pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 21 अगस्त 2013

समाज का अंग बनती उच्छ्रिंखलता

यही कारण है कि देश में जगह-जगह लगी महान हस्तियों की प्रतिमाओं को जब-तब अपमानित होना पड़ता है. कभी किसी वीर योद्धा की तलवार गायब हो जाती है तो कभी किसी के चश्मे या लाठी से खिलवाड़ किया जाता है कभी किसी पर गंदगी पोत  दी जाती है तो कभी जाति और धर्म के नाम पर उसे खंडित ही कर दिया जाता है. वो भी उन लोगों के साथ जिन्होंने अपने जीवनकाल में अपने कर्म के आगे कभी जात-पात, धर्म या भाषा को आड़े नहीं आने दिया.

कहावत है कि जैसा राजा वैसी प्रजा। परिवार, समाज, देश के मुखिया से अघोषित अपेक्षा रहती है कि वह विवेकशील, निष्पक्ष, न्यायप्रिय, समदर्शी तथा मृदुभाषी हो. पर लगता है कि आज के कुछ असंयमित, विवाद प्रेमी, अवसरवादी लोगों की जिव्हा पर सरस्वती के बजाए ताड़का ने अपना अधिकार जमा लिया है.  इनमें ज्यादातर वे लोग हैं, जिन्हें निकट भविष्य में अपने आप को हाशिए पर धकेल दिए जाने का खौफ सता रहा होता है. फिर चाहे वे सत्ता सुख भोगने वाली पार्टी के हों या फिर उसे संभालने को आतुर विपक्षी दल के. 

इन्हीं की देखा-देखी समाज में भी विवेकहीन, उच्छ्रिंखल लोगों के एक तबके का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है. इसका प्रमाण आए दिन यहाँ-वहाँ की घटनाएं देती रहती हैं। ये लोग अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए, अपने बलप्रदर्शन की चाहत के चलते किसी भी हद तक जा सकते हैं। यही कारण है कि देश में जगह-जगह लगी महान हस्तियों की प्रतिमाओं को जब-तब अपमानित होना पड़ता है. कभी किसी वीर योद्धा की तलवार गायब हो जाती है तो कभी किसी के चश्मे या लाठी से खिलवाड़ किया जाता है कभी किसी पर गंदगी पोत  दी जाती है तो कभी जाति और धर्म के नाम पर उसे खंडित ही कर दिया जाता है. वो भी उन लोगों के साथ जिन्होंने अपने जीवनकाल में अपने कर्म के आगे कभी जात-पात, धर्म या भाषा को आड़े नहीं आने दिया. हद तो तब हो जाती है जब सरकार की तरफ से उनके प्यादों के, जो सदा अपने आकाओं का मुंह और मूड ताक कर अपने कर्म करते हैं,  अनर्गल, तथ्यहीन बयान आग में घी का काम कर अपनी अक्ल के दिवालियापन का परिचय दे देते हैं।

इसी संदर्भ में एक कहानी याद आती है. किसी गुरुकुल में गुरु जी के पास दो शिष्य भी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे. पर वे लकीर के फकीर ही थे. आपस में उनकी कभी बनती नहीं थी इसके अलावा एक दूसरे को सदा नीचा दिखाने की फिराक में भी रहते थे. गुरु जी पर भी अपना हक़ जमाते रहते थे. इसी होड़ से बचने के लिए रोज रात को गुरु की सेवा के अंतर्गत उन्होंने गुरु के पाँव भी बाँट लिए थे. एक दिन गलती से दोनों दुसरे के नाम वाले पैर दबाने बैठ गए, पर अपने पास दूसरे का पैर देख उसे नुक्सान पहुंचाने की नीयत से पैरों को ही तोड़ कर रख दिया.
यह तो कहानी थी, पर कहानी के पात्र भी तो असल जिन्दगी से ही आते हैं. कुछ ऐसा ही देश के एक शहर में तब हुआ जजब कुछ दिनों पहले ऐसे ही कुछ विवेकहीन लोगों ने वीर शिरोमणी, देश के प्रमुख क्रान्तिकारीयों में अग्रणी सबके प्रिय शहीद की प्रतिमा पर लगे हैट पर आपत्ति जताते हुए प्रतिमा को ही खंडित कर दिया. कुछ दिनों शोर मचा, हल्ला-गुल्ला हुआ फिर सब कुछ अपने ढर्रे पर चलने लगा. राज्य की बागडोर संभालने वाले भी प्रतिमा पर कपड़ा लपेट अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा पा चुप बैठ गये. क्या अपनी जान, अपने परिवार, अपने भविष्य की परवाह न करने वालों ने गुलाम देश की बेड़ियाँ तोड़ने की कोशिश करते हुए ऐसी आजादी की कल्पना भी की होगी?          

