pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 22 मई 2013

अच्छाई कभी मिट नहीं सकती

धर्म-जाति-क्षेत्रियता के नाम पर भोले-भाले लोगों को बरगला कर कुछ मुट्ठी भर लोग अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हुए हैं,पर फिर भी इमान, इंसानियत, सच्चाई अभी बिल्कुल खत्म नहीं हुए हैं संसार में अच्छे, सीधे, परोपकारी, संत स्वभाव के लोगों की संख्या ज्यादा है, पर संख्या और प्रतिशत में कम होने के बावजूद कुटिल लोग उन पर वैसे ही भारी पड जाते हैं जैसे ढेरों दूध पर एक बूंद खटाई की।
#हिन्दी_ब्लागिंग
संसार में अच्छे, सीधे, परोपकारी, संत स्वभाव के लोगों की संख्या ज्यादा है, पर संख्या और प्रतिशत में कम होने के बावजूद कुटिल लोग उन पर वैसे ही भारी पड जाते हैं जैसे ढेरों दूध पर एक बूंद खटाई की। पर लगातार ठगे जाने, धोखा खाने के बावजूद सुदूर गांवों में, पहाडों पर अभी भी निश्छल मानवता जिंदा है। पर इसके साथ ही यह भी सही है कि लगातार बढते शहरीकरण, टी.वी.-सिनेमा में आए घातक बदलाव, बाजार की मॉल संस्कृति का जहरीला धूंआ धीरे-धीरे उस निष्कपटता को आच्छादित करता जा रहा है। धर्म-जाति-क्षेत्रियता के नाम पर भोले-भाले लोगों को बरगला कर कुछ मुट्ठी भर लोग अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हुए हैं। पर फिर भी ईमान, इंसानियत, सच्चाई अभी बिल्कुल खत्म नहीं हुए हैं इसका उदाहरण या साक्ष्य आए दिन डरावनी खबरों से भरे अखबारों के किसी कोने में, तपते रेगिस्तान के नखलिस्तान के रूप में सद्भावना का संदेश देती कोई खबर मिल ही जाती है। जिसे पढ वर्षों पहले घटी इंसानियत की मिसाल की दो घटनाओं की सहसा याद आ जाती है। 

यह तब की बात है जब पहाडों का मतलब काश्मीर हुआ करता था।  मेरे पिताजी जिन्हें सब बाबूजी कहा करते थे, सदा काम में मशगूल रहने वाले इंसान थे। बहुत कम कहीं आते-जाते थे. हम दो भाई, माँ  तथा बाबूजी, छोटा सा संपन्न  परिवार। एक बार हमारे बहुत इसरार करने पर उन्होंने काश्मीर चलने की हमारी बात मान ली। हमें जैसे कोइ खजाना मिल गया हो.  कलकत्ते से दिल्ली ट्रेन द्वारा तथा वहां से सांयकालीन बस द्वारा श्रीनगर जाना तय हुआ। दिल्ली पहुंच अंतर्राजीय बस अड्डे से बस ली गयी।  सब तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार हो रहा था। सुबह बस पहाडों में थी। ऐसे यात्रा का पहला मौका था सो एक-एक दृश्य को आंखों में समो लेने की तदबीर हो रही थी। इसी बीच कुछ जल-कलेवे के लिए ड्रायवर ने बस को एक ढाबे पर रोका। सभी यात्री उतर कर “रिलैक्स” होने लगे। हल्के-फुल्के जलपान के बाद सब बस में सवार हुए और बस फिर अपने गंतव्य की ओर बढ चली। कुछ ही मिनटों के बाद मां को पता चला कि उनका हैंड बैग पीछे ही छूट गया है। बस में गहमागहमी मच गयी, किसी भी शहराती यात्री को बैग मिलने की उम्मीद नहीं थी। पर कंडक्टर और ड्रायवर ने ढाढस बंधाया, बस लौटाई  गयी, ढाबे के मालिक को जैसे ही सब बताया उसने तुरंत अपने कांउंटर से बैग ला मां को थमा दिया, सारा सामान, नगदी यथावत थी। सुखद आश्चर्य ने जान में जान डाली। सभी यात्री हमारी तकदीर का गुणगान कर रहे थे पर कंडक्टर और ड्रायवर जो पहाडों के वासी थे उनके लिए इस में कोई अनहोनी बात नहीं थी। यह हमारी आम शहरी मान्यताओं के लिए एक सुखद झटका था।


