pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 4 मई 2015

माँ की सीख जो आज भी सामयिक है

बचपन घी लगे, सिके और फूले हुए फुल्के (रोटी) की ऊपरी पतली परत बहुत स्वादिष्ट लगती थी तो कई बार थाली में रोटी आते ही उसे उतार कर खा लिया करता था। एक बार माँ ने देखा तो टोकते हुए बोलीं कि किसी के पर्दे नहीं उघाड़ने चाहिए। उस समय तो पूरी बात समझ में नहीं आई थी पर समय के साथ यह ज्ञान हुआ कि रोटी का उदाहरण दे माँ ने कितनी बड़ी बात समझा दी थी। 

बड़ों द्वारा दी गयी गयी कुछ नसीहतें या सीखें ऐसी होती हैं जो मन में गहरे पैठ सदा मष्तिष्क से संपर्क बनाए रखती हैं इससे भविष्य में कभी भटकन के दौरान सही-गलत का अंदाजा होता रहता है। मेरी माताजी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं, पर व्यवहारिक ज्ञान, विवेकशीलता और दुनियादारी के चश्मे से देखा जाए तो वे विदुषी हैं। बातों-बातों में बड़ी सहजता से उन्होंने मानवता का दयालुता पाठ हमें पढ़ाया है। यही कारण है कि मनुष्य तो मनुष्य किसी जीव-जंतु, कीड़े-मकौड़े तक को अकारण कष्ट देना उचित नहीं लगता।   

आज कहीं ये लिखा पढ़ कर, कि दुनिया में सब खाली हाथ आते है और खाली हाथ ही जाते हैं, वर्षों पहले की उनकी एक बात याद आ गयी कि अपने-आप में शाब्दिक रूप में यह कहावत ठीक है और इससे यह सीख मिलती है कि जीवन की नश्वरता सबको याद रहे और इंसान लालच से बचे। यहां खाली हाथ जाने का मतलब यह है कि जाते समय कोई संपत्ति  यानी भौतिक संपदा नहीं ले जा पाता। पर कुछ लोग खाली हाथ नहीं जाते। क्योंकि  मनुष्य गुमनाम तो आता है, पर यह उसके परिश्रम और कर्मों पर निर्भर करता है कि जाते समय वह गुमनामी में न जाए। जाना तो सभी ने है। जिसने भी जन्म लिया है वो जाएगा जरूर। पर अच्छे कर्म करने वाले, दीन-दुखियों के सहायक, देश व समाज के प्रति समर्पित, इंसानियत के पैरोकार अपने पीछे अपनी कीर्ति-पताका को फहराता छोड़ जाते हैं और यही उनका खाली हाथ न जाना है। 

बचपन घी लगे, सिके और फूले हुए फुल्के (रोटी) की ऊपरी पतली परत बहुत स्वादिष्ट लगती थी तो कई बार थाली में रोटी आते ही उसे उतार कर खा लिया करता था। एक बार माँ ने देखा तो टोकते हुए बोलीं कि किसी के पर्दे नहीं उघाड़ने चाहिए। उस समय तो पूरी बात समझ में नहीं आई थी पर समय के साथ यह ज्ञान हुआ कि रोटी का उदाहरण दे माँ ने कितनी बड़ी बात समझा दी थी कि किसी भी हालात से मजबूर, समय के मारे, किसी मजलूम की हालत को सार्वजनिक नही करना चाहिए। सबको अपनी इज्जत प्यारी होती है पता नही किस की क्या मजबूरी हो ! तबसे हर बार खाने पर यह सीख याद आ जाती है।  

इसी तरह उनकी एक बात और नहीं भूलती। पुस्तक में एक पाठ हुआ करता था कि जोर के तूफान के आगे घास व नर्म पौधे तो बच जाते हैं पर बड़े-बड़े वृक्ष टूट कर ढह जाते हैं। माँ की व्याख्या कुछ अलग थी उन्होंने कहा, बेटा मौके की नजाकत को देख अपनी जान बचाने के लिए यदि सभी मौकापरस्त हो जाते तो देश को महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, गांधी जी जैसे नर-नाहर कैसे प्राप्त होते। यदि हम जुल्म के सामने झुके रहते या उसका विरोध न करते तो क्या आज देश आजाद होता ?   

समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदल गया है। अब उस बदलाव का क्या बार-बार उल्लेख करना !                         

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

प्रश्नवाचक चिह्न (?) कहाँ से आया

जब बिल्ली किसी खोज में, जिज्ञासा में या अंचभित सी अवस्था में होती है तो उसकी पूंछ प्रश्नवाचक चिह्न जैसा आकार ले लेती है। कहते हैं कि उसी से प्रेरित हो कर यह चिह्न अस्तित्व में आया .........     

किसी भी भाषा के लेखन में शब्दों के मायाजाल का संसार तो जरुरी है ही पर उसके साथ-साथ अल्प विराम, पूर्ण विराम,  प्रश्न चिह्न, विस्मयादिबोधक चिह्न का उचित प्रयोग भी अत्यंत आवश्यक होता है। इन छोट-छोटे चिह्नों के न होने से   न शब्द ही अपना जादू बिखेर पाते हैं नही पढने वाला कुछ ढंग से ग्रहण कर पाता है। इसीलिए आवश्यकतानुसार ये चिह्न अस्तित्व में आते गए और लेखन की सुंदरता में इजाफा होता गया। अब जैसे प्रश्नवाचक चिह्न को ही लें, इसके बिना वाक्य के अर्थ का अनर्थ हो जाना तय है। यह एक ऐसा चिह्न है जिसे संसार भर में मान्यता मिली हुई है। पर इसके अस्तित्व में आने को लेकर कई तरह की भ्रांतियां भी हैं। जिसमें एक तो बड़ी ही रोचक है, इसके अनुसार यह चिह्न बिल्ली की पूंछ से प्रेरित हो बनाया गया है। जब बिल्ली किसी खोज में, जिज्ञासा में या अंचभित सी अवस्था में होती है तो उसकी पूंछ प्रश्नवाचक चिह्न जैसा आकार ले लेती है। कहते हैं कि उसी से प्रेरित हो कर यह चिह्न अस्तित्व में आया। पता नहीं वे लोग सांप के फन से क्यों नहीं प्रेरित हुए !     


एक और धारणा के अनुसार इस चिह्न की उत्पत्ति लेटिन भाषा के शब्द quaestio से हुई है।  जिसका अर्थ प्रश्न होता है। जो समय के साथ बदलते-बदलते qo हो गया और फिर इसे और आसानी से लिखने की वजह से एक अक्षर में ढाल कर आज जैसा रूप मिल गया।  


पर सबसे सटीक धारणा भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार यह है कि इंग्लैण्ड के यॉर्क के निवासी अलक़ुइन, जिसने ढेरों किताबें लिखी थीं और जिसे आगे चल कर संत की उपाधि भी मिली, द्वारा इस चिह्न की ईजाद की गयी थी। उस समय किताबों में सिर्फ "डॉट" का प्रयोग विराम चिह्न के रूप में किया जाता था जो कि पुस्तक का पूरा प्रभाव देने में असहाय सिद्ध होता था। अलक़ुइन ने उसमें थोड़ा सुधार कर उसके ऊपर एक टेढ़ी से आकृति बना दी, जो ऐसी लगती थी जैसे आकाश से बिजली गिर रही हो। वर्षों बाद जब विराम चिह्नों को व्यवस्थित किया गया तो अलक़ुइन के इस चिह्न को थोड़ा सुधार  कर प्रश्नवाचक चिह्न के रूप में मान्यता दे दी गयी। इसे इतना पसंद किया गया कि अरबी लिपि में भी, जो दाएं से बांए लिखी जाती है, इसे स्थान प्राप्त हो गया। ऐसी मान्यता है कि इससे मिलते-जुलते चिह्न का सर्वप्रथम उपयोग सीरियक भाषा में किया गया था। इक्कसवीं सदी आते-आते यह करोड़ों-अरबों लोगों का पसंदीदा चिह्न बन गया।      