इस तरह की घटनाओं और परिस्थितियों के लिए  हमारी वर्तमान शिक्षा-प्रणाली भी किसी हद तक जिम्मेदार है जो बच्चों को देश और उसके लिए कुर्बान या समर्पित शहीदों, नेताओं, पूजनीय हस्तियों की जानकारी विस्तार और गहराई से उपलब्ध नहीं करवा पाती है. इसके विपरीत लोगों को सस्ती राजनीति के चलते महापुरुषों को भी जात, धर्म और राजनैतिक दलों की संकीर्णता के दायरे में बाँध कर रख दिया गया है. 
              

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

एक अद्भुत तीर्थस्थल बिजलेश्वर महादेव

बिजलेश्वर महादेव , जिनके दर्शन करते ही आँखें नम हो जाती हैं, मन भावविभोर हो जाता है। जिव्हा एक ही वाक्य उच्चारण करती है - त्वं शरणम ।   

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। तरह-तरह के धार्मिक स्थान, तरह-तरह के लोग, तरह-तरह के मौसम। यदि अपनी सारी जिंदगी भी कोई इसे समझने, घूमने में लगा दे तो भी शायद पूरे भारत को देख समझ ना पाये। यहां ऐसे स्थानों की भरमार है कि उस जगह की खासियत देख इंसान दांतों तले उंगली दबा ले। 

सावन जाने-जाने को है पर बरसात अभी भी मेहरबान है. इसी मौसम से जुडी एक हैरतंगेज जानकारी एक अद्भुत स्थल के बारे मे. 

बिजलेश्वर महादेव का मंदिर 

हिमाचल के कुल्लू जिले में शिव जी का एक अति प्राचीन मंदिर है, बिजलेश्वर महादेव। जिसे बिजली महादेव या मक्खन महादेव के नाम से भी जाना जाता है। हिमाचल के कुल्लू शहर से 18 की.मी. दूर, 7874 फिट की ऊंचाई पर मथान नामक स्थान में यह स्थित है. इसे शिवजी का सर्वोत्तम तप स्थल माना जाता है। पुराणों के अनुसार जालन्धर दैत्य का वध शिवजी ने इसी स्थान पर किया था। इसे कुलांत पीठ के नाम से भी जाना जाता है।

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग पर या मंदिर के ध्वज दंड़ पर हर दो-तीन साल में वज्रपात होता है। शिवलिंग पर वज्रपात होने के उपरांत यहां के पुजारी जी बिखरे टुकड़ों को एकत्र कर उन्हें मक्खन के लेप से जोड़ फिर शिव लिंग का आकार देते हैं। इस काम के लिये मक्खन को आस-पास नीचे बसे गांव वाले उपलब्ध करवाते हैं। कहते हैं कि पृथ्वी पर आसन्न संकट को दूर करने तथा जीवों की रक्षा के लिये सृष्टी रूपी लिंग पर यानि अपने उपर कष्ट का प्रारूप झेलते हैं भोले भंडारी। यदि बिजली गिरने से ध्वज दंड़ को क्षति पहुंचती है तो फिर पूरी शास्त्रोक्त विधि से नया ध्वज दंड़ स्थापित किया जाता है।

मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल्लु से बस या टैक्सी उपलब्ध हैं। व्यास नदी पार कर 15 की. मी. का सडक मार्ग चंसारी गांव तक जाता है। उसके बाद करीब तीन किलोमीटर की श्रमसाध्य, खडी चढ़ाई है जो अच्छे-अच्छों का दमखम नाप लेती है। चढ़ाई चढाते समय तो हाथ में पानी की बोतल भी एक भार सा महसूस होती है।

