिज, धन-धान्य से परिपूर्ण मेरी रत्न-गर्भा धरती का इतिहास दक्षिण-कौशल के नाम से रामायण और महाभारत काल में भी जाना जाता रहा है। वैसे यहां एक लंबे समय तक   कल्चुरी राज्यवंश का आधिपत्य रहा है। पर मध्य प्रदेश परिवार से जुडे रहने के कारण मेरी स्वतंत्र छवि नहीं बन पाई थी और देश के दूसरे हिस्सों के लोग मेरे बारे में बहुत कम  जानकारी रखते थे।                                            
वास्तु कला का बेतरीन नमूना 
 जिसके कारण देश के विभिन्न हिस्सों में मेरे प्रति अभी भी कई तरह की भ्रांतियां पनपी हुई हैं। अभी भी लोग मुझे एक पिछडा प्रदेश और यहां के आदिवासियों के बारे में अधकचरी जानकारी रखते है। पर जब यहां से बाहर जाने वालों से या बाहर से यहां घूमने आने वाले लोगों को मुझे देखने-समझने का मौका मिलता है तो उनकी आंखें खुली की खुली रह जाती हैं।
रेलवे स्टेशन 
उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि किशोरावस्था के द्वार पर खड़ा मैं, इतने कम समय में, सीमित साधनों के और ढेरों अडचनों के बावजूद इतनी तरक्की कर पाया हूं। वे मुझे देश के सैंकडों शहरों से बीस पाते हैं। 

रायपुर हवाई अड्डा  
कईयों की जिज्ञासा होती है मेरी पहचान अभी सिर्फ पंद्रह सालों की है उसके पहले क्या था? कैसा था? तो उन सब को नम्रता पूर्वक यही कहना चाहता
हूं कि जैसा था वैसा हूं यहीं था यहीं हूं। फिर भी सभी की उत्सुकता शांत करने के लिए कुछ जानकारी बांट ही लेता हूं। सैंकडों सालों से मेरा विवरण इतिहास में मिलता रहा है। मुझे दक्षिणी कोसल के रूप में जाना जाता रहा है। रामायण काल में मैं माता कौशल्या की भूमि के रूप में ख्यात था। मेरा   परम सौभाग्य है कि मैं किसी भी तरह ही सही प्रभू राम के नाम से जुडा रह पाया। कालांतर से नाम बदलते रहे, अभी की वर्तमान संज्ञा "छत्तीसगढ" के बारे में विद्वानों की अलग-अलग राय है। कुछ लोग इसका कारण
उन 36 किलों को मानते हैं जो मेरे अलग-अलग हिस्सों में कभी रहे थे, पर आज उनके अवशेष नहीं मिलते। कुछ जानकारों का मानना है कि यह नाम कल्चुरी राजवंश के चेडीसगढ़ का ही अपभ्र्ंश है। 
भारतीय गणराज्य में 31 अक्टूबर 1999 तक मैं मध्य प्रदेश के ही एक हिस्से के रूप में जाना जाता था। पर अपने लोगों के हित में, उनके समग्र विकास हेतु मुझे  अलग राज्य का दर्जा प्राप्त हो गया।   इस मुद्दे पर मंथन
नगर निगम भवन 
तो 1970 से ही शुरु हो गया था, पर गंभीर रूप से इस पर विचार 1990 के दशक में ही शुरु हो पाया  जिसका प्रचार 1996 और 1998 के चुनावों में अपने शिखर पर रहा जिसके चलते अगस्त 2000 में मेरे निर्माण का रास्ता साफ हो सका। इस ऐतिहासिक घटना का सबसे उज्जवल पक्ष यह था कि इस मांग और निर्माण के तहत किसी भी प्रकार के दंगे-फसाद, विरोधी रैलियों या उपद्रव इत्यादि के लिए कोई जगह नहीं थी।हर काम शांति, सद्भावना, आपसी समझ और गौरव पूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। इसका सारा श्रेय यहां के अमन-पसंद,
भोले-भाले, शांति-प्रिय लोगों को जाता है जिन पर मुझे गर्व है। आज मेरे सारे कार्यों का संचालन मेरी राजधानी
क्रिकेट स्टेडियम 
'रायपुर' से संचालित होता है। समय के साथ इस शहर में तो बदलाव आया ही है पर राजधानी होने के कारण बढती लोगों की आवाजाही, नए कार्यालय, मंत्रिमंडलों के काम-काज की अधिकता इत्यादि को देखते हुए नए रायपुर का निर्माण भी शुरू हो चुका है, बन जाने के बाद यह देश के सबसे सुन्दर और अग्रणी  शहरों में शुमार हो जाएगा ।  चंडीगढ़ और भुवनेश्वर जैसे व्यवस्थित और पूरी तरह प्लान किए गए शहरों की तरह मुझे ढाला जा रहा है।   