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

यह है देश का सबसे पुराना रेलवे स्टेशन

रोयापुरम, तब 
भारत में पहली बार रेल 16 अप्रैल 1853 के दिन चली थी। इसके बाद धीरे-धीरे इसे अपनी सुविधा के अनुसार अंग्रेजों ने देश भर में इसका विस्तार किया। इसके साथ ही रेलवे स्टेशनों की भी आवश्यकता महसूस होनी ही थी। सो उनका भी निर्माण शुरू हो गया। उस समय उन्हें बड़े भव्य रूप में बनाया जाता था, जिसके फलस्वरूप आज हमारे पास हावड़ा, शिवाजी टर्मिनस तथा चेन्नई सेन्ट्रल जैसे विशाल तथा कलात्मक स्टेशन मौजूद हैं। पर सबसे पुराने यानी पहले स्टेशन को, जो अभी भी कार्यरत हो, खोजा जाए तो रोयापुरम स्टेशन का नाम सामने आता है, (बंबई और थाणे के स्टेशन अब काम में नहीं लिए जाते हैं) इसे दक्षिण भारत के पहले रेलवे स्टेशन होने का गौरव भी प्राप्त है।

रोयापुरम, अब 

यह चेन्नई-अराकोणम सेक्शन में स्थित है। इसका निर्माण 28 जून 1856 में संपन्न हुआ था। कुछ ही दिनों बाद 1 जुलाई 1856 से यहां से गाड़ियों का चलना भी आंरभ हो गया था। शुरू में यहां से दो गाड़ियां चलाई गयीं जो रोयापुरम से अम्बुर और तिरुवल्लुर के लिए चलती थीं।  एग्मोर स्थान्तरित होने के पहले 1922 तक यह मद्रास और महराठा रेलवे का हेड ऑफिस भी रहा। रख-रखाव के अभाव में इसका अधिकाँश भाग खंडहर में बदल गया था जिसका जीर्णोद्धार 2005 में जा कर संभव हो पाया। आज देश के 800 स्मारकों की धरोहर में इसका भी स्थान है।      

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

आम का नाम लंगडा क्यों ?

फिर एक बार फलों के राजा आम का मौसम आ गया है। सैंकड़ों प्रजातियों के साथ दुनिया में बहुतायद में उगाया जाने वाला फल। इसीलिए शायद इसका नाम आम पड़ा हो। पर सुगंध, मिठास, स्वाद तथा अपने दैवीय रस के कारण ख़ास मुकाम हासिल कर फ़लों का राजा कहलाता है। क्या बच्चा क्या बूढ़ा, क्या युवक क्या जवान, शायद ही कोई ऐसा हो जो इसे पसंद न करता हो। तरह-तरह के नाम हैं इसके - हापुस, अल्फांसो, चौसा, हिमसागर, सिंदुरी, सफ़ेदा, गुलाबखास, दशहरी इत्यादि-इत्यादि, प्रत्येक की अपनी सुगंध, अपना स्वाद। हरेक अपने आप में लाजवाब। पर बनारस का एक कलमी आम सब पर भारी पडता है। यह खुद जितना स्वादिष्ट होता है उतना ही अजीब नाम है इसका #लंगडाआम। यह आमों का सरताज है। इसका राज फ़ैला हुआ है बनारस के रामनगर के इलाके में। इसका नाम ऐसा क्यों पडा इसकी भी एक कहानी है। 