मथान के एक तरफ़ व्यास नदी की घाटी है, जिस पर कुल्लु-मनाली इत्यादि शहर हैं तथा दूसरी ओर पार्वती नदी की घाटी है जिस पर मणीकर्ण नामक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। उंचाई पर पहुंचने में थकान और कठिनाई जरूर होती है पर जैसे ही यात्री चोटी पर स्थित वुग्याल मे पहुंचता है उसे एक दिव्य लोक के दर्शन होते हैं। एक अलौकिक शांति, शुभ्र नीला आकाश, दूर दोनों तरफ़ बहती नदियां, गिरते झरने, आकाश छूती पर्वत श्रृंखलाएं किसी और ही लोक का आभास कराती हैं। जहां आंखें नम हो जाती हैं, हाथ जुड जाते हैं, मन भावविभोर हो जाता है तथा जिव्हा एक ही वाक्य का उच्चारण करती है - त्वं शरणं।

मक्खन से लिपटा शिवलिंग 
कण-कण मे प्राचीनता दर्शाता मंदिर पूर्ण रूप से लकडी का बना हुआ है। चार सीढियां चढ़, दरवाजे से एक बडे कमरे मे प्रवेश मिलता है जिसके बाद गर्भ गृह है जहां मक्खन मे लिपटे शिवलिंग के दर्शन होते हैं। जिसका व्यास करीब ४ फ़िट तथा उंचाई २.५ फ़िट के लगभग है।                                                          
ऊपर मंदिर परिसर में बिज़ली-पानी का इंतजाम है। आपात स्थिति मे रहने के लिये कमरे भी बने हुए हैं। परन्तु बहुत ज्यादा ठंड हो जाने के कारण रात मे यहां कोई नहीं रुकता है। सावन के महीने मे यहां हर साल मेला लगता है। दूर-दूर से ग्रामवासी अपने गावों से अपने देवताओं को लेकर शिवजी के दरबार मे हाजिरी लगाने आते हैं। वे भोले-भाले ग्रामवासी ज्यादातर अपना सामान अपने कंधों पर लाद कर ही यहां पहुंचते हैं। उनकी अटूट श्रद्धा तथा अटल विश्वास का प्रतीक है यह मंदिर जो सैकडों सालों से इन ग्रामिणों को कठिनतम परिस्थितियों मे भी उल्लासमय जीवन जीने को प्रोत्सहित करता है। कभी भी कुल्लु-मनाली जाना हो तो शिवजी के इस रूप के दर्शन जरूर करें।

कुछ सालों पहले तक चंसारी गांव के बाद मंदिर तक कोई दुकान नहीं होती थी। पर अब जैसे-जैसे इस जगह का नाम लोग जानने लगे हैं तो पर्यटकों की आवा-जाही भी बढ गयी है। उसी के फलस्वरूप अब रास्ते में दसियों
दुकानें उग आयीं हैं। धार्मिक यात्रा के दौरान चायनीज और इटैलियन व्यंजनों की दुकानें कुछ अजीब सा भाव मन में उत्पन्न कर देती हैं। पर जो भी हो यह शिव भूमि है चमत्कारी।  

बुधवार, 14 अगस्त 2013

बखेड़ा बिजली का बरसात में

कई दिनों से लगी झड़ी आज सुबह ही बंद हुई थी. मौसम खुशगवार था. मैंने चाय का प्याला थामा ही था कि ठाकुर जी नमूदार हो गये. उन्हें भी चाय दी जिसकी एक चुस्की ले बोले, पता है कल शाम अपने जैन साहब को करेंट लग गया था.

मैं चौंका, अरे नहीं मुझे तो नहीं पता ! कैसे हैं ? कुछ ज्यादा चोट तो नहीं आई ? और यह सब हुआ कैसे ?
ठाकुर जी बोले, लगातार बारिश से दीवारों में सीलन आ गयी थी, उसी के कारण शायद स्विचों में भी करेंट आ गया था, काम से लौटने पर मुंह-हाथ धो जैसे ही लाईट बंद करने लगे जोर का झटका खा गये. वैसे डाक्टर देख गया था, खतरे से बाहर हैं। 
चाय में  दो बिस्कुट डूबा कर उदरस्त करते हुए बोले, देखो इसी बिजली के बिना हम अपनी दिनचर्या की कल्पना भी नहीं कर सकते पर यही कभी-कभी मुसीबत भी बन जाती है. 

मैं बोला, वो तो है, जब तक उसे चेरी बना कर रखेंगे तब तक आप के सारे काम सुचारू रूप से होते जाएंगे जैसे ही  आपने अपनी असावधानी की ढील दी वह जानलेवा हो जाएगी. इसलिए सावधानी बहुत जरूरी है..