दूसरा दिन,   होटल से निकल हम चारों जने तफरीह के मूड में घूम रहे थे  कि अचानक पीछे से एक आदमी को जोर-जोर से पुकारते-दौडते अपनी ओर आते देखा। पहले हमने सोचा कि वह किसी ओर को बुला रहा होगा पर वह हमें ही रुकने का इशारा कर रहा था। कुछ ही पलों में वह हमारे पास आ पहुंचा और अपने हाथ का पर्स बाबूजी को थमाने लगा। बाबूजी बिना अपनी जेब देखे मना कर रहे थे कि यह मेरा नहीं है पर वह मान ही नहीं रहा था। नई जगह, अनजाने लोग, मैदानी शहरों की मानसिकता कि कहीं कोई फंसा ही ना रहा हो। तभी वहां एक और व्यक्ति आया जो हिंदी बोल-समझ लेता था। उसने बताया कि आप का पर्स पिछली दूकान में गिर गया था यह उसी को वापस कर रहा है। तभी मां के कहने पर बाबूजी ने अपनी जेब टटोली तो वहां क्या होना था, जैसे ही सारी बात साफ हुई पर्स सही जगह पहुंचा वैसे ही लाने वाले के चेहरे पर पसरा तनाव गायब हो गया जैसे कोई भारी बोझ से मुक्ति मिली हो। बाबूजी ने उसे कुछ देना चाहा तो वहां से ऐसे सिर-हाथ हिलाते भाग लिया जैसे सांप देख लिया हो। 


दो दिनों में ये दो सुखद झटके हम तथाकथित समझदार शहरी लोगों की कई मान्यताओं को बदल कर रख गये। आज भी जब ऐसे लोगों की याद आती है तो वर्तमान के प्रति कडवाहट  कम तो होती ही है भविष्य भी आशा बंधाता नजर आता है। 

रविवार, 12 मई 2013

कर्नाटक ने मुहावरे सार्थक किए



मुहावरे या लोकोक्तियां यूं ही नहीं बन जाते इनमें वर्षों के अनुभवों का निचोड होता है। अब देखिए कर्नाटक में सत्ता पलटते ही और कुछ सिद्ध हो ना हो पर एक साथ कई मुहावरे सार्थक हो गये, जैसे घर का भेदी लंका ढाए, दो की लडाई में तीसरे का भला, बिल्ली के भाग छींका टूटा, हम तो डूबेंगे तुम्हे भी ले डूबेंगे, दो नावों का सवार कहीं नहीं पहुंचता। 

ऐसे ही अर्थों वाले और  मुहावरे भी  अपने औचित्य पर मुस्कुराने लगे हैं।



शनिवार, 4 मई 2013

“अंतिम यात्रा का ब्रांडेड पैकेज”


इंसान के जन्म लेते ही बाजार उसे हाथों-हाथ लेने लगा है और उसकी क्षण-क्षण की प्रगति को पग-पग पर भुनाना शुरु कर दिया है तो  उसकी अंतिम यात्रा, उसके निर्वांण के मौके को वह कैसे छोड सकता है। जबकी यह तो कभी खत्म ना होने वाला व्यापार है। अभी तक शायद कुछ भ्रांतियों, कुछ लोक-लाज, कुछ आलोचनाओं के डर से किसी ने शायद चाहते हुए भी इस तरह का कदम नहीं उठाया है पर लगता है बाजार की गिद्ध दृष्टि से धनागम का यह अजस्र स्रोत ज्यादा दिन तक बचा नहीं रह सकेगा।

बिक्री हो ना हो पर हर छोटे-बडे शहर में नए-नए माल का अवतरित होना निर्बाध रूप से जारी है। ये होते भी करीब-करीब एक जैसे ही हैं। ग्राहकों से ज्यादा सेल्स ब्वाय या गर्ल्स द्वारा जगह घेरे रहने वही जूते-चप्पलों, कपडे-लत्तों की ढेरों दुकानें। इनके बीच-बीच में  खाने-पीने का जुगाड ले बैठे कुछ देसी, विदेशी खान-पान से जुडे लोग। किसी एक "फ्लोर" में एक बडी सी “मनीहारी” की दुकान। किसी एक तल पर जनता के मनोरंजन हेतु एकाधिक स्क्रीन लगाए बैठे फिल्म वाले। एक तल से दूसरे तल तक आने-जाने के लिए चलित नसैनियां। शहर, स्थान को छोड सब एक जैसा, मिलता-जुलता। फिए भी लोग आते हैं भीड लगी रहती है पर वे खरीदते कम वातानुकूलिता का आनंद लेते हुए समय बिताने ज्यादा आते हैं।  इनको रिझाने को तरह-तरह के उचित-अनुचित ढंग माल वालों की ओर से भी अपनाए जाते रहते हैं।

ऐसे ही एक दिन आफिस से एक नवनिर्मित, विशाल व भव्य,  बाजार द्वारा फेंके गये फंदे को देखने चला गया, लौटा तो बेहद थका हुआ था घर आते ही नींद पूरी तरह हावी हो गयी। पर माल की भव्यता सपने में भी तारी रही। खुद को वहीं घूमता पा रहा था। ऐसे में ही अचानक एक शो-रूम के सामने पैर ठिठक गये। कुछ नया और हट कर लग रहा था उसके प्रवेश द्वार पर बडे-बडे अक्षरों में लिखा हुआ था “अंतिम यात्रा का सुगम ब्रांडेड पैकेज”। नयी चीज देख जिज्ञासा जगी। इस बला को जानने अंदर बैठी बाला के पास गया। उसने मुस्कुराहट के साथ स्वागत किया। फिर मेरे पूछने पर उसने जो बताया वह हैरतंगेज तो था ही बाजार की अनंत भूख के लिए आम जन की मेहनत की कमाई रूपी खून का निर्बाध प्रवाह जारी रखने के षडयंत्र का भयावह रूप भी सामने ला रहा था।   