मुझे कभी भी ना तो राजनीति से कोई खास लगाव रहा है नाहीं ऐसे दलों से। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ
सुंदर सपाट सड़कें 
और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है। कोई भी राजनीतिक दल आए, मेरी बागडोर किसी भी पार्टी के हाथ में हो उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, यहां बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर प्रेम भरे मेरे मन की यही इच्छा है  कि मैं सारे देश में एक ऐसे आदर्श प्रदेश के रूप में जाना जाऊं, जो देश के किसी भी कोने से आने वाले देशवासी का स्वागत खुले मन और बढे हाथों से करने को तत्पर रहता है। जहां किसी के साथ भेद-भाव नहीं
बरता जाता, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का समझ, हर समय, हर तरह की सहायता प्रदान करने को तत्पर रहते हैं। जहां कोई भूखा नहीं सोता, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत मुहैय्या करवाने में वहां के जन-प्रतिनिधि सदा तत्पर रहते हैं। मेरा यह सपना कोई बहुत दुर्लभ भी नहीं है क्योंकि यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूंही उन्हें "छत्तीसगढिया सबसे बढिया" का खिताब हासिल नहीं हुआ है।

मेरे साथ ही भारत में अन्य दो राज्यों, उत्तराखंड तथा झारखंड भी अस्तित्व में आए हैं और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं। मेरी तरफ से आप उनको भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करें, मुझे अच्छा लगेगा।  फिर एक बार आप सबको धन्यवाद देते हुए मेरी एक ही इच्छा है कि मेरे प्रदेश वासियों के साथ ही मेरे देशवासी भी असहिष्णुता छोड़ एक साथ प्रेम, प्यार और भाईचारे के साथ रहें।  हमारा देश उन्नति करे, विश्व में हम सिरमौर हों।

जयहिंद।  

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

डॉक्टरी नुस्खों की कलिष्ट भाषा

दूर पोस्टिंग पर गए डॉक्टर ने घर पत्र लिखा तो माँ ने बहू से कहा जा सामने वाले केमिस्ट से पढवा कर ला। थोड़ी देर बाद बहू लौटी तो माँ ने पूछा क्या लिखा है चिठ्ठी में ? बहू बोली पता नहीं माँ दूकान वाले ने तो ये दवा पकड़ा दी है :-)  

यह तो हुई मजाक की बात। पर सच्चाई यही है कि अभी भी डाक्टरों के द्वारा लिखे गए नुस्खे और उनमें दी गयी हिदायतें आम मरीजों या उनके घरवालों की समझ से बाहर होती हैं। शायद एक-दो प्रतिशत लोग ही ऐसे होंगे जो दूकान से दवा ले कर फिर से डाक्टर को दिखाने जाते होंगे, नहीं तो सभी केमिस्ट के भरोसे ही चलते और रहते हैं। यह तो हुई दवा की बात, उसके सेवन की मात्रा और बारंबारता को भी सरल भाषा में ना लिख कर वही वर्षों से चली आ रही लेटिन भाषा के चिन्हों से ही दर्शाया जाता है। जैसे BDS, CST, a.c.,a.c. & h.s., c.m.s., alt.dieb, ind, mane, p.c., q.d.am, q.d.pm आदि। यदि इन्हें सरल शब्दों में लिखा जाए जैसे दिन में एक-दो बार, खाने-सोने के पहले, खाली पेट इत्यादि, तो मरीज और उनके घर वालों को सहूलियत हो जाए बजाए बार-बार डॉक्टर या दवा की दूकान पर जा कर पूछने से। वैसे कुछ डॉक्टर इस बात की तरफ ध्यान देने लगे हैं पर अधिकतर नुस्खे अभी भी उसी ढर्रे पर लिखे चले आ रहे हैं। पता नहीं इस ओर संबंधित लोगों का ध्यान जाता नहीं कि जान बूझ कर ऐसा किया जाता है। वैसे भी डॉक्टरों के इर्द-गिर्द ऐसा आभामंडल रच दिया गया है जिससे साधारण आदमी उनसे ज्यादा बात करने में भी संकोच करने लगा है। विडंबना ही है कि डॉक्टरों, अस्पतालों की आकाश छूती फीस चुकाने के बाद भी आम आदमी अपनी समस्या या जिज्ञासा पर डॉक्टर से पूरी तरह खुल कर बात करने झिझकता है। इसमें डॉक्टरों का भी दोष नहीं है। अपनी तरफ से तो वे पूरी बात समझा देते हैं फिर मरीजों की लंबी कतारें उन्हें भी मजबूर कर देती हैं सबको जल्दी-जल्दी निपटाने के लिए। इसी पूछने की जहमत या झिझक के कारण कई बार मरीज द्वारा दवा लेने में गलतियों का होना भी नकारा नहीं जा सकता। ऐसा होने पर इस बात का दोष मरीज या उसके घरवालों का ही माना जाता है।   