ठाकुर जी ने चाय ख़त्म करते हुए कहा, भईये कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि यह सदा निरापद रहे ?

मैंने कहा ठाकुर जी ऐसा है कि शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसने अपने जीवन  काल में कभी बिजली का झटका न खाया हो. वैसे झटका खाने वाले हर व्यक्ति को नुक्सान नहीं होता. दुर्घटना की गंभीरता इसके वोल्टेज, अर्थिंग, बिजली के स्वरूप, व्यक्ति के स्वास्थ्य और उसे संपर्क में आने वाले हिस्से पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है. इसके झटके का असर ऐसे लोगों पर कुछ ज्यादा होता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। बच्चे, बूढ़े, ह्रदय रोगी और डायबिटिक व्यक्तियों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए. कड़ी, खुरदरी या कठोर चमड़ी पर भी कोमल त्वचा के बनिस्पत कम असर पड़ता है. 

ठाकुर जी ने इसी बीच एक प्रश्न और उछाल दिया, अच्छा भईये, या बताओ कितने वोल्ट की बिजली निरापद होती है ? 

मैं बोला, घरों में बिजली महकमे द्वारा जो विद्युत प्रवाह  भेजा जाता है वह २२०-२४० वोल्ट का होता है. जिसके संपर्क में ५-६ सेकेण्ड का समय भी जानलेवा हो सकता है. निरापद तो यह होती ही नहीं फिर भी पचास वोल्ट तक के करेंट को सहा जा सकता है. 

ठाकुर जी ने जेब से सौंफ की डिबिया निकाल  कर कुछ दाने मुंह के हवाले किए और बोले, अब लगे हाथ यह भी बता दो कि किसी को करेंट लग ही जाए तो क्या किया जाना चाहिए ?

मैंने भी उनकी डिबिया कुछ हल्की कर कहा, हर दुर्घटना में समय का बहुत महत्व होता है. पीड़ित को जितनी जल्द हो सके सहायता उपलब्ध करवानी चाहिए. बिजली के मामले में यदि करंट लगाने वाला व्यक्ति तार से चिपका हो तो उसे किसी सूखी लकड़ी से या रबर के दस्ताने पहन या फिर हाथों पर सूखे कपडे की कई परतें लपेट कर ही छूना और हटाना चाहिए. यदि व्यक्ति बेहोश हो तो उसे कृत्रिम सास देनी चाहिए. यदि उसकी नब्ज धीमी पड़ रही हो तो कार्डियक मसाज जरूरी होती है. यदि पीड़ित बेहोश न हो तो उसे गरम काफी पिलाना फायदेमंद रहता है. झटका खाए व्यक्ति को कुछ दिन आराम जरूर करना चाहिए. जिससे किसी अंदरूनी नुक्सान से बचाव हो सके.

ठाकुर जी सबसे अहम् बात तो बिजली से किसी भी तरह का पंगा, असावधानी या लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए. मौसम कैसा भी हो गीले हाथों से स्विच वगैरह या बिजली के उपकरणों को नहीं छूना चाहिए. ज़रा सी भी कोई भी खराबी हो तो उसे तुरंत सुधारवा लेना चाहिए. घर के छोटे बच्चों की पहुँच से साकेट वगैरह दूर होने चाहिए यदि ऐसा संभव न हो तो उन्हें ढक कर रखना उचित रहता है. घर की तारों, फिटिंग और उपकरण अच्छी क्वालिटी के तथा सही अवस्था में होने चाहिए। बरसात में कड़कती बिजली या घनघोर वर्षा के समय टी.वी, फ्रिज वगैरह बंद ही कर दिए जाएं तो बेहतर है. 
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थोड़ी सी सावधानी से इसे चेरी बना कर इसका असीमित लाभ उठाया जा सकता है. 
ठाकुर जी उठते हुए बोले, भईये चलूं, तुम्हारी भाभी को भी कुछ सीख दे दूँ।          

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

स्कूलों के मध्याह्न भोजन की समस्या

खाद्य सामग्री उपलब्ध करवाने वाली दुकानों का स्कूल के अधिकारियों से दूर-दूर का वास्ता न हो, इसका ध्यान रखा जाए. सप्लायर और स्कूल के गठबंधन पर नजर रखी जाए. यदि कोइ समिति बने तो उसमें स्कूल के छात्रों के पालक जरूर शरीक किए जाएं। क्योंकि अपने बच्चों के हित के लिए वे कुछ भी गलत होने से रोकेंगे। 