बाला के अनुसार आज के भागा-दौडी के जमाने में जो चीज सबसे कम उपलब्ध है वह है समय। इसी कारण चाहते ना चाहते हुए हम अपने कई अनुष्ठानों को पूरा नहीं कर पाते। इसके अलावा बहुतेरे सम्पन्न घरों के माता-पिता वृद्धाश्रम में दिन गुजारते इहलोक से परलोक को रवाना हो जाते हैं। इसी सब को मद्दे नज़र रख हमने यह नया “कांसेप्ट शुरु किया है। जिस तरह आप शादी-ब्याह, जन्म दिन, मुंडन, जनेऊ आदि के मौकों पर पैकजों की सुविधा लेते हैं उसी तरह हम इंसान की अंतिम यात्रा को बिना किसी अडचन और असुविधा के पूरी करने की जिम्मेदारी लेते हैं। बस आपको शव का एड्रेस और अपनी जरूरतों का पूरा ब्योरा हमें देना होता है। बाकी माचिस से लेकर पंडित और अस्थी विसर्जन से लेकर पगडी तक का सारा जिम्मा हम ले लेते हैं।  हमारे पंडित भी अपने विषय में मास्टर या पी.एच.डी. डिग्री धारी होते हैं जो अपने काम को बखूबी समझ कर संबंधित परिवार की भावनाओं का ख्याल रखते हुए पूरी निष्ठा और विधी पूर्वक सम्पन्न करवाते हैं। इन दिनों परिवार में बाहर से आए लोगों के खाने-पीने-रहने की भी हम समुचित व्यवस्था करते हैं। इस कर्म-कांड में प्रयुक्त तमाम वस्तुएं “ब्रांडेड कम्पनियों” की ही प्रयोग में लाई जातीं हैं। जैसे बांस वगैरह हम सुदूर आसाम से मंगाते हैं। चिता की लकडियां भी करीने से तराशी हुई एक सार होती हैं जिनसे हमारे विशेषज्ञ अंतिम शय्या तैयार करते हैं जो देखने में बिल्कुल आरामदायक बिस्तर का एहसास करवाती है। दहन स्थल पर प्रयुक्त होने वाली सारी सामग्री शुद्ध और ब्रांडेड हो इसका पूरा ख्याल रखा जाता है। शव को श्मशान तक लाने हेतु वातानुकूलित वैन प्रयुक्त की जाती है। इतना ही नहीं घर से लोगों को लाने और छोडने के लिए वातानुकूलित बस भी मुहैय्या करवाई जाती है। बात हो ही रही थी कि तभी वहां कुछ "अप-टु-डेट सज्जन" बुकिंग के लिए आ गये और मेरी फिर ना आने वाली नींद खुल गयी। 

मैं बाकी रात भर सोचता रहा कि जब इंसान के जन्म लेते ही बाजार उसे हाथों-हाथ लेने लगा है और उसकी क्षण-क्षण की प्रगति को पग-पग पर भुनाना शुरु कर दिया है तो उसके निर्वांण के मौके उसकी अंतिम यात्रा  को वह कैसे छोड सकता है। जबकी यह तो कभी खत्म ना होने वाला व्यापार है। अभी तक शायद कुछ भ्रांतियों, कुछ लोक-लाज, कुछ आलोचनाओं के डर से किसी ने शायद चाहते हुए भी इस तरह का कदम नहीं उठाया है पर लगता है बाजार की गिद्ध दृष्टि से धनागम का यह अजस्र स्रोत ज्यादा दिन तक बचा नहीं रह सकेगा।

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

मोटापे पर वजन की मार

भट्ट साहब का ध्यान इस ओर शायद नहीं गया कि अपनी इस सलाह से वे जिमों, व्यायामशालाओं, स्लिम करने का दावा करने वाले पेय और खाद्य बनाने वाली कंपनियों का परोक्ष-अपरोक्ष रूप से कितना भला कर रहे हैं। ऐसा त्तो नहीं कहीं उनकी भी ऐसी कोई संस्था हो।

मोटापा इंसान के लिए खतरे की जड है, यह सभी जानते हैं। यह भी सही है कि यह अपने आप में खुद ही एक बिमारी है जिसके दसियों नुक्सान हैं। इन सब के अलावा मोटे लोगों के लिए एक और बुरी खबर है, यदि नार्वे के एक अर्थ शास्त्री का सुझाव मान लिया गया तो हवाई यात्रा करने वाले स्थूलकाय लोगों को अपने वजन के हिसाब से पैसा चुकाना पडेगा। उनके अनुसार ऐसा करना स्वास्थ्य, वित्त और पर्यावरण के लिए लाभदायक होगा। 