बनारस के राम नगर के शिव मंदिर में एक सरल चित्त पुजारी पूsoरी श्रद्धा-भक्ती से शिवजी की पूजा अर्चना किया करते थे। एक दिन कहीं से घूमते हुये एक साधू महाराज वहां पहुंचे और कुछ दिन मंदिर मे रुकने की इच्छा प्रगट की। पूजारी ने सहर्ष उनके रुकने की व्यवस्था कर दी। साधू महराज के पास आम के दो पौधे थे जिन्हें उन्होंने
मंदिर के प्रांगण में रोप दिया। उनकी देख-रेख में पौधे बड़े होने लगे और समयानुसार उनमें मंजरी लगी जिसे साधू महराज ने शिवजी को अर्पित कर दिया। रमता साधू शायद इसी दिन के इंतजार मे था, उन्होंने पुजारीजी से अपने प्रस्थान की मंशा जाहिर की और उन्हें हिदायत दी कि इन पौधों की तुम पुत्रवत रक्षा करना, इनके फ़लों को पहले प्रभू को अर्पण कर फ़िर फ़ल के टुकडे कर प्रसाद के रूप में वितरण करना, पर ध्यान रहे किसी को भी साबुत फ़ल, इसकी कलम या टहनी अन्यत्र लगाने को नहीं देनी है। पुजारी से वचन ले साधू महाराज रवाना हो गये। समय के साथ पौधे वृक्ष बने उनमें फ़लों की भरमार होने लगी। जो कोई भी उस फ़ल को चखता वह और पाने के लिये लालायित हो उठता पर पुजारी किसी भी दवाब में न आ साधू महाराज के निर्देशानुसार कार्य करते रहे। फ़लों की शोहरत काशी नरेश तक भी पहुंची, उन्होंने प्रसाद चखा और उसके दैवी स्वाद से अभिभूत रह गये। उन्होंने पुजारी को आम की कलम अपने माली को देने का आदेश दिया। पुजारीजी धर्मसंकट मे पड गये। उन्होंने दूसरे दिन खुद दरबार में हाजिर होने की आज्ञा मांगी।सारा दिन वह परेशान रहे। रात को उन्हें आभास हुआ जैसे खुद शंकर भगवान उन्हें कह रहे हों कि काशी नरेश हमारे ही प्रतिनिधी हैं उनकी इच्छा का सम्मान करो। दूसरे दिन पुजारीजी ने टोकरा भर आम राजा को भेंट किये। उनकी आज्ञानुसार माली ने उन फ़लों की अनेक कलमें लगायीं। जिससे धीरे-धीरे वहं आमों का बाग बन गया। आज वही बाग बनारस हिंदु विश्वविद्यालय को घेरे हुये है। यह तो हुई आम की उत्पत्ती की कहानी। अब इसके अजीबोगरीब नाम की बात। 

शिव मंदिर के पुजारीजी के पैरों में तकलीफ़ रहा करती थी, जिससे वह लंगडा कर चला करते थे। इसलिये उन आमों को लंगडे बाबा के आमों के नाम से जाना जाता था। समय के साथ-साथ बाबा शब्द हटता चला गया और आम की यह जाति लंगडा आम के नाम से विश्व-विख्यात होती चली गयी।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

गुड फ्राईडे यानी होली फ्राईडे

आज सुबह-सुबह  एक बडी अजीब सा वाकया हुआ। गुड फ्रायडे की छुट्टी थी। एक सज्जन का फोन आ गया। छूटते ही बोले, सर हैप्पी गुडफ्राईडे । मुझसे कुछ बोलते नहीं बना पडा, पर फिर धीरे से कहा भाई कहा तो गुड फ्राईडे  ही जाता है, लेकिन है यह एक  दुखद दिवस। इसी दिन ईसा मसीह को मृत्यु दंड दिया गया था। किसी क्रिश्चियन  दोस्त को बधाई मत दे बैठना।

वैसे यह सवाल बच्चों को तो क्या बड़ों को भी उलझन में डाल  देता है की जब इस दिन इतनी दुखद घटना घटी थी तो इसे "गुड" क्यों कहा जाता है?  ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें सिर्फ छुट्टी या मौज-मस्ती से मतलब होता है, उन्हें उस दिन विशेष के इतिहास या उसकी प्रासंगिकता से कोई मतलब नहीं होता। बहुतेरे लोगों से इस दिन के बारे में पूछने पर इक्के-दुक्के को छोड कोई ठीक जवाब नहीं दे पाता, उल्टा उनका भी यही प्रश्न था कि फिर इसे गुड क्यों कहा जाता है।