केंद्रीय तथा राज्य सरकारों ने देश में शिक्षा के गिरते ग्राफ को थामने के लिए स्कूलों में बच्चों को दोपहर का भोजन देने की योजना को 5 अगस्त 1995 से ही लागू कर दिया था. तब इसके तहत स्कूल में 80 '/.  उपस्थिति दर्ज करवाने वाले बच्चों को हर महीने तीन किलो अनाज देने का प्रावधान था. पर कहते हैं न की गाँव बसा नहीं लुटेरे हाजिर. अब निर्धन, अशिक्षित गरीब बच्चों और उनके माँ-बाप के लिए कहां संभव था की वे अनाज की उचित मात्रा तौलें, उसकी गुणवत्ता देखें। उन्हें तो जो मिल गया वही नियामत था. फिर चाहे उसमें आधा किलो रेत या कंकड़ ही क्यूँ न मिले हों. फिर उस देश में जहां मृत लोग सरकारी योजनाओं के कागजों में ज़िंदा हो उठते हों वहाँ बच्चों की उपस्थिति में हेरा-फेरी कर माल इधर से उधर करना कौन सी बड़ी बात थी. बातें उठीं शिकायतें हुईं जिससे 2004 से योजना में तब्दीली कर, पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं को पका हुआ खाना देने की शुरुआत की गयी. जिसे 2007 से बढ़ा कर आठवीं क्लास तक कर दिया गया. मकसद वही था खाने के बहाने बच्चों को स्कूल तक लाना.

हमारे यहाँ घपले तो किसी भी योजना के साथ ही शुरू हो जाते हैं या यूं कहिए कि घपलों को जामा पहनाने के लिए ही योजनाएं शुरू की जाती हैं. उसी तर्ज पर ज्यादातर सरकारी योजनाओं की तरह इसका फ़ायदा भी मानव रूपी गिद्धों ने उठाना शुरू कर दिया. पौष्टिकता तो बहुत दूर की बात थी, बाजार का घटिया, निकृष्टतम अनाज स्कूलों में खपाया जाने लगा. मुफ्त का होने तथा सदा की तरह रसूखदारों के सगे-संबन्धी-मित्रों के दबदबे की वजह से कोई जल्द शिकायत भी नहीं करता था. पर लालच की इंतहा ने जब मासूमों की जिंदगियों  से खेलना शुरू कर दिया तब भी मुख्य मुद्दा छोड़, उनकी लाशों पर पक्ष-विपक्ष ने गंदी राजनीति का मंचन अपने हितों के लिए करना शुरू कर दिया.  तरह-तरह के आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच इस योजना को बंद करने की आवाज तो उठी पर किसी ने इसे सुधारने या "फूड माफिया" से बचाने की पहल किसी ने नहीं की. 

अभी घटा बिहार जैसा काण्ड पहली बार नहीं हुआ है. सितम्बर 2008 में झारखंड में दूषित भिजन के कारण 60 बच्चों को अस्पताल में भर्ती करवाना पडा था. 2009 में देश की राजधानी दिल्ली में सवा सौ के करीब बच्चियां बीमार हो गयीं थीं. अब बिहार की ताजा घटना सब के सामने है, पर इन सब से किसी ने ना तो सबक लिया नाहीं कुछ सुधार के कदम उठाए। अब तो इस योजना पर ही प्रश्न चिन्ह लगने शुरू हो गए हैं, यहाँ तक कि इसे निरस्त करने की मांगें भी उठानी शुरू हो गयी हैं. पर जिस देश में लाखों बच्चे हर साल कुपोषण का शिकार हो दम तोड़ देते हों, वहाँ ऐसी योजना को बंद तो नहीं ही करना चाहिए. भले ही भोजन बहुत पौष्टिक न भी हो पर पेट भरने लायक तो होना ही चाहिए। भूख के कारण किसी की मौत ना हो इसका ख्याल रखना हर सक्षम नागरिक का कर्तव्य है.

अभी घटी घटनाओं का फ़ायदा उठाने के लिए डिब्बाबंद खाने की सिफारिशें भी सर उठाने लगी हैं. जाहिर है यह ऐसा खाना बनाने और बेचने वाले बड़े ठेकेदारों और कंपनियों की लाबी के दाँव-पेंच हैं. जो लाखों रुपये के इस बाजार को हथियाना चाहते हैं. जब कि चिकित्सा विज्ञान ऐसे "जंक फूड" से बच्चों को दूर रखने को कहता है.
   