मरीज को डॉक्टर से और डॉक्टर को मरीज से अलग नहीं किया जा सकता, पर नुस्खे और हिदायतों को सरल भाषा में लिख कर कुछ तो एक दूसरे की सहायता की जा सकती है। आशा है समय के साथ इस पर भी ध्यान दिया जाएगा।      

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

रावण दहन की आग पर सिकना रोटियों का

जगह हो न हो छोटे-छोटे पार्कों में ही खतरा मोल ले तीन-तीन पुतलों का दहन किया जाने लगा है। एक बात और हो सकता है कुछ लोगों को अखरे भी, पर सच्चाई यही दिख रही है कि ये आयोजन कुछ लोगों के अहम को पूरा करने या फिर भविष्य का मंच तैयार करने के लिए करे या करवाए जाते हैं। इसी बहाने उन्हें अपनी दूकान सजाने का भी अवसर जो मिल जाता है। 

दशहरा, देश के बड़े त्योहारों में से एक। बुराई पर अच्छाई की प्रतीतात्मक जीत को दर्शाने का माध्यम। रामलीला का मंचन, धूम-धड़ाका, आतिशबाजी, हाट-मेला-बाज़ार, भीड़-भाड़, लोगों का रेला, मौज-मस्ती,
उत्साही बच्चे। ऊँचे से ऊँचे पुतले बनाने की होड़, दिन ब दिन बढ़ते आयोजन, छुटभइये नेताओं को भी मिलते अवसर। 

एक समय था दिल्ली में जगह-जगह माता के जगराते हुआ करते थे। ज्यादातर टैक्सी या त्रि-चक्र स्कूटर स्टैंडों के सदस्य इस तरह के आयोजन किया करते थे या फिर दशहरे पर सार्वजनिक पुतला दहन, वह भी कहीं-कहीं आयोजित होता था। पर अब तो चाहे कोई भी उत्सव हो, चाहे गणेशोत्सव हो, दुर्गा पूजा हो, दशहरा हो, होली-दिवाली मिलन हो, इन सब के कार्यक्रम हर गली-मौहल्ले में होने लगे हैं। जैसा कि अभी दशहरे के पुतला दहन का आयोजन।  एक ही कालोनी में दो-तीन जगह पुतले खड़े कर दिए गए दिखे। जगह हो न हो छोटे-छोटे पार्कों में ही खतरा मोल ले तीन-तीन पुतलों का दहन किया गया। एक बात और हो सकता है कुछ लोगों को अखरे भी, पर सच्चाई यही दिख रही है कि ये आयोजन कुछ लोगों के अहम को पूरा करने या फिर भविष्य का मंच तैयार करने के लिए करे या करवाए जाते हैं। इसी बहाने उन्हें अपनी दूकान सजाने का भी अवसर जो मिल जाता है। प्रभू राम तो गौण होते जा रहे हैं। भीड़ के लिए आज का दिन या तो रावण के नाम रहता है, जिसके पुतलों की भव्यता पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है, उसका किरदार निभाने वाले कुछ ख़ास और जाने-माने नामों को चुना जाने लगा है या फिर आज उन छुटभइये नेताओं की निकल पड़ती है जिन्हें भारी-भरकम नेताओं के सामने खड़े होने का भी अवसर नहीं मिलता। वे भी भीड़ के सामने आ अपनी पहचान करवाने का मौका पा जाते हैं। उनके शुभ चिंतक बार-बार उनका नाम ले-ले कर जबरदस्ती तालियां बजवा कर अपने लिए भी कहीं जगह बनवाने की जुगाड़ कर लेते हैं।  
                          