प्रार्थना-रत लोग 
इसका यही उत्तर है कि यहां  "गुड" का अर्थ "HOLY" यानी पावन के अर्थ में लिया जाता है. क्योंकि  इस दिन यीशु ने सच्चाई का साथ देने और लोगों की भलाई के लिए, पापों में डूबी मानव जाति की मुक्ति के लिए उसमें सत्य, अहिंसा, त्याग और प्रेम की भावना जगाने के लिए अपने  प्राण त्यागे थे।  उनके अनुयायी उपवास रख पूरे दिन प्रार्थना करते हैं और यीशु को दी गई यातनाओं को याद कर उनके वचनों पर अमल करने का संकल्प लेते हैं।

वैसे भी शुक्रवार का दिन बाइबिल में अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं से जुडा हुआ है जैसे उसके अनुसार सृष्टि पर पहले मानव का जन्म शुक्रवार को हुआ। प्रभु की आज्ञाओं का उल्लंघन करने पर आदम व हव्वा को शुक्रवार के दिन ही अदन से बाहर निकाला गया। ईसा शुक्रवार को ही गिरफ्तार हुए, जैतून पर्वत पर अंतिम प्रार्थना प्रभु ने शुक्रवार को ही की और उन पर मुकदमा भी शुक्रवार के दिन ही चलाया गया।              

मंगलवार, 31 मार्च 2015

भारत यूं ही सोने की चिड़िया नहीं बन गया था !

अपना देश सोने की चिड़िया ही क्यूँ कहलाता था इसका जवाब कोई दे न दे पर यह तो सर्वविदित है कि इसके चिड़िया होने का लाभ कई बाजों ने उठाया। जिन्होंने बाहर से आ-आकर इसे लहूलुहान कर छोड़ा और अब उनकी यहीं पनपी प्रजाति बचे-खुचे पिंजर को भी झिंझोड़ने से बाज नहीं आती...............

वर्तमान में हम चाहे जैसे भी हों, स्थितियां-परिस्थितियां कैसी भी हों पर हम में से अधिकांश अभी भी अपने पुराने अतीत को बड़े गर्व से याद कर उसका बखान करते नहीं थकते कि हमारा देश कभी सोने की चिड़िया कहलाता था। अब ये चिड़िया ही क्यूँ कहलाता था इसका जवाब कोई दे न दे पर यह तो सर्वविदित है कि इसके चिड़िया होने का लाभ कई बाजों ने उठाया। जिन्होंने बाहर से आ-आकर इसे लहूलुहान कर छोड़ा और अब उनकी यहीं पनपी प्रजाति बचे-खुचे पिंजर को भी झिंझोड़ने से बाज नहीं आती।
  