फिर उपाय क्या है?
उपाय तो हैं, बशर्ते उन्हें दृढ प्रतिज्ञ हो कर लागू किया जाए. पहले तो सारी योजना का विकेंद्रीकरण किया जाए. खाद्य सामग्री उपलब्ध करवाने वाली दुकानों का स्कूल के अधिकारियों से दूर-दूर का वास्ता न हो, इसका ध्यान रखा जाए. सप्लायर और स्कूल के गठबंधन पर नजर रखी जाए. यदि कोइ समिति बने तो उसमें स्कूल के छात्रों के पालक जरूर शरीक किए जाएं। क्योंकि अपने बच्चों के हित के लिए वे कुछ भी गलत होने से रोकेंगे। किसी समर्पित एन. जी. ओ. को योजना से जोड़ा जाए तो निश्चित ही अच्छे परिणाम मिल सकते हैं.      
         

शनिवार, 20 जुलाई 2013

गरीबी के बंजर में खिलती कोंपलें


ऐसे हजारों उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें एक इंसान ने अपने जीवन को परिवार के लिए होम कर दिया। पर ऐसे लोगों के साथ-साथ उनके बच्चे भी प्रशंसा के पात्र हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता के समर्पण को समझा, उनके त्याग को व्यर्थ नहीं जाने दिया।

एक-दो दिन पहले अखबार में पढ़ा कि गुजरात में एक ठेला लगाने वाले की बेटी ने अपने पहले प्रयास में ही सी.ए. की उपाधी पाने में सफलता हासिल कर ली. इसके बावजूद की अपनी पढाई के साथ-साथ वह अपने पिता का भी हाथ बंटाती थी. कम साधन, निम्न सुविधाओं और विपरीत परिस्थितियों में जब कोइ बच्चा ऐसी उपलब्धि हासिल करता है तो बहुत अच्छा लगता है. हालांकि ऐसे वाकये कम ही देखने-सुनने में आते हैं। ऐसा ही एक फेरीवाला  था जो खुद तो झाडू, झाडन इत्यादि घर-घर जा बेचता था पर उसने अपने दो बेटों को अच्छी तालीम दिलवाई जिसके फलस्वरूप एक सी.ए. बना और दूसरे को बैंक में नौकरी मिली.   

 संदर्भ वश वर्षों पहले की बातें और एक व्यक्ति की याद ताजा हो गयी है. कलकत्ते में हमारे पिताजी की एक मुंह बोली मौसी थीं. सगी माँ जैसॆ. मेरा बचपन खासा वहाँ बीता है. खुशहाल, समृद्ध परिवार था. दो-चार नौकर सदा घर पर रहते ही थे. उन्हीं में से एक थे रामदास। जिन्हें हम सब रामू काका कहा करते थे। उनकी अहमियत घर के अभिन्न सदस्य की तरह थी. एक तरह से सारे घर की जिम्मेवारी उनके ऊपर थी. मैंने उन्हें कभी गुस्सा होते या चिड़चिड़ाते नहीं देखा था. घर पर एक रसोईया होने के बावजूद हम उन्हीं के हाथ के "परौंठे" खाने के इच्छुक रहते थे. बनाते भी क्या लाजवाब थे, जैसे कोई कलाकार अपनी कला को मन से संवारता हो. मजाल है कि कभी अधसिका या ज्यादा सिक गया हो. एक-एक परत बनाने वाले के गुण का बखान करती थी.  कभी भी उनके मुख से ना नहीं सुनी, शायद खिलाने में उन्हें भी सुख मिलता था. घर एक चार कमरों का फ्लैट था. पर घर के पांच सदस्यों के अलावा कोई न कोई मेहमान आया ही रहता था. बाकी नौकर अपने समयानुसार आते-जाते थे पर रामू काका की रिहाइश वहीं थी, घर की बाल्कनी  में बने छोटे से कमरे में. वर्षों-वर्ष, जहां तक मुझे याद पड़ता है उनके 40-45 वर्ष वहीं कटे. किशोरावस्था से वहाँ पदार्पण करने वाले ने शरीर के अशक्त होने तक वहीं निवास किया बिना किसी गिले-शिकवे के. कभी कभी पुरानी फिल्मों में रामू काका जैसे अभिनेता को देख अक्सर उनकी याद आ जाती है, ऐसे लोगों का नाम रामू ही क्यों होता है? 
विषय से थोडा भटक गया था. साथ रहते-रहते उन्हें भी कारोबार की समझाइश दी जाती रही थी. समय के साथ उन्होंने भी इस परिवार की सहायता से अपना छोटा-मोटा काम शुरू कर दिया था. नेक इंसान पर खुदा की रहमत भी थी. साल में दो-तीन हफ्तों के लिए अपने गाँव जाने वाले इंसान ने कलकत्ते में रहते हुए ही अपनी बिटिया की शादी भले घर में की. एक बेटे को वकील बनाया तथा दूसरा सी.ए. बना. करीब सत्तर साल की उम्र में वे अपने घर चले गए थे जहां सात-आठ साल बाद उनका देहावसान हो गया.