नार्वे यूनिवर्सिटी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर भरत भट्ट ने सलाह दी है कि एयरलाइन्स को हवाई यात्रियों से उनके वजन के मुताबिक पैसा लेना चाहिए। भट्ट ने ‘जर्नल ऑफ रेवेन्यू एंड प्राइसिंग मैनेजमेंट’ में लिखा है कि इससे लोग अपना वजन घटाने को प्रेरित होंगे जिससे उन्हें दोहरा लाभ होगा, एक तो वे स्वस्थ रहेंगे दूसरा उनका किराया घटने से उनकी बचत भी होगी। उनके मुताबिक इस तरह की योजना को अपनाने वाले जहाज में हल्के वजन वाले ज्यादा यात्रियों को लिया जा सकेगा। इससे एयरलाइन्स को भी फायदा होगा। साथ ही यह पर्यावरण के लिए नुकसानदेह ईंधन के उपयोग में भी कमी लाएगा।

भट्ट ने तीन आप्शन पेश किए है, जिन्हें वह ‘अपने वजन के हिसाब से हवाई किराया देना’ कहते हैं। पहले के अनुसार यात्री और उसके सामान के वजन के हिसाब से किराया तय होगा। दूसरे के मुताबिक एक आधार किराया होगा जो सबके लिए होगा। इसके बाद ज्यादा वजन वाले यात्रियों से अतिरिक्त पैसा वसूला जाएगा। 

पर भट्ट साहब का ध्यान इस ओर शायद नहीं गया कि अपनी इस सलाह से वे जिमों, व्यायामशालाओं, स्लिम करने का दावा करने वाले पेय और खाद्य बनाने वाली कंपनियों का परोक्ष-अपरोक्ष रूप से कितना भला कर रहे हैं। ऐसा त्तो नहीं कहीं उनकी भी ऐसी कोई संस्था हो।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

क्या माँ का बुलावा सचमुच आता है ? दूसरा व अंतिम भाग।

कल बयान किया था कि मां के दरबार मे जाऊं या ना जाऊं कि ऊहापोह के बीच शुरु हुए सफ़र मे शुरु से ही अडचने आती रहीं पर दूर भी खुद ब खुद होती चली गयीं। पर दरबार के बिल्कुल पास आ बर्फ ने जो परेशानी खडी की उससे उस समय कैसे पार पाया था सोच कर ही ताज्जुब होता है। अब आगे - 

सूर्य देवता अस्ताचलगामी हो चुके थे। गनीमत यह रही कि अंधेरा होते-होते हम परिसर में पहुंच गये थे। पर यहां का तो नज़ारा ही विचित्र था। हर ओर आदमी ही आदमी। हर कमरा, गलियारा, बाल्कनी, बरामदा, हर कोना भरा पडा था इंसानों से। दर्शन कर लौट ना पाने वालों का हुजुम था यहां। कहीं कोई जगह नहीं। भवन की धर्मशाला के  पीछे खुलने वाला हिस्सा, जिसके फर्श पर बर्फ का कालीन बिछा हुआ था, वहां भी किसी तरह लोग सिमटे-सिकुडे पडे हुए थे। हमारे पास तो जरूरत के कपडे भी नहीं थे, कहीं से मिलने की उम्मीद भी नहीं दिख पा रही थी। और कोई उपाय ना पा हमने किसी तरह बर्फ हटा अखबारों को बिछा उसी खुले में अपना डेरा डाल दिया। दो शालों में तीन जने सिकुड कर बैठ गये। रात के गहराने के साथ-साथ ठंड का प्रकोप भी बढता जा रहा था जिसके चलते रह-रह कर शरीर में कंपकपी उठ रही थी जो रोके ना रुक पा रही थी।

बर्फ ही बर्फ चारों ओर
31 तारीख। साल का अंतिम दिन।  किसी तरह आंखों ही आंखों में रात कटी। सही-सही तो याद नहीं पर शायद हमें तीन-चार सौ के बीच कोई नंबर मिला था, दर्शनों के लिए। करीब साढे पांच बजे मैं अपना नंबर देखने उठा, शरीर अकडा पडा था किसी लकडी के फट्टे की तरह। पर किसी तरह की थकान महसूस नहीं हो रही थी। बोर्ड के पास जा कर देखा तो सौ से कुछ ही ऊपर बचे थे नंबर। मैने आकर दोनों को बताया और हम फटाफट नहाने के लिए बढ लिए। उन दिनों स्नानागर में नलों के अलावा मोटे-मोटे पाइपों से 

जल की धार अनवरत बहती रहती थी। सुबह का समय, बेतहाशा ठंड। लोग झट से पानी के नीचे जा पूरा भीगने के पहले ही भाग लेते थे। हड्डियों को कंपाने वाली ठंड के मारे हमारी हिम्मत ही नहीं हो रही थी कपडे उतारने की।जूते पहन लाइन में जा लगे। समय  यही तय रहा कि हाथ-मुंह धो लेते हैं, वैसे यह भी कोई आसान काम नहीं था अपने आप में उस माहौल में। तभी वहां एक आठ-दस साल का बालक दौडता हुआ आया, झट से कपडे उतारे, जै माता दी का जयकारा लगाया और पानी के नीचे जा खडा हुआ। हमें अपने पर शर्म आयी उस छोटे से बच्चे की हिम्मत देख कर। किसी तरह एक-एक कर कपडे उतारे, सांस रोक जैसे ही पानी के नीचे गये लगा किसी ने चाबुक मार दिया हो, करंट सा झटका, शरीर सुन्न। तौलिया भी तो नहीं था किसी तरह रुमाल से ही पोंछ-पांछ कर जल्दी से कपडे-था सुबह के सवा छह।