वक्त-वक्त की बात है, भारत यूं ही सोने की चिड़िया नहीं बन गया था। उसके निर्माण में राजा और प्रजा दोनों का सम्मलित योगदान था। राज्य  की तरफ से कामगारों और किसानों को  पूरी सुरक्षा तथा उनकी मेहनत का पूरा मुआवजा दिया जाता था।  हारी-बिमारी या प्राकृतिक आपदा में भी, खासकर किसानों को राजा से पूरा संरक्षण प्राप्त होता था। आखिरकार देश की प्रजा की भूख मिटाने में वही तो अहम भुमिका अदा करते थे। इसीलिए  मेहनतकश  कामगार और किसान भविष्य की तरफ से आश्वस्त हो कर पूरी निष्ठा और समर्पण भाव से अपना काम करते थे। उनके लिए पहले देश फिर राजा तथा उसके बाद खुद और अपना परिवार होता था। आपस में भाईचारा था। एक का दुःख सबका कष्ट होता था।  आस-पड़ोस तो क्या सारा गांव ही एक परिवार की तरह माना जाता था। शायद ही कभी किसी का पड़ोसी भूखा सो पाता हो। पेट भरा और दिमाग चिंता-मुक्त हो तभी हर काम सुचारू रूप से हो पाता है। वक्त के साथ सब कुछ बदल गया है। अब पहले खुद और अपनी पीढ़ी, फिर राजा, वह भी अपना मतलब सिद्ध करने के लिए। देश तो जाने किस कोने में पड़ा अपने दुर्दिन देख रहा है।  आज सारे देश का पेट भरने वाला खुद आधे पेट रहता है। अपने लहू को पसीना बना फसल सींचने वाला उसका उचित मोल न मिलने पर निराश हो या तो मौत को गले लगाने पर मजबूर है या फिर माँ समान धरती को बेच-बाच कर किसी और धंधे की और उन्मुख हो जाता है । अभी एक सर्वे में सामने आया है कि करीब बासठ प्रतिशत किसान अपना पुश्तैनी काम छोड़ कुछ और करना चाहते हैं। कभी- कभी तो लगता है कि कहीं जान-बूझ कर ही तो उसे मजबूर नहीं किया जाता उसकी जमीन को हड़पने लिए।  सरकारी नीतियां और धन-लोलुपों की लालसाएं अपना उल्लू सीधा करने के लिए कुछ भी तो कर सकती हैं। फिर ऊपर से कामगार को काम नहीं मिलता, किसी तरह कुछ दिनों के लिए मिल भी जाए तो उसका एक बड़ा हिस्सा बिचौलिए या दलाल दबा जाते हैं । सरकार की नीतियां कुछ रसूख-दारों और बड़े जमींदारों के लिए कुबेर का खजाना बनती जा रही हैं। आज हुनरमंदों की हैसियत किसी भिक्षुक के समान कर दी गयी है । यही हाल रहा तो आने वाले समय में अविराम बढ़ती आबादी का पेट भरना एक ज्वलंत समस्या बन कर सामने आने वाली है। 

 उस समय के भारत  का प्रामाणिक विवरण को, बहुत सारी जानकारियों के साथ मेगास्थनीज ने, जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी नरेश सिल्यूकस का राजदूत था, भारत भ्रमण कर लिपिबद्ध किया था। उसके अनुसार  चंद्रगुप्त के समय में चोरियां ना के बराबर होती थीं। किसानों और पूरे खेतिहर वर्ग को बहुत सम्मान प्राप्त था। एक तरह से इस काम को पवित्र और पूजनीय माना जाता था। उसने आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा है कि जहां दूसरे देशों में युद्ध के समय खड़ी फसलों को बर्बाद कर दिया जाता था, खलिहानों में आग लगा दी जाती थी जिससे सेना को रसद ना मिल पाए, वहीं भारत में किसानों को युद्ध से जैसे कोई मतलब ही नहीं होता था। युद्धभूमि से कुछ दूरी पर भी किसान अपना कार्य यथावत करते रहते थे। इसीसे रसद की अबाध उपलब्धि सेना और नागरिकों को प्राप्त होती रहती थी। जिससे आपात काल में भी कोई काम ठप नहीं हो पाता था। 

मेगास्थनिज ने उस काल में यहां विदेशियों की सुरक्षा और उनकी देखभाल के लिये राजा और राज्य के निवासियों की भी बहुत तारीफ की है। उसका लेख आज भी प्रामाणिक दस्तावेज माना जाता है। जाहिर है ऐसी स्थिति-परिस्थिति या माहौल कह लीजिए, कोई भी देश हो, उन्नति, वैभव, समृद्धि खुद चल कर उसके पास आएगी ।  

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

इम्तिहानी मौसम

अधिकांश किशोर-मुखारविंद जो अबतक  शक्कर के 'श' में छोटी 'इ' की मात्रा लगा टट्टू का 'ट' जोड, जैसे शब्दों को बिना उसका अर्थ समझे, बिना किसी झिझक के सरे आम उगलते रहते थे, वही अब हनुमान चालीसा या शिव स्त्रोत्र जपते नजर आने लगते हैं।   