ऐसे हजारों उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें एक इंसान ने अपने जीवन को परिवार के लिए होम कर दिया। पर ऐसे लोगों के साथ-साथ उनके बच्चे भी प्रशंसा के पात्र हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता के समर्पण को समझा, उनके त्याग को व्यर्थ नहीं जाने दिया। आज के भटकन भरे समय में पथभ्रष्ट न होते हुए, खुद भी मेहनत की और अपने लक्ष्य को पाने के लिए दिए गए बलिदान को सार्थक किया.               

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

शम्मी कपूर की फिल्मों के विरोधाभासी नाम

शम्मी कपूर.  हिंदी फ़िल्म जगत का एक ऐसा नाम जो अपने अभिनय से ज्यादा अपनी अदाओं यानी "मैनरिज्म" के कारण याद किया जाता है. जिसने अपने समय के दिग्गजों, सर्वकालीन महान अभिनेताओं के बीच अपनी पहचान बनाई. अभिनय और नृत्य की अपनी अलग शैली विकसित की और "रिबेल" कहलाए.  भले ही उस समय के आलोचकों ने उन्हें ज्यादा भाव न दिया हो फिर भी उन्होंने अभिनय के विश्वविद्यालयों जैसे कलाकारों के बीच अपनी छोटी सी पाठशाला स्थापित की जिसकी लीक पर कई अभिनेता चले और आज तक चल रहे हैं या यूं कहें की उसी लीक को ज्यादा पसंद किया जा रहा है. 
 
पर शम्मी जी की एक ख़ास बात जिसकी मिसाल अपने ही नहीं दुनिया के किसी भी देश के फिल्मी  जगत में शायद ही मिले वह है उनकी फिल्मों के विरोधाभासी नाम, जो एक दो नहीं, दसियों हैं. यदि उन्होंने जंगली में काम किया तो वे प्रोफेसर भी बने. यदि बद्तमीज में काम किया तो राजकुमार भी बने.
आइये देखें उनकी ऐसी ही कुछ फिल्मों के नाम -

जंगली ----------------------------------राजकुमार
जानवर ---------------------------------प्रोफेसर
ब्लफमास्टर ---------------------------ब्रह्मचारी
बद्तमीज ------------------------------प्रिंस 
बंडलबाज ------------------------------लाट साहब
हम सब चोर हैं ------------------------मिर्जा साहब
डाकू ------------------------------------प्रीतम
हरजाई --------------------------------विवेकानंद
वांटेड ----------------------------------शहीद भगत सिंह
मुजरिम -------------------------------विधाता

सोचिए मिलेगा ऐसा उदाहरण कहीं  और?


 
  

रविवार, 14 जुलाई 2013

जिसे डायन कहलवाने पर गर्व है

कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें किसी भी प्रकार सिद्ध न कर पाने  के बावजूद वे करोंड़ों लोगों का विश्वास बनी रहती हैं। इस तरह की ज्यादातर धारणाएं परालौकिक जगत को ले कर प्रचलित हैं। ख़ासकर इंसान की मृत्यु के बाद  का रहस्य इन बातों का मुख्य मुद्दा रहता आया है। सदियों से या यूं कहें की मनुष्य के जन्म के साथ ही यह रहस्य उपजा और आज तक विद्यमान है. हजारों-हजार ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनका दावा है की मृत्युपरांत वे इंसान की आत्माओं के संपर्क में आए या आ सकते हैं।