सबको आशा थी कि दो-तीन घंटे में दर्शन हो जाएंगे। इसीलिए कई लोग श्रद्धावश बर्फ पर भी नंगे पैर खडे थे। उन्हें देख हमने मां से क्षमा मांगी और अपने, जो था उसी जिरह-बख्तर समेत डटे रहे। पर एक ही जगह खडे-खडे नौ बज गये। ठंड के प्रकोप से दो-तीन महिलाएं बेहोश हो गयीं। किसी तरह चाय वाले की अंगीठी के पास ले जा कर उनकी सुश्रूषा की गयी। लाइन एक इंच भी नहीं सरक रही थी। उसी स्थिति में खडे-खडे एक बज गया। कोई बता नहीं पा रहा था कि ऐसा क्यों है। इसी बीच खबर आई कि रास्ता खुल गया है। लोग धीरे-धीरे लौटने लगे थे। तभी देखा एक पुरोहित अपने यजमान पति-पत्नी को भवन के ठीक नीचे ले गया और बोला यहीं से ध्यान लगा मां को प्रणाम कर लें। दोनों ने हाथ जोड वहीं प्रार्थना की और वापस हो लिए। पता नहीं उनकी क्या मजबूरी रही होगी कि इतने पास आ कर भी दर्शनों को मोहताज रह वापस लौटना पडा।
माँ का दरबार 
करीब तीन बजे पुलिस आई, पता चला कि पैसे ले कर बिना लाइन के लोगों को आगे से ले जा कर दर्शन करवाए जा रहे थे। इनमें दो-तीन दिन से फंसे लोग भी थे जो लौटते-लौटते फिर “पुण्य” कमाने के लिए बाकी लोगों की तकलीफें बढा रहे थे। मन के किसी कोने से आवाज उठी, मां के सामने ऐसा अन्याय?

खैर पुलिस ने व्यवस्था संभाली, धांधली रुकी तो लाइन मे जान आयी। आडे-तिरछे खिसकते, अटकते, रेंगते, रुकते, चलते, जैकारा लगाते, भजन गाते करीब पौने बारह बजे जाकर हम गुफा के द्वार पर पहुंच पाये। उन दिनों एकतरफा आवागमन था। आठ-दस लोग भीतर जाते थे उनके बाहर आने पर ही दूसरे आठ-दस लोगों को भीतर जाने दिया जाता था।  अंदर फिर वही हडबडी किसी को दस सेकेंड भी खडे होने का मौका नहीं मिल पाता था। पंडे सैंकडों मीलों से आए लोगों को अंदर पिंडियों को एक नजर देखने के पहले ही बाहर करने पर उतारू रहते थे। मजबूरी उनकी भी थी, नहीं तो कौन अंदर से हटना चाहेगा। जो भी था हम ठीक 12 बजे नये साल की शुरुआत पर मां के चरणों में थे। दर्शन लाभ ले बाहर आए।
कल और आज में जमीन आसमान का फर्क था। अफरात जगह खाली पडी थी। फंसे हुए लोग जा चुके थे। कमरे अपनी गर्माहट के साथ उपलब्ध थे। कंबलों के ढेर सुलभ थे ठंड से बचा अपने आगोश में लेने के लिए। रात बडे ही सकून से गुजरी।

1 तारीख। नया साल। सुबह माँ से विदा ले शाम को जम्मू से बस द्वारा दिल्ली का रुख कर लिया। इस यात्रा के दौरान कई विडंबनाएं दिखीं। बूढे से बूढे व्यक्ति को पैदल चढाई चढते देखा और वहीं, हृष्ट-पुष्ट जवान को घोडे या बंहगी में टंगे जाते देखा। मां के दरबार में भी पैसों के लिए धांधली देखी। रास्ता चलते अनजानों को भी प्रेम से एक दूसरे की निस्वार्थ मदद करते देखा। गरीबों की इमानदारी भी देखी। भक्तों की मासूमियत का लाभ उठा उनको ठगे जाते भी देखा। गर्भ जून की खोह में कैदी की तरह  पैसों के ढेर पर बैठे पंडे को देखा। अबोध, मासूम बालिका को पैसों के कारण माँ-बाप द्वारा देवी का रूप धरवा, मार्ग पर बैठे देखा। हम जैसों को अडचनों पर पार पा अपनी यात्रा सफ़ल होते देखा। उसी के साथ इतनी दूर आ कर भी माँ के दर्शन न कर पाने वाले लोगों को भी देखा। प्रभू की माया अपरंपार है। कौन इसका भेद जान पाया है।  