बड़े आयोजनों को ही देख लें। श्रीराम पक्ष के कुछ किरदारों की आरती-तिलक कर अौपचारिकता पूरी होते ही सब का ध्यान पधारे हुए विशिष्ट जनों पर केंद्रित हो जाता है। जितनी आव-भगत उन में से हरेक की होती है उतनी तो पूरे राम-दल की भी नहीं होती। फिर उनमें भी होड़ सी करवा दी जाती है रावण के पुतले पर तीरों की बौछार करवाने में। ऊपर बैठा रावण भी हाथ जोड़ कर कहता होगा, हे प्रभू, उस समय तो अपने कर्मों के कारण आपने मेरा वध किया था, वह सम्मानजनक अंत था मेरा। तब  मुझे उतनी तकलीफ नहीं हुई थी पर इस अपमानजनक स्थिति से हर साल दो-चार होने में बहुत कष्ट होता है।  किसी तरह मुझे निजात दिलवाइए इन भक्तों के चंगुल से !        

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

लगना हलवे का कड़ाही में, चिंता कंजकों की

काम पर जाने वाले हम जैसे लोग, हाथ में पानी का लोटा या जग लिए घर के दरवाजे पर खड़े रहते थे कि देवियां आएं तो उनके चरण पखार, स्वागत कर अपने काम पर जाएं। देर हो रही होती थी, पर आफिस के बॉस से तो निपटा जा सकता था घर के बास से कौन पंगा ले, वह भी तब, जब बात धर्म की हो, आस्था की हो। वैसे निश्चिंतता इस बात से भी रहती थी कि आज के दिन तो आफिस का बॉस भी "अपने बॉस" से डरता अपने घर लोटा लिए खड़ा  होगा .…… 

आज सुबह, करीब पौने सात का समय था, थोड़ी हवाखोरी के लिए निकला तो  देखा बच्चियों के झुण्ड हाथ में प्लेट नुमा थाली लिए आ-जा रहे हैं। उनके साथ ही दो-तीन नन्हें बालक, जिन्हें "लैंकडा" कहा जाता है वे भी काफी व्यस्त दिख रहे थे। सुबह-सुबह सारे बच्चे नहाए-धोए, टीप-टॉप नज़र आ रहे थे। बच्चियों के कंधों पर बाकायदा पर्स नुमा बैग लटके हुए थे। कमाई और उपहार सहेजने के लिए। नवरात्र की अष्टमी जो थी, कमाई के साथ-साथ मौज-मस्ती का दिन। बच्चों को तो मौज-मस्ती का कोई न कोई बहाना चाहिए। उन्हें ना खाने से मतलब होता है ना पैसों से। रोजमर्रा के बंधे-बधाए नियमों से छुटकारा ही उनको प्रफुल्लित करने के लिए बहुत होता है। नहीं तो इन्हें ही रोज स्कूल भेजने के लिए सुबह उठाते-उठाते माँ-बाप की परेड हो जाती है।  कुछ सालों पहले स्कूल वगैरह में इन दिनों लंबी छुट्टियां हुआ करती थीं। हड़बड़ाहट नहीं होती थी, सो ऐसे दृश्यों की शुरुआत साढ़े आठ-नौ बजे दिन से शुरू होती थी। पर
समय के साथ घटती छुट्टियों और बढ़ती आपा-धापी ने इस उत्सव के साथ भी तनाव को जोड़ दिया है। अल-सुबह कार्यक्रम की शुरुआत होने लगी है। आस्तिक गृहणियां इन दिनों सदा से ही चिंतित रहती हैं, कन्याओं की आपूर्ती को लेकर। जरा सी देर हुई और कहीं अघाई कन्या ने खाने से इंकार कर दिया तो हो गया अपशकुन। इसीलिए होड़ रहती है पहले अपने घर कन्या बुला कर जिमाने की। हैं तो आखिर बच्चियां ही ना ! कम-ज्यादा
खा लेने से कहीं तबियत ही ना बिगड़ जाए, इसका भी ध्यान रखना पड़ता है। 