इप्सिता राय चक्रवर्ती 
इस बात पर शायद ही कोई भरोसा करे कि एक ओर जहां विज्ञान भूत-प्रेत को अंधविश्वास और झूठ मानता है वहीं महान वैज्ञानिक थॉमस एडिसन ने भूतों से बात करने के लिए एक मशीन बनाई थी। अभी कुछ दिनों पहले ऐसी ही एक खबर मीडिया में छाई रही जिसमें कोलकाता की इस्पिता राय चक्रवर्ती ने, जो विका संप्रदाय की एक अनुयायी हैं, इसी मशीन की मदद से भूतों से बात करने का दावा किया है। अपनी किताब "स्पिरिट्स आई हैव नोन" में इप्सिता रॉय चक्रवर्ती ने कहा मोशन पिक्चर कैमरा और फोनोग्राफ बनाने वाले मशहूर अमेरिकी वैज्ञानिक थॉमस एडिसन ने एक "स्पिरिट मशीन" भी बनाई थी। जो भूतों से बात करने के लिए बनाई गई थी और इसके बारे में कुछ चुनिंदा लोगों को ही पता है।  उनके अनुसार हमारा शरीर हजारों तत्वों से बना है जो शरीर के ख़त्म हो जाने के बावजूद नष्ट नहीं होते बल्कि अलग हो जाते हैं. इसलिए उन तरंगित तत्वों से फिर जुडा जा सकता है, इस मशीन से उन तरंगों को पकड़ा जा सकता है और इस तरह भूतों और आत्माओं से संपर्क हो सकता है।  सुनने में आता है कि एडिसन और उनके असिस्टेंट ने यह मशीन बनाई थी लेकिन वो बात करने में सफल हुए थे या नहीं ये बता पाना मुश्किल है।

कौन हैं ये इप्सिता चक्रवर्ती  क्या है विका धर्म .....
आज के समय में जब डायन शब्द एक घोर नकारात्मक और बुरा अर्थ रखता है, जिसकी आड़ में पुरुष निर्देशित समाज महिलाओं पर अत्याचार करने का मौका ढूँढ़ता रहता है, आज भी जब हमारे गाँव-देहातों में औरतें इस शब्द से खौफ खाती हैं, वहीं इप्सिता अपने-आप को डायन कहलवाने में गर्व महसूस करती हैं। उनका कहना है कि पिछले जन्म में औरतों और उनके खुद के ऊपर हुए जुल्म का बदला लेने उन्होंने दोबारा यह जन्म लिया है. इस जन्म में वह सदियों से चले आ रहे स्त्रियों के विरुद्ध षडयंत्र को समाप्त करना चाहती हैं. उनका कहना है, हाँ! मैं डायन हूँ. मैं ही क्यूँ, दुनिया की हर वह स्त्री, जिसे अपने होने का गरूर और अपनी ताकत का एहसास है, डायन है. 
विका संप्रदाय के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि इसका मतलब है "क्राफ्ट आफ वाइल्ड, लर्निंग आफ द वाइल्ड". इसका सिद्धांत है कि प्रकृति में एक सर्वोच्च सत्ता विद्यमान है. जो सर्वव्यापी है. उसकी पूजा-आराधना, मन्दिर, मस्जिद, चर्च या खुले में, कहीं भी की जा सकती है। उस सत्ता का जब हमारी अंदरूनी ताकत, हमारी इच्छाशक्ति से मेल होता है तभी चमत्कार घटित होता है।  

तब के कलकत्ता में 1950 के एक सभ्रांत परिवार में जन्मी तथा विदेश में पली-बढी देश की स्वघोषित प्रिय  डायन  इप्सिता का कहना है कि बचपन में खुद को मिल रहे संकेतों को वह समझ नहीं पाती थी पर उसे एहसास होता रहता था कि उसके आस-पास किसी अनोखी शक्ति का प्रवाह है. धीरे-धीरे उस आनन्ददायक शक्ति की मौजूदगी का प्रमाण मिलने लगा. वे मानती हैं कि उनकी शक्तियों का अभी वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं हुआ है. उन्हें खुद भी अपनी बातों को साबित करने में दिलचस्पी नहीं है. वे तो स्त्रियों के पक्ष में जो कुछ भी हो सकता है, जो कुछ भी संभव है, करने को तत्पर रहती हैं. 

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