पर इन सब के साथ ही यह सवाल भी अनुत्तरित ही रहा कि क्या हम लोगों के लिए यह माँ का बुलावा था? यदि हां, तो कदम-कदम पर अडचनें क्यूं खडी मिलीं?  क्यों हमें बार-बार गैर कानूनी रास्ते अख्तियार करने पडे, और यदि नहीं बुलाया था!!! तो दर्शन कैसे दे दिए?
है कोई जवाब?
जै माता दी।
खा। गरीबों की इमानदारी भी देखी। भक्तों की मासूमियत का लाभ उठा उनको ठगे जाते भी देखा। गर्भ जून एक एक खोहमें कैदी की तरह  पैसों के ढेर एक पर बैठे पंडे को देखा। अबोध, मासूम बालिका को पैसों के कारण माँ-बाप द्वारा देवी का रूप धरवा, मार्ग पर बैठे देखा। हम जैसों को अडचनों पर पार पा अपनी यात्रा सफ़ल होते देखा। उसी के साथ इतनी दूर आ कर भी माँ के दर्शन न कर पाने वाले लोगों को भी देखा। प्रभू की माया अपरंपार है। कौन इसका भेद जान पाया है।   

पर इन सब के साथ ही यह सवाल भी अनुत्तरित ही रहा कि क्या हम लोगों के लिए यह माँ का बुलावा था? यदि हां तो कदम-कदम पर अडचनें क्यूं खडी मिलीं और क्यों हमें बार-बार गैर कानूनी रास्ते






बुधवार, 17 अप्रैल 2013

माँ का बुलावा क्या सचमुच आता है? एक अजब-गजब यात्रा वृतांत


ऐसी आम धारणा है कि किसी देव-स्थान या तीर्थ पर जाना तभी संभव हो सकता है जब वहां के अधिष्ठाता देवी या  देवता का बुलावा आता है। खासकर वैष्णव देवी के धाम के साथ यह विश्वास काफी गहराई से जुडा हुआ है। अभी हाल में ही इस विषय पर पक्ष और विपक्ष में कथन पढने को मिले। तभी वर्षों पहले की गयी एक यात्रा का विवरण आंखों के सामने कौंध गया। किसी भी पक्ष की तरफ़दारी ना करते हुए सिर्फ आपबीती बयान कर रहा हूं।   हालांकि उस समय हर कदम पर अडचनें आयीं पर खुद ब खुद दूर भी होती चली गयीं। उस समय घटी एक-एक बात या घटना "पक्ष" की ओर इशारा करती है। पर फिर भी मन किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुंच पाया आज तक। अनेक घटनाओं के कारण यात्रा का वर्णन काफी लंबा हो गया है। इसलिए इसे दो भागों में रख रहा हूं।    

28 तारीख। दिल्ली। 82 या 83 का साल। दिसम्बर का महीना कडाके की ठंड। कार्यस्थल के एक सहयोगी, श्री ओमी ने वैष्णव देवी के दर्शनार्थ चलने का प्रस्ताव रखा। उस समय "जगराते" बहुत होते थे। खासकर टैक्सी, स्कूटर स्टैंड वाले समय-समय पर ऐसा आयोजन करते रहते थे। जिनमें इक्की-दुक्की जगह को छोड कर अधिकांश में फिल्मी गानों पर आधारित भजन गाये जाते थे। मैं कभी भी इन सब जगहों से तारतम्य नहीं बैठा पाया। जिन भजनों को सुन मां की मूरत के बदले फिल्मों के सीन याद आएं वहां श्रद्धा कहां से उपजती। पता नहीं क्यों यह धारणा बन गयी थी कि यह देवी सिर्फ टैक्सी-स्कूटर वालों की अधिष्ठात्री देवी हैं। शायद इसी लिए ओमी के बहुत जोर देने पर भी मन बन नहीं पा रहा था जाने का। पर नहीं जाने का भी कोई कारण नहीं समझ आ रहा था।

माँ का दरबार 
उन दिनों नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली स्टेशनों तक जाने के लिए विभिन्न कालोनियों से रल नं। वाली बसें चला करती थीं। राजौरी गार्डेन से रल 6 नं की बस गुजरती थी, जो हम दोनों के घरों को जोडती चलती थी। सो मैंने ऐसे ही कह दिया कि चलना होगा तो अंतिम रल 6 में मिल जाऊंगा। क्योंकि पुरानी दिल्ली से जम्मू एक्स।, ठीक से याद तो नहीं, पर उस समय शायद साढे ग्यारह बजे चला करती थी, से जाने का प्रोग्राम था। घर आ कर बताया तो श्रीमती जी ने भी चले जाने को ही कहा। ऊहापोह में पौने नौ बज गये बस सवा नौ के आस-पास थी। पता नहीं जाने वाले मन का पलडा कैसे भारी पडा कि बैग उठा बस स्टैंड जा पहुंचा। तभी बस भी आ गयी, जिसमें ओमी जी तथा उनका छोटा भाई मौजूद थे। मुझे देख उन्होंने एक सुखद सांस ली। पर यह तो शुरुआत थी। आगे होने वाली बातों का कहां किसी को अंदाज था।