वर्षों के बाद इस बार इन दिनों दिल्ली में होने का सुयोग मिला है। तो फिर पुरानी यादें ताजा हो गयीं हैं। अस्सी
के दशक की याद आती है।      दिल्ली में हमारी  कालोनी में,  खास कर अष्टमी के दिन, कैसे  आस - पडोस की अभिन्न सहेलियों में भी अघोषित युद्ध छिड़ जाता था।   सप्तमी की रात से  ही कंजकों  की बुकिंग शुरु हो जाती थी। फिर भी सबेरे-सबेरे 'हरकारे' दौड़ना शुरु कर देते थे। गृहणियां परेशान, हलुवा कडाही में लग रहा है पर चिंता इस बात की है कि "पन्नी" अभी तक आई क्यूं नहीं ? "खुशी" सामने से आते-आते कहां गायब हो गयी ? "पिंकी" आ कर फिर कहाँ चली गयी ?  कोरम पूरा नहीं हो पा रहा है !         
इधर काम पर जाने वाले हम जैसे लोग, हाथ में लोटा - जग लिए घर के  दरवाजे पर खड़े रहते थे कि देवियां आएं तो उनके चरण पखार, स्वागत कर अपने काम पर जाएं। देर हो रही होती थी, पर आफिस के बॉस से तो निपटा जा सकता था, घर के इस बास से कौन पंगा ले, वह भी तब जब बात धर्म की हो। वैसे निश्चिंतता इस बात से भी रहती थी कि आज के दिन तो आफिस का बॉस भी "अपने बॉस" से डरता अपने घर लोटा लिए खड़ा होगा । 

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

रामलीला के संवादों में हिंग्लिश की सेंध

कुछ लोगों का मानना है कि  रामलीला में  "इस लक्ष्मण रेखा को पार मत कीजिएगा" जैसे संवाद में  आजकल के बच्चे रेखा शब्द का अर्थ नहीं समझ पाते इसलिए अब इस संवाद को बदल कर "यह लाइन मत क्रॉस करना" कर देने से बात सब की समझ में आ जाएगी। "लक्ष्मण रेखा लांघना" और "लाइन क्रास करना" दोनों  के भावों में जमीन-आसमान का फर्क है।  पर उनके अनुसार हिंग्लिश जैसी भाषा, जो आम बोली जाती है के उपयोग में कोई बुराई नहीं है। गोया कि बच्चे को सात्विक भोजन के गुण न समझा कर उसके मन का फास्ट-फ़ूड परोस दिया जाए !!!

समय करवट ले रहा है। यह तो सनातन प्रक्रिया है। बदलाव में प्रगति निहित है। पर कभी-कभी लगता है कि इस क्रिया में कुछ लोग अति-उत्साहित हो अतिरेक भी कर जाते हैं। अब जैसे शारदीय नवरात्र के अवसर पर देश भर
में सैंकड़ों जगह आयोजित की जाती हैं राम-लीलाऐं। समय के साथ-साथ इनमें भी भारी बदलाव आए हैं।फिर चाहे वे तकनीकी में हों, "ग्लैमर" में हो, मंच-सज्जा में हों, वेश-भूषा, परिधान में हों, सब स्वागत योग्य ही हैं, बशर्ते यह सब ग्रंथ की गरिमा के अनुरूप हों। सबसे बड़ी बात है इन कथाओं में प्रयुक्त होने वाले संवाद और उनकी भाषा। यह सही है कि संवाद ऐसे होने चाहिए जो हर तरह के अवाम को समझ में आ जाएं। पर ऐसे भी ना हों कि आम नाटकों की तरह उनमें चलताऊ भाषा का प्रयोग किया गया हो। पर कुछ ऐसे ही बदलावों की पदचाप सुनाई देने  लगी है।