आजकल प्राकृतिक मौसम के अलावा एक और मौसम अस्तित्व में है वह है इम्तिहानों का मौसम। यह मौसम प्राकृतिक देन ना होकर एक मानव-प्रदत्त ऋतु है। इसके स्थूल फायदे-नुक्सान, जरुरत और कार्यकलाप को नज़रंदाज़ कर जरा हट कर देखें तो पाएंगे कि इस देशव्यापी ऋतु का समाज के एक वृहद वर्ग पर अच्छा-खासा असर पड़ता है। ऐसा पाया गया है कि इस मौसम के आते ही इससे प्रभावित लोग अनायास ही श्रद्धालु और भक्तिरस में सराबोर हो जाते हैं। इसीलिए धर्मस्थलों में आवागमन काफी बढ़ जाता है, पूजा-पाठ, दान-पुण्य में बढ़ोतरी हो जाती है। किताब-कापियां जो इधर-उधर पड़ी रहती थीं अब सिर-माथे लगने लग जाती हैं। 'हाय' और 'बाय' की जगह 'पैरिपौना' ले लेता है। शगुन-अपशगुन का ध्यान रखा जाने
परीक्षा कक्ष में जाने से पहले

लगता है। अधिकांश किशोर-मुखारविंद जो अबतक  शक्कर के 'श' में छोटी 'इ' की मात्रा लगा टट्टू का 'ट' जोड, जैसे शब्दों को बिना उसका अर्थ समझे, बिना किसी झिझक के सरे आम उगलते रहते थे, वही अब हनुमान चालीसा या शिव स्त्रोत्र जपते नजर आने लगते हैं।

कहते हैं कि यदि परीक्षा न हो तो स्कूल-कालेज का समय छात्रों की जिंदगी का बेहतरीन हिस्सा होता है। पर यही परिक्षाएं समाज के एक तबके का सबसे प्रतीक्षित समय भी होता है। इन दिनों पैदा होने वाली मानसिकता का एक ख़ास पेशे से जुड़े चतुर-सुजान लोग फायदा उठाने में कोई गफलत नहीं करते। ये पेशा है भीख मांगने का। वैसे तो यह एक सदाबहार धंधा है जो बारहों-मास, बिना हींग और फिटकरी लगाए फल टपकाता रहता है, पर यह मौसम इनके लिए सर्वाधिक लाभ का मौसम है वह भी बिना ज्यादा मेहनत-मशक्कत के। जिस में बिना दुत्कारे या मुंह बनाए हर कोई इनकी झोली में कुछ न कुछ जरूर डाल देता है। इसीलिए ये लोग अपने-अपने निश्चित ठीहों-इलाकों को छोड़ कालेज, स्कूलों के आस-पास मंडराने लगते हैं। जहां परीक्षार्थियों को अपने आशीर्वचनों से बहला-फुसला उन्हें अपनी अच्छी-खासी आमदनी का जरिया बना लेते हैं। इनके जाल में वे लोग ज़रा ज्यादा ही उलझ जाते हैं जिन्होंने विद्यालयों में दाखिले के बाद अपने समय का सदुपयोग अपने साथी के साथ बाग़-बगिया, मॉल-बाजार, रेस्त्रां-फ़िल्म इत्यादि में किया होता है। उनके लिए पांच-दस रुपये में मिलने वाली दुआ मनोबल बढ़ाने में
वियाग्रा का काम करती है।

वैसे परीक्षा का भूत कुछ होता ही ऐसा है। विद्यार्थी चाहे कितना भी रियाज कर ले, कितने भी सवालों का हल अपने दिमाग में स्टोर कर ले, जैसे ही परीक्षा का समय आता है महाभारत के कर्ण की तरह उसकी यादाश्त 'हैंग' हो जाती है। तब इस परीक्षा रूपी सागर को पार करने के लिए कोई भी, कैसा भी तिनका दिखे उसका सहारा लेने के लिए हाथ बढ़ ही जाता है।

चलिए दुआ करते हैं कि जैसे भी हो इस समर में कूदे हर योद्धा को किनारा मिल जाए।             

विशिष्ट पोस्ट

किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर कर...