स्टेशन पहुंच कर पता चला कि गाडी में बिल्कुल भी जगह नहीं है, खडे हो कर जाना भी मुश्किल लग रहा था। मन में पहला विचार यही आया चलो लौट चला जाए। टिकट खिडकी पर विचार विमर्श चल ही रहा था कि एक सज्जन अपने टिकट वापस करवाने आ गये, वह भी पूरे तीन। पर उसमें एक टिकट महिला का था। मेरे आनाकानी करने पर भी ओमी ने यह मौका हाथ से नहीं जाने दिया। मेरे कहने पर भी कि एक तो टिकट बाहर से ले रहे हैं दूसरा उसमें एक महिला का है, गडबड हो गयी तो? ओमी का कहना था कि छोटे भाई को ढक-ढुक कर ऊपर की बर्थ पर सुला देंगे। वैसे भी रात का समय है कौन खोज-खबर लेगा। खैर गाडी पकड ली गयी। कुछ ही देर में कठोर से चेहरे और टेढी भृकुटी वाला चेकर भी आ धमका, वह ओमी का भी गुरु था, बहस बाजी, मोलतोल के बाद किसी तरह 100 रुपये में भाई को बहन मान आगे बढ गया। ऐसे एक बला टली।

29 तारीख। इस तरफ पहली बार जाना हो रहा था सो जम्मू में ठौर के तौर पर ओमी के मामा जी के यहां पडाव डालने की बात थी। अपरान्ह में जम्मू पहुंच उनके घर पहुंचे तो देखा वे घर का ताला खोल रहे हैं। पता चला कि दो सप्ताह बाद अभी पंजाब से लौटे हैं। हम सोच रहे थे कि वे दो-तीन बाद आते तो? खैर जो हुआ अच्छा ही हुआ। तरोताजा हो आगे जाने का पता करने हम बस अड्डे की तरफ चले गये वहां जा पता चला कि दरबार का रास्ता बंद है। ऊपर बर्फ-बारी हुई है। करीब दस हजार लोग फंसे हुए हैं। शासन ने और भीड ना बढे इसलिए यात्रा रोक दी है। अब !!! इतनी दूर आ कर बिना दर्शन के लौटना!!! मन मायूस सा हो गया। पर उपाय भी क्या था?

30 तारीख। आते समय रेल की हालत देख ही चुके थे तो इस बार बस से ही दिल्ली वापसी का तय पाया गया। धूप खिली हुई थी, पर ठंड भी काफी थी। सो कुछ गर्म कपडे पहन ऊपर एक लोई डाल बस के समय का पता करने फिर एक बार बस अड्डे पहुंचे। अभी देख-सुन ही रहे थे कि पता नहीं कहां से एक व्यक्ति आया और पूछने लगा कि क्या कटरे जाना है? ज्ञात हो कि मां के भवन की पैदल यात्रा कटरे से ही प्रारंभ होती है। अब तो खैर बहुत से साधन हो गये हैं पर उस समय घोडे, बंहगी या पैदल ही पहुंचा जाता था। हमें तो मनचाही मुराद मिल गयी। हमारी स्वीकारोक्ति पर उसने अड्डे के बाहर कोने में खडी एक बस की ओर ईशारा कर दिया। पता चला कि नाके पर मेजिस्ट्रेट बैठा हुआ है सो परमिट उसी रास्ते पर पडते किसी गांव का लिया गया है। वहां जा दूसरे रास्ते से कटरा जाया जाएगा। चलना है तो अभी पांच-सात मिनट में चलना होगा। सोचने का समय कहां था, नाहीं घर खबर करने का। उस समय मोबाइल कहां होते थे। हम तीनों वैसे ही बस में सवार हो गये। कंडक्टर ने जयकारा लगाने से मना कर कहा कि नाके पर चेकिंग के बाद जो करना है करें, पर तब तक बिल्कुल चुपचाप रहें। राम-राम कर नाका पार हुआ, हम सब को लगा कि जैसे कोई किला फतह कर लिया हो। फिर तो बिना किसी अडचन के कटरे जा पहुंचे। सबसे पहले मामा जी को फोन पर सारी बात बताई। पर किसे पता था कि अभी तो इंटरवल ही हुआ है।

कटरे में बताया गया कि ऊपर बिल्कुल जगह नहीं है, अपनी जिम्मेदारी पर आगे जा सकते हो। फिर क्या था, बस के सारे यात्रियों ने बिना रुके उसी समय चढाई चढनी शुरु कर दी। अर्ध क्वारी, गर्भ जून कहीं कुछ भी नहीं, सब ठीक-ठाक, कहीं कोई बर्फ नहीं। हम सब को आश्चर्य हो रहा था कि यात्रा क्यूं रोकी गयी थी। पर इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि यह यात्रा एकतरफा थी। हमें ऊपर से कोई लौटता नहीं मिला था। हंसते-गाते-जयकारा लगाते हम सब करीब-करीब भवन तक पहुंच ही गये थे कोई चार-पांच की।मी। का रास्ता और बचा था कि एक बच्चे की किलकारी सुनाई पडी, मम्मी बर्फ!!! सभी ने मुड कर देखा बायीं तरफ़ एक झाडी पर एक छोटा सुंदर सा बर्फ का फाहा टंगा हुआ था। यह आगत का विजिटिंग कार्ड था।