दिल्ली की एक रामलीला कमेटी के कर्ता-धर्ता की तरफ से कुछ ऐसा ही बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने संवादों में अंग्रेजी शब्दों यानी युवाओं में लोकप्रिय हिंग्लिश के उपयोग की हिमायत की है। उदाहरण स्वरुप उनका कहना है कि अब तक सीता जी के जोर देने पर लक्ष्मण, राम की खोज में जाने के पहले कुटिया के द्वार के आगे एक लकीर खींच कर सीता जी से कहते रहे हैं कि इस लक्ष्मण रेखा को पार मत कीजिएगापर आजकल के बच्चे रेखा शब्द का अर्थ नहीं समझ पाते इसलिए अब इस संवाद को बदल कर "यह लाइन मत क्रॉस करना" कर देने से बात सब की समझ में आ जाएगी। हमारी संस्कृति में लक्ष्मण रेखा एक आदर्श बन चुकी है। इस संवाद ने लोकोक्ति का रूप ले लिया है। जो गहराई इस संवाद में है वह लाइन क्रास करने में कहाँ से आ पाएगी। राम कथा का एक-एक संवाद अपने-आप में पूर्ण शिक्षा है। ऐसे कदम हमारी शिक्षा प्रणाली पर भी सवाल खड़ा करते हैं। क्या आज की शिक्षा इतनी लचर है कि वह बच्चों को रेखा जैसे हिंदी के आसान शब्दों का अर्थ भी नहीं समझा सकती। जिस रामायण ने वर्षों भारतीयों को दुःख में सुख में, लाचारी में बेबसी में, देश में विदेश में अपनी संस्कृति से बांधे रखा।  सर्वाधिक लोकप्रिय जो कथा देश के नागरिकों के रोम-रोम में समाई हुई है। जो आज तक गांव-गवईं, अनपढ़, अशिक्षित सभी की समझ में आती रही, उसे ही लोग शायद अपने-आप को कुछ ज्यादा ही प्रगतिशील और खुले विचारों का दर्शाने के लिए मिटाने पर तुले हुए हैं।

विडंबना है कि कोशिश यह नहीं की गयी कि बच्चों को रेखा का अर्थ समझाया जाए, उसके बदले संवाद की आत्मा पर ही हमला कर दिया गया है। "लक्ष्मण रेखा लांघना" और "लाइन क्रास करना" दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। उनका कहना है कि पहले रामलीला के संवाद संस्कृत में होते थे फिर उसका स्थान हिंदी ने ले लिया तो अब हिंग्लिश जैसी भाषा, जो आम बोली जाती है के उपयोग में कोई बुराई नहीं है। गोया कि बच्चे को सात्विक भोजन के गुण न समझा कर उसके मन का फास्ट-फ़ूड परोस दिया जाए। पर बात यहीं ख़त्म नहीं हो रही। कुछ लोग हिंदी रजतपट के "बैड मैंनों" की लोकप्रियता को भुनाने के लिए अपने यहां बुला रहे हैं और इतना ही नहीं आने वाले वे लोग अपनी फिल्मों के पुराने किरदारों द्वारा बोले गए तथाकथित लोकप्रिय संवाद तथा लटके-झटके यहां मंच पर भी चिपकाएंगे, और फिर बात यहीं तक रह जाएगी यह भी तो तय नहीं है। अपने-अपने खेल को और प्रचार दिलाने, अधिक से अधिक भीड़ जुटाने के लिए आयोजक किस हद तक जाएंगे कैसे-कैसे हथकंडे अपनाएंगे यह कौन कह सकताा है। हो सकता है फिल्मों की तरह द्वि-अर्थी और गाली-गलौच से भरपूर संवाद असुरों को और नीच-हीन दिखाने के नाम पर ठूंस दिए जाएं !  

धीरे-धीरे बची-खुची श्रधा, भक्ति, आस्था जैसी भावनाऐं तिरोहित होती जा रही हैं या कहिए कर दी जा रही हैं और उनकी जगह बाज़ार अपने पूरे लाव-लश्कर और बुराई के साथ हावी होने की फिराक में आ खड़ा हुआ है।  हर काम की तरह न्यायालय का मुंह जोहने से तो अच्छा है कि ऐसी बातों पर शुरू से ही अकुंश लग जाए।     

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