अगला मोड पार करते ही दुनिया बदल गयी। हम सब जैसे किसी दूसरे लोक में आ गये हों। प्रभू ने जैसे सफेद रंग की कूची फेर दी हो सारी कायनात पर। जहां तक नज़र जाती थी बर्फ ही बर्फ, सिर्फ बर्फ। दूर दिखता भवन,
बर्फ से ढका पूरा परिवेश 
उसके आस-पास की अन्य इमारतें, जंगल, झाडी, पहाड, घाटी सब पर बर्फ का भारी लिहाफ। अब तो हमारे पांवों के नीचे भी बर्फ की चिकनी सतह मोटी
होती जा रही थी। ऊपर से ढलान भी शुरु हो चुकी थी। लोग बार-बार फिसल रहे थे। अब पछतावा हो रहा था कि कटरे में लोगों की सलाह मान कर चलने में सहायक छडियां क्यूं नहीं लीं। फिर दस्ताने वगैरह भी नहीं थे जो आस-पास की झाडियों का ही सहारा लिया जा सकता। किसी तरह सब एक दूसरे का हाथ पकड कछुए की तरह रेंग रहे थे। पीछे एक मां बार-बार अपने बेटे को संभल कर चलने का निर्देश दे रही थी। अचानक हमारे पैरों के पास से वही महिला फिसलती हुई आगे निकलीं, बडी मुश्किल से उन्हें संभाल कर सहारा दे खडा किया जा सका। उन चार कि.मी. को पार करने में तीन-साढे तीन घंटे लग गये।

आगे का हाल कल बयान करूंगा। कैसे लाइन में एक ही जगह खड़े-खड़े नौ घंटे बीत गये. 

शनिवार, 30 मार्च 2013

अब्राहम लिंकन ने गीता शायद ही पढी होगी,


पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है?   शायद हां।   इसी  "हां"  को समझाने के लिए भगवान ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था। क्योंकि वे जानते थे कि इस "हां"  से आम-जन को परिचित करवाने के लिए, उसकी क्षमता को सामने लाने के लिए उसे मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी।


अब्राहम लिंकन ने गीता तो नहीं पढी होगी पर उनका जीवन पूरी तरह एक कर्म-योगी का ही रहा। वर्षों-वर्ष असफलताओं के थपेड़े खाने के बावजूद वह इंसान अपने कर्म-पथ से नहीं हटा।  अंत में तकदीर को ही झुकना पड़ा उसके सामने।

अब्राहम लिंकन 28-30 सालों तक लगातार असफल होते रहे। जिस काम में हाथ ड़ाला वहीं असफलता हाथ आई। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लोगों के लिए मिसाल पेश की और असफलता को कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। लगे रहे अपने कर्म को पूरा करने में, जिसका फल भी मिला। दुनिया के सर्वोच्च पद के रूप में। 

उनकी असफलताओं पर नज़र डालें तो हैरानी होती है कि कैसे उन्होंने तनाव को अपने पर हावी नहीं होने दिया होगा। 20-22 साल की आयु में घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए उन्होंने व्यापार करने की सोची, पर कुछ ही समय में घाटे के कारण सब कुछ बंद करना पड़ा। कुछ दिन इधर-उधर हाथ-पैर मारने के बाद फिर एक बार अपना कारोबार शुरु किया पर फिर असफलता का मुंह देखना पडा।  26 साल की उम्र में जिसे चाहते थे और विवाह करने जा रहे थे, उसी लड़की की मौत हो गयी। इससे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। पर फिर उन्होंने अपने आप को संभाला और स्पीकर के पद के लिए चुनाव लड़ा पर वहां भी हार का सामना करना पड़ा। 31 साल की उम्र में फिर चुनाव में हार ने पीछा नहीं छोड़ा। 34 साल में कांग्रेस से चुनाव जीतने पर खुशी की एक झलक मिली पर वह भी अगले चुनाव में हार की गमी में बदल गयी।

46 वर्षीय लिंकन ने हार नहीं मानी पर हार भी कहां उनका पीछा छोड़ रही थी फिर सिनेट के चुनाव में पराजय ने अपनी माला उनके गले में डाल दी। अगले साल उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए खड़े हुए पर हार का भूत पीछे लगा ही रहा। अगले दो सालों में फिर सिनेट पद की जोर आजमाईश में सफलता दूर खड़ी मुस्काती रही। पर कब तक भगवान परीक्षा लेता रहता, कब तक असफलता मुंह चिढाती रहती, कब तक जीत आंख-मिचौनी खेलती। दृढ प्रतिज्ञ लिंकन के भाग्य ने पलटा खाया और 51 वर्ष की उम्र में उन्हें राष्ट्रपति के पद के लिए चुन लिया गया। ऐसा नहीं था कि वह वहां चैन की सांस ले पाते हों वहां भी लोग उनकी बुराईयां करते थे। वहां भी उनकी आलोचना होती थी। पर लिंकन ने तनाव-मुक्त रहना सीख लिया था। उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति इतना अच्छा नहीं होता कि वह राष्ट्रपति बने, परंतु किसी ना किसी को तो राष्ट्रपति बनना ही होता है।

तो यह तो लिंकन ही थे जो इतनी असफलताओं का भार उठा सके। पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है?   शायद हां।   इसी  "हां"  को समझाने के लिए भगवान ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था। क्योंकि वे जानते थे कि इस "हां"  से आम-जन को परिचित करवाने के लिए, उसकी क्षमता को सामने लाने के लिए उसे मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी।


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